
- May 15, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से....
हिन्दी ग़ज़ल में डॉ. उर्मिलेश
डॉ. उर्मिलेश, दुष्यंत कुमार के बाद की पीढ़ी के महत्वपूर्ण ग़ज़लकार रहे। इन्होंने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से आम आदमी की पीड़ा, संघर्ष और सामाजिक यथार्थ की गहन पड़ताल की है। उर्मिलेश एक प्रतिबद्ध और सजग ग़ज़लकार हैं। उनकी ग़ज़लों में समाज साँस लेता है, आम आदमी की बेचैनी करवटें बदलती दिखायी देती है। उनकी रचनाओं में परिवर्तन की तीव्र आकांक्षा स्पष्ट रूप से परिलक्षित है।
अपनी वैचारिक शक्ति और रचनात्मक दृष्टि पर पूर्ण विश्वास रखने वाले डॉ. उर्मिलेश के इस विश्वास के भीतर एक गहरी चिंता भी महसूस की जा सकती है। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की तरह वे भी मानते हैं कि व्यक्ति से समाज बनता है और समाज से व्यक्ति; और अंततः यही व्यक्ति समाज में परिवर्तन का वाहक बनता है।
उर्मिलेश का मानना है कि सामाजिक बदलाव के लिए कभी-कभी दृढ़ और स्पष्ट रुख़ अपनाना आवश्यक होता है। वे समाज में किसी भी प्रकार के एकाधिकार के विरोधी हैं। उनका विश्वास शक्ति और अधिकार के समान वितरण में है। उनका मानना है कि यदि समस्त अधिकार एक ही हाथ में केंद्रित हो जाएँ, तो किसी भी स्तर पर वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं हो सकता।
आचार्य श्रीराम शर्मा के नाम से प्रचलित हो चुके विचार ‘हम बदलेंगे युग बदलेगा’ की तर्ज़ पर उर्मिलेश भी मानते हैं कि समाज को बदलने की पहली शर्त स्वयं को बदलना है। एकरूपता, जड़ता और ऊँघते हुए समाज से वह व्यथित दिखायी देते हैं। उनका कहना है यदि परिवर्तन की पुरानी तदबीरें कारगर सिद्ध नहीं हो रही हैं, तो नयी राह तलाशना समय की माँग है।
चूँकि उर्मिलेश ओज के कवि रहे इसलिए उनकी ग़ज़लों में समय-समय पर संघर्ष, प्रतिरोध और जागरण का सशक्त आह्वान भी सुनायी देता है। समाज और अपने दौर का एक स्पष्ट, तीखा और यथार्थपरक चेहरा उनकी रचनाओं में हर क़दम पर दृष्टिगोचर है। यह भी याद रखने वाली बात है कि उर्मिलेश किसी विचारधारा, समूह या बैनर विशेष के अंतर्गत लिखने वाले रचनाकार नहीं रहे हैं।

चूंकि उर्मिलेश ओज के कवि हैं, गीत के कवि हैं, इनकी रचनाओं में गेयता के साथ-साथ शासक वर्ग के साथ निरंतर एक जन-संघर्ष चलता रहता है। इन तमाम बातों के सबूत के तौर पर कई शेर प्रस्तुत किये जा सकते हैं लेकिन यहां दो-एक पूरी ग़ज़लें ही देख ली जाएं तो बात बन जाएगी:
कल न बदला तो आज बदलेगा
वक़्त अपना मिज़ाज बदलेगा
आदमी की यहाँ तलाश करो
आदमी ही समाज बदलेगा
फूल-माला बने रहे जो तुम
कैसे काँटें का राज बदलेगा
वो ही अफ़सर है वो ही चपरासी
कैसे सब कामकाज बदलेगा
वो जो खुद को बदल नहीं सकता
वो भला क्या रिवाज बदलेगा
रोज बढ़ता ही जा रहा है दोस्त
जाने वो कब इलाज बदलेगा
राजनीतिक आडंबर हों या धार्मिक आडंबर, उर्मिलेश कई जगह अपनी काटदार बयानबाज़ी से काम लेते हैं। वह स्पष्ट रूप से सांप्रदायिक सद्भाव के पक्ष में खड़े हैं। इसके अलावा, मानवीय मूल्यों के पतन, सामाजिक विघटन और प्रेम जैसे जीवन-मूल्यों को वह अपने रचनाकर्म के केंद्र में रखते हैं। एक और ग़ज़ल देखिए:
सादगी की उसूल की बातें
आजकल हैं फ़िज़ूल की बातें
अब फ़सादों के काम आती हैं
राम की और रसूल की बातें
जिनसे गुलशन की ख़ैर माँगी थी
सुन रहा हूँ बबूल की बातें
चिकने फ़र्शों पर चल रहे हैं वो
वो क्यों समझेंगे धूल की बातें
हम कि काँटों के बीच रहते हैं
हम ही समझेंगे फूल की बातें
डॉ. उर्मिलेश ने अपनी रचनाओं में प्रेम की भावभूमि को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया है। उनकी एक ग़ज़ल पर दृष्टि डालते हैं, जिसमें प्रेम की सुंदरतम और नवीनतम कल्पना है। इस ग़ज़ल के प्रत्येक शेर में कोई-न-कोई नवीन प्रतीक और उपमा है, जो मनोहारी है…
तुम प्रभाती हो सुबह की आरती हो शाम की
एक उपमा हो स्वयं तुम, रूप के आयाम की
उर्वशाी-सी उर बसी कामायनी-सी कामिनी
उर्मिला ‘साकेत’ की तुम राधिका हो श्याम की
देखकर जिसके हृदय को भेद सारे खुल गये
इस तरह की तुम खुली पाती हो मेरे नाम की
मैं परीक्षा के कठिनतम प्रश्न-पत्रों-सा विषम
और तुम हो सूचना उसके सफल परिणाम की
मैं नगर के बुद्धिजीवी चिंतकों-सा शुष्क हूँ
तुम सरस भोली सरल-सी आत्मा हो ग्राम की
मैं पराजय की सभा की वेदनामय आह हूँ
तुम विजय ध्वनि हो किसी जीते हुए संग्राम की
एक ग़ालिब की ग़ज़ल-सा शेष हूँ मैं उर्मिलेश
तुम छलकती-सी रुबाई हो उमर ख़य्याम की
अब यहां से ज़रा डॉ. उर्मिलेश की ग़ज़लों के दूसरे पक्ष का रुख़ करते हैं। इस पक्ष में हम उनके शिल्प तथा भाषिक-व्याकरणिक पक्ष का अनुशीलन करेंगे।
उर्मिलेश ग़ज़ल में शिल्प की अनिवार्यता को पूर्णतः स्वीकार करते हैं। वे ग़ज़लों में समकालीन भावबोध तथा उसकी प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति, दोनों को समान रूप से आवश्यक मानते हैं। यह उचित है कि ग़ज़ल अपने समय के प्रति हमें सजग करे, हमें अपने युग की वास्तविकताओं से रू-ब-रू कराये; किन्तु उसका मात्र अख़बार बन जाना उर्मिलेश को स्वीकार्य नहीं है। वह चाहते हैं कथ्य की प्रस्तुति में प्रतीकात्मकता, संकेत और कलात्मकता बनी रहे। उनका मानना है अख़बारों की तरह अत्यधिक सपाट और प्रत्यक्ष हो जाने से ग़ज़ल की साहित्यिक गरिमा और कलात्मकता प्रभावित होती है। इस संदर्भ में उनकी यह ग़ज़ल:
लड़कियाँ लड़कियाँ लड़कियाँ
सुर्खियाँ हल्दियाँ स्याहियाँ
लड़कियाँ लड़कियाँ लड़कियाँ
घुट्टियां दुद्धियां गोदियाँ
लड़कियाँ लड़कियाँ लड़कियाँ
मेंहदियाँ रोलियाँ खाखियाँ
लड़कियाँ लड़कियाँ लड़कियाँ
दृष्टियाँ फब्तियाँ सीटियाँ
लड़कियाँ लड़कियाँ लड़कियाँ
चोलियाँ चुन्नियाँ साड़ियाँ…
यदि डॉ. उर्मिलेश स्वयं इस तुकबंदी को ग़ज़ल के रूप में स्वीकार करते हैं, तो चर्चा भी उसी आधार पर की जानी चाहिए। सबसे पहले शिल्प पक्ष पर बात आवश्यक है। स्पष्ट रूप से कहना होगा कि इन पदबंधों को ग़ज़ल कहना, ग़ज़ल जैसी उत्कृष्ट और अनुशासित विधा के मानकों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यह निर्विवाद है कि डॉ. उर्मिलेश हमारे आदरणीय रचनाकार हैं और हिन्दी ग़ज़ल की पूर्वपीठिका के महत्वपूर्ण स्तंभों में गिने जाते हैं; किन्तु यह कहते हुए दुःख और संकोच भी है कि इस रचना को लिखते समय उन्होंने अपने स्थापित साहित्यिक मर्तबे के अनुरूप सावधानी नहीं बरती।
शिल्प सौष्ठव के लिहाज़ से पूर्ण वाक्यात्मक संरचना नहीं है। क़ाफ़िये तो हैं यानी तुकबंदी मात्र तो है लेकिन यहाँ रदीफ़ के प्रयोग को लेकर शिल्पगत दोष की संभावना भी है। एक व्याकरणिक प्रश्न भी ध्यान आकर्षित करता है। ‘दृष्टि’ का बहुवचन ‘दृष्टियाँ’ प्रयोग करने को लेकर भी भाषिक स्तर पर विचार किया जा सकता है।
भाव पक्ष की ओर बढ़ते ही रचना में एक कमज़ोर और पराजित पिता की छवि उभरती प्रतीत होती है। कुछ लयखंडों में डॉ. उर्मिलेश की दृष्टि अत्यधिक सीमित और संकीर्ण लगती है। तमाम उपमाएँ इसी प्रश्न को और गहरा करती हैं कि क्या स्त्री की पहचान केवल इन परंपरागत प्रतीकों तक सीमित की जा सकती है? क्या कोमलता और कमज़ोरी के बीच के अंतर को पर्याप्त संवेदनशीलता के साथ समझा गया है?
अंतिम उपमाएँ- ‘अर्थियाँ’, ‘लकड़ियाँ’ और ‘तीलियाँ’- कई प्रश्न उठाती हैं। यदि इनका उद्देश्य किसी सामाजिक यथार्थ या त्रासदी की ओर संकेत करना है, तो प्रतीकात्मक स्तर पर वह आशय पर्याप्त स्पष्टता के साथ सामने नहीं आ पाता। और यदि ऐसा आशय नहीं है, तो इन्हें केवल स्त्रियों के संदर्भ में जोड़ना भी पूरी तरह संगत नहीं दिखता। अब कुछ और शेरों पर दृष्टि:
बाँटकर जिस्मों को अब तो बाँटने निकले हैं दिल
फ़ैसला वो भी ग़लत था फ़ैसला ये भी ग़लत
इस शेर में एक बात विशेष रूप से खटकती है। प्रश्न यह उठता है उर्मिलेश ने ‘दिल’ को ‘जिस्म’ से पृथक मानने की आवश्यकता क्यों महसूस की? क्या ‘जिस्म’ के बँटने के साथ ‘दिल’ के बँटने की कल्पना स्वाभाविक रूप से नहीं जुड़ती? याद कीजिए ग़ालिब का वह मिसरा – जला है जिस्म जहां दिल भी जल गया होगा…
एक और बात यह कि प्रथम दृष्टि में प्रतीत होता है जिस्म के बँटने की कल्पना अपने आप में अस्वाभाविक है। ऐसे में उसके बाद ‘दिल’ के बँटने की बात और भी जटिल हो जाती है। हाँ, एक विशेष अर्थ-संदर्भ में इस प्रयोग की संभावना अवश्य दिखती है। यदि शायर का संकेत किसी सामाजिक या सांकेतिक यथार्थ की ओर है, तो इस अभिव्यक्ति को एक अलग दृष्टि से समझा जा सकता है; किन्तु जिस परिप्रेक्ष्य और वातावरण में यह शेर सामने आता है, वहाँ उस अर्थ तक सहजता से पहुँचना संभव नहीं हो पाता। अब एक और शेर पर दृष्टि डालते हैं:
प्यार के उस रास्ते को छोड़कर ऐ ‘उर्मिलेश’
तू चला वो भी ग़लत था मैं चला ये भी ग़लत
इस शेर में ‘ऐ उर्मिलेश’ के बाद दूसरे मिसरे में आया ‘तू’ और ‘मैं’ एक ही व्यक्ति की तरफ़ इशारा कर रहे हैं जो मेरी दृष्टि में ग़लत है। एक और शेर:
सब उसको देख-देख के बाहर चले गये
वो आईना था घर में अकेला खड़ा रहा
इस शेर में भी कुछ न कुछ अखर रहा है। ‘आईना’ अगर किसी ‘बुज़ुर्ग’ या ‘बीमार’ या ‘अभिभावक’ के प्रतीकार्थ रूप में आया है तो फिर खड़ा क्यों रहा, पड़ा रहता तो स्थिति के साथ कहीं अधिक मैच करता और ये ‘आईना’ यदि सिर्फ़ ‘आईना’ है तो फिर इसमें ऐसी कौन-सी जादू वाली बात है कि लोग इसे देखने आ रहे हैं! अब ये देखें:
बारिश हुई तो लोग सभी घर में छुप गये
वो घर की छत था इसलिए भीगा खड़ा रहा
इस शेर में भी अर्थ की स्पष्टता का कुछ अभाव है। शेर पूरी तरह खुलकर सामने नहीं आ पाता। ‘घर में घुस गए’, ‘वो घर की छत था’ अथवा ‘भीगा खड़ा रहा’ जैसे प्रयोग अपेक्षित प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पा रहे। इन अभिव्यक्तियों में शायरी की वह सहजता और गहराई उभरती नहीं दिखती, जिसकी अपेक्षा रहती है। और यह शेर:
मेरे पिता की उम्र से कम थी न उसकी उम्र
वो गिर रहा था और मैं हँसता खड़ा रहा
इस शेर को पढ़ते हुए सबसे पहला प्रश्न यह उठता है कि यदि उस व्यक्ति की आयु पिता की आयु के बराबर या उससे अधिक न होती, तो क्या उस पर हँसना उचित माना जाता? क्या किसी बच्चे के गिर जाने पर हँसना उचित ठहराया जा सकता है? कहने का आशय यह है कि शायर ने श्रोता को अधिक भावुक बनाने के प्रयास में इस प्रसंग को कुछ अनावश्यक विस्तार दे दिया है।
एक और बात खटकती है। ‘वो गिर रहा था’ जैसे प्रयोग को पढ़कर ऐसा आभास होता है मानो गिरने की क्रिया किसी लंबी प्रक्रिया के रूप में घटित हो रही हो। संभवतः बहर की अनिवार्यता के कारण शायर ने इस प्रकार का शब्द-विन्यास चुना है। अब एक और शेर:
बुलबुलों-सी वो ग़ज़लें सँवारेंगे क्या
वो तख़ल्लुस से सैयाद हैं दोस्तो
इस ग़ज़ल में एक अर्थगत भ्रम दिखाई देता है। ‘बुलबुलों-सी’ पदबंध से शायर का अभिप्राय क्या है, यह सहज रूप से स्पष्ट नहीं हो पाता। क्या यहाँ ग़ज़ल को बुलबुल के समान बताया गया है, अथवा यह संकेत है कि बुलबुल ग़ज़लों को किसी विशेष ढंग से सँवारती है? समग्र रूप से भी यह शेर अपेक्षित प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं होता। यह भी देखें:
ग़ज़लों के घायल आँगन में
वो कैसे छमाछम लिखते हैं
इस शेर में बस इतना ही जानना है कि ग़ज़लों का आँगन घायल क्यों है?
इसी क्रम में डॉ. उर्मिलेश की कुछ और शिल्पगत असावधानियों पर भी एक दृष्टि डालते हैं। इस ग़ज़ल में ऐसा प्रतीत होता है कि क़ाफ़िया निभाने के स्तर पर उनसे चूक हो गयी है।
लोग जिसको गुनगुनाएँ आज के माहौल में
वो ग़ज़ल कैसे सुनाएँ आज के माहौल में
चोट लगने पर भी अब आँसू निकल पाते नहीं
चुक गयीं संवेदनाएँ आज के माहौल में
मतले के शेर में शायर ने ‘गुनगुनाएँ’ और ‘सुनाएँ’ को काफ़िये के रूप में बरता है, किन्तु बाद के अश्आर में ‘संवेदनाएँ’, ‘योजनाएँ’, ‘आलोचनाएँ’ और ‘सूचनाएँ’ जैसे शब्दों का प्रयोग है, जिसे शास्त्र के जानकार क़ाफ़िये का दोष मानते हैं। परिणामस्वरूप ग़ज़ल की संगति और प्रभाव दोनों प्रभावित होते हैं। चलिए बह्र की भी एक ग़लती देख लेते हैं:
अभी है सुब्ह अभी से न शाम कर ख़ुद को
अभी से न सँभला तो तार-तार हो लेगा
बह्र है- मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन… इस लिहाज़ से दूसरा मिसरा बे-बह्र हो जाता है। इस शेर में एक बात पर और ध्यान दें कि ‘सुब्ह’ शब्द को उर्दू के वज़न के अनुसार बांधा गया है, हिंदी के नहीं। जैसा कि दुष्यंत ने ‘साये में धूप’ की भूमिका में उर्दू में प्रचलित वज़न ‘शह्र’ को हिंदी में प्रचलित वज़न ‘शहर’ में रूपांतरित करने के दावे किये थे। और ऐसे ही दावों से ‘हिंदी ग़ज़ल’ का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस विषय पर अगले किसी लेख में प्रमुखता से बात की जाएगी।
उर्मिलेश की ग़ज़लों में अब ज़रा मुहावरा-दोष पर भी दृष्टि डालते चलें। जैसा कि हम सभी जानते हैं, किसी भी वाक्य या अभिव्यक्ति में मुहावरों का प्रयोग उनके मूल रूप में ही किया जाना चाहिए; उनके साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ भाषा के सौंदर्य और अर्थ-गांभीर्य, दोनों को प्रभावित कर सकती है।
गो कि मेरे पास-बुक से भी बड़े हैं मेरे ख़्वाब
फिर भी उसने पाँव फैलाये न चादर से अलग
इस शेर में प्रयुक्त मुहावरा है ‘चादर से अलग’ किन्तु वास्तविक मुहावरा है ‘चादर से बाहर’, उर्मिलेश जी ने यहाँ मुहावरे के मरतबे के साथ खिलवाड़ किया है। यह शेर भी देखें:
ओ! मेरे मल्लाह यह नाज़ुक घड़ी है होशियार
काग़ज़ी इस नाव में कुछ गड़बड़ी है होशियार
इस शेर में मुझे सिर्फ़ इतना ही कहना है कि अगर नाव काग़ज़ की है तो कुछ गड़बड़ी क्यों है, फिर तो गड़बड़ी ही गड़बड़ी है। यह भी देखें:
हाल ये प्रतिपक्ष के आलोचकों ने कर दिया
थे बहुत मौलिक मगर अनुवाद बनकर रह गये
आख़िर ‘प्रतिपक्ष के आलोचक’ से अभिप्राय क्या है? क्या ‘पक्ष के आलोचक’ जैसी भी कोई संज्ञा हो सकती है? मेरी समझ से तो प्रतिपक्ष का मूल स्वभाव ही आलोचनात्मक होता है। यदि इसी बात को साहित्य के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जाये, तो स्थिति और भी जटिल प्रतीत होती है। कहीं ‘पक्ष का आलोचक’ से आशय केवल प्रशंसात्मक लेखन करने वाले व्यक्ति से, और ‘प्रतिपक्ष का आलोचक’ से केवल कमियों को रेखांकित करने वाले व्यक्ति से तो नहीं है? यदि ऐसा है, तो आज की हिन्दी ग़ज़ल-समीक्षा पर भी गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है आज अधिकांश समीक्षक केवल पक्षधर आलोचना तक ही सीमित नज़र आते हैं। ज्ञान प्रकाश विवेक, हरेराम समीप, अनिरुद्ध सिन्हा आदि चर्चित नामों की समीक्षाओं को देखकर कभी-कभी प्रश्न मन में उठता है कि क्या उन्हें ग़ज़लों में कमियाँ दिखायी नहीं देतीं। अब यह देखें:
बेटियां जबसे बड़ी होने लगी हैं मेरी
मुझको इस दौर के गाने नहीं अच्छे लगते
यह शेर पहले ही प्रभाव की दृष्टि से कुछ कमज़ोर है, और उस पर ऊपरी मिसरे में ‘मेरी’ शब्द जोड़ देने से इसकी कसावट और भी कम हो जाती है। किसी की बेटी के संदर्भ में अभिव्यक्ति करते समय डॉ. उर्मिलेश जैसे वरिष्ठ रचनाकार से अधिक संयमित और गरिमामय भाषा की अपेक्षा स्वाभाविक है। अब एक और शेर:
उसका बचपन कभी नहीं मरता
जिसके परिवार में अगर है मां
दूसरे मिसरे को पढ़ने के बाद पाठक स्वयं विचार करें कि क्या डॉ. उर्मिलेश जैसे प्रतिष्ठित ग़ज़लकार से इस प्रकार की बुनावट की अपेक्षा की जा सकती है? ‘जिसके’ और ‘अगर’ जैसे शब्दों का प्रयोग भले ही व्याकरण की दृष्टि से पूर्णतः त्रुटिपूर्ण न हो, किंतु शेर की समग्र संरचना और सौंदर्यबोध के स्तर पर यह कुछ असंगत-सा प्रतीत होता है। हमारे गाँव में एक कहावत प्रचलित है, ‘गेहूँ की राशि पर कांदे का बढ़ावन।’ यह शेर भी कुछ वैसा ही आभास कराता है।
उनके हाथों में चलो हथकड़ी डालें चलकर
जिनकी नज़रों में कलाई की घड़ी है औरत
मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि डॉ. उर्मिलेश ‘कलाई की घड़ी’ के माध्यम से आख़िर किस प्रतीक या भाव को स्थापित करना चाहते हैं। चाहे कलाई की घड़ी हो या दीवार घड़ी! यहाँ कोई स्पष्ट अर्थ या संकेत उभरता हुआ दिखायी नहीं देता। इस शेर पर दृष्टि डालते हैं, जहाँ क़ाफ़िया साधने के प्रयास में डॉ. उर्मिलेश से चूक हो गयी:
जिनके ख़्वाबों में परी बनकर उड़ी है औरत
उससे अब कह दो कि लोहे की छड़ी है औरत
डॉ. उर्मिलेश ने यहाँ ‘उड़ी’ का क़ाफ़िया ‘छड़ी’ के साथ मिलाया है। दूसरी बात यह कि यदि किसी के ख़्वाब में नारी का रूप परी-समान दिखायी देता है, तो इसमें आपत्ति की बात क्या है? क्या यह आवश्यक है कि नारी की कल्पना किसी चुड़ैल या केवल किसी कठोर या नकारात्मक प्रतीक के माध्यम से ही की जाये? मीर को याद कीजिए:
नाज़ुक़ी उसके लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की-सी है
इस शेर को लिखने के बाद क्या हम मीर तक़ी मीर को चरित्रहीन या बुरा कहने लगें? क्या यह कहना उचित होगा कि उन्हें ऐसा लिखना ही नहीं चाहिए था? यदि किसी के स्वप्न में नारी का रूप परी-समान दिखायी देता है, तो इसका अर्थ यह कैसे मान लिया जाये कि वह नारी के प्रति कोई अनुचित भाव रखता है? स्वयं डॉ. उर्मिलेश ने भी अनेक स्थानों पर नारी के कोमल, सौम्य और नाज़ुक रूप का उल्लेख किया है।
अब एक और शेर, जिसका आशय समझ पाना मेरे लिए संभव नहीं हो रहा। उसके अर्थ की स्पष्टता के लिए स्वयं डॉ. उर्मिलेश जी ही बता पाते, अगर हमारे बीच होते।
अब के खेतों में तो हरकत ही नहीं होती है
तब के खेतों में पसीने भी बहा करते थे
इससे अधिक किसी लेख में और क्या कहा जा सकता है! इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि डॉ. उर्मिलेश की ग़ज़लों का कैनवास अत्यंत व्यापक है। उनकी ग़ज़लों का आद्योपांत अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि उनकी रचनाएँ शोषित, पीड़ित और वंचित जनमानस के पक्ष में पूरी दृढ़ता के साथ खड़ी हैं। डॉ. उर्मिलेश हिन्दी ग़ज़ल के अमिट हस्ताक्षर हैं, जिनका साहित्यिक अवदान सदैव स्मरण किया जाता रहेगा। हिन्दी ग़ज़ल के विकास और संवर्धन में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। फिर भी इसके साथ उनकी ग़ज़लों में ऐसे कई दोष स्पष्ट दिखते हैं, जिनसे हिन्दी ग़ज़ल त्रस्त रही और अब भी है। हिन्दी ग़ज़ल की दोषपूर्ण प्रवृत्तियों का शिकार होने से उर्मिलेश की ग़ज़लें ख़ुद की रक्षा कर पायी हैं, ऐसा दावे से कहना उचित नहीं है।

ज्ञानप्रकाश पांडेय
1979 में जन्मे, पेशे से शिक्षक ज्ञानप्रकाश को हिन्दी और उर्दू की शायरी में समकालीन तेवरों के लिए जाना जाता है। अमिय-कलश (काव्यसंग्रह), सर्द मौसम की ख़लिश (ग़ज़ल संग्रह), आसमानों को खल रहा हूँ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हैं। कुछ एक प्रतिष्ठित संस्थाओं से नवाज़े जा चुके हैं।
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