October 26, 2025 आब-ओ-हवा इत्यादि बृज की एयरलाइंस हास्य डॉ. मुकेश असीमित की कलम से…. बृज की एयरलाइंस अभी कुछ दिन पहले हमारे देश के ख्यातिप्राप्त हास्य-व्यंग्यकार कवि डॉ. अशोक चक्रधर जी... Continue Reading
October 15, 2025 आब-ओ-हवा व्यंग्य: पक्का चिट्ठा व्यंग्य शीर्षक: ऐसा हो, ऐसा-वैसा नहीं नियमित ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से…. व्यंग्य शीर्षक: ऐसा हो, ऐसा-वैसा नहीं बात उस समय की है, जब कोरोना के कारण... Continue Reading
October 7, 2025 आब-ओ-हवा इत्यादि पर्दा है पर्दा व्यंग्य मुकेश असीमित की कलम से…. पर्दा है पर्दा राजा विशेष आरामगाह में आराम फ़रमा रहा था। विशेष इसलिए कि वह पहली... Continue Reading
September 30, 2025 आब-ओ-हवा व्यंग्य: पक्का चिट्ठा व्यंग्य में फैंटेसी- प्रभावकारी व्यंजना नियमित ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से…. व्यंग्य में फैंटेसी- प्रभावकारी व्यंजना फैंटेसी-साहित्य एक सशक्त और बहुआयामी विधा है, जिसमें... Continue Reading
September 26, 2025 आब-ओ-हवा इत्यादि रंग ललित व्यंग्य पंकज निनाद की कलम से…. रंग पूत के पाँव पालने में दिखने लगे थे। वह अपने पिता पर ही गया... Continue Reading
September 6, 2025 आब-ओ-हवा इत्यादि साहब की डिग्री और नैतिकता की दुहाई हास्य-व्यंग्य आदित्य की कलम से…. साहब की डिग्री और नैतिकता की दुहाई मेरा मानना है देश के युवा साहब की डिग्री इसलिए देखना... Continue Reading
August 30, 2025 आब-ओ-हवा व्यंग्य: पक्का चिट्ठा 21वीं सदी में व्यंग्य: अभिव्यक्ति के नये उपकरण तलाशना ज़रूरी पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से…. 21वीं सदी में व्यंग्य: अभिव्यक्ति के नये उपकरण तलाशना ज़रूरी 21वीं सदी व्यंग्य के लिए... Continue Reading
August 26, 2025 आब-ओ-हवा इत्यादि एक राष्ट्र एक चुनाव – बेरोज़गारी के बढ़ते भाव हास्य-व्यंग्य डॉ. मुकेश असीमित की कलम से…. एक राष्ट्र, एक चुनाव – बेरोज़गारी के बढ़ते भाव देश में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का पुछल्ला... Continue Reading
August 14, 2025 आब-ओ-हवा व्यंग्य: पक्का चिट्ठा भारतीय व्यंग्य इतिहास का प्रस्थान बिंदु “शिवशंभू के चिट्ठे” अरुण अर्णव खरे की कलम से…. भारतीय व्यंग्य इतिहास का प्रस्थान बिंदु “शिवशंभू के चिट्ठे” व्यंग्य का मूल स्वभाव विरोध है, यह सत्ता के... Continue Reading
August 10, 2025 आब-ओ-हवा आलेख व्यंग्य की लोकधर्मी परंपरा: भारतेंदु से वर्तमान तक ‘मान’ सहज व रोचक अंदाज़ में उस परिदृश्य को सामने लाती है, जो इस शती के पूर्वार्द्ध तक के समाज की तस्वीर रहा है। अंत में कहानी के पारंपरिक... Continue Reading