
हिंदुस्तान यानी एक रंग-रंगीली सरगम। हर सुर, हर रंग एक-दूसरे में घुला-मिला हुआ, रचा-बसा हुआ। यही इंद्रधनुषी धुन देश की तहज़ीब है। प्यार, वाबस्तगी और एका के पैग़ाम सभी को मुबारक… हिन्दी और उर्दू साहित्य में रंगों का जश्न ख़ूब मनाया जाता रहा है। रंगों के त्यौहार के मौक़े पर अलग-अलग रंगों की शायरी आब-ओ-हवा के पाठकों के लिए……
आज रंग है…

होली और हिन्दोस्तान
-अर्श मल्सियानी
इक तरफ़ राहत का और फ़रहत का काल
इक तरफ़ होली में उड़ता है गुलाल
इक तरफ़ यारों की इशरत-कोशियाँ
इक तरफ़ हम और हाल-ए-पुर-मलाल
इक तरफ़ दौर-ए-शराब-आतिशीं
इक तरफ़ तलछट का मिलना भी मुहाल
देखते हैं तुझ को जब उठती है हूक
आह ऐ हिन्दोस्ताँ ऐ ख़स्ता-हाल
रहम के क़ाबिल ये बर्बादी तिरी
दीद के क़ाबिल ये तेरा है ज़वाल
किस क़दर ख़ूँ-रेज़ है कितना क़बीह
तेरी मस्जिद और मंदिर का सवाल
उफ़ तिरे बेटों की रज़्म-आराइयाँ
आह उन के बाहमी जंग-ओ-जिदाल
अपने फ़रज़न्दों के ये अतवार देख
देख ये ला’नत के क़ाबिल चाल-ढाल
किस क़दर ज़िल्लत के दिल-दादा हैं ये
बे-कमाली में हैं कितने बा-कमाल
सीना-ए-तहज़ीब पर है पंजा-ज़न
दीन के झगड़ों में इनका इश्तिआ’ल
दामन-ए-अख़्लाक़ पर धब्बा है एक
इन की वहशत-ख़ेज़ियों का इत्तिसाल
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(इशरत-कोशियाँ = सुख के बहाने, क़बीह = लज्जाजनक, रज़्म-आराइयाँ = युद्धोन्माद, इश्तिआ’ल = उत्तेजना, इत्तिसाल = क्रम)
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ग़ज़ल
इश्क़ की इक रंगीन सदा पर बरसे रंग
रंग हो मजनूँ और लैला पर बरसे रंग
कब तक चुनरी पर ही ज़ुल्म हों रंगों के
रंगरेज़ा तेरी भी क़बा पर बरसे रंग
ख़्वाब भरें तिरी आँखें मेरी आँखों में
एक घटा से एक घटा पर बरसे रंग
इक सतरंगी ख़ुश्बू ओढ़ के निकले तू
इस बे-रंग उदास हवा पर बरसे रंग
ऐ देवी रुख़्सार पे तेरे रंग लगे
जोगी की अलमस्त जटा पर बरसे रंग
सूरज अपने पर झटके और सुब्ह उड़े
नींद नहाई इस दुनिया पर बरसे रंग
-स्वप्निल तिवारी
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ग़ज़ल
लुभा न पाया कभी मुझको ये गुलाल का रंग
हरेक सिम्त फिज़ा में है बस ज़वाल का रंग
जहाँ खड़े हो बड़ी दलदली ज़मीन है ये
उतार फेको मियाँ नुकरई ख़याल का रंग
उसे है फ़िक्र कहीं सादगी न मर जाये
तुझे ख़ुशी कि चटक है तेरे गुलाल का रंग
धनक के रंग सभी दिख रहे सियाह उसे
ये रंग भूख का भी है बड़े कमाल का रंग
उलझ के मर नहीं जाता तो और क्या करता
बड़ा हसीन था उस बेवफ़ा के जाल का रंग
हमारे हिस्से की नेमत हड़प के भूल गये
हमारे खूँ से गुलाबी है तेरे गाल का रंग
-ज्ञान प्रकाश पाण्डेय
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होली गीत
– सदफ़ इक़बाल
रंग राधा है,रंग मीरा है
रंग मोहन के दिल का हीरा है
रंग गीता के मुँह की बोली है
फाग उड़ती है भीगी चोली है
आज आँगन में मेरे होली है
कोई धनवान है ना निर्धन है
प्रेम रंगों से रंग गया तन है
रुत अबीर ओ गुलाल वाली है
सात रंगों की मेरी डोली है
आज आँगन में मेरे होली है
आज दर्पण हुआ है हर इक मन
हर क़दम पर सजा है वृंदावन
रंग राधा पे डाले गोपाला
भाँग, मस्ती, हंसी, ठिठोली है
आज आँगन में मेरे होली है
पगली मन किसपे तेरा रीझा है
किसने ह्रदय पे तीर खींचा है
भाँग का है नशा चढ़ा इतना
तूने सुध बुध ही अपनी खो ली है
आज आँगन में मेरी होली है
आज मौक़ा है रंग ले तन मन
रंग में घुल गया है घर आँगन
तू जो मीरा है ,आज बन राधा
उफ़्फ़ सदफ़ तू भी कितनी भोली है
आज आँगन में मेरे होली है
