
- January 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग सलीम सरमद की कलम से....
इल्म, तजुर्बा, थ्योरी और अख़्तरुल ईमान
ज़िंदगी मुझसे कह रही थी कि उम्र सवालों की जा चुकी है और अब दौर जवाबों के आये हैं। मैं तब प्राइवेट स्कूल टीचर की हैसियत से कमफ़हम बच्चों के सामने अपनी क़ाबिलियत का भरम बनाये हुए था… मेरी आंखों के सामने जो छोटी-सी दुनिया थी, मैं उसमें सही और ग़लत की डेफ़िनेशन तय कर रहा था। इल्म और तजरुबे के दरमियान एक ऐसी लकीर खींचने की जद्दो-जहद में था जिस पर मैं आइंदा चल सकता था।
तसव्वुरात की शमएं जला के देख तो लूं
सियाहखानः-ए-हस्ती सजा के देख तो लूं
ग़मे-हयात पर आंसू बहा के देख तो लूं
तेरी नज़र से ज़रा दूर जा के देख तो लूं
मैं ग़ज़ल कहना सीख चुका था यानी शेर की रिदम से आशना था। तब दो मिसरों के बीच तसलसुल तो था मगर रोज़मर्रा की ज़िंदगी बेतरतीब थी। ज़हनो-दिल आज़ाद थे मगर मैं शेर के दो मिसरों के सीमित और जाने-पहचाने लफ़्ज़ों में फंस गया था। जैसे ग़ज़ल में किसी एक फ़िक्र का मरकज़ नहीं होता ठीक वैसे ही मेरी समझ बिखरी हुई थी। बच्चों को साइन्स की थ्योरी तो सिखा रहा था मगर मेरे अपने तजुर्बे से किसी थ्योरी ने जन्म नहीं लिया था। मैं शायरी तो कर रहा था मगर मैं शायर नहीं था। इल्म और तजुर्बे के बीच जिस लकीर को खींचता वो बीच में ही टूट जाती थी।
पिये हुए हूं मए-ग़म संभल नहीं सकता
अभी तो होश में दो गाम चल नहीं सकता
अभी तो ज़ीस्त का उनवाँ बदल नहीं सकता
महब्बतों को फ़साना बना के देख तो लूं
अदब से मोह की क़ीमत चुकानी पड़ती है सो अपना सुकून क़ुर्बान करके उसे चुका रहा था। सेंट्रल लाइब्रेरी में ठहरी हुई उन ख़ामोश किताबों में कुछ ऐसी किताबों को ढूंढ़ने में समय गंवा रहा था जो मेरे तख़य्युल को रफ़्तार दें और फ़िक्र में शोर पैदा कर सकें। मुझे एक किताब मिली ‘सरो-सामां’, अख़्तरुल ईमान की नज़्मों का संकलन… गर्मियों की छुट्टियां थीं, उन्हीं फ़ुर्सत के दिनों में ये भारी-भरकम किताब मेरे हाथ लगी, पहले इन ज़ख़ीम किताबों से अक्सर किनारा कर लेता था। शायद किताबें भी अपने पाठक के इल्म और तजरुबे को परखती हैं फिर वो उनके हाथ आती हैं। हो सकता है पहले भी लाइब्रेरी की किताबों की भीड़ में मुझसे ये किताब टकरायी हो और मेरी नासमझी ने दो-चार पन्ने पलटकर इसे रख भी दिया हो, रॉन्डा बर्न की किताब में लिखा रहता है न कि आप जिसके बारे में लगातार सोचते हैं, धीरे-धीरे वो सब कुछ उसी सोच के अनुसार घटना शुरू हो जाता है। आख़िर जिस किताब का मुझे बरसों से इंतज़ार था वो मेरे हाथ में थी।
ये घर बना के गिरा दूंगा अपने हाथों से
दिये जला के बुझा दूंगा अपने हाथों से
ये सारी बज़्म उठा दूंगा अपने हाथों से
ख़यालो-ख़ाब की दुनिया बसा के देख तो लूं
सरो-सामां ने लुग़त का क़ुफ़्ल तोड़ दिया था लफ़्ज़ मेरे सामने सोने-चांदी की अशर्फ़ियों की तरह बिखर गये थे। या वो सुब्ह हरी घास की नोकों पर ठहरी ओस की बूंदों जैसे लग रहे थे या वो शाम के रंग थे जो उफ़क़ पर फैले थे। ढेरों लफ़्ज़ और अनगिनत मानी इसे यूँ कहें कि रात में आसमान की छत कुछ नीचे आ गयी थी और मैंने लफ़्ज़ों के सितारों को हाथ बढ़ा के एक झटके में तोड़ लिया था और रोशनी की तरह उनके मानी मेरी रूह में उतर गये।

सियाहो-कुहना महलकों से उस तरफ़ कोई
घनी दबी हुई पलकों से उस तरफ़ कोई
पुकारता है धुंधलकों से उस तरफ़ कोई
ये दो क़दम हैं इन्हें भी उठा के देख तो लूं
ज़िंदगी से बेतरतीबी फिर जाती रही, ग़ज़ल के अशआर-सी बिखरी हुई समझ किसी मुकम्मल कहानी के अंजाम-सी हो गयी। नज़्म एक मुकम्मल कहानी ही तो होती है। नज़्म इल्म और तजुर्बे को जोड़ने वाली लकीर होती है। अख़्तरुल ईमान मेरे अनदेखे, अनजाने और अलबेले उस्ताद थे जो मुझे अपनी किताब से सिखा रहे थे और मेरे अंदर मेरी अपनी थ्योरी जन्म ले रही थी।
ग़ुबारे-रह के इशारे संभाल लेते हैं
उफ़क़ के धुंधले किनारे संभाल लेते हैं
सुना है टूटते तारे संभाल लेते हैं
बस एक बार सही डगमगा के देख तो लूं

सलीम सरमद
1982 में इटावा (उ.प्र.) में जन्मे सलीम सरमद की शिक्षा भोपाल में हुई और भोपाल ही उनकी कर्म-भूमि है। वह साहित्य सृजन के साथ सरकारी शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों को भौतिक विज्ञान पढ़ाते हैं। सलीम अपने लेखन में अक्सर प्रयोगधर्मी हैं, उनके मिज़ाज में एकरंगी नहीं है। 'मिट्टी नम' उनकी चौथी किताब है, जो ग़ज़लों और नज़्मों का संकलन है। इससे पहले सरमद की तीन किताबें 'शहज़ादों का ख़ून' (कथेतर) 'दूसरा कबीर' (गद्य/काव्य) और 'तीसरा किरदार' (उपन्यास) प्रकाशित हो चुकी हैं।
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