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देश की विभिन्न गंभीर समस्याओं, देश के विकास की राह और सामाजिक विडंबनाओं पर चिंतन व विमर्श के लिए, दिशा दर्शन के लिए कलाकार का, लेखक का कोई दायित्व होता है? यह प्रश्न शाश्वत महत्व का है। संवेदनशील कलाकार स्वयं की अभिव्यक्ति के लिए किसी भी विधा को माध्यम बनाये, वह समष्टि और मानवीयता के प्रति उदासीन नहीं होता। मनोज की कहानी वह यक्ष प्रश्न है, जो मानवीय सरोकारों के युधिष्ठिर को मथता है कि लिखना ज़रूरी है या प्रतिरोध की किसी सीधी कार्रवाई में हिस्सा लेना। लेखकों-कलाकारों की चुप्पियांँ और पाठकों की उदासीनता में खलबली मचाने में यह कहानी समर्थ है। -शशि खरे (संपादक-कथा प्रस्तुति)
मनोज कुलकर्णी की कलम से....

वॉन गॉग का कान

स्टूडियो का दरवाज़ा खोल उन्होंने बत्तियां जलायीं, पंखा चला दिया। खिड़की पर डला नींबू-पीले रंग का पर्दा सरकाते हुए लगा जैसे उस पर बनी तांबई-भूरी चिड़ियाएं चहक रही हैं। बाहर, वाकई कुछ थीं। मुंडेर पर फुदकतीं-चहकतीं। उन्हें निहारने में वे मगन होने-होने को थे कि दिल ने झकझोरा-चहचहाना बाद में, फिलहाल बचे पड़े काम निपटाओ।

वे पलटे। नज़रें घुमायीं, इधर से उधर तक। अरसे से अधबना चित्र इज़ल पर ठिठका खड़ा था। पास के टेबल पर रखी कलर-पैलेट के इर्द-गिर्द कूचियों का हुजूम था। रंगों की डिब्ब्यिां और तितर-बितर ट्यूब थे। पैलेट पर निकला पड़ा जैतूनी-हरा रंग पपड़ा चुका था। उसी से लिपटा पड़ा था एक चपटा ब्रश। जिसे तारपीन भरे मग में डूबो बाकी साफ कूचियां उन्होंने एक टोकरी के हवाले कीं। रंगों की डिब्बियां जमाकर रखीं। ट्यूबों के ढक्कन जांचे कि कोई खुला तो नहीं छूटा रहा। स्केच-बुक, डेस्क पर खुली पड़ी थी। एक बूढ़े चेहरे की झुर्रियां खेंचते-खेंचते थक चुका स्केच-पेन उसी पर सुस्ता गया था। उसे उठाकर पेन-स्टैंड में रखा। आसपास बिखरे पड़े कलर-पेस्टल्स समेट उन्हें डिब्बे में कतारबद्ध जमा दिया। इरेज़र का काला किनारा रगड़ डाला। कुर्सी पर पड़े एप्रन को उठा कर खूंटी पर टांग देने पर पेंसिल को शार्पनर से छीलने लगे। नोक निकल आयी तो उसे हथेली पर चुभोकर देखा। तीखी थी।

स्टडी-टेबल पर एक मोटी किताब थी, औंधी पड़ी। उसे सीधा किया। उसके तले रंग-बिरंगा आमंत्रण-पत्र दबा मिला। अमिता बवेजा की आगामी कत्थक प्रस्तुति का था। उसे सॉफ्ट-बोर्ड पर पिन करते हुए वे बड़बड़ाये-इस बार चला ही जाऊंगा….पिछली बार की ग़ैर-हाज़िरी से अब तक खफ़ा हैं मोहतरमा।

-सुनो ज़िंदगी गाती है…..लल्ललल्लला…..।- सारेगामा कारवां का खटका दबाते ही आशा भोंसले की मधुर आवाज़ कमरे में लहरा गयी। सिगरेट सुलगा वे बेंत की कुर्सी में जा धंसे। सुबह, घर से ठान कर निकले थे कि प्रभात के चित्रों पर अपनी टिप्पणी आज लिख ही डालेंगे। प्रभात, चित्रकला की दुनिया का पहचाना नाम है। मुंबई की ‘गैलरी 79’ में उसके नये चित्रों की प्रदर्शनी है, अक्टूबर में। जिसके कैटलॉग पर कला-दीर्घा की मालकिन पेरिन खम्बाटा उन्हीं की टिप्पणी छापने पर अड़ी है। उसके अनवरत अनुरोधों को याद करते हुए उनकी आंखों में पेरिन का गोरा लम्बोतरा चेहरा तिर आया -नकचढ़ी ज़रूर है लड़की…..लेकिन निगाहें उसकी पारखी हैं।

पिछले कुछ दिनों से लेकिन उनका मन उचटा हुआ है। जिसकी तात्कालिक वजह तो मौसम है। अजीब, उमस भरा। चिपचिपी धूप जब फुहारों में बदलती है, राहत रहती है। मगर, उसके बाद नुमायां सूरज ऐसा तमतमाता है कि जीना मुहाल समझो। तिस पर फैले-पसरे काम, आधी-अधूरी योजनाएं। इकट्ठा होते जा रहे तगादे। जिन्हें एक-एक कर निपटा देने के ख़ुद से किये गये वायदे वे किसी न किसी बहाने टरकाते आ रहे हैं।

अधबना चित्र हर दिन ललकारता है, किंतु वे पसो-पेश में हैं। चित्र में उन्होंने पोटलियां ही पोटलियां बनायी हैं। धूसर, धूंधली पोटलियां। महामारी की देशबंदी में शहर-बदर हुए घर-गांव लौटते मजबूर मज़दूरों के असबाबों और कष्टों, दुःखों से भरी पोटलियां। वे तय नहीं कर पा रहे कि एक पोटली से छिटक आयी सूखी रोटी के लिए कौन-सा रंग सटीक होगा? गहरा भूरा या मटमैला पीला?

विनोद आये-दिन याद दिला रहा। अपने नये उपन्यास ‘घाटी में घटाटोप’ के मुखपृष्ठ के लिए उसे उन्हीं का खींचा फोटो चाहिए। आदिवासी इलाक़े में वैकल्पिक विद्यालय चला रहे नीता और अर्जुन को ‘खेल-खेल में शिक्षा’ के उनके प्रयोगों में चित्रकला किस तरह शामिल की जा सकती है, इस बाबत एक नोट चाहिए, जल्द से जल्द। दिवंगत चित्रकार जयकुमार नायर पर शॉर्ट-फ़िल्म बनी है ‘कलर्स अंडर सीज़’। उनकी बेटी श्रीलेखा का इसरार है कि वे उस पर राय दें। फ़िल्म देख सकें तब तो राय बने! दरअसल तकनीक के साथ उनकी पटरी कभी बैठी नहीं। कम्प्यूटर से दोस्ती तो दूर उन्हें तो स्मार्ट-फ़ोन पर मैसेज भेजना तक मुश्किल लगता है। एक नौजवान को पगार ही इस बात की देते हैं कि वह हफ़्ते में दो-तीन दिन आकर उनके ई-मेल दिखवा दिया करे। जैसा वे कहें, जवाब भेज दिया करे। वह पिछले कुछ दिनों से नहीं आ रहा। बदमाश ने कोई इत्तला भी न दी है। वह आये तो विनोद के लिए फ़ोटो-गैलरी खंगाली जा सके। श्रीलेखा की भेजी फ़िल्म देखी जा सके। जब भी उसका मोबाइल नम्बर मिलाया, जवाब आया -द नंबर यू हैव डायल्ड इज़ आइदर स्विच्ड ऑफ़ ऑर इज़ आउट ऑफ कवरेज एरिया।-

बेचारा किसी आफ़त में तो नहीं? उन्हें तो उसका घर-ठिकाना भी नहीं पता! ऐसे में क्या करें, क्या नहीं, असमंजस उन्हें घेरे रहता है। विचलित मन एक काम करना तय पाता ही है कि दूसरे को निपटाना ज़्यादा ज़रूरी मालूम देने लगता है। उसे शुरू करने से ऐन पहले कुछ तीसरा ही मुंह उठाये चला आता है। मन फिर किसी काम में नहीं रमता। तब, सरकते समय को बेबस ताकते वे सिगरेट फूंकते बैठे रहते हैं। मंत्र की मानिंद बार-बार, मन ही मन, जपते हैं- फ़ोकस…फ़ोकस…।- मगर, कहां, कैसे? यही तो समझ नहीं आ रहा।

रोज़मर्रा की समस्याएं तो ख़ैर ठीक हैं। उनकी परेशानी के वास्तविक सबब कुछ और ही हैं। मसलन यह बात उन्हें लगातार कचोट रही कि सियासी हालात जिस तेज़ी से बदतरीन होते गये हैं, कल्चरल-रेज़िस्टेंस के नये तरीके उसी गति से नहीं ढूंढे जा सके हैं। यह सवाल उनके दिमाग़ को मुसलसल खुरचता रहता है कि बदलता समय उनके चित्रों में ठीक-ठीक क्यों नहीं आ पा रहा? जब सामाजिक विडम्बनाएं बढ़ती जा रही हैं, तब उनकी रेखाएं लय क्यों खो रहीं? उनके रंग सूख क्यों रहे? धूसर परतदार पृष्ठभूमि में से चटख मानवाकृतियां उभार लाने की उनकी शैली क्या गुज़रे वक्तों की बात हुई?

उनके मनचाहे उपकरण क्या इतने बोथरे हो चुके कि आज का यथार्थ पकड़ नहीं सकते? नवाचारों के प्रति वे दुराग्रही नहीं। प्रयोग उन्हें आकर्षित और उत्साहित करते हैं। उन्हें तो विधाओं के बीच आवाजाही से भी परहेज़ नहीं रहा। खुद को ठीक-ठीक अभिव्यक्त करने के लिए जब-तब उन्हें कविता का शिल्प मौज़ूं लगता रहा है। उनकी रची कविताएं पाठकों, मित्रों, समीक्षकों और संपादकों को पसंद आती रही हैं। प्रसंग, प्रकृति, व्यक्ति अथवा प्रवृत्ति को देखने के उनके कोण भिन्न बताये जाते रहे हैं। बिम्ब नायाब और प्रतीक अलहदा। भाषा की उनकी नक्काशी सबको नवेली लगती रही है। मगर, अनेक मसले हैं, जिन पर चली आती ज़ेहनी जद्दोजहद को सिलसिला देने के लिए उन्हें चित्र या कविता नाकाफ़ी मालूम देने लगे हैं। मसलन संस्कृति की दुहाई देकर फैलायी जा रही नफ़रत, मनुष्य-मनुष्य के बीच उगाये जा रहे कांटें, हिंसक भीड़ द्वारा किसी निर्दोष निरीह को पीट-पीट कर मार डालने का वहशीपन। उस पर उल्लसित लोग। तरक़्क़ी के नाम पर लिखी जा रही बर्बादी की इबारतें और कमज़ोर पड़ते जा रहे जनांदोलन।

सुधीर सुझाता है -इन विषयों पर उपन्यास लिख डालो।

वे आंखें मटकाकर ओठ बिचका देते हैं। दुविधा उन्हें अनवरत मथती रहती है कि इस वक़्त प्रतिरोध की किसी सीधी कार्रवाई में हिस्सेदारी ज़्यादा ज़रूरी है या नॉवेल लिखना? मगर, मुख़ालफ़त के वास्तविक अभियान हैं कहां? सामूहिकता इस क़दर छीज क्यों गयी है? लुम्पैनाइजे़शन के विरुद्ध जो संगठन और लोग सचमुच लड़ सकते हैं, बिखरे-से क्यों हैं? सोशल-मीडिया पर आवाज़ उठाना, बेशक ज़रूरी है, लेकिन क्या उतने भर से कुछ हो पायेगा? लेखक-कलाकारों की चुनी हुई चुप्पियां, उनके समझौतें, उनके पलायन… उन्हें संदिग्ध नहीं बनाते? अपने दोहरेपन पर वे चाहे गफ़लत में रहें कि किसे समझ आता है, मगर समय सबके अपराध नोट करता रहता है न! ‘बाबू…ये पब्लिक है…सब जानती है…।’ गुनगुनाने के तत्काल बाद वे कुनमुनाये -पता नहीं कितना जानती है… फ़िलहाल तो बरगला ली गयी है।-

-हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से क्या होगा?- ख़ुद की मलामत करते हुए वे उठे। रैक से एक लिफ़ाफ़ा निकाला, जिसमें प्रभात के बनाये चित्रों के प्रिंटस् थे। सेंटर-टेबल पर उन प्रतियों को करीने से बिछा, चश्मा चढ़ाया। तसल्ली से एक-एक चित्र को देखने-जांचने में क़रीब पौन घंटा लगा। तब उन्होंने राहत भरी सांस ली। रुके पड़े एक काम को अंजाम दे देने की चमक उनकी आंखों में झिलमिलायी। एक भरपूर जम्हाई ले उन्होंने गर्दन को दांये-बांये घुमाया। आहिस्ता-आहिस्ता। उंगलियां चटकायीं। सिगरेट सुलगा कर कश खेंचते हुए कमरे में टहलने लगे।

उन चित्रों पर लिखने की तरतीब वे ज़ेहन में जमा ही रहे थे कि मोबाइल ने तान छेड़ी। दूसरी तरफ़ मधुलिका सेनगुप्ता थी, पुरानी दोस्त। बरसों पहले लंदन जा बसी हैं। दो-तीन बरसों में छुट्टियां बिताने, ख़ैरख्वाहों से मिलने-मिलाने वतन चली आती है। शुरूआती पूछ-परख के बाद दोनों आर्ट-कॉलेज की स्मृतियों में भीगते रहे। बातों-बातों में एक घंटा गुज़र जाने का पता उन्हें तब चला जब फ़ोन आपो-आप कट गया। चर्चा को अंतिम सिरे तक पहुंचा देने की गरज़ से उन्होंने मधु का नम्बर फिर मिलाया और खिलखिलाये ‘हमारी प्यारी बातें…लगता है…ट्राई को भी नागवार गुज़रीं!’

‘ट्राई?’ मधु समझ न सकी।

‘टी.आर.ए.आई…टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया।’ उनका ठहाका गूंजा।

उसकी भी हंसी झरी ‘तुम कलकत्ते चले आओ…। यहां कोई ट्राई-फ्राई हमारी गपशप में अड़ंगा डालने की ट्राय तक न कर पाएगा। कितनी तो बातें करनी हैं यार…पुराने दोस्तों की…तुम्हारे प्रोजेक्टस् की…और हां…..तुम्हारे औलियेपन की भी। जिस पर मैं हमेशा फ़िदा रही।’

‘तुम ही यहां क्यों नहीं आ जातीं? मेरी पेंटिंग्स देखने। रंगनाथपुर भी चले चलेंगे। वहां खुदाई में मठ और स्तूप मिले हैं…।’ उनका न्योता मधु ने स्वीकार लिया। बातों पर विराम लगा। उनका मन लेकिन फिर बीते दौर में ही अटका रहा। बातचीत से टपक आया शब्द ‘औलियापन’ उनके समक्ष आ खड़ा था। अपने इर्द-गिर्द कोई रहस्य बुनने की इच्छा उन्हें कभी नहीं रही। तब भी मित्रों, रिश्तेदारों और दीग़र लोगों के लिए उनकी शख़्सियत अबूझ क्यों है?

साथी प्रोफ़ेसर उन्हें खब्ती ठहराते हैं। शायद इस कारण कि व्यावहारिक कहे जाने वाले जोड़-तोड़ में उनकी दिलचस्पी नहीं? विभागीय उठा-पटक, चुग़लख़ोरी और चमचागिरी में वे शामिल नहीं। उनके जब-तब छुट्टियों पर निकल जाने पर स्टाफ़-रूम में खिल्ली उड़ायी जाती हैं -गये होंगे जनाब खजुराहो, कोणार्क, हम्पी या एलोरा…पत्थरों से बतियाने।

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समकालीन चित्रकारों की निगाहों में वे अहमक हैं कि कला-बाज़ार में पूछ-परख के बावजूद बरसो-बरस चित्रों की नुमाइश नहीं करते। व्यावसायिक कला-वीथिकाओं के ताक़तवर मालिकों, रसूख़ वाले ख़रीदारों और महाबली समीक्षकों की चिरौरी नहीं करते। ज़िद करते हैं कि चित्र, बाज़ार की मांग पर नहीं, अपनी आत्मा की पुकार पर बनाएंगे। रंग-आकारों से सिर्फ सौंदर्यानुभूति जगाने की बजाय अपने चित्रों में जन-जीवन से राब्ता बनाएंगे। वक़्त के विरोधाभासों को बिम्बों में ढालने की कोशिश करेंगे।

मंगला, उनकी जीवन-साथी, यूं तो शांत स्वभाव की हैं किंतु कभी-कभी बिदक जाती हैं- ‘आपकी सनक के सामने किसी की चलती भी है? आपसे इतने जूनियर मल्होत्रा जी तक नये बंगले में शिफ़्ट हो गये और हम हैं कि बरसों से इन्हीं ढाई कमरों में पड़े हैं। उस पर किताबों, तस्वीरों, मूर्तियों और अगड़म-बगड़म का इतना ढेर…लगता है घर नहीं… अजायबघर है।’

मिडिल स्कूल तक आते-आते बेटे उन्हें तवज्जो देना छोड़ चुके थे। उनके लंबे बाल और घनी मूंछें बड़े बेटे की पसंद में कभी न अंट सकीं। अपने दोस्तों के चिकने-चुपड़े, टाई-सूट धारी पिताओं के बरअक्स ख़ुद के पिता की धूसर पतलूनें और खादी के कुर्ते उसे शर्म से भर देते थे। छोटा बेटा उनकी ‘मारुति 800’ से ख़फ़ा रहा। स्कूल की पैरेंट्स मीटिंग के वक्त उसका निर्देश स्पष्ट रहता था -मम्मी, आप अकेली आना…।-

अधिकतर विद्यार्थियों को वे झक्की लगते रहे। कुछ सहकर्मियों के खातों में वे बतौर अहंकारी दर्ज हुए। उनसे खुन्नस पालने वाले माथुर साहब तो पीठ पीछे घोषित ही कर चुके – पागल है।- आम लोग भी उन्हें अचम्भे-सा देखते कि पिछली शाम हाई स्कूल के सालाना-जलसे में विजेताओं को पुरस्कृत कर रहा मुख्य-अतिथि अगली दोपहर रेल्वे-स्टेशन पर बूट-पॉलिश करने वाले बच्चों के साथ बैठा भुट्टे खा रहा है?

जनतंत्र के हक़ में आवाज़ उठाते धरने-प्रदर्शनों में उनकी उपस्थिति से कुछ प्रशासकों, सहकर्मियों और पड़ोसियों के माथे पर बल पड़ जाते हैं। दलितों, आदिवासियों, महिलाओं के हक़ों के लिए…अथवा पानी बचाओ-मिट्टी बचाओ…जैसी तरह-तरह की लामबंदियों में इस सिरफिरे का क्या काम? ऐसे आंदोलनों से ताल्लुक़ात के मद्देनज़र आजकल वे लोग उन्हें नये विशेषण से नवाज़ने लगे हैं -अर्बन नक्सल।

वे किंतु ना तो झगडालू है ना ही अकड़बाज। बर्दाश्त की उनकी हद ज़रूर कुछ तंग है। ख़ासकर अभिजात नख़रों के प्रति। अपना ग़ुस्सा वे ओठों में चाहे ज़ब्त कर लें, आंखों से फूट ही पड़ता है। पसन्द-नापसंद के उनके मापदंड आम कसौटियों से जुदा होने अथवा जीवन जीने के उनके तौर-तरीक़े डिग्रीधारी शहरी मध्यमवर्ग के तयशुदा सांचों के बाहर रह जाने के कारण उन्हें निरंकुश, नाकारा, नाकामयाब, नालायक…तक मान लिया या बता दिया जाता है।

अनदेखी या अवमानना के ऐसे मायूस मौक़ों पर वे अपने हाई स्कूल ड्राईंग टीचर असलम पठान सर को बेतरह याद करते हैं। लहीम-शहीम, पान चबाते रहने वाले। बात-बेबात बेफ़िकर ठहाका लगाने वाले पठान सर छात्रों को अक्सर आगाह करते -बरख़ुरदार, राजपथ तो बने-बनाये होते हैं…जिन पर चलते चले जाना कौन मुश्किल है? सफ़र का असली मज़ा तो अपनी पगडंडी आप बनाने में है…फिर चाहे किसी मंज़िल तक पहुंचो, न पहुंचो। ऐसा कर सकने वाले लेकिन बिरले ही होते हैं।-

सर की वह बात, वे आज तक गांठ बांधे हुए हैं। अपनी राह आप खोजने में कितनी ही बार थके। कभी-कभी निराश भी हुए। उदास पलों में जब कभी लौटकर राजपथ पर चले जाने का विचार मन में आता, साथ ही साथ पठान सर भी अवतरित हो आते। मुंह में गिलोरी दबाये, आंखों में सवालियां निशान टांगे। जवाब में फिर पगडंडी बनाने में जुट जाने के सिवाय उन्हें और कुछ नहीं सूझता।

तंगहाली ने कभी पठान सर का पीछा न छोड़ा। तकलीफ़ें और मुसीबतें भी उनके आस-पास बनी रहती। सर ने हर हाल में लेकिन ख़ुद्दारी बचाये रखी। उनकी बेपरवा हंसी सदा सलामत रही। सर के कष्टों को याद करते हुए अपनी सुख-सुविधाओं पर उन्हें अपराध-बोध हो आता है।

कुर्सी में धंसे, सिगरेट फूंकते-फूंकते व्यतीत में टहल आने में ख़ासा समय बीत गया। घड़ी में झांका, साढ़े तीन बजने को थे। उन्हें चाय की तलब हो आयी। चाय पीकर प्रभात के चित्रों पर लिखने बैठूंगा, सोचते हुए वे उठे ही थे कि दरवाज़े की घंटी घनघनायी। किवाड़ धकेला, सामने नीरज दिखा। अचरज की तरह।

‘अरे…! आइए..आइए। आज रास्ता कैसे भटक गये…?’ उनकी आवाज़ में हल्की-सी तुर्शी थी।

हाथ मिलाते हुए वह भी थोड़ा तल्ख़ हुआ ‘आप तो हमारे घर आने से रहे…तो हम ही चले आए…दर्शनार्थ।’

‘एक सरकारी मुहिम चल रही है आजकल -आपकी सरकार-आपके द्वार।’ उनके ठहाके में तंज़ था। वे फिर कुर्सी में जा धंसे। नीरज लेकिन ख़रामा-ख़रामा बढ़ता इज़ल के सामने जा ठहरा। नज़रों का चश्मा चढ़ा अधूरे चित्र का मुआयना करता रहा। फिर उनके सामने आकर, सोफ़े पर बैठते हुए उसने आंखें मिचमिचायीं ‘सच कहूं…मैं हमेशा से एक पेंटर बनना चाहता था।’

नीरज की ऐसी भंगिमाएं ही उन्हें भीतर तक कलपा देती हैं। वे मन ही मन भड़के, यह कमबख़्त यदि किसी संतूर-वादक के घर जाये तो ज़रूर कहेगा कि वह संतूर-वादक ही बनना चाहता था।

वे उसका मुआयना करने लगे। जाना-पहचाना गोल चेहरा। तराशी हुई फ़्रेंचकट दाढ़ी। सफ़ाई से छिपा दी गयी बालों की सफ़ेदी। बादामी रंग के पेंट पर गहरे आसमानी रंग की शर्ट। चमचमाते कत्थई जूते। शानदार कमर-पट्टा। जगमगाती सुनहरी ऐनक। लकदक कलाई घड़ी। बायी अनामिका में सोने की अंगूठी। सब कुछ ब्रांडेड और क़ीमती। वह किसी कारपोरेट बॉस के-से रूआब का हमेशा आकांक्षी रहा है। सोफ़े पर पीठ टिकाये वह दीवार पर लटकती तस्वीरों और शेल्फ़ में सजी पुस्तकों पर निगाहें घुमा रहा था। साइड-टेबल पर रखी एक कला-पत्रिका के पन्ने पलटता वह मुख़ातिब हुआ ‘क्या कर रह हो आजकल…?’

‘कुछ ख़ास नहीं…और तुम?’

‘मैं तो व्यस्तम-व्यस्त…।’ वह मुस्कुराया। ‘सेठ धरमचंद कोठारी ने यूं ही तो मुझे एपाइंट नहीं किया होगा।’ उसने गर्दन तानी।

‘ज़ाहिर है…..।’ मुंडी मटकाते हुए उन्होंने जोड़ा ‘…नामी टी.वी. चैनल का कामयाब एंकर बेवजह तो आने से रहा…।’

‘…एक्सेक्टली। यू नो… मेरे वीकली प्रोग्राम की टी.आर.पी. बहुत हाई थी। अच्छे-अच्छे लीडर्स की धोती ढीली कर दी थी मैंने। एरोगेंट हीरो-हीरोइन्स की बोलती बंद कर देता था। दिग्गज खिलाड़ियों…ताक़तवर बाबाओं, टॉप ब्यूरोक्रेट्स और बिज़नेस टाइकून्स…मैंने किसी को नहीं बख़्शा…सबके कान काटे।’ ख़ुद की ख़ूबियों और उपलब्धियों के बेहिचक प्रदर्शन की लत-सी है उसे।

‘उसमें तो तुम्हें महारत हासिल है…।’ उन्होंने चुटकी ली। बावजूद सारी प्रतिभा और यश के निर्लज्ज आत्म-प्रशंसा के कारण ही उन्हें नीरज कभी रास न आया। उसका अध्ययन क़ाबिले-तारीफ़ है और याददाश्त रश्क करने लायक़। तरह-तरह के मसलों पर विचित्र जानकारियां देकर चौंकाना उसकी पुरानी अदा है। रौब गांठना उसे पसंद है। पांच-मिनिट की बातचीत में पच्चीस विदेशी नाम पटकना उसका शगल। पहले हैबरमॉस, ग्रॉम्शी, लोर्का, तारकोवस्की के उद्धरण दे-दे कर चकित करता था। आजकल देरिदा, फूको, मार्क्वेज़, हॉकिन्स, झिझेक और चोम्स्की के हवालों से डराता है। उसकी कविताओं के तेवर और भाषा आधुनिक है। मगर, उसकी वैचारिक दृष्टि उन्हें संदेहास्पद मालूम देती है और उसका राजनीतिक झुकाव अक्सर अवसरानुकूल।

‘सुधीर बाबू कहां हैं आजकल?’ उसने एकाएक प्रश्न उछाला। सुधीर भी चर्चित कवि है और उसके साथ नीरज की प्र्रतिद्वंद्विता साहित्य-जगत का ज्ञात रहस्य। नीरज मानता है कि सुधीर उनका क़रीबी है, इसलिए उसे लेकर उन्हें घेरने की कोशिशें करता रहता है।

‘दिल्ली…।’ उन्होंने दांयी भौंह तिरछी की। एक-दूसरे को ख़ारिज करने की दोनों की पैंतरेबाज़ी उन्हें कभी नहीं सुहायी। सुधीर की कविताओं को नीरज उथली वामपंथी नारेबाज़ी करार देता है। जबकि नीरज की कविताओं को सुधीर ने विदेशी मुहावरों की तत्सम नक़ल घोषित कर रखा है।

‘उसने गोल्डन शेकहैण्ड स्कीम में नौकरी क्यों छोड़ी? जबकि उसकी यूनियन…उसकी पार्टी भी…उस नीति के विरोध में थी।’ नीरज ने आवाज़ तेज़ की। सुधीर की कविता और जीवन को कठटघरे में खड़ा करने का कोई मौक़ा वह नहीं चूकता।

नीरज के सामने उन मजबूरियों का ज़िक्र उन्हें बेमतलब लगा, जिनकी वजह से जुझारू छात्रनेता सुधीर को पढ़ाई अधबीच में छोड़नी पड़ी। कम उम्र में ही सरकारी महकमे में कारकून बन जाना पड़ा। वे जानते हैं कि पार्टी-होलटाइमर बनने के टूटे ख़्वाब की भरपाई ट्रेड-यूनियन में सक्रियता से करने, आरोप-पत्र देते रहने, वेतन-वृद्धियां रोकने और एक बार तो सस्पेंड तक कर देने के मैनेजमेंट के हथकंडों का सुधीर ने कैसे सामना किया उस पूरी दास्तां को नीरज ढकोसला बता सकता है, लिहाज़ा वे सिर खुजाते हुए खिड़की से बाहर ताकने लगे।

उनकी चुप्पी चटकाने की नीरज की कोशिश जारी रही, ‘बेहतरीन एक्सग्रेशिया कमाया… अब श्रीमान क्रांति करेंगे? मुझे ऐसी हिप्पोक्रेसी से नफ़रत है। बेटी को तो जर्नलिस्ट बना ही दिया है उसने…अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल में निश्चित ही बढ़िया सैलरी पीट रही होगी। सुनते हैं…गाज़ियाबाद में फ्लैट ख़रीद चुकी है! बुढ़ापा मज़े से काटेंगे सुधीर बाबू। दिल्ली में पार्टी बॉसेज़ की नज़रों में बने रहने का सुभीता है और आलोचकों को सलाम बजाने की सहूलियत भी। अकादमी अवॉर्ड कबाड़ ही लेंगे अब…।’

‘…किसी के प्रति इतना प्रिज्युडाइज़्ड कैसे हुआ जा सकता है?’ वे बमक गये ‘तुम जानते ही होगे कि सुधीर दिल्ली शिफ्ट नहीं हुआ है…वाइफ़ के इलाज के लिए वहां है। उसी प्रॉब्लम के चलते यूनियन ने ही उससे वॉलेंटरी रिटायरमेंट लेने को कहा था…उसी बीच गवर्नमेंट की गोल्डन शेकहैंड-पॉलिसी आ गयी…तो? बीवी अस्पताल में भर्ती हो तब किसे फ़ुर्सत होगी नेताओं या आलोचकों को सलाम बजा आने की?…और इस हुकूमत के दौर में सुधीर अकादमी अवॉर्ड पा सकता है?’

नीरज तब भी डटा रहा ‘देखो यार…मै जानता हूं…सुधीर कभी भी अपनी नौकरी के प्रति ऑनेस्ट नहीं रहा…ड्यूटी-फ्री रहने के लिए यूनियन सेक्रेट्री बना। रोज ऑफ़िस तो जाता था…पर अपनी सीट पर नहीं…कैंटीन में बैठा मिलता था। कभी जनाब लेबर-कोर्ट जा रहे हैं तो कभी किसी भलती ही इंडस्ट्री की गेट-मीटिंग में भाषण झाड़ने। अगर कोई नौकरी में ईमानदार नहीं है…तो कैसे मान लें कि वह पत्नी, बेटी, यूनियन या पार्टी के प्रति वफ़ादार होगा ही?’

वे नीरज को घूरते भर रहे।

‘आई एम नाट बोस्टिंग…बट…मैंने जो कुछ हासिल किया है…अपने बूते पर किया है। किसी वेलविशर…गॉडफ़ादर…आइडियालॉजी…संगठन या पार्टी की बदौलत नहीं।’ नीरज ने आंखें झपकायीं।

उन्होंने ज़ोर की जम्हाई ली।

उनकी अनिच्छा देख आख़िर नीरज ने बातचीत का रुख़ पलटा ‘यार, छोड़ो…यह बताओ कि तुम किस चित्रकार के मुरीद हो?’

‘कितने ही…किसी एक का नाम कैसे लूं?’ वे सोचते हुए बोले।

‘कोई मुझसे यह सवाल करे तो मैं बिना पल गंवाये कहूंगा…विंसेंट वान गॉग।’ नीरज चहका।

‘…पोस्ट-इम्प्रेशनिस्ट दौर का अनोखा चित्रकार था।’ उनकी नज़रें उस दीवार की तरफ़ उठीं, जहां वान गॉग का प्रसिद्ध आत्मचित्र लगा था। धंसे हुए गाल। लाल-भूरी दाढ़ी। प्रशस्त ललाट। पीछे की तरफ़ काढ़े गये सुनहरे बाल। तनी हुई भौंहें। नीली पुतलियां। तीखी नाक। बंद गले की सफ़ेद शर्ट पर हल्की हरी-नीली रंगतों वाली जैकेट और कोट। उसके अपने विशिष्ट तूलिकाघातों से बनी उन्हीं रंगों वाली लहरदार पृष्ठभूमि। उन्होंने चित्र की तरफ़ इशारा किया, ‘…गोली मार ख़ुदकुशी कर लेने वाले उस जुनूनी डच चित्रकार का यह आख़िरी सेल्फ़-पोट्रेट माना जाता है।’

चित्र निहारता नीरज बोलने लगा, ‘मेरी ख़्वाहिश है कविता का वान गॉग बनना। सब कुछ भुलाकर मगन रहने वाले मुफ़लिस कलाकार…पियक्कड़ कवि…मुझे बहुत अट्रैक्ट करते हैं। वे लोग…जिनका जीवन नामालूम-सी जगहों…छोटे-छोटे कामों…मयख़ानों, पागलख़ानों अथवा वेश्याओं के कोठों पर बीत जाता है। घर फूंक देने वाली उनकी विक्षिप्तता मुझे दिव्य जान पड़ती है। हिंदी साहित्य में मेरा वोट इसीलिए भुवनेश्वर को जाता हैं।’

उनकी आंखों में संदेह उग आया।

नीरज जारी रहा ‘अमस्टरडम में…पेरिस में…मैंने उसकी पेंटिंग्स देखी हैं। क्या दमदार रेखाएं हैं…रौशनी का बहाव है…रंगों को नये मायने देने वाला चित्रकार है वह। यू नो…पिछले बरस मैं यू.एस. गया था…प्रधानमंत्री का दौरा कवर करने। तमाम बैठकों…कार्यक्रमों की व्यस्तताओं बीच भी मैं न्यूयार्क में -म्यूज़ियम ऑफ मॉडर्न आर्ट- जाने से नहीं चूका। मुझे वान गॉग की -स्टारी-नाइट- जो देखना थी।’ नीरज उत्साह में था ‘वहां पिकासो की पेंटिग्स हैं। मातीस, पॉल क्ली, जॉन मीरो…तमाम महान चित्रकारों के चित्र हैं। पर… -स्टारी-नाइट- लाजवाब है…सम्मोहित कर देने वाला जादू है…।’

वे नीरज को ताकते भर रहे।

वह उठ कर आहिस्ता-अहिस्ता टहलने लगा ‘गांव…किसान…खेत…अनाज…पुआल… पनचक्की…आलू खाते लोग…वह छोटी-छोटी चीज़ों… आम लोगों का चितेरा था। सुनहरे पीले रंग का तो जैसे वह दीवाना ही था। नौ-दस बरस ही तो चित्रकारी कर सका…पर उसी में ग़ज़ब ढा गया। जीते जी वह अभावों में रहा…आज उसकी कृतियां करोड़ों में बिक रही हैं। मैंने उस पर लिखी अनेक किताबें पढ़ी हैं…। लस्ट फ़ॉर लाइफ़ और भाई थियो को लिखी उसकी चिट्ठियां… बहुत ही मार्मिक हैं। चित्रकार गोगां से उसकी भिड़ंतों के… पीले मकान के… पादरी बनने के… खदान में मज़दूरी के…और प्रेम में विफलताओं के उसके क़िस्से…सचमुच बेचैन कर देते हैं। कान कटने का दर्द कैसा होता होगा, यह महसूस करने के लिए जो ख़ुद का ही कान काट डाले… समाज उसे पागल करार देता है! कटे कान को वह एक वेश्या को भेंट कर आया था…।’

‘हूं।’ वे आहिस्ता हुंकारे ‘मुझे लगता है…..वान गॉग की मनःस्थिति का आंकलन हमेशा आधा-अधूरा रह जाएगा। किसी के अवसादग्रस्त होने…..हिंसक पागलपन की दशा तक पहुंच जाने के लिए… क्या सोसायटी ज़रा भी रिस्पॉन्सिबल नहीं? आख़िर हमारा समाज किसी के दुःखों, कष्टों, संघर्षों को ठीक से समझने की कोशिश ही कहां करता है? उनके चेहरे पर ग़ुस्से की लकीरें खिंच आयी थीं।

नीरज की ढपली बजती रही ‘मैं इंटरनेट छानता रहता हूं…वान गॉग पर बनी अनेक फ़िल्में देख डाली हैं मैंने। कुछ यूरोपीयन देश बुल-फ़ाइटिंग के लिए जाने जाते हैं… लाल कपड़ा दिखाकर सांड को भड़काने वाला हिंसक खेल। गोल अहाते के चौ-तरफ़ चीखती-चिल्लाती उन्मादी भीड़… और बीचो-बीच मैटाडोर… मतलब योद्धा और एक भयावह सांड। सारा दारोमदार उस अकेले व्यक्ति की चपलता पर है… वह सांड को चकमा दे सका तो ठीक… वरना ज़रा-सा चूका कि क्रुद्ध सांड उसे सींगों से मार-मार अधमरा कर दे। भीड़, उत्तेजित है… मैटाडोर सांड को छका दे… तब भी और भड़का हुआ पशु उसे पैरों तले कुचल रहा हो… तब भी। इसी खेल का रिवाज था… विजेता मैटाडोर को पुरस्कार स्वरूप सांड का कान काट कर भेंट किया जाता था। वान गॉग शायद उसी से आहत था…ख़ुद का कान काटकर ख़ुद को ही देते हुए…वह विजयी भी था और परास्त भी।’

‘उसके बारे में सूचनाओं का घालमेल है। पता नहीं क्या प्रामाणिक है, क्या नहीं? बहरहाल, इतिहास में शायद वह ऐसा ही रहेगा… रहस्यमय पहेली-सा। उसके चित्रों की व्याख्याएं भी तटस्थ नहीं हो सकेंगी…।’ उनकी बुदबुद के बाद वहां उदासी पसर गयी। उसी अंतराल में उन्होंने कॉफ़ी बना ली। एक प्याला नीरज को थमाया ही था कि कॉलबेल बजी। अपना प्याला तिपाई पर रख उन्होंने दरवाज़ा खोला। बाहर वीरेन्द्र खड़ा था। बेतकल्लुफ़। बीड़ी धौंकता। उसके भीतर आने से पहले रम का तेज़ भभका घुसा चला आया। उन्हें कसकर बाज़ुओं में बांध गले लगा वीरेंद्र। नीरज को बैठे देख उसने शरारत की ‘ये महाशय भी यहां कुर्सी तोड़ रहे हैं!’

नीरज की झेपी-सी मुस्कान ने उनकी खिलिखिलाहट की ओट ले ली थी।

‘कॉफ़ी पियोगे?’ उन्होंने वीरेन्द्र से पूछा।

‘यार… उतर जाएगी!’ घिसी हुई चप्पलों से पैर निकाल, सोफ़े पर आलथी-पालथी मार बैठते हुए उसने अपनी गुड़ी-मुड़ी धारीदार कत्थई शर्ट की बांह उमेठी। बिखरे बाल उसके उन्नत माथे पर बिखरे हुए थे। बेतरतीब खिचड़ी-दाढ़ी ने उसके पिचके हुए गालों को ढांक रखा था। उसकी गर्दन के आस-पास चौखानेदार लाल गमछा लिपटा था। जिससे माथे का पसीना पौंछते हुए उसने नीरज को छेड़ा ‘महाकवि…..सुनाओ कुछ नयी-पुरानी।’

‘आप ही सुनाइए श्रीमान कथाकार…क्या चल रहा आजकल?’ नीरज के चेहरे पर नाखुशी थी।

‘ऐश।’ कहते हुए वीरेन्द्र ने सेंटर-टेबल पर पैर पसार दिये। उसकी बदरंग, मैली जीन्स के उधड़े हुए पायचों से निकली एड़ियां खुरदुरी थी। काली बिवाइयों से भरी। उसके इर्द-गिर्द रम, बीड़ी और पसीने की मिली-जुली बू थी।

‘तुम्हारे तो ऐश ही हैं यार…..बेटा स्टेट्स में नौकरी जो पा गया है।’ नीरज की आवाज़ में ईर्ष्या का आभास था।

‘हां….! उड़ाओ मेरी हंसी। ता-उम्र जिस अमेरिका को मैं गरियाता रहा..साहबज़ादे वहीं जाकर सड़ रहे है।’ व्यंग्य से हंसते हुए उसकी आंखें मुंदा जाने से किनारे की झुर्रियां उभर आयीं। मूंछों के नीचे पीली-काली बत्तीसी बेपर्दा हुई।

‘शानदार पैकेज पर होगा ?’ नीरज उत्सुक था।

‘पता नहीं यार…कि उसकी तनख़्वाह लाखों में है कि करोड़ो में! ये पैकेज…पर्क्स …भला मेरी समझ में आये भी हैं कभी? सारा गणित मेरी बीवी ही जानती है। मुझे इतना भर पता है कि मेरा बेटा बचपन से क्रिएटिव था…उसकी दिलचस्पी थियेटर में थी…मेरी चलती तो उसे एन.एस.डी. भेजता। मगर, सारे सूत्र उसकी मां…बल्कि उसके मामा के हाथों में रहे। आई.आई.टी…आई.आई.एम…सारा कैलक्युलेशन उसी निक्कर-नेशनलिस्ट का था। राष्ट्रवाद और अमेरीका की ग़ुलामी एक साथ साध लेने का करतब उसे आता है।’ भभक गया वीरेन्द्र कुछ क्षण चुप रहकर आहिस्ता फुसफुसाया ‘मैं…..कोई प्रागैतिहासिक गुफा मानव…सबके पीछे छूटा रहा..अपने क़िस्से-कहानियों के साथ…ग़म और रम के साथ।’

बेआवाज़ वे उसे देखते भर रहे। नीरज बेवजह यहां-वहां ताक रहा था।

वीरेंद्र अचानक उठा। लड़खड़ाता-सा उनकी कुर्सी पीछे पहुंचा। अपनी बांहें उनके गले के इर्द-गिर्द लपेट भर्राया ‘…मेरे हिस्से आये ये चंद हरामी दोस्त…और मुझे चाहिए भी क्या?’ उसने प्रश्नवाचक मुद्रा में दांयी हथेली लहरायी। उसकी हंसी में अजीब आर्द्रता थी।

उसकी खुरदुरे पंजे अपनी हथेलियों में कसकर थाम लिये उन्होंने। गमछे से आंखें पौछते, सोफ़े पर आ बैठते हुए वह खांसने लगा। उन्होंने उसे पानी पिलाया। कुछ देर फिर सन्नाटा छाया रहा। जिसे नीरज की सधी आवाज़ ने तोड़ा ‘मैं नौकरी छोड़ने वाला हूं।’

‘क्यों?’ वे चौंके।

‘गोदी सेठ ने बम्बू कर रखा होगा…।’ निढाल पड़े वीरेंद्र का नश्तर तीखा था।

नीरज ने ग़ुस्से से ओठ चबाये। बेपरवाह वीरेंद्र अपनी बीड़ी सुलगा रहा था।

‘आई हैव फ़ायनली डिसाइडेड।…नोएडा का फ़्लैट मैंने बेच दिया है। गांव के मकान को अपने हिसाब से कन्वर्ट करवा रहा हूं…। यहां…सृष्टि एनक्लेव में मेरा एक डुप्लेक्स है। नेक्स्ट फरवरी में मै सत्तावन का हो जाऊंगा…तब कभी यहां तो कभी गांव में रहूंगा।… अपना सारा समय लिखने-पढ़ने में गुज़ारूंगा।’ नीरज की मुद्रा फ़ैसला सुना देने की-सी थी।

वह उठा और धीरे-धीरे चलता वान गॉग के आत्मचित्र क़रीब जा खड़ा हुआ। कुछ क्षण उसे देखने के बाद पीछे घूमा ‘बेटी की शादी मैं कर ही चुका हूं। दामाद…अमेरिकन एम.एन.सी. में है…सीनियर एक्सेक्यूटिव। दे आर वेरी वैल सेटल्ड। मेरा बेटा…पिलानी में है। इंजीनियरिंग का…फ़ाइनल-सेमेस्टर है…कैम्पस सिलेक्शन में हालांकि शिवम् कम्प्यूटर्स का हैंडसम ऑफ़र है…बट आई वांट हिम…कि वह एम.बी.ए. करे। मैनेजमेंट में स्कोप शानदार है…।’

नीरज के अचूक हिसाब-किताब से वे ऊबने लगे थे। आंखें मींच सुनने का अभिनय करता वीरेन्द्र वाक़ई नींद में जा चुका था। नीरज जारी रहा ‘प्रॉब्लम एक ही है कि हमारे सुपुत्र मिलेट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज़ में जाने की ठाने बैठे हैं… आदर्श झाड़ रहे हैं… कि फ़ौज में आजकल कोई नहीं जा रहा। हर इंजीनियर मल्टीनेशनल में जाएगा तो देश की सिक्योरिटी का क्या होगा…?’

नीरज के चेहरे पर मृत्युभय की परछाईं मंडरा रही थी। सोफ़े पर फिर बैठते हुए वह फड़फड़ाया ‘देश की सुरक्षा का ठेका जैसे हमारे बेटे ने ही ले रखा है? लाख समझाया… इस सरकार की राष्ट्रवाद की परिभाषा से सहमत भी कैसे हुआ जा सकता है..? महाशय… लेकिन ज़िद पर अड़े हैं।’

उनका मन हुआ पूछ लें -मल्टीनेशनल कंपनियों की लूट से सहमत हुआ जा सकता है? …और ग्लोबलाइजे़शन, प्राइवेटाइज़ेशन, लिब्रलाइज़ेशन से?-

कौन जिरह करे, सोचकर वे चुप रहे। वीरेन्द्र के खर्राटे बजने लगे थे।

नीरज ने वीरेन्द्र को घूरा। क्षणांश के लिए उसकी निगाहों में हिकारत कौंधी। उसने मोबाइल में झांका और हड़बड़ाया-सा उठ खड़ा हुआ। मिलाने के लिए दायां हाथ आगे बढ़ाया ‘इजाज़त चाहूंगा…।’

उसकी हथेली गिलगिली-सी थी। जिसे उन्होंने तुरंत छोड़ दिया। नीरज के पीछे-पीछे वे बरामदे में निकल आये। वहां बूढ़ी धूप बैठी थी। थकी हुई। विजयी मैटाडोर की-सी अकड़ में चलता नीरज कार की तरफ़ बढ़ रहा था। अदब से झुके वर्दीधारी ड्राइवर ने कोकाकोला रंग की कार का पिछला दरवाज़ा खोला।

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विशाल, आलीशान कार में बैठने से ठीक पहले नीरज पलटा। उनकी तरफ़ हाथ हिलाते हुए मुस्कुराया। उन्होंने भी होंठ फैला दिये। कार की सीट में धंसते नीरज की पतलून का हिप-पॉकेट उन्हें कुछ भारी मालूम दिया। भरा-भरा सा। उन्होंने नज़रें गड़ायीं तो लगा उसकी जेब की सतह पर खून की कुछ बूंदें भी हैं। वे हकबकाये। भीतर, दीवार पर वान गॉग का आत्मचित्र अपनी जगह था। मगर, उसे देख वे थर्रा गये। उन्होंने आंखें मिचमिचायीं। चित्र की तरफ़ फिर देखा। वान गॉग के धंसे हुए गालों पर से दाढ़ी-मूंछ गायब थी। सिर पर उसने नीला टोप धर लिया था। जिसके किनारों के काले फर ने उसके प्रशस्त माथे को आधा ढांक दिया था। तीखी नाक के नीचे कुछ सिकुड़े हुए-से ओठ थे। पुतलियां, हल्की हरी-नीली। उसने बड़ी कॉलर वाला गहरा हरा ओवर-कोट पहन लिया था। पीछे की पीली दीवार पर एक चित्र चस्पां था। चित्रकार के चिर-परिचित ब्रश-स्ट्रोक्स जस के तस थे। अपने कटे हुए कान पर उसने सफ़ेद मरहम-पट्टी बांध रखी थी।

चिंतातुर वे भीतर लपके। हवा में रक्त सने ताजे मांस की-सी गंध का एहसास हुआ उन्हें! वीरेंद्र के खर्राटों की घुरघुराहट, बुल-फ़ाइटिंग के अखाड़े में हाज़िर हुजूम की उन्मादी चीखों में बदलती जा रही थी। उन्हें लगा, आततायी कोलाहल बीच कोई मर्माहत सिसकारी भी उनके कानों से टकरा रही है।

मनोज कुलकर्णी, manoj kulkarni

मनोज कुलकर्णी

चित्रकार, कहानीकार, छायाकार, घुमक्कड़ व वामपंथी संस्कृतिकर्मी। 25 से अधिक चित्र प्रदर्शनियों में हिस्सेदारी। सामयिक विषयों पर अनेक शहरों में नुक्कड़ नुमाइशें। कहानियां, चित्रकला संबंधी लेख, चित्र, रेखांकन, यात्रावृत्तांत, संस्मरण, समीक्षाएं आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। कहानी संग्रह 'औघड़ समय' सहित भारत के जनविज्ञान आंदोलन पर एक पुस्तक के अलावा कुछ अनुवाद पुस्तिकाएं प्रकाशित। बाल-साहित्य की एक पुस्तक-माला, कलापत्र 'तूलिका-संवाद' और जनवादी लेखक संघ की केंद्रीय पत्रिका 'नयापथ' के चित्रकला विशेषांक, जनविज्ञान की त्रैमासिकी 'ज्ञान-विज्ञान वार्ता' और आनलाइन सांस्कृतिक पत्रिका 'हम देखेंगे' का संपादन।

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