meena kumari, मीना कुमारी, शायरी, shayari, meena kumari ki shayri
विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....

मीना कुमारी की शायरी: ख़ामोशी व ठहराव

             सिनेमा के सुनहरे पर्दे पर जब-जब ट्रेजेडी और अभिनय की संजीदगी की बात होगी, तब-तब एक नाम सबसे पहले याद आएगा..मीना कुमारी। लेकिन चमकते हुए रुपहले पर्दे की चकाचौंध के पीछे उनमें एक ऐसी स्त्री भी थी, जो अपनी तनहाइयों को कोरे कागज़ों पर उकेरती थी। हम उन्हें पर्दे पर ‘साहिब बीवी और ग़ुलाम’ की छोटी बहू के रूप में देखते रहे, पर असल में वे शब्दों की एक ऐसी शिल्पी थीं, जिन्होंने अपनी सिसकियों को शायरी का जामा पहनाया। वे अपनी शायरी में ‘नाज़’ उपनाम का प्रयोग करती थीं, जो उनके व्यक्तित्व के उस हिस्से को दर्शाता है जो बेहद कोमल, स्वाभिमानी और बेहद अकेला था।

मीना कुमारी की शायरी किसी पेशेवर शायर की कलम नहीं है, बल्कि यह एक थकी हुई रूह की अपने आप से बातचीत है।

उनके लेखन में एक अजीब-सी ख़ामोशी और ठहराव है। वे जब लिखती हैं, तो ऐसा लगता है मानो वे अपने भीतर के उस शून्य को भरने की कोशिश कर रही हैं, जिसे दुनिया की भीड़ कभी समझ ही नहीं पायी। उनके जीवन में शोहरत तो बेहिसाब थी, पर सुकून की हमेशा कमी रही। अपनी इसी मनोदशा को उन्होंने बहुत ही सादगी और प्रवाह के साथ अपनी ग़ज़लों में पिरोया है।

meena kumari, मीना कुमारी, शायरी, shayari, meena kumari ki shayri

उनकी एक मशहूर नज़्म की कुछ पंक्तियाँ उनके जीवन के दर्शन को बख़ूबी बयान करती हैं:

चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा
दिल मिला है कहाँ‑कहाँ तन्हा
बुझ गयी आस छुप गया तारा
थरथराता रहा धुआँ तन्हा
ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हा है और जाँ तन्हा
हमसफ़र कोई गर मिले भी कहीं
दोनों चलते रहे यहाँ तन्हा
जलती‑बुझती‑सी रौशनी के परे
सिमटा‑सिमटा‑सा इक मकाँ तन्हा
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएँगे ये जहाँ तन्हा

मीना कुमारी की नज़्मों में एक तरफ प्रेम की असीम गहराई है, वहीं दूसरी ओर विश्वासघात की वह टीस भी है, जिसने उन्हें ताउम्र बेचैन रखा।

मीना जी के काव्य में भावनात्मक सूक्ष्मता नजर आती है। उनकी शायरी में बनावट नहीं है, बल्कि एक भोगा हुआ प्रवाह है, जो पाठक को सीधे उनके ड्रॉइंग रूम तक ले जाता है, जहाँ किताबों के ढेर लगे हैं और अगरबत्ती की ख़ुशबू के बीच एक अदाकारा रात भर जागकर अपनी डायरी लिख रही है।

वे लिखती हैं “आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता, जब मेरी कहानी में तेरा नाम नहीं होता”। यह शेर महज़ तुकबंदी नहीं है, बल्कि उस अधूरी मोहब्बत का इक़रार है जिसने उन्हें कभी पूरा होने ही नहीं दिया।

अक्सर लोग पूछते हैं इतनी ख़ूबसूरत और सफल अभिनेत्री के भीतर इतना दुख कहाँ से आया? उनकी शायरी इसका जवाब देती है। उन्होंने बचपन से ही अभाव देखे थे और जब सफलता आयी, तो उसने उन्हें अकेला कर दिया। उनकी कविताओं में ‘मृत्यु’ का बोध भी बहुत गहरा है। वे जानती थीं वे वक़्त से पहले विदा हो जाएंगी। एक जगह लिखती हैं:

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली

जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज़ सुनी
जैसे कोई कहता हो ले फिर तुझको मात मिली

जीवन की इस कड़वी हक़ीक़त को इतने सरल शब्दों में कह देना ही उनकी अभिव्यक्ति की महानता थी। वे शब्दों से चित्र बनाना जानती थीं। उनके लिए शायरी केवल शौक़ नहीं था, बल्कि एक ‘कैथार्सिस’ था, अपने दर्द को बाहर निकालने का एक ज़रिया था।

मशहूर शायर गुलज़ार साहब, जिन्होंने उनकी मृत्यु के बाद उनकी ग़ज़लों और नज़्मों को सहेजकर प्रकाशित करवाया, कहते थे मीना कुमारी का लेखन उनके अभिनय से भी ज़्यादा सच्चा था। कैमरे के सामने तो उन्हें निर्देशक की बात माननी पड़ती थी, पर कलम उनके अपने वजूद की रक़ीब थी।

उनकी कविताओं में शब्दों का चयन बहुत ही सहज और हिन्दुस्तानी मिज़ाज का है। वे भारी-भरकम फारसी शब्दों के पीछे नहीं भागतीं, बल्कि दिल की बात उसी भाषा में कहती हैं जिसमें आदमी रोता या मुस्कुराता है। उनकी शायरी पढ़ते हुए महसूस होता है कि वे समाज की बंदिशों और एक औरत की मजबूरियों के बीच छटपटाती हुई एक आज़ाद रूह थीं।

एक कलाकार के रूप में मीना कुमारी ने जो ऊँचाइयां छुईं, उसे इतिहास याद रखेगा, लेकिन एक कवयित्री के रूप में उन्होंने जो विरासत छोड़ी है, वह दिलवालों की धरोहर है। उनकी शायरी हमें सिखाती है दर्द को नफ़रत में बदलने के बजाय उसे कला में कैसे ढाला जाता है। आज भी जब हम उनकी आवाज़ में उनकी शायरी को सुनते हैं, तो ऐसा लगता है मानो वे कहीं क़रीब बैठकर अपनी कहानी सुना रही हैं।

मीना कुमारी यानी ‘नाज़’ आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी शायरी का वह ‘तन्हा चाँद’ आज भी साहित्यानुरागियों के आसमान में चमक रहा है। उनका यह साहित्यिक पक्ष उनके अभिनय से भी ज़्यादा स्थायी और जीवंत है, क्योंकि इसमें वह मीना कुमारी बोलती है, जिसे दुनिया ने कभी पर्दे पर नहीं देखा, सिर्फ़ महसूस किया।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!