
- May 25, 2026
- आब-ओ-हवा
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बीते जीवन की स्मृतियों से गलबहियाँ करना अर्थात अतीत-राग सुखद अहसास होता है, नॉस्टैल्जिया साहित्य के लिए अत्यंत उपजाऊ विषय है क्योंकि यह रचनात्मकता को जन्म देता है। समकालीन उर्दू साहित्य में स्थापित नाम हैं ज़किया जी, जो उर्दू और हिंदी के बीच अनुवाद रूपी पुल भी हैं। उन्होंने यह कहानी उर्दू व हिंदी दोनों में लिखी है। -शशि खरे (संपादक-कथा प्रस्तुति)
ज़किया मशहदी की कलम से....
कहानी- अंडे वाले मौली साब
“यह कितने दिन के लिए आये हैं? वीज़ा में कोई और शहर भी लिखवाया है या पूरा समय यहीं बिताने का इरादा है?”
आरिज़ की पत्नी ने चावलों की प्लेट में मटर पुलाव निकालते हुए आरिज़ से पूछा जो खाना लगाने में उसकी मदद करने के लिए किचन में आ गया था।
“धीरे बोलो, डाइनिंग टेबल पर आ चुके हैं, सुन लेंगे।” आरिज़ ने तनिक नाराज़ होकर कहा। शाहीन शर्मिंदा हो गयी फिर फुसफुसाकर बोली, “लेकिन यह पहले तो कभी नहीं आये, अब बुढ़ापे में क्यों डोलते फिर रहे हैं?”
“कह रहे थे एक बार फिर इन गली-कूचों में घूम लेना चाहते हैं, जहाँ बचपन और नौजवानी के दिन गुज़रे थे। इस तरह बोले थे कि सच पूछो तो मुझे इन पर बड़ा तरस आया।” शाहीन मुँह बिगाड़कर चुप हो गयी।
“सादिक़ मियां, और कौन-कौन बाक़ी हैं?” खाना खाते हुए शब्बीर ने पूछा। “ज़्यादा उम्र पाने का एक नतीजा यह भी होता है कि साथी साथ छोड़ गये होते हैं।”
“अब ऐसी उम्र भी नहीं हो गयी आपकी” सादिक़ ने जवाब दिया। “आपके कई हमउम्र मौजूद होंगे”।
“लोग न भी हों तो उनके बाल-बच्चे या कुनबे के दूसरे अफ़राद (व्यक्ति) तो होंगे।” शब्बीर ने आशा जतायी।
“थोड़े बहुत मिल जाएंगे। जिनसे यहाँ होने की उम्मीद की जा सकती थी उनमें से बेशतर ज़्यादा हरी-भरी चरागाहों की तरफ़ निकल लिये हैं। दुनिया अब कहाँ रह गयी, सुकड़कर ग्लोबल विलेज बन गयी है। पहले कोई मज़ाफ़ात से आता तो हम लोग कहते देखो बेचारा चार-पांच मील दूर से चला आ रहा है।”
सादिक़ की पत्नी हँस पड़ी। साठ के पेटे में थी लेकिन स्वस्थ, हँसमुख और बड़ी स्मार्ट महिला थीं। बोलीं, हमारे स्कूल में एक लड़की पढ़ा करती थी। उसकी मंगनी जिन साहब से हुई वह एस.आर.सी.एस. करने लन्दन गये हुए थे। वापस आये तो उनके नाम से ‘लन्दन रिटर्न्ड’ यूं चिपका जैसे वो डॉक्टर हो। अब तो जिसे देखिए मुंह उठाए योरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया जाने कहां-कहां भागा चला जा रहा है। यह लीजिए तीतर मुल्तानी… उन्होंने एक सुन्दर डिश आगे बढ़ाते हुए उसी साँस में कहा।
“तीतर! तीतर कहाँ से आ गये? क्या उधर के जंगलों में यह अब भी पाये जाते हैं? क्या अब भी घर ले कोई शिकार को जाता है?” शब्बीर ने जल्दी-जल्दी अधीर होकर कहा।
सादिक़ मुस्कुराए। “भाईजान जंगल होंगे तब तो बचेंगे बेचारे तीतर। जंगल तो कट के साफ़ हो गये। अब कैसे तीतर कहांँ के तीतर!”
तीतर की आकृति से सादिक़ की पत्नी को कुछ याद हो आया। नाक पर सरकता चश्मा ऊपर उठाते हुए बोलीं, “याद है हम लोग बचपन में एक पहेली बुझाते थे, ‘तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर, बोलो बोलो कितने तीतर’।”
शब्बीर बच्चों की भांति खिलखिला कर हँसे। “लेकिन यह बताइए यह कहांँ से आ गये? वह भी चार-चार? पहेली के जवाब में तो सिर्फ़ तीन ही होते हैं।
“हमारे आजहानी श्यामनाथ के पोते ने तीतर-बटेरों का फ़ार्म खोल लिया है। शादी ब्याह और होटलों में ख़ूब खपत है। मुर्ग़ तो अब पुराने फ़ैशन की चीज़ हो गयी।” आरिज़ बोल पड़ा।
शब्बीर का मुंह खुले का खुला रह गया। “भाई श्याम नाथ का खानदान तो कट्टर वेजिटेरियन था।”
“अब सिर्फ़ लड़कों की बेवा दादी हैं जो गोश्त क्या, प्याज़-लहसुन तक नहीं खातीं। वैसे गोश्त न खाने से पोल्ट्री फ़ार्म खोलने का ज़्यादा ताल्लुक नहीं है। बिज़नेस तो बिज़नेस ठहरा।”
“उनके यहाँ जाऊंगा। वहांँ कई लोग ऐसे होंगे, जो मुझे पहचान लेंगे।” फिर वह अचानक मुस्कुरा पड़ा। “वह याद है लीलाधर? उनके घर के रिश्तेदारों का लड़का? उसके बाप का बड़ा-सा किराना स्टोर हुआ करता था। वह घरवालों से छुपकर अंडे खाया करता था। मौक़ा मिल जाये तो गोश्त भी उड़ा लेता था। उसका कुछ पता है?”
“वह गोश्त-अंडे खाने वाला ख़ुद कद्दू-लौकी बना पड़ा है। सारे मज़े हवा हो गये। सिर्फ़ सब्ज़ियाँ खाने की इजाज़त है, वह भी उबली हुई।” आरिज़ की पत्नी का स्वर निष्ठुर था।
शब्बीर ने भुने हुए तीतर का कौर मुँह में डाल तो लिया था लेकिन उसका स्वाद भूसे जैसा हो उठा। भूसा जो घर में पली गाय के लिए मौलवी नेमत उल्ला का भतीजा शराफ़त उल्ला गांव से लाया करता था।
“और मौलवी नेमत?” लेकिन नाम का उच्चारण करते ही शब्बीर को अपनी मूर्खता समझ में आ गयी। वह तो शब्बीर की पिछली पीढ़ी के थे। उन्होंने उसे क़ुरान शरीफ़ पढ़ाया था। क़ब्र में उनकी स्वयं की हड्डियां भूसा बन गयी होंगी।
मौलवी नेमत आम तौर पर अंडे वाले मौली साब कहलाते थे। न जाने कितने सबेरे घर से चला करते थे, कब सोते थे… कब जागते थे, वह मनुष्य थे या जिन, कोई अनुमान न लगा पाता चार कोस का रास्ता पार करके सूर्योदय होते-होते शहर में प्रकट हो जाते। उनके सिर पर एक बड़ा-सा टोकरा होता, जिसमें एक गत्ते के डिब्बे में भूसे की तहों के बीच कोई डेढ़-दो दर्जन अंडे रखे हुए होते। एक बड़े तामचीनी के थाल में लगभग दो दर्जन ही उबले हुए अंडे भी हुआ करते थे जो मुंह अंधेरे ताज़ा-ताज़ा उबाले जाते थे। फिर घर में ही बड़े-बड़े तांबे के थालों में तले-ऊपर अंगारे रखकर सेंके गये कुल्चे, भैंस के मांस के गुल कबाब, जिनमें मांस कम और चने की दाल ज़्यादा होती थी और मौसम के अनुसार कई और वस्तुएं (क्योंकि उस समय न बेमौसम चीज़ें मिलती थीं न लोग उन्हें खाते थे) जैसे कभी मक्कल में भुनी शकरकंदियां, कभी तिल के लड्डू, कभी भुट्टे और अंदरसे। टोकरे में एक और ‘अनुभाग’ हुआ करता था। इसमें सस्ते जालीदार बिनाइन और रूमाल, लड़कियों के लिए प्लास्टिक के क्लिप, रंगीन परांदे, रिबन, घर में बुने गये जाली के रंगीन नाड़े, सूई-धागा, बटन इत्यादि और समयानुसार और भी बहुत कुछ हुआ करता था। वह बहुत सवेरे इससे लिए आ निकलते थे कि उनके लगे हुए मुहल्ले में कई ऐसे स्थायी ग्राहक थे जो नाश्ते के लिए उनसे कुल्चे, कबाब और उबले अंडे खरीदा करते थे। बच्चे उन्हें घेर लेते और खट्टी-मीठी गोलियां खरीदते जो पैसे में दो मिला करती थीं। लॉलीपॉप मंहगा हुआ करता था। वह एक आने में मिलता। मौलवी साहब के टोकरे में भिन्न-भिन्न प्रकार की इतनी वस्तुएं होती थीं लेकिन न जाने क्यों लोग इन्हें अंडे वाले मौली साब कहने लगे थे। कुछ लोगों ने अंडों को उनकी चिढ़ बनाने की कोशिश की लेकिन वह कभी चिढ़े नहीं। धीरे-धीरे सभी चिढ़ाने वाले उनके चेहरे पर खेलती स्नेहिल मुस्कान से हार गये। उन्होंने जुमला-बाज़ी बन्द कर दी परन्तु मौलवी साहब रह गये अंडे वाले मौली साब ही। यह नाम उनसे चिपक गया था।
उन दिनों वह एक कम उम्र के युवक थे। यही कोई बीस एक वर्ष के। अल्पायु में ही चाचा की बेटी से ब्याह भी हो गया था। वही भागवान कुल्चे और तिल के लड्डू बनाया करती थी। जब तक मौली साब की अम्मांँ जीवित रहीं, कबाब वही बनाती थीं। सबेरे-सबेरे सौदा बेचकर मौली साब पैदल ही गांव लौट आते। हां कभी कुछ अच्छा कमा लिया या मौसम बहुत ख़राब हुआ तो ‘एक आना सवारी’ वाले एक्के पर बैठकर वापस हो जाते। गांव के स्थानीय मदरसे में वह हिफ़्ज़ (क़ुरान कंठस्थ करना) कर रहे थे और उर्दू व हिसाब भी पढ़ाते थे। जैसे-तैसे गुज़ारा हो रहा था। फिर धीरे-धीरे शहर में उनकी लायी हुई वस्तुओं का चलन कम होने लगा। शहर में कई लोग उबले अंडों का खोमचा लगाने लगे। छोटे-बड़े कई होटल खुल गये। बिसात खाने वाली अधिकतर वस्तुओं की अधिक बेहतर और अधिक विविध वस्तुएं जेनरल स्टोर्ज़ में मिलने लगी थीं। लोग वहां से लेना उचित ठहराते।
लीलाधर घर वालों से छुपकर उबले हुए अंडे खाया करता था। मौली साब से कबाब लेकर खाने चाहे तो उन्होंने मना कर दिया, “बेटा पहले पिताजी से पूछ लो। उन्होंने इजाज़त दी तभी तुम्हें हाथ कबाब बेचेंगे। अंडे तक ठीक है। तुम्हारे एक चाचा भी अंडे खाते हैं।”
लीला को कबाब खाने की अनुमति कहां से मिलती। कई हिन्दू घराने तो मौली साब से बनियान और क्लिप जैसी वस्तुएं भी नहीं खरीदते थे इसलिए कि जिस टोकरे में यह रखी होती थीं, उसी में कबाब और अंडे भी होते थे।
एक दिन मौली साब की टोकरी में झांकते हुए लीला ने कहा, “ऐसी सफ़ाई से तो स्त्रियां ही सामान सजा सकती हैं। हमारी अम्मा की रसोई भी ऐसी ही सजी रहती है। बेगिनती बर्तन, डिब्बे, कनस्तर, घी-तेल और जाने क्या अल्लम गल्लम—पापड़, बड़ी, मुंगौड़ी। पर हां अम्मां अपनी रसोई सिर पर लेकर नहीं घूमतीं। मौलवी साब का कमाल यह है कि वह दो कोस से पैदल चले आते हैं, दमादम, क्या मजाल जो कच्चे अंडे फूटें या कबाब जा के बनियानों में घुस जाएं। फिर उसने वह छोटी-सी कहानी सुनायी:
पता है सब्बीर भय्या, हमारी दादी बताती हैं कि एक बार कृष्णजी जब छोटे-से थे तो मिट्टी खा रहे थे। मां जसोदा ने देख लिया तो लगे जल्दी-से मुंँह छिपाने। उन्होंने डांँटा। मुंँह दिखाओ। खोलो मुंँह, क्या खा रहे थे। अब देखो न भय्या यह सारी दुनिया की अम्मा लोगों ने बच्चों को डांटने का ठेका ले रखा है। भगवान विष्णु के अवतार को भी नहीं छोड़ा। ज़्यादा डांँट पड़ी तो बाल गोपाल ने मुंँह खोल दिया। पता है भय्या, उनके मुंह में पूरा ब्रह्मांड था। हमें नेमत चाचा की टोकरी वैसी ही लगती है।”
“अबे लीला, जिस टोकरे में कट्टे (भैंस का बछड़ा) के गोश्त के कबाब रखे हों और अंडे, उसमें कृष्णजी का मुंह देख रहा है। मार खाएगा और साथ में हमें भी पिटवाएगा।
— क्यों भय्या इसमें ऐसी क्या बात है, अब अगर वहांँ ब्रह्माण्ड था तो उसमें हिन्दू-मुसलमान सभी रहे होंगे। और भी न जाने कौन जंगली होंगे, राक्षस होंगे, जानवर होंगे तो क्या सब कुछ साफ़-सुथरा खाना खाते थे?
“तेरे दिमाग़ में मुर्गी ने घुसकर अंडे दे दिये हैं। चल एक अंडा खरीद देता हूंँ चुपके से खा ले।”
लीलाधर ने मारे ख़ुशी के बच्चों की तरह किलकारी मारी। वैसे भी वह बच्चा ही तो था कोई बारह-तेरह वर्ष का। ‘सब्बीर भय्या’ का प्रियपात्र। भय्या सरकारी स्कूल में नवीं कक्षा में पढ़ते थे।
“लीला को क्या हुआ है सादिक़ मियां? ठीक तो हो जाएगा?” शब्बीर ने डरते-डरते पूछा।
“ब्रेन हैमरेज हुआ था। बिस्तर पर पड़ा रहता है। ठीक से बोल नहीं पाता।”
“उससे ज़रूर मिलूंगा।” शब्बीर के स्वर में दुख की सघन छाया थी।
“और हांँ वह अंडे वाले मौली साब– मेरा मतलब मौलवी नेमतुल्ला के रिश्तेदारों का पता ज़रूर देना। मौलाना का तो मैं क़र्ज़दार हूं।” शब्बीर के स्वर में दुख वैसे का वैसा था। धीरे-धीरे उनके अतीत के पन्ने पलटने शुरू किये।
“मैं जिस ज़माने में यहां था तो एक मर्तबा उनके यहां जाने का इत्तफ़ाक़ हुआ था। मेरे बहनोई हकीम अनवार को उनके गांव के एक दौलतमंद शख़्स ने बड़े इसरार से अपने यहां शादी में मदऊ (आमंत्रित) किया था। वह मुझे भी साथ लिये चले गये। मौलवी साहब भी वहां थे। मुसिर (आग्रह करने वाला) हो गये कि भाईसाहब उनके ग़रीबख़ाने में क़दम रखें। न तक़रीब छोड़कर कहीं जाना मुनासिब था न मौलवी साहब की दिल-शिकनी गवारा थी। इसलिए घन्टा भर को मुझे भेज दिया। घर सचमुच ही ग़रीबख़ाना था। कच्ची दीवारों पर फूस का छप्पर। बरसात का मौसम था इसलिए कई जगह मिट्टी के कुंडे रखे हुए थे कि पानी टपके तो फ़र्श पर कीचड़ न हो जाये।”
आरिज़ खाना समाप्त करके बड़ी रुचि से उनकी बातें सुन रहा था। पत्नी बर्तन समेटने में व्यस्त हो चुकी थी।
“वक़्त नहीं मिल पा रहा। एक दिन वक़्त निकालकर मरम्मत करेंगे।” मौलवी साहब ने कहा। हमें आता देखकर मौलवियाइन ने जल्दी-जल्दी ओसारे की दीवार से लगी खाट बिछाकर उसपर धुली हुई चादर फैलायी। फिर अलमूनियम की काली पड़ी केतली चूल्हे पर चढ़ाकर तामचीनी की रकाबी में भुबर में भुनी शक्करकन्द और भुने हुए मकई के दाने लेकर आयीं। फिर तामलोट (अल्मूनियम का बड़ा, भद्दा-सा मग) में गुड़ से मीठी की गयी चाय पेश की।”
मुझे उनका चेहरा आज तक याद है। मेरी उम्र कोई तेरह-चौदह साल रही होगी। लगता उससे भी कम था इसलिए उन्होंने मुझसे परदा नहीं किया। सुतवां नाक में सोने की चौड़ी-सी कील पहने हुए थीं। वही एक ज़ेवर उनके जिस्म पर था। मक्खन जैसी जिल्द, पीले रंग के दुपट्टे से ढका सिर। ऐसी ग़ुरबत में यह रंग-रूप और तमानियत।
“लेव भय्या, तनी-चाह पी लेव” उन्होंने बड़ी मुहब्बत से कहा था। वह फ़रिश्तों जैसी मुस्कुराहट, वह नौजवान नूरानी चेहरा बरसों याद रह गया।”
आरिज़ हंँसने लगा।
“हंँसने की क्या बात है?”
शब्बीर ने कोशिश की कि लहजे से उसकी खिन्नता प्रकट न हो। “हम बूढ़ों के नॉस्टैल्जिया पर हंँस रहा होगा”, सादिक़ ने तनिक मज़ाक़ का पुट डालते हुए कहा।
“बेटा आओ हमारी उम्र में तो पता चलेगा कि जिन्हें हम बे-काम समझते रहे वह हमारे लिए कितने अहम हो उठे हैं।”
आरिज़ अब भी मुस्कुरा रहा था। फिर वह उठ गया। “ठीक है आप लोग बातें कीजिए।” मौलवी नेमत को हम सबके घरों में बड़ा मानूस चेहरा था। उनका कारोबार रफ़्ता-रफ़्ता बिल्कुल ही ठप हो गया था लेकिन उस वक़्त तक वह हिफ़्ज़ मुकम्मल करके मदरसे का एक इम्तहान भी पास कर लिया था इसलिए अब उन्होंने लड़कों को क़ुरान और उर्दू पढ़ाना शुरू कर दिया।”
“हाँ, तो उनके पहले शागिर्दों में हम थे न”, शब्बीर ने कहा।
“और फिर आपके बाद जो खेप आयी उसमें हम और खानदान के दूसरे बच्चे। सादिक़ ने बात जारी रखी, “उन्हीं दिनों वह यहां एक क्लास टू अफ़सर के घर के बच्चों को पढ़ाने के लिए बुलाये गये। कुछ अरसे बाद उन्होंने अपना रसूख़ इस्तेमाल करके मौलवी साहब के लड़के को चुंगी में क्लर्क मुक़र्रर करा दिया। वह गांँव के सरकारी स्कूल से दसवांँ पास कर चुका था। कुछ अरसे बाद उनके गांँव वाले घर का छप्पर ढह गया। खपरैल डाली गयी और दीवारें पुख़्ता हो गयीं। मज़ीद वक़्त गुज़रा तो उसे बेचकर यहाँ शहर में घर बनवा लिया गया। मौलवी नेमत निहायत नाख़ुश मरे। गांव का घर ख़त्म हो गया था इसलिए बेटे के साथ रहना उनकी मजबूरी थी।”
“नाख़ुशी की क्या बात थी?” शब्बीर ने आश्चर्य से पूछा।
“मौलवी साहब बख़ूबी समझ रहे थे कि बेटे के ख़र्च उनकी तनख़्वाह से बहुत ज़्यादा हैं। ज़ाहिर है पिछले दरवाज़े से काफ़ी कुछ चला आ रहा है। उन्हें यह कमाई बिल्कुल भी मंज़ूर नहीं थी। आख़िर में उन्होंने बीवी से कहकर अपना चूल्हा अलग कर लिया और छोटी-सी निजी आमदनी पर गुज़ारा करते रहे। बेटा बहुत कुढ़ा लेकिन फिर उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। कोई बदसुलूकी या बदज़बानी कभी नहीं की। अब यह नस्ल भी कम होती जा रही है।”
“कौन सी नस्ल?” शब्बीर ने बेध्यानी में सवाल किया।
“वही जो मां-बाप के साथ बदसुलूकी और बदज़बानी न करे।”
“वैसे आपको यह सब मालूम कैसे हुआ?”
सादिक़ मुस्कुराये। “औरतों का नेटवर्क। मौलवी नेमतउल्ला की बीवी तुम्हारे बहनोई हकीम अनवार के घर आती जाती थीं। जाड़ों में वह चुपके से कुछ ख़ास-ख़ास घरों में जाकर रज़ाई में धागे डाल दिया करती थीं। शादी-ब्याह के मौक़े पर गोटा-पट्टा टंँकवाने, हलवा-मलोदा बनाने में मदद कर देतीं। लेकिन किसी को पता न चले, इस तरह। मौलवी नेमत मरहूम के पोते ने लोकल पॉलिटेक्निक से कोई सर्टीफिकेट कोर्स किया था। उससे उसे इलेक्ट्रिसिटी डिपार्टमेंट में नौकरी मिल गयी थी। अब ख़ासी पैंतालीस-पचास की उम्र में तरक़्क़ी करते-करते ओवरसियर हो गया है। दरवाज़े पर तख़्ती लगवायी है ‘इंजीनियर जवाद हुसैन, दादा ने नाम रखा था सिब्ग़त उल्ला। अरसा पहले उसे बदलकर जवाद हुसैन कर दिया। कोई नाम पूछे तो जवाद हुसैन नहीं कहता, हमेशा इंजीनियर जवाद हुसैन बताता है। शायद इसीलिए आरिज़ हंँस रहा था।”

लोगों से मिलते-मिलाते शब्बीर एक दिन सादिक़ के बताये पते पर मौलवी नेमतउल्ला, उर्फ़ अंडे वाले मौली साब के परिवार के लोगों से मिलने पहुंँच गये। अच्छा-खासा दो मंज़िला मकान था। सफ़ेद पेंट किया हुआ लकड़ी का गेट, उसके बाद हरा-भरा लॉन। गेट पर इंजीनियर जवाद हुसैन की तख़्ती लगी हुई थी। शब्बीर ने कॉल बेल का बटन दबाया। थोड़ी देर बाद अन्दर से नौकरानी प्रकट हुई। उसने सज्जन, दिखते बुज़ुर्ग को अन्दर बुला लिया और बरामदे में बिछी कुर्सी पर बिठा दिया। फिर अन्दर से उसकी साफ़ आवाज़ सुनायी दी, “एक ठो बुढ़ऊ आये अँहें। हाथ मां बड़का डिब्बा मिठाई लावे हैं। कहत हैं, मौलवी नेमत के बेटा से मिलै का है।”
थोड़े अन्तराल के बाद जीन्स और टी शर्ट पहने एक व्यक्ति प्रकट हुआ। शब्बीर ने उसके सलाम का जवाब देकर मिठाई का डिब्बा थमाया और कहा, हमें मौलाना नेमतउल्ला मरहूम ने क़ुरान पढ़ाया था, इसी रिश्ते से मिलने आये हैं।
“वह हमारे दादा थे। आइए, अन्दर आ जाइए। मिठाई के डिब्बे और इस परिचय ने उसके चेहरे से जिज्ञासा और किंचित खिन्नता को दूर कर दिया था।
अन्दर सुव्यवस्थित ड्रॉइंग रूम था। क़ीमती सोफ़ा लगा हुआ था और एक शीशे की अलमारी में सजावटी सामान भी।
“मियां आपके वालिद?”
“वह घर पर नहीं हैं? गवर्नमेंट सर्विस से रिटायर हुए हैं। अक्सर घूमने-घामने शहर से बाहर चले जाते हैं।”
“और आप उनके बेटे हैं, गोया मौलाना के पोते।”
“जी, मैं इंजीनियर जवाद हुसैन। बाहर मेरे ही नाम की तख़्ती लगी हुई है।
“बच्चे होंगे आपके?”
“दो बेटियांँ हैं, दोनों लोकल कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ती हैं, आपके वक़्त में शायद वह नहीं रहा होगा।”
शब्बीर तनिक चुप रह गये। फिर बोले, “आपके दादा बहुत अच्छे इंसान थे। बहुत मेहनती। मैं एक बार उनके गांव, बल्कि उनके घर भी गया था। आपकी दादी को भी देखा। बड़े मासूम सीधे-सादे लोग थे।”
लड़के ने पहलू बदला।
“आपके दादा ने मुझे उर्दू भी पढ़ायी थी। सरकारी स्कूल तो हमारे वक़्त से ही हिन्दी मीडियम हो गया था। उर्दू एक मज़मून के तौर पर भी नहीं थी।”
काम करने वाली स्त्री अन्दर से चाय ले आयी। ट्रे में सुघड़ ढंग से ढकी चायदान थी। शक्कर अलग से रखी हुई। एक सुन्दर चीनी के प्याले में भुने हुए नमकीन काजू पर्याप्त मात्रा में थे।
“हमारे वक़्त में उस्ताद की बड़ी इज़्ज़त थी, क़ुरान पढ़ाने वाले की तो और भी ज़्यादा और आपके दादा ऐसे नेक इन्सान थे कि पढ़ाने की कोई फ़ीस तक न तय करते। कहते थे, क़ुरान शरीफ़ पढ़ाने का कोई मुआवज़ा मुकर्रर नहीं किया जा सकता। जो ख़ुशी से दे दिया जाता, उसे क़बूल कर लेते। गांव के लोग नक़दी की जगह फसल की चीज़ें दे जाते उस पर भी ऐतराज़ नहीं था। पढ़ाना तो बाद में शुरू किया पहले तो घर-घर जाकर सामान बेचा करते थे।”
जवाद हुसैन के चेहरे पर नाराज़गी और खिन्नता के भाव तैरने लगे, जिन्हें शब्बीर ने अतीत के संदर्भ में महसूस नहीं किया।
“और आपकी दादी! उनके हाथ में बरकत था। तिल के लड्डू और कुलचे इतने मज़ेदार बनाती थीं कि उनका मज़ा आज तक ज़बान पर ताज़ा है। आपके दादा कहते थे हमारे हुज़ूर (हज़रत मुहम्मद साहब) ने तिजारत को अफ़ज़ल बताया है। किसी भी जायज़ काम को आर (लज्जा) नहीं समझना चाहिए। मुनाफ़ा भी वह इतना ही रखते थे जो मज़हब के उसूलों के मुताबिक़ हो।”
बोलते-बोलते शब्बीर को अचानक यह एहसास हुआ कि कदाचित वह कुछ अधिक बोल गये हैं क्योंकि चाय बनाकर प्याली उनके सामने रखकर जवाद उठ खड़ा हुआ था।
आप चाय पिएंँ। शक्कर अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ मिला लीजिएगा। मैं माफ़ी चाहता हूंँ, बहुत जल्दी में हूंँ। ज़रूरी काम से जाना है”.. कहता हुआ वह अन्दर चला गया।
कुछ देर ख़ामोश रहकर चाय को मुंह लगाये बिना शब्बीर भी उठ खड़ा हुआ।

ज़किया मशहदी
शिवप्रसाद सिंह के भाषाई तौर पर बेहद कठिन उपन्यास 'नीला चाँद' का उर्दू में अनुवाद करने वाली ज़किया मशहदी ने लखनऊ यूनिवर्सिटी से मनोविज्ञान में एम.ए. किया है। पिछले 45 वर्षों से उर्दू में कहानियाँ लिख रही हैं। अनुवाद करती हैं। सात कहानी संग्रहों के साथ लगभग सत्रह अनूदित पुस्तकें प्रकाशित हैं। दो उपन्यास हैं और तीसरा शीघ्र प्रकाश्य। कथा लेखन और अनुवाद के लिए साहित्य अकादमी, दिल्ली के अलावा मिर्ज़ा ग़ालिब एवार्ड व इक़बाल सम्मान भी आपके हिस्से है। ई-मेल : zakia.mashhadi@yahoo.com
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