
- May 15, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
‘हिंदी पत्रकारिता के 200 साल’ के संदर्भ में विशेष प्रस्तुति… यह आलेख ‘समग्र भारतीय पत्रकारिता’ ग्रन्थ की समीक्षा नहीं, बल्कि इस नायाब धरोहर के बहाने भारतीय पत्रकारिता के 200 साल में से 168 साल की यात्रा कथा है।
राजेश बादल की कलम से....
अख़बारनवीसी: वे एक सौ अड़सठ साल
हम भारतीय अक्सर अपनी श्रुति या वाचिक परंपरा पर गर्व करते हैं। कल भी करते थे। शायद आगे भी करते रहेंगे। लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि जब पूर्वजों को अपनी इस भूल का अहसास हुआ तो उन्होंने वाचिक परंपरा त्यागकर हमारे पौराणिक ग्रंथों को लिपिबद्ध करना शुरू किया। इसीलिए चार वेद समेत अनेक बेहद पुराने ग्रन्थ आज भी हमारे सामने हैं। इसके बावजूद अनगिनत अनमोल दस्तावेज़ हमारी वाचिक परंपरा की बलि चढ़ गये। हज़ार-डेढ़ हज़ार साल पहले जो बेजोड़ पुस्तकें लिखी गयीं, वे हमने अपनी लापरवाही या उदासीनता से विलुप्त हो जाने दीं। मसलन कोई नहीं जानता कि राजा भोज का विमान ग्रन्थ कहाँ है और समूचा जल मंगल ग्रन्थ किसके पास है? विमान ग्रन्थ में आधुनिकतम विमान बनाने की तकनीक थी और जल मंगल में पानी से प्रत्येक बीमारी का इलाज बताया गया है।जलमंगल के कुछ अध्याय तो कहीं-कहीं उपलब्ध हैं, लेकिन समूचा ग्रन्थ अनुपलब्ध है। यह आने वाली नस्लों के लिए हमारे पुरखों का एक ऐसा भयानक काम है, जिसे कभी माफ़ नहीं किया जा सकता।
हमारे अधिकांश पूर्वज एक और अक्षम्य कृत्य कर गये। सामंती शासन प्रणाली के कारण उन्होंने चारण परंपरा का निर्वाह करते हुए ऐसे-ऐसे हैरतअंगेज़ ग्रन्थ लिखे, जो अतिरंजना और अतिशयोक्ति की सारी सीमाएँ तोड़ते थे। जैसे आल्हा-ऊदल की वीरता का बखान करने वाली किताबों में लिखा है कि ऊदल में सैकड़ों हाथियों का बल था। दोनों भाइयों के पास उड़ने वाली घोड़ी थी, वग़ैरह-वग़ैरह। पृथ्वीराज रासो में भी कुछ ऐसा ही है। बढ़ा-चढ़ाकर अपने स्वामी की चाटुकारिता बखान करने का दुष्परिणाम यह हुआ कि आज गाँव-गाँव में इन अतिरंजित गाथाओं पर लोग आँख मूंदकर भरोसा करते हैं और अतीत के ऐतिहासिक चरित्रों के गीत गा रहे हैं। हमारी रगों में चारण परंपरा आज भी दौड़ रही है। सदियों तक ग़ुलामी का एक बड़ा कारण यह भी है।
मैं अपने ऐतिहासिक चरित्रों की बहादुरी को कमतर नहीं आँकना चाहता, लेकिन अशुद्ध और बढ़ा-चढ़ाकर विरुदावलि गाने के सख़्त ख़िलाफ़ हूँ। इस प्रवृति का नुक़सान यह हुआ है कि इस कालखंड में प्रामाणिक लेखन अथवा इतिहास का दस्तावेज़ीकरण हाशिये पर चला गया और विकृत इतिहास लेखन से पन्ने के पन्ने भरे हुए हैं। पुरखों के लिखे इन ग्रंथों पर हम आज आँख मूँदकर भरोसा करते हैं। पर, उनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसीलिए आज भी लेखन के नाम पर किये गये अपराध के दुष्परिणाम देखने को मिलते हैं।
इन इतिहासकारों ने अपने लेखन के साथ न्याय नहीं किया। यह अलग चर्चा का विषय हो सकता है। फ़िलहाल मेरा आशय केवल प्रामाणिक लेखन और दस्तावेज़ीकरण से है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किये गये। मौटे तौर पर इतिहासकारों के बाद पत्रकारों की यह ज़िम्मेदारी बनती थी कि वे उन समसामयिक विषयों पर तथ्यात्मक लेखन करें, जिनके वे प्रत्यक्षदर्शी हैं। उनसे आशा की जाती थी कि पत्रकारिता के नज़रिये से उन दिनों की अतीत गाथा पन्नों पर उतारें, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए उपयोगी हो सके। गुज़िश्ता अठहत्तर साल में ऐसा कोई ठोस प्रयास हमें नहीं दिखायी देता। हालाँकि कुछ एक अपवाद भी हैं। अलबत्ता एक नायाब नमूना हमें इस बरस ज़रूर देखने को मिला है। यह अँधेरे बंद कमरे में एक रौशनदान जैसा है।
अत्यंत गंभीर और वरिष्ठतम संपादक विजयदत्त श्रीधर ने 168 साल की पत्रकारिता को एक गागर में भरकर अनगिनत नस्लों पर उपकार का क़र्ज़ लाद दिया है। इस चुनौती भरे काम में उनकी उमर के तीन दशक से भी अधिक लग गये। श्रीधरजी का पहला शाहकार माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय के रूप में हमारे सामने है। यह संभवतः विश्व का अकेला संस्थान है, जहाँ सदियों का अतीत करोड़ों पन्नों में सुरक्षित है। उनके इस काम के चलते उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया है। इसके बाद तीन खण्डों में समग्र भारतीय पत्रकारिता की रचना करके श्रीधरजी ने हमें नायाब धरोहर सौंपी है।

पहले भाग का आग़ाज़ 1780 से होता है और एक सदी यानी 1880 तक चलता है। दूसरा हिस्सा 1881 से 1920 तक की पत्रकारिता समेटे हुए है। श्रीधर जी ने इसे तिलक युग का नाम दिया है। तीसरे खंड का सफ़र 1921 से शुरू होकर 1948 पर आकर रुकता है। यह संसार के सबसे बड़े पत्रकार गांधी जी के नाम से समर्पित है। क्या हमारी मौजूदा नस्लें महात्मा गांधी और तिलक महाराज की पत्रकारिता से वाक़िफ़ हैं? बड़े-बड़े पत्रकारिता विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भी इन महापुरुषों की पत्रकारिता शुमार नहीं है। क्या लोग जानते हैं कि 1857 के नाकाम ग़दर के बाद पहले संपादक मौलाना बाक़र अली और दूसरे क्रांतिकारी पत्रकार बेदार बख़्त को अँग्रेज़ों ने निर्भीक लेखन और अभिव्यक्ति के लिए सूली पर चढ़ा दिया था। कितने विद्वान इन तथ्यों से वाक़िफ़ हैं? शायद एक फ़ीसदी भी नहीं। ऐसे उनचास अध्यायों में शामिल अद्भुत जानकारियों से यह ग्रन्थ अटा पड़ा है।
ग्रंथ का पहला खंड
इस बेमिसाल शोध पर सिलसिलेवार बात करना बेहतर होगा। पहले भाग से शुरूआत करते हैं। अपने निवेदन में श्रीधरजी विनम्रता से मानते हैं कि वे ऐसा कोई दावा नहीं कर रहे हैं कि सब कुछ इस ग्रन्थ में संजो लिया गया है। वे कहते हैं कि नये तथ्यों की खोज, उनमें संशोधन और उन्हें तराशने की प्रक्रिया निरंतर जारी रहने वाली है। यह हमें आश्वस्त करती है कि 168 साल की यात्रा कथा का यह विराम नहीं है। वे लिखते हैं:
यह भारत का सबसे उथल-पुथल भरा कालखंड है। उन दिनों यह महादेश एक साथ कई मोर्चों पर जूझ रहा था। सम्पूर्ण आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहा था… इस महासंग्राम में क़लम के सिपाहियों ने कंधे से कंधा मिलाकर भागीदारी की। संपादकों और समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने इसके लिए भारी क़ीमत चुकायी। उन पर छापे पड़े, जुर्माने भरे, जेल गये, गोली खायी और फाँसी चढ़ गये। जोश और जूनून की इस बलिपंथी पत्रकारिता को मिशन कहा गया।
समग्र भारतीय पत्रकारिता के पहले भाग में पंद्रह अध्याय हैं। इनमें मुल्क में पत्रकारिता की शुरूआत से लेकर भाषाई रूपों में इसके विकास का विवरण है। संभवतः यही इस शोधपरक दस्तावेज़ को सबसे अलग और विशिष्ट बनाती है। अभी तक हिंदी के साथ-साथ सभी भारतीय भाषाओँ की पत्रकारिता और स्वाधीनता आंदोलन में उनके योगदान को सामने लाने वाला कोई अन्य दस्तावेज़ मेरी नज़र से नहीं गुज़रा। लेकिन इस शोध में आप तमिल, बांग्ला, उड़िया, कन्नड़, तेलुगु, उर्दू, गुजराती, मराठी, मलयालम, असमिया और हिंदी के पत्र-पत्रिकाओं का समावेश देखेंगे। उनसे पता चलता है कि कमोबेश पूरे हिन्दुस्तान में बरतानवी हुक़ूमत के विरुद्ध आक्रोश पनपना शुरू हो गया था। गोरों की तानाशाही से मोर्चा लेती हुई पत्रकारिता का लोकतान्त्रिक स्वरूप भी इन्हीं दिनों उभरकर आया था, जो आज विलुप्त है। यह संपादक के नाम पत्र स्तंभ के बारे में है। श्रीधरजी लिखते हैं:
संपादक के नाम पत्र स्तंभ का जनक हिकी का बंगाल गज़ट था। इससे ज्ञात होता है यह पत्र जनता की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का पक्षधर था। जन भावनाओं को उजागर करके समस्याओं और सोच को प्रमुखता से उठाता था। इसके पच्चीस मार्च 1780 के अंक में फिलन थ्रोप्स का संपादक के नाम पत्र छपा था। इस पत्र में कोलकाता के श्मशान घाट पर गंदगी की शिकायत थी।
आज के हिंदुस्तान में यह स्तंभ अख़बारों के पन्नों से नदारद है। लेकिन, प्रसंग के तौर पर बता दूँ कि भारत के महान संपादक राजेंद्र माथुर ने पहले नई दुनिया और फिर नवभारत टाइम्स का प्रधान संपादक रहते हुए संपादक के नाम पत्र को एक आंदोलन बना दिया था। वे प्रतिदिन सैकड़ों पत्र ख़ुद पढ़ते थे। उनके नई दुनिया कार्यकाल में तो गाँव-गाँव में पत्र लेखक मंच बन गये थे। इन मंचों ने लोगों की सोच को मुखरित किया था और उनकी भाषा को संस्कार दिये थे।
पढ़कर आश्चर्य होता है कि 1822 में उर्दू साप्ताहिक जाम-ए-जहाँनुमा से गोरी हुकूमत घबरा उठी थी। कोलकाता के मुख्य सचिव विलियम ब्रूथ बैले ने एक फ़ाइल में लिखा कि यह समाचार पत्र भविष्य में अँग्रेज़ सत्ता के ख़िलाफ़ आग लगाने वालों का नेतृत्व कर सकता है। यह भी आज के पत्रकारों को शायद नहीं पता होगा कि मुंबई समाचार एक ऐसा अख़बार है, जो बीते दो सौ चार साल से नियमित प्रकाशित हो रहा है।
यह भी एक दिलचस्प तथ्य होगा कि इस बरस 30 मई को उदन्त मार्तण्ड को 200 साल हो जाएँगे। इस कड़ी में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के जन्म की दास्तान यक़ीनन दिलचस्प है। यह तो लोगों की जानकारी में है कि इस समाचारपत्र की शुरूआत 1861 में गोरी सत्ता के दरम्यान हुई थी। लेकिन कितने लोग यह जानते होंगे कि एक अँग्रेज़ रॉबर्ट नाईट ने बॉम्बे टाइम्स, बॉम्बे स्टैंडर्ड और बॉम्बे टेलीग्राफ़ समाचारपत्रों का विलय करके टाइम्स ऑफ़ इंडिया प्रारंभ किया था।
यह खंड एक तथ्य और उद्घाटित करता है। ब्रिटिश राज की तमाम साज़िशों के बावजूद हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच कोई कड़वाहट नहीं थी। मदरसों की ओर से संचालित समाचारपत्रों के संपादक हिन्दू होते थे और हिंदूवादी संस्थाओं में मुस्लिम संपादक काम करते थे। यहाँ तक कि कई गोरों ने जो अख़बार निकाले, उनमें भी मुस्लिम और हिन्दू संपादक होते थे। सांप्रदायिक सद्भाव का ऐसा उदाहरण आज नहीं दिखायी देता।
जब साक्षरता का प्रतिशत पाँच या छह फ़ीसदी था, तो हमारे दिल और दिमाग़ बड़े और उदार थे। मगर, आज अस्सी प्रतिशत साक्षर होने के बाद भी हमारे मष्तिष्क संकुचित और संकीर्ण हो गये हैं। पाठकों को भरोसा नहीं होगा लेकिन मुझे याद है राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का यह नाम मदरसे के मौलवी ने दिया था। इस नामकरण के नेंग स्वरूप वस्त्र और सोने-चांदी के सिक्के बैलगाड़ी में भरकर उनके पिता सेठ रामचरण कनकने मौलवी जी के पास ले गये तो दिन भर बहस के बाद भी मौलवी जी ने एक पैसा नहीं लिया था। राष्ट्रकवि का मूल नाम उनके जन्म के समय एक पंडित जी ने रखा था, जिसमें लगभग पचास अक्षर थे। ऐसे नाम को कौन स्वीकार करता?
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
