
- March 31, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से....
सुल्तान अहमद: ख़ूबियां बनाम ख़ामियां
इस बाज़ारवादी दौर में जब हर व्यक्ति अपनी क़ीमत बढ़ाने में लगा है, अपने प्रचार में लगा है, जुगाड़ भिड़ाने में लगा है, सुल्तान अहमद साहब बिल्कुल निर्लिप्त दूर ही खड़े दिखायी पड़ते हैं। सुल्तान अहमद साहब अशिक्षित (साहित्यिक रूप से) ग़ज़लकारों से बिल्कुल अलग हैं। जहाँ तक हिन्दी ग़ज़ल की बात है, प्रायः हर ग़ज़लकार शॉर्टकट अपनाने में लगा है। बिना कुछ लिखे-पढ़े ही, सिर्फ़ जुगाड़ या अर्थ के बल पर साहित्य का ज्योतिस्तंभ बन जाना चाहता है। ऐसे कई ग़ज़लकारों को मैं जानता हूँ जिन्होंने अपने ग्रुप बना रखे हैं। सब एक-दूसरे की पीठ खुजलाने में लगे हैं। एक-दूसरे को ए’जाज़ बाँट रहे हैं। एक-दूसरे पर अभिनंदन ग्रंथ लिख रहे हैं। ऐसे में सुल्तान अहमद ही बचते हैं, जो इन तमाम बातों के अपवाद नज़र आते हैं।
एक और बात कह देना ज़रूरी समझता हूँ कि सुल्तान अहमद साहब को मात्र ग़ज़लकार मान लेना उनका सही आंकलन नहीं होगा। जितना शानदार इल्म उन्हें ग़ज़ल के अरूज़ का है, उतना ही अच्छा ज्ञान हिन्दी कहानी और कविता का भी है। जब कभी सुल्तान अहमद साहब का फ़ोन आता है या मैं फ़ोन करता हूँ, हिन्दी ग़ज़ल पर घंटों बातें होती हैं। अपने अनुज रचनाकारों से इतना स्नेह मैंने सुल्तान अहमद साहब में ही देखा है। उनके स्नेह की वजह से उनकी थाह पाना बड़ा मुश्किल होता है। आप जान ही नहीं पाएँगे कि आप जिससे बात कर रहे हैं, वो एक समुद्र है। उनके द्वारा व्यवहृत ‘बंधु’ संबोधन बिल्कुल अवाक्-सा कर देता है।
सुल्तान अहमद साहब निरंतर ईमानदारी से लगे रहने में विश्वास करते हैं। इनका रचना प्रासाद वास्तविकता की ठोस ज़मीन पर खड़ा है। इनकी अपनी एक विचारधारा है। एक कसौटी है, जिस पर अपनी रचनाओं को जाँचते-परखते हैं। ‘गाय भी गाभिन, बैल भी गाभिन’ वाली स्थिति कहीं दिखायी नहीं देती, जैसा हिन्दी के प्रायः ग़ज़लकारों में हम देखते हैं। इस लेख के तहत हम सुल्तान अहमद साहब के ग़ज़ल संसार की यात्रा करेंगे। सुल्तान अहमद साहब के कुछ शेर देखते हैं:
इतनी कठिन किसी पे कभी रहगुज़र न हो
रहबर मिलें तमाम कोई हमसफ़र न हो
सुल्तान अहमद साहब का यह शेर देखने में लोगों को वैयक्तिक लग सकता है, मगर सच इसके विपरीत है। शेर में कही गयी बात हर व्यक्ति के जीवन का सत्य है। आज दिन-ब-दिन हमसफ़र कम होते जा रहे हैं। मगर रहबरों की संख्या रोज़ बढ़ रही है। संभवतः बढ़ती राहज़नी का यही कारण है। इसी तसलसुल का एक और शेर देखें:
कल ये तुम्हारे साथ भी गुज़रे न हादसा
क़दमों की रौ हो तेज़ अगरचे सफ़र न हो
हर व्यक्ति के जीवन में कभी-न-कभी यह सफ़र भी आता है, जब वो कोशिश तो बहुत करता है, किन्तु वहीं-का-वहीं खड़ा रह जाता है। कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि चलता तो बहुत है लेकिन कोई सफ़र तय नहीं कर पाता। इसमें एक संघर्ष तो है, किन्तु परिणाम रहित। यह शेर देखें:
उस पर न जंगलों में करे कारवाँ यक़ीन
दिखता है जो भी ऐसा जिसे कोई डर न हो
इस शेर पर बहुत-सी बातें कही जा सकती हैं लेकिन यहाँ मैं बहुत गहराई में न जाकर सिर्फ़ ये बताना चाहूँगा कि किसी पर यक़ीन करने से पहले, उसे अंदर तक जान लेना ज़रूरी है। यहाँ रचनाकार ने ‘जंगल’ संज्ञा डालकर बात को थोड़ा हल्का कर दिया है। व्यक्ति चाहे जंगल में हो या फिर अन्य किसी जगह। यक़ीन करने के कुछ आधार तो निर्धारित करने ही पड़ेंगे। सुल्तान साहब के कुछ बेहद तंज़िया शेर देखते हैं:
ज्यों ही उनके गुनाह गिनवाये
कट के आयी ज़ुबान सीने पर
कारवाँ की लीक पकड़े चल पड़ेंगे
क्या करेंगे जागकर हम सब अभी से
अल्फ़ाज़ के हुजूम खड़े कर रहे हैं जो
देखो न अस्ल में वो कहीं बेज़ुबाँ न हों
इन तीनों शेरों में ग़ज़ल का तंज़ है। आज के दौर में, या कहें हर दौर में, सच बोलना एक गुनाह रहा है। जब तक आप हाँ-में-हाँ मिला रहे हैं, आप चहेते बने रहेंगे। मगर सच बोलते ही गुनहगार करार कर दिये जायेंगे। दूसरे शेर में तमाम सोते हुए लोगों को जगाने की, अर्थात् अपने तरीक़े से सोचने की ओर प्रेरित किया जा रहा है। आज के दौर का सारा आतंकवाद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज के युवा अगर दूसरे के बहकावे में आने की बजाय, स्वयं सोचने की ज़हमत उठाने लगें तो संभव है यह ख़ून-ख़राबा बंद हो जाये। तीसरा शेर भी ज़ेह्न के दरवाज़े खटखटा रहा है। किसी बड़बोले के बहकावे में आने की बजाय, शायर गंभीरता से सोचने पर ज़ोर दे रहा है। जो ज़रूरत पर न बोल सके, वो लफ़्ज़ों का पहाड़ ही खड़ा क्यों न कर दे, बे-ज़ुबान ही रहेगा। कुछ और अच्छे शेर देखते हैं:
ढलते-ढलते दिन तो आख़िर ढल जाता है
पर दिन का कुछ ऐसे ढलना खल जाता है
माना कि डराते हैं सागर के वो धारे भी
दिलचस्प नहीं लगते लेकिन ये किनारे भी
क्या ख़ूब मसीहा है, सबको वो सवालों से
अक्सर तो जलाता है, कह दो कि सँवारे भी
एक भगदड़-सी है आज चारों तरफ़
किसके साये में है आजकल ज़िन्दगी
कबसे ये घाटियाँ हैं, अँधेरी पड़ी हुई
सूरज वो लाइए कि जो पहुँचे वहाँ तलक
पत्थर की मूरतें ही मिलीं आदमी नहीं
फेरी निगाह उसके जहाँ में जहाँ तलक
देता रहूँगा ख़ून मुसलसल चिराग़ को
देखूँ ये रात करती है पीछा कहाँ तलक
इन तमाम शेरों को इनकी अलग-अलग ख़ासियत के लिए यहाँ उद्धृत किया है। पहले शेर में शायर एक ऐसी मनःस्थिति का वर्णन कर रहा है, जिसमें हर व्यक्ति पहले से अपने लिए कुछ निश्चित कर रखता है। वह अपना जीवन उसी तरह बिताना चाहता है। अगर जीवन उससे इतर होता है तो उसे खलता है। इस शेयर में एक आजिज़ी भी है। कहने का अर्थ कि ज़िंदगी जैसे-तैसे गुज़र तो सबकी हो जाती है किंतु जिस तरीक़े और जिस सलीके से गुज़रनी चाहिए उस तरह नहीं गुज़रती। एक दर्द है, एक तड़प है, एक बेचारगी है इस शेर में।
दूसरा शेर, बहुत-सी संभावनाएं और विडंबनाएं व्यक्ति को आगे बढ़ने से रोकती हैं, लेकिन उसका वर्तमन भी उसे कम परेशान नहीं करता। एक हेज़िटेशन हर व्यक्ति में होता है। इस हिचकिचाहट पर विजय प्राप्त कर मनुष्य को आगे बढ़ना पड़ता है और बढ़ना चाहिए। बाद के दोनों शेरों में हमारा वर्तमान है। कवि कहीं-न-कहीं थोड़ा-सा नास्तिक होता-सा दिखायी देता है, थोड़ी नाफ़रमानी करता-सा। बगावत की एक चिनगारी कहीं-न-कहीं से ज़रूर निकलने की कोशिश कर रही है। बग़ावत इस अर्थ में कह रहा हूँ कि मसीहाओं के सामने अपनी जिज्ञासा व्यक्त करना भी आज के दौर में बग़ावत है। हमारा वर्तमान तो इतना आतिशख़ेज़ हो गया है जिसकी कोई सीमा ही नहीं है। हर देश जब अपनी शक्ति प्रदर्शन में लगा हो, मनुष्यता कुचली जा रही हो, ये देश एक-दूसरे को परमाणु बम की धमकी दे रहे हों। ऐसे में, जिन्दगी में भगदड़ मचना तो स्वाभाविक है। एक अजीब-से साये में लोग खड़े हैं। जिंदगी या यूँ कहें लोग एक सुरक्षित आश्रय की तलाश में भटक रहे हैं। ये शेर आज के लिए बहुत ही प्रासंगिक है।
बाद के शेर में शायर जागरूकता और आधुनिकता की बात करता है। कवि उस संप्रदाय और उस कुनबे की बात करता है, जहाँ के लोग आज भी कई साल पीछे हैं। कवि अपने वर्तमान को देख रहा है। वह समझ रहा है इस जहालत का कारण अशिक्षा और जागरूकता का अभाव है। कुछ लोग, कुछ लोगों की जहालत का लाभ उठाकर अपनी दुकान चला रहे हैं। इनकी अशिक्षा में ही उनका फ़ायदा है। जितने भी संविदाकार आज दिख रहे हैं, वे किसी भी धर्म के क्यों न हों, उन्हें जगाने की बजाय थपकियाँ देकर सुला रहे हैं। यही वजह है कि आदमी धीरे-धीरे पत्थर बनता जा रहा है। किसी को किसी के जज़्बात की पर्वा नहीं है। कौन मरता है, कौन जीता है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। सबको अपने फ़ायदे से मतलब है।
अंतिम शेर जिजीविषावादी है। कवि जीवन की प्रतिकूलताओं का अंत तक सामना करता है। ये शेर संघर्षण की अग्नि जलाने वाला शेर है। ऐसे कितने ही शेर हैं, जिन पर बहुत कुछ कहा जा सकता है। अब ज़रा दूसरी तरफ़ चलते हैं। कुछ मीन-मेख की बात करते हैं। कुछ ऐसी बात जिसकी अपेक्षा हम सुल्तान अहमद जैसे शायर से नहीं करते।

सभी जानते हैं हिन्दी ग़ज़ल में आत्मालोचन की परंपरा नहीं है। संभवतः इसका कारण यह हो सकता है कि ग़ज़ल में वाहवाही तुरंत मिलती है और शायर फूलकर कुप्पा हो जाता है, मगर सुल्तान अहमद साहब ऐसे नहीं हैं। जहाँ तक मुझे याद है, मैंने आज तक उन्हें, उनकी जितनी भी ख़ामियों की तरफ़ इशारा किया, उसे उन्होंने या तो स्वीकार किया या फिर स्वस्थ तर्क किया। नाराज़ कभी नहीं हुए, जैसे आज के तथाकथित बड़े और जुगाड़ू शायर हो जाया करते हैं।
एक बार तो हरेराम समीप ने मुझे यहाँ तक कह दिया कि तुम और सुल्तान अहमद मल में अन्न खोजने का कार्य करते हो। सुनकर पहले तो कोफ़्त हुई, मगर बाद में यह सोचकर चुप रह गया कि जब ये स्वयं अपनी ग़ज़लों को मल कह रहे हैं तो नाराज़ क्या होना। इसी तरह के एक तथाकथित शायर ज्ञानप्रकाश विवेक साहब हैं, जिन्होंने अपने चारो तरफ़ छद्म शिष्टता की सुरंग बना रखी है। जब भी आलोचनात्मक बॉम्बिंग होती है, उसी सुरंग में दुबक जाते हैं। कभी-कभी उर्दू ग़ज़लों की दलाली करते नज़र आ जाते हैं। ख़ैर, हम यहाँ सुल्तान अहमद पर चर्चा करेंगे। एक शेर देखें:
कतरा रहे हैं लोग तो पहचानने से यूँ
बाहर से आके जैसे कि उनके शहर में हूँ
इस शेर के दूसरे मिसरे में ‘जैसे’ के बाद आया ‘कि’ क्या ऐसा नहीं लग रहा कि जैसे ज़बरदस्ती धकियाकर लाइन में घुस आया है। इसकी यहाँ कोई ज़रूरत नहीं थी। इसे हम अधिक पदत्व दोष तो कह ही सकते हैं। ‘जैसे’ के बाद ‘कि’ अनुचित लगता है। बाद के दो शेर और देख लेते हैं:
बढ़ने लगी हैं और भी लपटें ये आग की
पथराव के मैं बर्फ़ के जबसे असर में हूँ
इस शेर का दूसरा मिसरा फिर से गच्चा खा जाता है। ‘के’ की पुनरुक्ति से वाक्य तो कुरूप हुआ ही है, शब्दक्रम दोष ने इसमें सोने पर सुहागा का कार्य किया है। इसके बाद का शेर भी देख लेते हैं:
ख़ामोशियों में बंद है ज्वालामुखी मेरी
अब वो नहीं हूँ मैं कि जो उनकी नज़र में हूँ
पहले मिसरे का अंतिम शब्द ‘मेरी’ फिर से शब्दक्रम दोष का शिकार हो गया है। शब्दों की फ़िज़ूलख़र्ची का एक और उदाहरण देखें:
बढ़ता है हौसला जो चलें घर को फूँककर
फूँके ग़रीब क्या जो कहीं उसके घर न हो
दूसरे मिसरे में ‘जो’ के बाद आया ‘कहीं’ शब्द का निरर्थक प्रतीत हो रहा है। सुल्तान अहमद साहब अगर इसका प्रयोग न करते तो कोई हर्ज नहीं था। चलिए आगे बढ़ते हैं:
बीज छोटा-सा बोके देखो तो
उससे कितनी बड़ी फसल होगी
क्या बीज के साथ छोटा या बड़ा विशेषण लगाना सही होगा? क्या बीज फुटबॉल के आकार के भी होते हैं। क्या सिर्फ़ छोटे बीज से ही फसल या बड़ी फसल हो सकती है। क्या आम के बीज से बड़ी फसल नहीं हो सकती। एक और शेर देखें। ये शेर बेरब्त भी हो सकता है।
ज़ंजीर बनके बाँध रहे हों जो पाँव को
सपने तो ठीक, उनके मिटा दो निशाँ तलक
इस शेर में ‘सपने तो ठीक’ पदबंध कोई अर्थ नहीं दे रहा। पूरा-का-पूरा आधा वाक्य अतिरिक्त पद-दोष लग रहा है। इसी पगडंडी पर थोड़ा और आगे बढ़ते हैं तो एक और शेर नज़र आता है।
तारों से आकाश भरा है ठोस अँधेरा छाया है
मुरझाये हैं तारे जितने झर जाते तो अच्छा था
इस शेर में आया ‘ठोस अँधेरा’ थोड़ा रंगबाज़ी-सा कर रहा है। अँधेरा भाववाचक संज्ञा है। भाववाचक संज्ञा ठोस या तरल कैसे हो सकती है। जो जैसा होता ही नहीं, उससे वैसा चित्र कैसे बनाया जा सकता है। कहने को लोग तर्क के तौर पर कह सकते हैं कि ‘पक्की बात’ अगर बात पक्की हो सकती है तो अँधेरा भी ठोस हो सकता है, किन्तु ‘बात’ के लिए ‘पक्का’ विशेषण प्रचलन में है किन्तु ‘अँधेरा’ के लिए ‘ठोस’ विशेषण प्रचलन में नहीं है। घना अँधेरा, गहरा अँधेरा तो सुना था, ठोस अँधेरा नहीं सुना था। इसे हम इस्तिलाह दोष (अप्रयुक्ति दोष) कह सकते हैं।
ख़ौफ़ उसकी आँख में है फिर डरें क्यों
हम ज़मीं की कोख के ज्वालामुखी से
इस शेर के दूसरे मिसरे में आया पदबंध ‘ज़मीं की कोख के ज्वालामुखी’ खल रहा है। सिर्फ़ ज्वालामुखी से भी काम चल सकता था। हाँ चंद्रयान के जाने पश्चात ये पता ज़रूर चला है कि चन्द्रमा पर भी ज्वालामुखी हैं। मगर ये किताब तो उसके पहले की है। अतः इस बात की यहाँ कोई ज़रूरत नहीं थी। एक ग़ज़ल की रदीफ़ पर एक नज़र डालते हैं:
ये न समझो आप के अपनाव से मैं थक रहा हूँ
उसके भीतर के छुपे अलगाव से मैं थक रहा हूँ
दायरे को तोड़कर बाहर निकलता ही नहीं जो
वक़्त की उस दौड़ में ठहराव से मैं थक रहा हूँ
ख़ौफ़-सा लगने लगा है देखकर इस ज़िंदगी को
अब मुसलसल ज़ुल्म के पथराव से मैं थक रहा हूँ
इस शेर में ‘थक रहा हूँ’ रदीफ़ मिसरे के साथ अपना संबंध सही ढंग से निभा नहीं पा रही है। भला कोई ‘अपनाव’ और ‘अलगाव’ से कैसे थक सकता है। अधिक अपनाव से आदमी बोर हो सकता है, चिढ़ सकता है। अलगाव से आदमी दुःखी हो सकता है, कमज़ोर हो सकता है-थक तो नहीं सकता! बाद के शेर में शायर ‘ठहराव’ से थक रहा है। ये कुछ हद तक संभव हो सकता है। किन्तु बाद के शेर में शायर ‘पथराव’ से घायल होने की बजाय थक रहा है, यह बात कुछ हज़म नहीं हो रही। और शेरों में ‘बर्ताव’, ‘फैलाव’ और ‘बिखराव’ से भी शायर को थकने की बजाय कुछ और शब्द चयन करना चाहिए। ख़ैर, अब यह शेर देखें, इसका भी वाक्य-विन्याास कुछ अजीब-सी पेचीदगी के साथ है।
रख रहे हैं फूंककर ही बस! वही सारे क़दम
ज़िंदगी है ढाल पर जिनकी गड़ारी की तरह
पहले मिसरे में आया ‘ही’ और ‘बस’ एक साथ आकर एक अजीब-सी उलझन पैदा कर रहे हैं।
ये शिकार अब जा पहुँचे हैं ख़ुद उनके मुँह तलक
सामने आये भला वो क्यों शिकारी की तरह
इस शेर में आया ‘ये’ अतिरिक्त पद है। ‘अब’ शब्द की भी कोई ज़रूरत समझ में नहीं आ रही। इसके अलावा इस पूरे शेर में शुतुरगुर्बा दोष भी दिख रहा है। पहली पंक्ति में ‘उनके’ शब्द का प्रयोग किया गया है जबकि बाद की पंक्ति में ‘वो’ एकवचन का प्रयोग है।
आत्ममुग्धता प्रायः हर हिन्दी शायर में देखने को मिलती है। हिन्दी ग़ज़ल के मतले तो निन्यानवे फ़ीसदी आत्ममुग्धता के ही शिकार होते हैं। सुल्तान अहमद साहब भी इससे बच नहीं पाये हैं। मतले का एक शेर:
मैं सागर का मंथन किये जा रहा हूँ
हलाहल भी ख़ुद ही पिये जा रहा हूँ
इस शेर में कई बातें निकलकर सामने आ रही हैं। शायर या तो अपनी प्रशंसा कर रहा है या फिर अपनी मजबूरी बता रहा है। अगर ये मजबूरी है तो इसका अर्थ ये हुआ कि शायर मंथन तो स्वयं करना चाहता है, किन्तु उससे निकला ज़ह्र किसी और को पिलाना चाहता है। दोनों ही अर्थों में शेर अच्छा नहीं कहा जा सकता। एक और शेर देखें। बड़ी अजीब-सी लॉजिकल मिस्टेक नज़र आ रही है।
मुसलसल जो फटते रहे मेरे चोले
दुबारा उन्हें मैं सिये जा रहा हूँ
मुझे लगता है जो मुसलसल फट रहा है उसे दुबारा सीने से काम नहीं चलेगा। उसे मुसलसल ही सीना पड़ेगा। एक और ग़ज़ल पर दृष्टिपात करते हैं। ज़रा भाषा की पड़ताल करते हैं। सुल्तान अहमद साहब विद्वान शायर हैं, अतः उनकी पड़ताल भी कठोरता की माँग करती है।
आँधियों में वो टूट ही जायें
हम घरौंदे बना ही जाएंगे
इस शेर के दोनों मिसरों में आया ‘ही’ व्याकरणिक तौर पर ग़लत भले न हो, किन्तु भाषाई सुंदरता को आहत कर रहा है। लगे हाथ बाद के शेर भी देखें:
सर पे रखकर अगर पहाड़ चले
क्या है जो लड़खड़ा ही जाएंगे
इस शेर का दूसरा मिसरा देखते हैं। ‘जो’ और ‘ही’ एक साथ आये हैं। ‘जो’ संभावनात्मक है जबकि ‘ही’ निश्चितता का बोध कर रहा है। एक ही बात भला निश्चित और अनिश्चित दोनों कैसे हो सकती है? यह बात अनुचित लग रही है।
इक जहाँ ख़ाक में भी पा लेंगे
गर हमें वो मिटा ही जाएंगे
इस शेर के दूसरे मिसरे में आया ‘गर’ और ‘ही’ अनुचित लग रहे हैं। आपस में मूड़-फुड़ौवल-सी करते हुए। जहाँ तक मैं समझता हूँ, किसी भी काव्य या ग़ज़ल में मुहावरों को ज्यों-का-त्यों लिखा जाये तो भाषा की सुन्दरता बरक़रार रहेगी। सुल्तान अहमद साहब का ये शेर मुहावरे को मुँह चिढ़ाता नज़र आ रहा है।
साँप ने सूँघ लिया गर सबको
हौसला हम ही करें, कुछ गायें
‘ने’ की वजह से ‘साँप सूँघना’ मुहावरा अपने मूल अर्थ से च्युत होता-सा, लड़खड़ाता-सा नज़र आ रहा है। भाषा बड़ी बारीक चीज़ है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। एक और शेर की भाषाई असावधानी अखर रही है। हो सकता है दूसरे को न अखरे:
इस तरह साथ जो निभाते हैं
बीच जंगल में छोड़ जाते हैं
इस शेर में सुल्तान साहब ने ‘जंगल’ शब्द का प्रयोग क्यों किया है? क्या इस तरह की कोई माइथोलॉजी है? क्या ‘जंगल’ यहाँ कोई विशेष अर्थ दे रहा है? अगर ऐसा नहीं है तो फिर ‘जंगल’ की जगह ‘रस्ता’ क्यों नहीं? ‘रस्ता’ रहने से मुहावरे का अर्थ भी बरकरार रहता।
कभी लोग झटके में शेर समझकर कुछ कह तो जाते हैं, मगर वो शेर नहीं होता। एक स्टेटमेंट बनकर रह जाता है। शेर देखिए, इसमें सलासत भी है, सुल्तान अहमद साहब की अपनी काव्य-भाषा भी है, किन्तु इसमें शायरी का गुदाज़ नहीं है। अटैकिंग पावर नहीं है। तीखापन नहीं है। ऐसा लग रहा है, जैसे शायर प्रोज़ की भाषा में अपना कोई स्टेटमेंट दे रहा है:
तूफ़ां का ये ख़याल है कैसे वो देगा फल
जो पेड़ उसके ज़ोर से इक बार लच गया
एक और शेर की भाषा अखर रही है। इस शेर में भी मुहावरा आहत हुआ है। अतिरिक्त पद दोष भी है:
हमने उनकी आँख के भीतर झाँक के देखा
उनका भी हर ख़्वाब लहू से तर लगता है
इस शेर में ‘आँख के भीतर झाँक कर देखना’ पदबंध अखर रहा है। यहाँ ‘भीतर’ पद की कोई ज़रूरत नहीं है। ‘आँख में झाँकने’ या ‘आँख में देखने’ मात्र से भीतर शब्द का अर्थ आ जा रहा है। ‘आँख में झाँकना’ या ‘आँख में देखना’ एक मुहावरा भी रच रहा है अतः इस ‘भीतर’ की वजह से और ‘झाँकना’ तथा ‘देखना’ दोनों के साथ प्रयोग की वजह से काव्य-भाषा असुंदर हो गयी है। एक और शेर देखते हैं, जिसमें लिंग दोष अखर रहा है:
कब सिवा शब का ज़ोर होता है
जब भी होने को भोर होता है
‘भोर होता है’ पदबंध दूध में खटाई का काम कर रहा है। इसे मुद्रण का दोष भी नहीं कह सकते, क्योंकि रदीफ़ ‘होता’ ही है। ‘सिवा’ शब्द भी अखर रहा है। एक और शेर में शब्द-चयन:
चले हैं राह जो मिला के हाथ आग से
हरेक मोड़ पर खड़ी मिली उन्हें उजास
यहाँ आग से हाथ मिलाना, बहादुरी की बजाय षडयंत्र अधिक लग रहा है। शब्द प्रयोग से ही जुड़ा एक और शेर:
सुब्ह पर यूँ तो बहुत बात हुई
और भी ठोस मगर रात हुई
यहाँ रात का गहरा होना, तो समझ में आता है, मगर रात का ठोस होना जंच नहीं रहा। एक व्याकरणिक दोष:
कहें भी क्या जो कहें वो, मज़ा तो कुछ भी नहीं
वही है दर्द कि जो था, नया तो कुछ भी नहीं
दूसरे मिसरे में ‘कि’ और ‘जो’ जैसे दो योजक एक साथ आकर सिर भिड़ा रहे हैं। ये भाषा को क्लमज़ी बना रहे हैं। अब ज़रा शिल्प की ओर चलते हैं। क़ाफ़िया ग़ज़ल का एक अहम पहलू है। साधारण भाषा में कहें तो कह सकते हैं कि क़ाफ़िया ग़ज़ल के तुकान्त को कहते हैं। ग़ज़ल देखते हैं:
रहमत नहीं किसी की है दौर मुफ़लिसी का
मेरा ख़ुदा न कोई बंदा न मैं किसी का
कैसी चमक-दमक है, ये कैसी रौशनी है
जिसमें हुआ है गहरा कुछ रंग तीरगी का
ये ज़िंदगी मिली है, जद्दोजहद की ख़ातिर
इसको न वक़्त समझो तुम कोई ख़ुदकुशी का
इस ग़ज़ल में मतले के क़ाफ़िये ‘मुफ़लिसी’ और ‘किसी’ हैं, किन्तु बाद के सारे क़ाफ़िये ‘तीरगी’, ‘ख़ुदकुशी’, ‘बेकसी’, ‘सरकशी’ डीरेल हो गये हैं। एक और ग़ज़ल पर दृष्टि डालते हैं:
अच्छा चलो न खुलके अभी तुम बयान दो
होगा मगर वो क्या ज़रा इस पर तो ध्यान दो
इस ग़ज़ल में मतले का क़ाफ़िया ‘बयान’ और ‘ध्यान’ है, किन्तु बाद के क़ाफ़िये ‘पासबान’, ‘तीरो-कमान’, ‘आसमान’, ‘उड़ान’ और ‘ज़ुबान’ हैं, जो सरासर बग़ावत कर रहे हैं। लगे हाथ तनाफ़ुर का भी एक दोष:
किस क़दर मासूम थी चिड़िया मगर
आग से जलते सुरों में गा गयी
इस शेर के दूसरे मिसरे में आया ‘गा गयी’ तनाफ़ुर दोष पैदा कर रहा है। तमाम मीन-मेख के बावजूद सुल्तान अहमद साहब की बहुत बड़ी विशेषता ये है कि वे अपनी आलोचना उतने ही उत्साह के साथ सुन लेते हैं, जितने उत्साह के साथ अन्य शायर अपनी प्रशंसा सुन लेते हैं। आलोचना को सुन पाने वाला व्यक्ति बहुत मज़बूत होता है। इनकी प्रवृत्ति के अनुकूल इनका अपना एक विज़न, एक मैनरिज़्म होता है। सुल्तान अहमद साहब में भी हमें ऐसा देखने को मिलता है। इनकी ग़ज़लें सलासत और नुदरत का एक संगम बनकर हमारे सामने आती है। इनका सरोकार हमें आकर्षित करता है। इनकी प्रश्नाकूलता, एक मारक क्षमता पैदा करती है। इनका मैनरिज़्म बने-बनाये रास्ते पर चलने की इजाज़त नहीं देता।
सुल्तान अहमद की शायरी में शुरू से अंत तक एक आदमी के रूप में ही दिखायी देते हैं। कहीं हिन्दू या मुसलमान बनकर कुछ नहीं कहते। आद्योपान्त इनकी शायरी में मानवतावादी दृष्टिकोण नज़र आता है। अपनी शायरी की इसी ख़ुसूसियत की वजह से इन्हें मुनफ़रिद और आला मुक़ाम हासिल है।

ज्ञानप्रकाश पांडेय
1979 में जन्मे, पेशे से शिक्षक ज्ञानप्रकाश को हिन्दी और उर्दू की शायरी में समकालीन तेवरों के लिए जाना जाता है। अमिय-कलश (काव्यसंग्रह), सर्द मौसम की ख़लिश (ग़ज़ल संग्रह), आसमानों को खल रहा हूँ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हैं। कुछ एक प्रतिष्ठित संस्थाओं से नवाज़े जा चुके हैं।
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