भाई शरद के बहाने

कटाक्ष राजेंद्र प्रसाद सक्सेना की कलम से…. भाई शरद के बहाने            शरद भाई! क्या तुम जैसे दुबले-पतले आदमी के होने या न होने से...

लाल बिंदी वाली इरफ़ाना

याद बाक़ी…संस्मरण (कुछ वर्ष पहले लिखित) रामप्रकाश त्रिपाठी की कलम से…. लाल बिंदी वाली इरफ़ाना              शब्दशिल्पियों के आसपास में नेहा शरद की फ़ेसबुक...

व्यंग्य की लोकधर्मी परंपरा: भारतेंदु से वर्तमान तक

‘मान’ सहज व रोचक अंदाज़ में उस परिदृश्य को सामने लाती है, जो इस शती के पूर्वार्द्ध तक के समाज की तस्वीर रहा है। अंत में कहानी के पारंपरिक...