अख़बारनवीसी: वे एक सौ अड़सठ साल

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राजेश बादल की कलम से....

अख़बारनवीसी: वे एक सौ अड़सठ साल

दूसरा खंड उर्फ़ तिलक युग

बहरहाल! आगे बढ़ते हैं। तिलक युग की पत्रकारिता याने इस वृहत शोध के दूसरे खंड की बात करते हैं। उन्नीस अध्यायों वाला यह खंड मेरी नज़र में सबसे ख़ास है। इसमें अगले 39 साल की सशक्त होती अख़बारनवीसी का ब्यौरा है। आज़ादी के लिए संघर्ष जवान हो रहा था और सामाजिक चेतना करवट ले रही थी। इसी कालखंड में बाल गंगाधर तिलक यानी तिलक महाराज प्रकट होते हैं। वे नारा देते हैं- स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। देखते ही देखते यह नारा समूचे मुल्क के अवाम की आवाज़ बन जाता है। आज़ादी की चाह अंगड़ाई लेती है और महात्मा गांधी इस देश में आत्मा की तरह साँसों में धड़कने लगते हैं।

मगर तिलक महाराज का ज़िक्र एक बार फिर करते हैं। एक जनवरी 1881 को वे अँग्रेज़ी साप्ताहिक मराठा और तीन दिन बाद चार जनवरी को मराठी साप्ताहिक केसरी का शुभारंभ करते हैं। केसरी के तेवर सख़्त थे और वह विचारों का शोला था। हिंदीभाषी क्षेत्र में स्वराज का नारा बुलंद करने के लिए माधवराव सप्रे हिंदी में केसरी का प्रकाशन करते हैं। तिलक जी से घबराकर बरतानवी सत्ता ने उन्हें मांडले (आज के म्यांमार में) की जेल में डाल दिया।लेकिन तब तक वे अपना काम कर चुके थे। कानपुर से गणेशशंकर विद्यार्थी का प्रताप, बनारस से विष्णु पराड़कर का आज और जबलपुर से माखनलाल चतुर्वेदी का कर्मवीर और काला कांकर से महामना मदनमोहन मालवीय के संपादन में हिंदोस्थान क्रांतिदूत बन गये।

तेलुगु में सुब्रमण्यम अय्यर ने स्वदेशमित्रन और मलयालम में कंदतिल वर्गीज़ मापिल्लै ने मलयाला मनोरमा का आग़ाज़ किया। यह सिलसिला पूरे राष्ट्र में फैल गया। मौलाना आज़ाद एक शानदार पत्रकार थे। उन्होंने 1912 में उर्दू में आज़ादी की अलख जगाने वाले पत्र अल हिलाल का प्रकाशन किया। नतीजतन उन्हें बंगाल से निकाल दिया गया। मगर आप उर्दू के एक और साप्ताहिक स्वराज का प्रकाशन है। यह शांति स्वरूप भटनागर ने निकाला था। ढाई साल तक यह अख़बार निकला। इसके आठ संपादक हुए। इनमें छह को 94 बरस की क़ैद हुई और दो को आजन्म कालापानी दिया गया। इस भाग में एक पूरा अध्याय इस संपादक गाथा पर केंद्रित है। क्या हमारी नयी पीढ़ियों को अपने पुरखों के इन बलिदानों की ख़बर है?

इसी खंड में द्विवेद्वी युग के सूत्रधार महावीर प्रसाद द्विवेद्वी का भी हवाला है। महावीर प्रसाद द्विवेद्वी ने सरस्वती के ज़रिये भाषा और व्याकरण के नये संस्कार डाले। मैं याद कर सकता हूँ द्विवेद्वी जी ने ही हमें मैथिलीशरण गुप्त से परिचित कराया था। उनका छद्म नाम रसिकेन्द्र बंद कराकर असली नाम से छापना शुरू किया। इतना ही नहीं, मैथिलीशरण गुप्त ने खड़ी हिंदी में लिखना सरस्वती से ही शुरू किया था क्योंकि द्विवेद्वी जी ने बृज बोली से प्रभावित गुप्त जी के लेखन को प्रकाशित करने से इनकार कर दिया था।

आज हमारे समाचार-पत्रों में कार्टून विधा का लोप-सा होता जा रहा है लेकिन क़रीब डेढ़ सौ साल पहले के ग़ुलाम हिन्दुस्तान में कार्टून के ज़रिये अभिव्यक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण थी। जब 1883 में वृन्दावन से राधाचरण गोस्वामी ने भारतेन्दु का प्रकाशन प्रारंभ किया, तो उसमें पूरे एक पन्ने का कार्टून छपता था। यह कार्टून चुटीले कटाक्षों के लिए विख्यात था। मैं याद कर सकता हूँ कि आज़ादी के बाद भी कार्टून विधा की लोकप्रियता चरम पर थी। हम लोगों ने आर.के. लक्ष्मण और उनके आम आदमी के माध्यम से ऐसे-ऐसे व्यंग्य बाण निकलते देखे, जो आज विलुप्त हो चुके हैं।

प्रसंगवश बता दूँ कि आर.के. लक्ष्मण का आख़िरी साक्षात्कार मैंने लिया था। उनका कैबिन टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संपादक के कक्ष से कम से कम दोगुना था। उनकी ज़िंदगी का एक उदाहरण मैं कभी नहीं भूल सकता। जब लक्ष्मण जवान थे और बतौर कार्टूनिस्ट अपनी पेशेवर पारी शुरू करना चाहते थे तो उनका सपना था कि वे उस दौर के महान कार्टूनिस्ट डेविड लाओ जैसे बनें। वे मेहनत करते गये। जब वे सारे संसार के कार्टूनिस्टों के आराध्य बन गये तो एक दिलचस्प घटना हुई…

दरअसल वे अपने कार्टून बनाने के समय में कोई दख़ल पसंद नहीं करते थे और न ही किसी से मिलते थे। उनकी निजी सचिव को यह स्पष्ट निर्देश थे। एक दिन जब वे कार्यालय पहुँचे तो उनकी सचिव ने बताया कि कोई अतिथि मिलने के लिए उनके कक्ष में बैठा है। लक्ष्मण का पारा सातवें आसमान पर। सचिव ने उत्तर दिया, “सर! वह एक अँग्रेज़ है और लन्दन से सिर्फ़ आपसे मिलने के लिए आया है।” लक्ष्मण हैरान-परेशान अंदर दाख़िल हुए। भीतर एक अँग्रेज़ बैठा था। लक्ष्मण को देखते ही सम्मान से उठ खड़ा हुआ और बोला, “सर! आय एम डेविड लाओ। कार्टूनिस्ट फ्रॉम लंदन एंड ग्रेट फ़ैन ऑफ़ योर कार्टून्स”। लक्ष्मण को काटो तो ख़ून नहीं। उनके द्रोणाचार्य सामने और वे एकलव्य की तरह थे। क्या ऐसा किसी की ज़िंदगी में होता है?

यह लक्ष्मण की लोकप्रियता है कि लक्ष्मण के रचे गये काल्पनिक ‘कॉमन मैन’ की मूर्तियाँ पुणे और मुंबई के चौराहों पर लगी हैं। यह लोकतंत्र में आम आदमी की ही आवाज़ है। आज संपादक के नाम पत्र की तरह कार्टून भी हमारे पन्नों से अनुपस्थित होते जा रहे हैं। श्रीधरजी लिखित ग्रंथ के इस दूसरे भाग में विशेषीकृत पत्रकारिता के भी अनेक उदाहरण मिलते हैं। मसलन कृषि, विज्ञान, रंगीन चित्र और पुस्तक समीक्षा जैसे क्षेत्र भी उस काल की पत्रकारिता से अछूते नहीं थे। तिलक युग का यह दूसरा भाग जहाँ अपना उपसंहार करता है, वहाँ से भारत में गांधी युग की शुरूआत होती है।

तीसरा खंड उर्फ़ गांधी युग

दक्षिण अफ्रीका में पत्रकारिता करते-करते गांधी जी 1915 में स्वदेश लौटे और हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई के केंद्र बिंदु बन गये। इसीलिए तीसरा हिस्सा यानी गांधी युग की पत्रकारिता मेरी दृष्टि में इस समग्र पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। केवल 27 बरस की पत्रकारिता ने भारत से गोरों की विदाई देखी। पंद्रह अध्यायों में सिमटी भारतीय पत्रकारिता का यह सबसे जीवंत और धड़कता हुआ दस्तावेज़ है। गांधी इस कालखंड के प्राण हैं। श्रीधरजी इस खंड की अपनी प्रस्तावना में लिखते हैं:

यह तथ्य रेखांकित किया जाना चाहिए कि लोकमान्य तिलक के बाद महात्मा गांधी ने भारतीय पत्रकारिता को सर्वाधिक प्रभावित किया। सन 1921 से 1948 तक के कालखंड को पत्रकारिता का गांधी युग कहा जाएगा… गांधी युग में भारत की सभी भाषाओं और प्रांतों में पत्र-पत्रिकाएँ निकाले जा रहे थे। धारवाड़-कर्नाटक से 1921 में कन्नड़ साप्ताहिक कर्मवीर का प्रकाशन तिलक की विचारधारा को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से हुआ। यह नये युग की माँग के अनुरूप महात्मा गांधी की राह का राही बन गया।

गांधी की पत्रकारिता इस मायने में बेमिसाल कही जा सकती है क्योंकि 1921 से 1935 के बीच पत्रकारिता करना जान की बाज़ी लगाना था। गोरी सत्ता ने ख़ौफ़ और दहशत का ऐसा माहौल बना दिया था, जिसमें आम आदमी आज़ादी का सपना देखने में भी डरता था। कुछ उदाहरण देता हूँ।

  1. अँग्रेज़ों ने कलकत्ता से दिल्ली राजधानी स्थानांतरित की थी। उसे ख़ुशी का मौक़ा मानते हुए दिल्ली में 23 दिसम्बर 1912 को वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग की शाही सवारी निकल रही थी। वाइसराय एक हाथी पर सवार थे। उस पर आज़ादी के मतवालों ने बम फेंका। इसमें महावत की मृत्यु हो गयी और वाइसराय घायल हो गये। उन्हें तीन महीने बिस्तर पर रहना पड़ा। इसके बाद तो गोरे जल्लाद बन गये। उन्होंने मुल्क़ में ऐसा क़त्ले-आम मचाया कि लोग कराह उठे। बात-बात में क्रांतिकारियों को फाँसी दी जाने लगीं। वाइसराय पर बम फेंकने के आरोप में मास्टर अमीरचंद, भाई बालमुकुंद और मास्टर अवधबिहारी को मृत्युदंड दिया गया और कई क्रांतिकारियों को आजीवन कारावास।
  2. इसके बाद 17 नवंबर 1913 को राजस्थान के अरावली के मानगढ़ में बरतानवी फ़ौज ने 2500 भील आदिवासियों को घेरकर गोलियों से भून दिया।
  3. दो साल बाद यानी 1915 में संसार के सबसे बड़े गदर की योजना विश्वासघात के कारण नाकाम हो गयी, जिसमें 8000 क्रांतिकारी गोपनीय तरीक़े से समंदर के रास्ते जहाज़ों में भरकर भारत पहुँचे थे। उन्होंने अविभाजित हिन्दुस्तान की 26 सैनिक छावनियों में सशस्त्र विद्रोह की ख़ुफ़िया योजना बनायी थी। इसमें ग़दर के नौजवान संपादक करतार सिंह सराभा और इलाहाबाद से प्रकाशित उर्दू अख़बार स्वराज में उप संपादक रहे पंडित परमानन्द (भाई परमानन्द नहीं) समेत 26 क्रांतिकारियों को फाँसी की सज़ा सुनायी थी। बाद में प्रिवी कौंसिल ने मुल्क में बग़ावत की आशंका के मद्देनज़र 19 देशभक्तों की सज़ा आजन्म क़ैद में बदल दी। शेष 7 को फाँसी दे दी गयी थी। आज़ाद हिन्द फ़ौज़ के संस्थापक रास बिहारी बोस भी इस गदर के सूत्रधार थे। वे ऐन वक़्त पर गोरी पुलिस को चकमा देकर भाग निकले थे। जब मैं 7 या 8 साल का था, तो पंडित परमानन्द ने मुझे बताया था कि वे स्वराज में पत्रकारिता प्रशिक्षण के दरम्यान जेल की चक्की पीसा करते थे और बाज़ार में घंटा बजाकर स्वराज बेचते थे। लोग आते। चुपचाप अख़बार खरीदकर ले जाते। पंडित परमानन्द पंडित सुंदरलाल के कर्मयोगी में भी लिखते थे।
  4. इसके बाद 1919 में जलियाँवाला बाग़ नरसंहार हुआ। बाद के वर्षों में चंद्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी दी जाती है और छतरपुर ज़िले में चरणपादुका नरसंहार किया जाता है। अर्थात भारत के हर इलाक़े में बेग़ुनाह देशवासियों को मारकर बरतानवी सत्ता आतंक का साम्राज्य क़ायम कर चुकी थी।

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