
- January 18, 2026
- आब-ओ-हवा
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शख़्सियत को जानें चंद्रेश्वर की कलम से....
आलोचक वीरेंद्र यादव होने के मायने
अग्रज लेखक-आलोचक वीरेन्द्र यादव से मेरी पहली मुलाक़ात वर्ष 1989 के जून में हुई थी। मैं उन दिनों इप्टा आंदोलन पर सरदार पटेल विश्वविद्यालय, वल्लभ विद्यानगर, गुजरात में प्रख्यात जनवादी हिन्दी आलोचक, विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर शिवकुमार मिश्र के निर्देशन में शोधकार्य कर रहा था। लखनऊ में मुझे इप्टा के नाटककार, नाट्य निर्देशक राकेश का एक साक्षात्कार लेना था। मुझे आगरा, कानपुर, लखनऊ होते हुए पटना जाना था। आगरा में नाट्यकार राजेन्द्र रघुवंशी, जितेन्द्र रघुवंशी, राम गोपाल सिंह चौहान का साक्षात्कार लेने के बाद कानपुर में मैंने जनकवि-नाटककार शील का साक्षात्कार लिया था।
लखनऊ में राकेश के साथ बातचीत करनी थी। मैं उनके घर पर ही ठहरा हुआ था। उन्होंने ही कहा कि मैं इप्टा आंदोलन पर बातचीत के लिए मुद्राराक्षस, वीरेंद्र यादव, सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ एवं सिद्धेश्वर अवस्थी को भी बुला लेता हूं। इन सभी ने बातचीत में हिस्सा लिया और लंबी बातचीत हुई, जो अब एक पुस्तिका (इप्टा आंदोलन: कुछ साक्षात्कार) के रूप में प्रकाशित भी है। मैंने वीरेंद्र यादव को आज से कोई 37 वर्ष पहले वहीं देखा था। तब वे एक सुदर्शन व्यक्तित्व वाले तेज़-तर्रार मार्क्सवादी युवा आलोचक के रूप में उभर रहे थे। उनकी बातचीत की तार्किक एवं तथ्यात्मक शैली ने मुझे उस पहली मुलाक़ात में ही गहरे प्रभावित किया था।
जब मैं शोध पूरा कर डॉक्ट्रेट की उपाधि लेने के बाद वर्ष 1991 में पुनः अपने गृह राज्य बिहार वापस लौट आया तो पटना के दैनिक अख़बारों में स्वतंत्र लेखन करने लगा। पटना में ही ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ में नागेन्द्र जी उप संपादक थे। वे वीरेंद्र यादव के ही छोटे भाई हैं। नागेन्द्र जी ने मुझे अपने अख़बार में ‘साहित्य-संस्कृति’ के पृष्ठ पर लगातार प्रकाशित किया। वे मेरे गहरे मित्र बन गये। इस नाते से मैं वीरेंद्र यादव को अपना बड़ा भाई मानता रहा हूं।
एक तरह से कहूं तो वीरेंद्र यादव मेरे अभिभावक की तरह थे। उनके न होने से लखनऊ ही नहीं, पूरे देश में हिन्दी साहित्य जगत में जो रिक्तता पैदा हुई है, उसकी भरपाई निकट भविष्य में मुश्किल है। सच कहूं तो वीरेंद्र यादव समकालीन हिंदी आलोचना में पूरी तरह से विश्वसनीयता के पर्याय थे। आप उनके लिखे पर भरोसा कर सकते थे। ऐसे तो वीरेंद्र जी ने कविता-कहानी पर भी लिखा है, लेकिन उनकी मुख्य पहचान उपन्यास आधारित आलोचना से है। वर्ष 1999 से ‘तद्भव’ (संपादक-अखिलेश) का प्रकाशन शुरू हुआ, तो उसमें वीरेंद्र जी के कई लम्बे आलोचनात्मक लेख प्रकाशित हुए थे- कालजयी हिंदी उपन्यासों (गोदान, झूठा सच, मैला आँचल, आधा गाँव, रागदरबारी आदि) पर। इन लेखों ने उन्हें इस सदी के पहले दशक में एक ठोस पहचान दी थी।

उनकी प्रमुख आलोचना की पुस्तकों में ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’, ‘विमर्श और व्यक्तित्व’, ‘विवाद नहीं, हस्तक्षेप’, ‘उपन्यास और देस’ आदि के नाम तत्काल याद आ रहे हैं। वीरेंद्र जी ने इधर सामयिक मुद्दों पर त्वरित टिप्पणियां लिखी थीं। वे हिंदी साहित्य में चल रहे विमर्शों में भी लगातार शामिल होते रहे थे। उनमें सच की तरफ़दारी में खड़े होने का माद्दा था। वे हमेशा ग़लत के विरोध में खड़े होते थे। उनकी आलोचना में विचार का पक्ष कभी धूमिल नहीं होता था। वे एक साहित्यिक-सांस्कृतिक योद्धा थे। वे प्रेमचंद साहित्य के एक गहरे अध्येता भी थे। वाम- प्रगतिशील चेतना की पत्रिका ‘प्रयोजन’ के संपादक भी थे।
हिन्दी आलोचना में उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 2001 में ‘देवीशंकर अवस्थी स्मृति सम्मान’ वीरेंद्र यादव को मिला था। इसके अलावा भी उन्हें हिंदी संस्थान, उत्तर प्रदेश का ‘साहित्य भूषण’ सम्मान एवं अन्य कई सम्मान-पुरस्कार मिले थे। वैसे तो वे प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे, लेकिन लखनऊ में प्रलेस, जलेस, जसम और अन्य प्रगतिशील-जनवादी साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए भी वे सर्वमान्य थे। उनकी इस स्वीकृति के पीछे उनका दशकों का लम्बा संघर्ष, स्वाध्याय और लेखन था। वे जीवन और लेखन में दोहरेपन के शिकार नहीं थे। वे खरे मार्क्सवादी और कम्युनिस्ट लेखक थे।
इधर उनका झुकाव ‘सबॉल्टर्न’ की ओर हुआ था और वे मार्क्सवाद के साथ आम्बेडकरवाद को साथ लेकर चल रहे थे और हिन्दी आलोचना में उन्होंने प्रतिरोध की एक नयी ज़मीन विकसित की थी। वे वर्ग के साथ वर्ण की भी बात करते थे। वे अपनी वैचारिकी में, विमर्शों में यांत्रिक होने के ख़तरों के प्रति सचेत रहते थे और दूसरों को भी सजग करते थे। वे लगातार इधर सांप्रदायिक और फासीवादी ताक़तों से लेखन के मोर्चे पर जूझ रहे थे। वे ब्राह्मणवाद-पुरोहितवाद, मनुवाद और किसी तरह की सामंती-पूंजीवादी प्रवृत्तियों पर तीखा प्रहार किया करते थे। वे जितने अच्छे लेखक थे, उतने ही कुशल वक्ता भी थे। सरल-सहज मनुष्य थे। वे जीवन में जितने मृदुल थे, लेखक के रूप में उतने ही सख़्त। वे अपनी वैचारिकी से कभी थोड़ा भी डिगते नहीं थे। वे समझौतापरस्त नहीं थे। वे जीवन में कोरे शब्दजीवी नहीं थे। उनके यहाँ शब्द और कर्म की एकता देखने को मिलती थी। वे एक जन बुद्धिजीवी थे। उनकी आलोचना में अब भी युवापन का जोश बचा हुआ था।
जौनपुर जनपद के मूल निवासी थे, मगर लखनऊ की संस्कृति में पूरी तरह से रच-बस गये थे। इसी वर्ष 5 मार्च को अपने जीवन के 76 वसंत पूरे करने वाले थे। उनका इस तरह अचानक हृदयगति रुकने से असमय मृत्यु का ग्रास बनना पूरे देश की साहित्यिक बिरादरी को स्तब्ध कर दिया है। इधर जिन ‘कुछ’ हिन्दी आलोचकों ने हिंदी आलोचना में प्रतिरोध की ज़मीन तैयार करने की कोशिश की थी, उनमें वीरेन्द्र यादव का नाम शीर्ष पर रहेगा। उनकी स्मृति को सलाम! विनम्र श्रद्धांजलि।

चंद्रेश्वर
प्रोफ़ेसर पद से सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन। हिन्दी-भोजपुरी की सभी प्रमुख साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, आलेखों और 'हिन्दवी' पर चयनित कविताओं का भी प्रकाशन। तीन हिन्दी और एक भोजपुरी कविता संग्रह प्रकाशित। एक शोधालोचना की पुस्तक 'भारत में जन नाट्य आंदोलन' (1994) और साक्षात्कार की एक पुस्तिका 'इप्टा-आंदोलनः कुछ साक्षात्कार' सहित कथेतर गद्य की किताबें भी आपके नाम। संपर्क- 7355644658।
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सही सही लिखा ।