
- October 15, 2026
- आब-ओ-हवा
- 1
नियमित ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....
मुशायरे: रिवायत, अहमियत और फ़ायदे-2
अब रुख़ करते हैं दिल्ली के दीगर मुशायरों की तरफ़। दरबारी मुशायरों के सिवा भी लोग अपने घरों पर इसका आयोजन करने लगे। बाक़ायदा उर्दू मुशायरों की कुछ भनक मुहम्मद शाह रंगीला (जन्म: 07 अगस्त 1702-मृत्यु: 26 अप्रैल 1748) के अह्द में मिलती है मगर तसदीक़ मीर दर्द (1720-1785) के ज़माने से होती है।
मुशायरों की कई क़िस्में जो आज भी राइज हैं, जो अपने आयोजन, मौज़ू (विषय) और ज़माने के लिहाज़ से मुख़्तलिफ़ (भिन्न) हैं। मसलन उनमें तरही, ग़ैर-तरही, क़ौमी या ऑल इंडिया, अंतरराष्ट्रीय (बैन-उल-अक़वामी), रेडियो और टेलीविज़न, इस्लाही (सुधारवादी), और मज़ाहीया (हास्य) मुशायरे, ख़वातीन का मुशायरे शामिल हैं।
1. सबसे पहले रिवायती और तारीख़ी (परंपरागत एवं ऐतिहासिक) मुशायरों पर नज़र करते हैं।
“तरही मुशायरा”
इसमें एक ‘मिसरा-ए-तरह’ पहले से दे दिया जाता है। तमाम शोअरा इसी वज़न और ज़मीन में शेर कह कर लाते हैं। ये कभी-कभी बड़ा दिलचस्प हो जाता है ख़ासकर छोटी बहर की तरह में कई शोअरा के मिसरे टकरा जाते हैं और भाव-साम्यता (तवारद) की मिसालें मिल जाती हैं।
“ग़ैर-तरही मुशायरा”
इस में शोअरा पाबंदी के बग़ैर अपनी मर्ज़ी और पसंद का अपना कलाम सुनाते हैं।
“इस्लाही मुशायरा”
पुराने वक़्तों में उस्ताद शोअरा नये शागिर्दों की तरबीयत और इस्लाह के लिए ऐसे मुशायरे मुनाक़िद करते थे।
2. जदीद और तकनीकी क़िस्मों के तहत रिवायती मुशायरों से इस लिहाज़ से अलग हैं कि इनमें तकनीक की भी जगह बनती है।
“ऑल इंडिया या बैन-उल-अक़वामी मुशायरे”
बड़े पैमाने पर मुनअक़िद होते हैं जिनमें मुल्क और देश-विदेश (बैरून-ए-मुल्क) के नामवर शोअरा को बुलाया जाता है।
“रेडियो और टीवी मुशायरे”
जो मीडिया के प्रसारण की संस्थाओं (नशरियाती इदारों) के स्टूडियो में रिकॉर्ड या सीधे प्रसारित होते हैं।
“ऑनलाइन मुशायरे”
जो इंटरनैट और वीडियो कॉलिंग के ज़रिये डिजिटल प्लेटफ़ार्म पर होते हैं।
3. “मौज़ूआती क़िस्मों” में दरअसल किसी विषय या प्रसंग को केंद्र में रखने वाले मुशायरों का शुमार है।
“मज़ाहिया मुशायरा “
जिसका मक़सद सिर्फ तंज़-ओ-मज़ाह (हास्य-व्यंग्य) और सुनने वालों को हंसाना होता है।
“यादगारी मुशायरा”
जो किसी मारूफ़ शायर या शख़्सियत की याद में मनाया जाता है।
“इन्क़िलाबी या मिल्ली मुशायरा”
जिसमें देश-प्रेम (हुब्ब-उल-वतनी), सियासत या समाजी मसाइल पर नज़्में पढ़ी जाती हैं।
अब आइए, इनमें से कुछ पर तफ़सीली गुफ़्तगू करते हैं।
“अवामी मुशायरे”
शाह और उमरा (बादशाह और धनाढ्य वर्ग) के मुशायरों के इलावा आम मुशायरे भी मुनाक़िद होने लगे, जिनको क़ायम करने वाले ज़्यादा-तर ख़ुद शायर होते थे। इसी तरह ख़ानक़ाहों, मदरसों में मुशायरे होने लगे। मीर दर्द और मीर तक़ी मीर के मुनअक़िद मुशायरे भी कम-ओ-बेश अवामी मुशायरे की हैसियत रखते हैं।

अवामी मुशायरों में सबसे बड़ा मुशायरा लाल क़िले का होता था, जिसमें शहर के तमाम उस्ताद जैसे ज़ौक़, मोमिन, ग़ालिब वग़ैरह शामिल होते थे। ये मुशायरे बहादुर शाह के हुक्म से दरबार-ए-आम में होते थे। धीरे-धीरे मुशायरे दिल्ली से निकलकर आस-पास के इलाक़ों में भी फैल गये। उनमें रामपुर, पटना, टोंक, आगरा, वग़ैरह अहम हैं। इस तरह मुक़ामी असरात (स्थानीय प्रभाव) की बदौलत कुछ तब्दीलियां भी हुईं और कुछ नयापन भी शामिल होने लगा।
एक ख़ास रिवाज भी था। मुशायरे में जो कलाम पढ़े जाते थे, उनको बाक़ायदा शाया करके “गुलदस्तों” की शक्ल दी जाती थी। उर्दू का पहला गुलदस्ता “गुल-ए-राना” है, जो 1845 में मौलवी करीमउद्दीन ने निकाला था। गुलदस्तों की ईजाद का सेहरा लखनऊ के सर पर है।
“मुशायरा-ए-ज़िंदाँ” यानी कारागार में मुशायरा
इसकी इब्तिदा अंग्रेज़ों के ज़माने में हुई क्योंकि बहुत-से स्वतंत्रता सेनानी जेलों में बंद थे। उनमें बहुत सारे शायर भी थे। जेल में ही हसरत मोहानी ने ये शे’र रचा था:
है मश्क़-ए-सुख़न जारी चक्की की मशक़्क़त भी
एक तुरफ़ा तमाशा है हसरत की तबीयत भी
“यादगारी मुशायरे”
किसी अहम शायर या शख़्सियत की याद में होने वाले मुशायरों के ज़िक्र में, 1969 में एक अज़ीम मुशायरा “सद साला यादगार-ए-ग़ालिब’ (ग़ालिब की याद में शताब्दी समारोह) के तौर पर मुनअक़िद किया गया था। शंकर शाद का यादगारी मुशायरा भी बहुत मशहूर है।
“रेडियो मुशायरे”
रेडियो मुशायरे की तारीख़ भारतीय उपमहाद्वीप (बर्र-ए-सग़ीर) में नशरियाती इदारों के आग़ाज़ (प्रसारण के प्रारंभ) से जुड़ी है, जिसमें ऑल इंडिया रेडियो ने उर्दू शायरी को आम करने में अहम किरदार अदा किया। हिन्दोस्तान में विधिवत प्रसारण का आग़ाज़ 23 जुलाई 1927 को इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन के तहत बंबई स्टूडियो के शुभारंभ से हुआ। 8 जून 1936 को इसका नाम ऑल इंडिया रेडियो (AIR) रखा गया, जहां से अदबी प्रोग्रामों और मुशायरों का प्रसारण शुरू हुआ।
रेडियो मुशायरों ने मुल्क के दूरदराज़ इलाक़ों तक उर्दू शोअरा और उनके कलाम को पहुंचाया। ईद, यौम-ए-आज़ादी और दीगर क़ौमी और मज़हबी त्योहारों पर ख़ुसूसी ऑल इंडिया और रेडियाई मुशायरे रिवायत बन गये।
- “मक़सदी मुशायरे” (विषय प्रधान)
ऐसे मुशायरे भी होने लगे, जो किसी न किसी मौज़ू (विषय) पर आधारित थे, जैसे देशप्रेम, मेहनत की अज़मत (मज़दूर दिवस), प्राकृतिक सौंदर्य वग़ैरह। इनमें कलाम इन्हीं मौज़ूआत (विषयों) पर सुनाना लाज़िमी था। - “सरकारी और तंज़ीमी मुशायरे”
हुकूमत ख़ास तौर से वतन की अहमियत को मद्द-ए-नज़र और अज़ीम शख़्सियतों की जयंती पर मुशायरे करने लगी जैसे स्वाधीनता दिवस, गांधी जयंती वग़ैरह।
मुशायरों में मुख़्तलिफ़ इलाक़ों से शामिल होने वाले शायरों के मुताबिक़ भी मुख़्तलिफ़ नामों से जाने जाते हैं, जैसे मुक़ामी (स्थानीय शायरों का) मुशायरा, सूबाई (प्रदेश के विभिन्न ज़िलों के शायरों का) मुशायरा, आल इंडिया (देश के विभिन्न प्रदेशों के शायरों) मुशायरा और बैन-उल-अक़वामी मुशायरा (दुनिया के दूसरे देशों के शायरों के) मुशायरा और किसी ज़माने में इंडो-पाक मुशायरे होते थे, जिनमें हिंदुस्तान और पाकिस्तान के शोअरा शामिल होते थे।
“मुशायरा-ए-शायरात”
मुशायरों में बाक़ायदा अवामी सतह पर शाएरात की शिरकत का आग़ाज़ बुनियादी तौर पर बीसवीं सदी के प्रारंभ और मध्य में हुआ, जब पर्दे का रिवाज कम हुआ और ख़वातीन ने अदबी रसाइल के ज़रीये अपनी शनाख़्त बनाकर बराह-ए-रास्त मुशाविरों की महफ़िलों में क़दम रखा। मुग़्लिया और नवाबी दौर के रिवायती और दरबारी मुशाविरों में ख़वातीन की बराह-ए-रास्त (सीधे तौर से) शिरकत आम नहीं थी क्योंकि महाफ़िल-ए-मर्दाना (पुरुषों की सभाएं) और मख़सूस माहौल तक महदूद (सीमित) थीं। अलबत्ता और निजी घरों में बेगमात और शाएरात (जैसे माही बेगम या दीगर शाएरात) अंदरूनी महफ़िलों में शेर कहती थीं मगर वो अवामी स्टेज पर नहीं आती थीं।
अमली और अवामी शमूलीयत (जनसाधारण की भाग लेने) का आग़ाज़ भी बीसवीं सदी के आग़ाज़ 1910 की दहाई में होती है। रिसाला (पत्रिका) “इस्मत” और दीगर पत्रिकाओं ने ख़वातीन की रचनाओं को जगह देना शुरू किया। इस पहल से कई शाएरात उभरीं।
तरक़्क़ी-पसंद तहरीक (प्रगतिशील विचारधारा) और आज़ादी का दौर यानी 1930 के बाद के दौर में और आज़ादी के फ़ौरन बाद अवामी मुशायरों की शक्ल बदली और शाएरात की स्टेज पर एंट्री शुरू हुई। 1950 और 1960 की दहाई के बाद मुशायरों में ख़वातीन शोअरा ने बाक़ायदा तौर पर कलाम सुनाना शुरू किया और ये रिवायत वक़्त के साथ-साथ भरपूर अंदाज़ में आम होती चली गयी।

और अब तो शाएरात पर आधारित मुशायरे भी ख़ूब होते हैं। ऐसी जाने कितनी संस्थाएं भी सक्रिय हैं, जो निसाई अदब-ओ-शायरी के फ़रोग़ में हर वक़्त मसरूफ़ हैं। सरकारी अकादमियां भी साल में एक-दो ऐसे मुशायरे करती हैं, जिनमें सदारत, निज़ामत और शायरी की सारी ज़िम्मेदारी ख़वातीन ही बख़ूबी अंजाम देती हैं।
“तमसीली मुशायरा” (दृष्टांत मुशायरा)
एक ऐसी मुनफ़रद (विशिष्ट) अदबी महफ़िल है, जिसमें शोअरा, स्टूडेंट्स या ड्रामा आर्टिस्ट फ़र्ज़ी, अलामती (सांकेतिक) या तारीख़ी किरदारों (ऐतिहासिक पात्रों) का रूप धार कर या उनकी ज़बान-ओ-अंदाज़ में कलाम पेश करते हैं। इस रिवायत का मक़सद शाइरी को ड्रामाई अंदाज़ देना और सुनने वालों को क़दीम शेअरी रिवायत से जोड़ना है।
अहम विशेषताओं में किरदार निगारी, अदाकारी और लहजा हैं। कलाम की अदायगी में आम मुशायरों के मुक़ाबले में मुकालमा बाज़ी (वार्तालाप शैली) और अदाकारी का पुट शामिल होता है। इस में मुआशरती (समाजी) या फ़िक्री मौज़ूआत को तमसील और इशारों के ज़रीये समझाया जाता है। जहां तक उस के तारीख़ी पस-मंज़र (पृष्ठभूमि) की बात है, तो उर्दू अदब में इसको फ़रोग़ देने में पण्डित बृजमोहन दत्तातर कैफ़ी देहलवी (3 दिसंबर 1866-01 नवंबर 1956) का नाम बहुत अहम है। उन्होंने “तमसीली मुशायरा” के नाम से इस मौज़ू पर किताब भी लिखी, जो इस रिवायत की बुनियाद समझी जाती है।
इस तरह के मुशायरे अब भी अदबी और सांस्कृतिक समारोहों, स्कूल कॉलेज के सालाना जश्न वग़ैरह में किये जाते हैं ताकि क़दीम (प्राचीन) और क्लासिकी शायरी और क़दीम शाइरों की छवि से नस्लें वाक़िफ़ रहें।
पण्डित आनंद मोहन गुलज़ार ज़ुत्शी देहलवी (07 जुलाई 1926-12 जून 2020) ने एक आर्टिकल लिखा था, जो टाइम्स आफ़ इंडिया में शाया हुआ। इसमें मुशायरों की मुख़्तसर तारीख़ का हवाला था। इसमें इन्होंने आज़ादी के बाद के दो ख़ास मुशायरों का ज़िक्र किया है, “जश्न-ए-जम्हूरियत मुशायरा” (गणतंत्र का उत्सव) जो चार दिनों तक 1950 के फरवरी माह में हुआ। इस मुशायरे की बुनियाद रखने वालों में सर शंकर लाल, श्री शंकर प्रसाद आईसीएस, कुंवर महेंद्र सिंह बेदी “सहर”, “साहिर” होशयारपुरी और ख़ुद “गुलज़ार” देहलवी थे। उद्घाटन जवाहर लाल नहरू ने किया था।
दूसरा तारीख़ी मुशायरा सात दिसंबर 1950 को राष्ट्रपति भवन में हुआ, जिसकी सदारत डॉक्टर राजिंदर प्रसाद, हिन्दोस्तान के पहले राष्ट्रपति ने फ़रमाई थी।
इसके बाद मुतअद्दिद मुशायरे किये गये, जो यौम-आज़ादी, यौम-जम्हूरिया, गांधी जयंती के मौक़ों पर मुल्की या इंडो-पाक स्तर पर हुए।
हज़रत निज़ामउद्दीन औलिया के उर्स के मौक़े पर कई सालों तक अज़ीमुश्शान मुशायरे होते रहे, जिनमें एक से एक बड़ी शख़्सियात ने अपनी मौजूदगी से रौनक बख़शी। इनमें जवाहर लाल नेहरू, राजिंदर प्रसाद, डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन, लाल बहादुर शास्त्री, वीवी गिरी, इंदिरा गांधी के नाम क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं। इन मुशाविरों में दूसरे देशों के भी सरबराह शामिल हुए जैसे किंग सऊद, शाह फ़ैसल, ईरान के बादशाह, अफ़ग़ानस्तान के शाह, इराक़ के सदर वग़ैरह।
आज आवामी और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर मुशायरों का चलन है। कवि सम्मेलन और मुशायरा संयुक्त रूप से अधिक देखने को मिलते हैं।
(चित्र परिचय: पहली तस्वीर इप्टा मुंबई के चर्चित नाटक “आख़िरी शमां” के एक दृश्य की। दूसरी में जवाहरलाल नेहरू एक मुशायरे के मंच पर, जिसमें जोश मलीहाबादी व अन्य शोअरा नज़र आ रहे हैं। चित्र हेरिटेज टाइम्स से साभार।)

डॉक्टर मो. आज़म
बीयूएमएस में गोल्ड मेडलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky

1 comment on “मुशायरे: रिवायत, अहमियत और फ़ायदे-2”