गंगाजल की गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीय चेतावनी
पाक्षिक ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....

गंगाजल की गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीय चेतावनी

         फरवरी 2026 में ब्रिटिश जीवविज्ञानी और टीवी प्रस्तोता जेरेमी वेड का वीडियो वायरल हुआ। ​वे दुनिया भर में अपने मशहूर शो ‘रिवर मॉन्स्टर्स’ (River Monsters) के लिए जाने जाते हैं। जनवरी और फरवरी 2026 के दौरान उनके द्वारा साझा किया गया वीडियो भारत में सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना, जिसमें उन्होंने गंगा के जल की स्थिति को “अत्यधिक जोखिम भरा” बताया एवं गंगा के पानी को स्पर्श करने से मना किया।

यह घटना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह महाकुंभ 2025 के ठीक बाद सामने आयी, जब करोड़ों श्रद्धालुओं ने पवित्र संगम में डुबकी लगायी थी।

वैज्ञानिक चिंता: फीकल कोलिफॉर्म (Fecal Coliform) क्या है?

ब्रिटिश वैज्ञानिक के गंगा से पीछे हटने का सबसे बड़ा कारण फीकल कोलिफॉर्म का उच्च स्तर था। फ़ीकल कोलिफॉर्म, बैक्टीरिया का एक समूह है जो मनुष्यों और गर्म रक्त वाले जानवरों के मल में पाया जाता है। पानी में इसकी मौजूदगी का अर्थ है कि उसमें अनुपचारित सीवेज मिल रहा है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, स्नान के लिए ‘वांछनीय’ सीमा 500 MPN/100ml है, जबकि ‘अधिकतम अनुमति योग्य’ सीमा 2,500 MPN/100ml है। रिपोर्टों के अनुसार, कुछ क्षेत्रों में यह स्तर 82,000 तक दर्ज किया गया, जो सुरक्षित सीमा से लगभग 160 गुना अधिक है।

महाकुंभ 2025 और प्रदूषण के आंकड़े..

महाकुंभ के दौरान संगम (प्रयागराज) में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के कारण जल की गुणवत्ता पर भारी दबाव देखा गया। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड और विभिन्न शोध संस्थानों की रिपोर्टों ने निम्नलिखित बिंदुओं को रेखांकित किया है।

अनुपचारित सीवेज: अस्थायी शिविरों और भारी आबादी के कारण सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट अपनी क्षमता से अधिक भार पर काम कर रहे थे।

यमुना का प्रभाव: दिल्ली और हरियाणा के औद्योगिक क्षेत्रों से होकर आने वाली यमुना का प्रदूषित पानी संगम पर गंगा की गुणवत्ता को और ख़राब कर देता है।

जैविक ऑक्सीजन मांग (BOD): पानी में ऑक्सीजन का स्तर कम होने से जलीय जीवन (जैसे गंगा डॉल्फिन) के लिए भी ख़तरा उत्पन्न हुआ है।

पवित्र स्नान या स्वास्थ्य जोखिम?

जब जल में फीकल कोलिफॉर्म का स्तर इतना अधिक होता है, तो इसमें केवल पैर डालना या स्नान करना कई बीमारियों को निमंत्रण दे सकता है:

त्वचा रोग: खुजली, रैशेज और गंभीर डर्मेटाइटिस।
संक्रमण: टाइफाइड, हैजा, और हेपेटाइटिस-A जैसे रोग यदि पानी शरीर के भीतर चला जाए।
एंटीबायोटिक प्रतिरोध: शोध बताते हैं कि गंगा के प्रदूषित पानी में ‘सुपरबग्स’ (Superbugs) पनप रहे हैं, जिन पर सामान्य दवाएं बेअसर हो रही हैं।

नीतिगत विफलता और भविष्य की चुनौतियाँ

‘नमामि गंगे’ जैसे प्रोजेक्ट्स पर करोड़ों ख़र्च करने के बावजूद, एक विदेशी वैज्ञानिक का नदी में पैर रखने से इनकार करना विदेशों में यथार्थ छवि बताता है।

सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की कार्यक्षमता: कई शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो पुराने हैं या पूरी क्षमता से नहीं चल रहे।

औद्योगिक अपशिष्ट: कानपुर और उन्नाव जैसे क्षेत्रों से चमड़ा और रसायन उद्योगों का कचरा अभी भी सीधे नदी में गिर रहा है।

नागरिक नैतिक मूल्य, जन जागरूकता: केवल सरकारी नीतियों से बदलाव संभव नहीं है; जब तक कचरा प्रबंधन में व्यापक जनभागीदारी नहीं होगी, स्थिति गंभीर बनी रहेगी।

ब्रिटिश जीवविज्ञानी का वीडियो केवल एक ‘वायरल क्लिप’ नहीं, बल्कि भारत के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। यदि हम अपनी सबसे पवित्र नदी को उसके पारिस्थितिक और जैविक रूप में नहीं बचा पाये, तो यह न केवल हमारी आस्था बल्कि हमारे पर्यावरण और अस्तित्व के लिए भी बड़ा संकट होगा।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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