December 15, 2025 आब-ओ-हवा उर्दू के शाहकार कुरान के बाद सबसे ज़्यादा छपने वाली किताब पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से…. मुसद्दस हाली – अल्ताफ़ हुसैन “हाली” किताब “मुसद्दस हाली” पहली बार 1879 में पब्लिश हुई थी। इसमें... Continue Reading
December 15, 2025 आब-ओ-हवा गूंजती आवाज़ें जुड़ती कड़ी, सिमटता हिसार और अकबर इलाहाबादी पाक्षिक ब्लॉग सलीम सरमद की कलम से…. जुड़ती कड़ी, सिमटता हिसार और अकबर इलाहाबादी शेर का मा’नी वक़्त और हालात के साथ... Continue Reading
November 30, 2025 आब-ओ-हवा ग़ज़ल: लौ और धुआं लकदक बाज़ार में गुमसुम किरदार पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से…. लकदक बाज़ार में गुमसुम किरदार फ़िक्रो-फ़न के ऐतबार से शाइरी ने नये मौज़ूआत को हर वक़्त... Continue Reading
November 30, 2025 आब-ओ-हवा गूंजती आवाज़ें जंगल की रात और तख़लीक़ पाक्षिक ब्लॉग सलीम सरमद (03.12.1982) की कलम से…. जंगल की रात और तख़लीक़ पचमढ़ी की सिम्त पिपरिया नगर के आख़िरी छोर पर चूहे के... Continue Reading
November 12, 2025 आब-ओ-हवा आलेख उर्दू शायरी में भारतीयता – भाग दो 9 नवंबर को विश्व उर्दू दिवस मनाया गया। यह लंबा लेख आब-ओ-हवा के पाठकों के लिए ख़ास तौर से। यह चर्चित लेख लेखक ने उपलब्ध करवाया है, जो 2009... Continue Reading
November 12, 2025 आब-ओ-हवा आलेख उर्दू शायरी में भारतीयता – भाग एक 9 नवंबर को विश्व उर्दू दिवस मनाया गया। यह लंबा लेख आब-ओ-हवा के पाठकों के लिए ख़ास तौर से। यह चर्चित लेख लेखक ने उपलब्ध करवाया है, जो 2009... Continue Reading
October 15, 2025 आब-ओ-हवा काव्य हिन्दी-उर्दू शायरी में ‘चराग़’ शम्अ, दीया और दीपक शब्द भी शायरी में बख़ूबी बरते जाते रहे हैं लेकिन हमने इस दीवाली के मौक़े पर चुना है लफ़्ज़ ‘चराग़’ या चिराग़। इस लफ़्ज़ को... Continue Reading
September 10, 2025 आब-ओ-हवा काव्य हिन्दी-उर्दू शायरी में ‘आबो-हवा’ ‘आबो-हवा’ का सीधा मतलब जलवायु है और शायरी में यह बाहर और भीतर की कैफ़ियत के हवाले से दर्ज होता रहा है। कहीं-कहीं तो यह प्रतीक भी बन जाता... Continue Reading
August 30, 2025 आब-ओ-हवा ग़ज़ल: लौ और धुआं नयी शायरी : तकनीक के ज़ाविये में ढलने का हुनर पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से…. नयी शायरी : तकनीक के ज़ाविये में ढलने का हुनर शाइरी के अपने तकाज़े रहे हैं। अपने... Continue Reading
August 28, 2025 आब-ओ-हवा काव्य शायरी में बारिश-बादल-बरसात ‘मान’ सहज व रोचक अंदाज़ में उस परिदृश्य को सामने लाती है, जो इस शती के पूर्वार्द्ध तक के समाज की तस्वीर रहा है। अंत में कहानी के पारंपरिक... Continue Reading