
- November 14, 2025
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पाक्षिक ब्लॉग विजय कुमार स्वर्णकार की कलम से....
एक दरख़्त के साये में 50 वर्ष
आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल की गंगा के भागीरथ दुष्यंत कुमार हैं। वर्षों तक हिन्दी साहित्यकारों और प्रकाशकों की उपेक्षा सहती हुई ग़ज़ल विधा चमत्कारिक रूप से उनकी मात्र एक पुस्तक के द्वारा प्राणवान ही नहीं हुई, वरन अन्य काव्य विधाओं के रचनाकारों को भी अपनी ओर आकृष्ट करते हुए आज की सबसे लोकप्रिय विधा बन गयी है। यह दुष्यंत कुमार का ही करिश्मा है कि हिन्दी ग़ज़ल के शेर उसी तरह उद्धृत होते हैं जिस तरह उर्दू के हुआ करते हैं और आज अगर हिन्दी ग़ज़ल समकालीन कविता से आंख से आंख मिलाकर बात कर रही है, तो उसका पूरा श्रेय दुष्यंत कुमार के भागीरथी प्रयास को जाता है। उनके अनेक शेर अपनी परतों में भारतीय जनमानस की महाकाव्य पीड़ा समेटे हुए हैं। इस लेख के केंद्र में दुष्यंत कुमार का यह प्रसिद्ध शेर है:
यहां दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए
इसी शेर में वह मिसरा है, जो दुष्यंत कुमार की ग़ज़लवाहिनी का पहला परचम बना था। इस शेर का पहला मिसरा, पूरा मिसरा, दुष्यंत के ग़ज़ल संग्रह का पहला नाम था। कालांतर में शायद शीर्षक की लंबाई को ध्यान में रखते हुए केवल “साये में धूप” को चुना गया और आज यह वाक्यांश कालजयी ग़ज़लों के गुलदस्ते का पर्याय बनकर हिन्दी साहित्य में प्रतिष्ठापित है। “साये में धूप” शीर्षक भले ही घोषित परचम है लेकिन दुष्यंत की ग़ज़ल का प्रत्येक शेर एक परचम है और जैसे हिमालयीन गांवों और मठों में पहाड़ियों पर अनेक रंग-बिरंगे परचम नयनाभिराम दृश्य प्रस्तुत करते हैं वैसा ही दुष्यन्त का ग़ज़ल संसार है अपने चटख रंगों के कारण ये परचम बहुत दूर से आपकी दृष्टि के केंद्र में रहने लगते हैं और देर तक स्मृति पर छाये रहते हैं। इन ग़ज़लों का नैसर्गिक बांकपन साहित्य-प्रेमियों को पिछले पचास वर्षों से निरंतर रोमांचित और आंदोलित करता आ रहा है। आज हिन्दी ग़ज़ल के आसमान तले ग़ज़ल-प्रेमियों का जो इतना बड़ा जमावड़ा है, उसके पीछे इन्हीं ग़ज़लों से उत्पन्न दुर्निवार आकर्षण है। यह जमावड़ा और आकर्षण समय के साथ बढ़ता जा रहा है।
दुष्यंत की ग़ज़लों के सृजन में ऐसी राजनैतिक और सामाजिक चेतना की भूमिका है, जो तात्कालिक अवश्य प्रतीत होती है लेकिन उसकी अक्षय व्यंजना आधी सदी व्यतीत होने के बाद भी जनमानस को स्पर्श करती है और बार-बार उद्वेलित करने की क्षमता रखती है। जहां एक ओर दुष्यंत ग़ज़ल के मिज़ाज को अपना मिज़ाज बनाने में सफल रहे, वहीं वे अपनी प्रतिबद्धताओं को ग़ज़ल की प्रतिबद्धताओं में शामिल करने में भी सफल हुए। दुष्यंत से पहले भी मानवीय अनुभूतियों और सामाजिक संबंधों को केंद्र में रखकर शेर कहे जा रहे थे, लेकिन जिस प्रतिबद्धता के साथ अपने यथार्थ से विद्रोह करते हुए समाज की सामूहिक चेतना की सशक्त अभिव्यक्ति दुष्यंत की ग़ज़लों में हुई है, वह अपूर्व है। इस अभिव्यक्ति की गूंज इतनी प्रभावकारी थी कि बाद के ग़ज़लकार इसी की अनुगूंज को ग़ज़ल का नया मिज़ाज समझने लगे। सत्य यह है कि दुष्यंत ने पारंपरिक ग़ज़ल की सम्मोहिनी शक्ति के एकाधिक स्तरीय घेरों को तोड़ते हुए एक ऐसे नये गुरुत्व से ग़ज़ल को समृद्ध किया जिसके प्रभाव से उसमें मनुष्य की सामूहिक प्रतिबद्धताओं के प्रति आग्रह और बढ़ता गया। ग़ज़ल के आत्मलीन परिसर में ऐसी तोड़फोड़ के साथ सुचिंतित परिवर्तन पहली बार देखा गया।
प्रस्तुत शेर उन पीढ़ियों की समेकित विवशता और निरुपायता को चिह्नित करता है, जो सदियों के संघर्ष के पश्चात प्राप्त स्वाधीनता के साये में अपने सुखद भविष्य और सार्थक जीवन के सपने बुन रही थीं। स्वाधीनता के कई आयाम हैं। यह वह कालखंड था, जब देश के कर्णधार, जो स्वयं अपने अपने क्षुद्र स्वार्थों को पूरा करने में व्यस्त थे, इस स्वाधीनता के व्यापक संदर्भों को समझने में और उनके अनुकूल वातावरण तैयार करने में चूक रहे थे। आम आदमी दूसरी तरह पराधीन होने लगा था। एक बार पराधीन होकर स्वाधीन होने में सदियां बीत गयी थीं। ऐसे आशंकाग्रस्त माहौल में दुष्यंत नयी काव्य विधा अपनाकर अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाता है। वह किसी को झकझोरता है तो किसी को ललकारता है लेकिन जूझता है- सतत। दुष्यंत कुमार ने अपने समय की विसंगतियों और विडंबनाओं को व्यक्त करने के लिए इस शेर की पहली पंक्ति में एक अपूर्व रूपक गढ़ा। आडंबरपूर्ण मूल्यों की महिमा से भ्रमित न होने का विवेक और यथास्थिति के कुचक्र से निकलने के लिए आवश्यक साहस दोनों इस शेर की आत्मा में है। इस शेर के बहाने दुष्यंत की ग़ज़लगोई और रचनाधर्मिता को समझने का प्रयास करते हैं।

शेर की पहली शर्त होती है कि उसके टेक्स्ट का जो स्थूल/प्रत्यक्ष अर्थ है, क्या वह सहज बुद्धि से सत्य या सत्य के निकट प्रतीत होता है या नहीं। अगर होता है तो उसकी क़ीमत बढ़ जाती है क्योंकि सत्य के प्रति पाठक का आग्रह होता है। जिस शेर में सत्य के दर्शन की संभावना नहीं होती, पाठक का विवेक उसे अपनाने से कतराता है। इस शेर के सतही अर्थ को ग्रहण करने में हमारा विवेक यहां आकर ठिठकता है कि “साये में धूप लगती है” वाक्यांश क्या कल्पना मात्र है। अगर यह कहा जाता कि साये में धूप आती है तो यह एक वैज्ञानिक सत्य है। इस तथ्य को माध्यमिक शिक्षा के छात्रों को पढ़ाया जाता है। यहां “धूप आती है” की बजाय “धूप लगती है” कहा गया है इसीलिए पहले यह विवेचन किया जाये कि साये में धूप कैसे असहनीय लग रही होगी।
सायेदार दरख़्त प्रकृति का उपहार हैं और उनसे आत्मिक संबंध जनजीवन का हिस्सा है। उनकी सामाजिक स्वीकृति और उपयोगिता है। शेर में जिन परिस्थितियों की ओर संकेत है उन्हें समझना होगा। साये में या यूं कहिए कि सायेदार दरख़्त के तले धूप कब लगती है, इस पर ग़ौर किया जाना चाहिए। पहला कारण तो यह हो सकता है कि उसकी सारी पत्तियां झड़ चुकी हों, दूसरा यह कि वह हमेशा के लिए सूख चुका हो और तीसरा यह कि उसकी कुछ महत्वपूर्ण शाख़ें काट दी गयी हों। और भी कारण हो सकते हैं।
साये में धूप लगना और इतनी धूप कि सहन नहीं हो, इसका कोई प्रामाणिक भौतिक आधार हमारे सामने प्रस्तुत होना ही चाहिए अन्यथा शेर में उल्लेखित स्थिति काल्पनिक हो जाएगी। कपोल-कल्पना से उपजे शेर की विश्वसनीयता हमेशा कठघरे में रहती है। सहज बुद्धि कहती है कि धूप और वो भी साये में आती धूप इतनी असहनीय तो नहीं लगनी चाहिए। फिर यह असहनीय क्यों लग रही है? पहला कारण तो यह हो सकता है कि इस व्यक्ति की प्रकृति बहुत कोमल हो (ऐसा यहां नहीं है), दूसरा यह कि इस व्यक्ति के साथ ऐसा कोई है, जिसके लिए मामूली धूप भी असहनीय है- जैसे कोई नवजात बच्चा। इसी धूप के साथ लू-लपट भी अगर जुड़ जाये तो इनका समेकित प्रभाव वास्तव में असहनीय हो सकता है।
“साये में धूप लगने” का एक और पहलू देखिए। किसी दरख़्त के साये में कितने लोगों को सुविधापूर्ण आश्रय के लिए स्थान मिल सकता है। साया सूरज की गति के अनुसार अपनी जगह और आकार बदलता रहता है। जिस जगह दोपहर से पहले साया था वहां दोपहर के बाद धूप आ सकती है। आख़िर कितने लोगों को तने के आसपास की जगह का ऐसा हिस्सा दिया जा सकता है, जहां हमेशा छांव बनी रहती है। समय के साथ इसी साये के सीमित दायरे में नये लोग आ जाते हैं। इस भीड़ में सभी को समान सुविधा नहीं मिल सकती। यह भीड़-भाड़ आपसी तनातनी और षड्यंत्र का कारण बनती है। ऐसी परिस्थितियों की नकारात्मक ऊर्जा अपनी कृत्रिम गर्मी से धूप के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती है। ऐसे में पलायन के सिवा और कोई उपाय नहीं बचता है…
शेष अगले भाग में

विजय कुमार स्वर्णकार
विगत कई वर्षों से ग़ज़ल विधा के प्रसार के लिए ऑनलाइन शिक्षा के क्रम में देश विदेश के 1000 से अधिक नये हिन्दीभाषी ग़ज़लकारों को ग़ज़ल के व्याकरण के प्रशिक्षण में योगदान। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग में कार्यपालक अभियंता की भूमिका के साथ ही शायरी में सक्रिय। एक ग़ज़ल संग्रह "शब्दभेदी" भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। दो साझा संकलनों का संपादन। कई में रचनाएं संकलित। अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
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