khumar, khumar barabankvi
पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....

वक़्त के ज़ख़्म और ग़ज़ल का दामन

              निहायत सादगीपसंद और दिलचस्प गुफ़्तगू करने वाले ख़ुमार बाराबंकवी साहब का मैं इंटरव्यू ले रहा था। बात वक़्त की तल्ख़ियों की निकली तो हर एक से झुक के मिलने वाले ख़ुमार साहब बेहद संजीदगी से कहने लगे, ‘ग़ज़ल ने वक़्त का दामन कभी नहीं छोड़ा इसलिए मैं भी ग़ज़ल का दामन छोड़ने का कभी सोच नहीं सकता। ये तल्ख़ियां तो हर दौर में बनी रही हैं और रहेंगी लेकिन एक शाइर को कभी वक़्त से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए।’ इतना कहते हुए उन्होंने बेहद लोकप्रिय ग़ज़ल के चार मिसरे कह डाले-

न हारा है इश्क और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है हवा चल रही है
चरागों के बदले मकां जल रहे हैं
नया है ज़माना नयी रोशनी है

इन दिनों आंखों से रोशनी छीनते उजालों पर ग़ौर किया तो ख़ुमार साहब की बात याद आयी। ग़ज़ल ने हमेशा मुखरता से अपनी बात कही है। यह अलग बात है कि ज़माने को यह बात कड़वी लगी मगर ग़ज़ल ने वक़्त की अक्कासी बहुत ज़िम्मेदारी से की। बशीर बद्र साहब ने कहा-

मैं बोलता हूँ तो इल्ज़ाम है बग़ावत का
मैं चुप रहूँ तो बड़ी बेबसी-सी होती है

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इस बेबसी ने मौन को मुखर में तब्दील किया। हर ख़ामोशी को तोड़ा। बदलते मौसम में आम आदमी को सहलाने का काम भी किया। वक़्त ने तो ज़ख़्म पहुंचाने में कोई कमी नहीं छोड़ी। अभिषेक सिंह ने इसी दर्द को दो मिसरों में ख़ूबसूरती से बांधा है-

सांस लेने की नयी शर्तें हैं लागू अब यहां
धड़कनें भी लिंक होगी आपके आधार से

हमारी ख़्वाहिशों पर कई नज़रें जमी हैं। होठों पर ताले लगाये जा रहे हैं। पैरों में बेड़ियां डाली जा रही हैं। आम आदमी का आधार छीना जा रहा है। शाइरी की नज़र से यह सब गुज़र रहा है। शाइरी इनसे कभी जुदा हो ही नहीं सकती है। शाइरी अपनी ज़िम्मेदारी बख़ूबी समझती है। वक़्त-बेवक़्त उसने उन मसअलों को उठाया है जिनका उठाना लाज़िमी था। उन समकालीन सरोकारों से शाइरी जुड़ी रही जो एक इंसान की ज़िन्दगी को प्रभावित करते हैं।

शाइरी का यह अंदाज़ लोगों को भी पसंद आता है। शायद यही कारण है कि शाइरी के क़रीब जाकर आम इंसान सुकून पाता है। उसे दो मिसरे अपनी ज़िन्दगी के क़रीब महसूस होते हैं। शाइरी की ताक़त उसके चाहने वालों से ही है। यह निरंतर बढ़ रही है। शाइरी के दामन को चाहने वालों ने भी थाम रखी है। ऐसे में उजालों को क़ैद करने वाले इस बात से अनजान तो बेशक नहीं लेकिन वे इंसान को लफ़्ज़ों से दूर करने की कोशिश में लगे हैं। शायद उन्हें इस बात का एहसास नहीं कि लफ़्ज़ों के क़रीब जाकर इंसान हर दौर में मज़बूत होता रहा है। वक़्त को अपनी मुट्ठी में क़ैद करने की चाहत रखने वालों का वक़्त बदलते देर नहीं लगती लेकिन शाइरी की ताक़त वक़्त के साथ और बुलंद होती जाती है।
अहमद फ़राज़ कहते भी हैं-

मैं आज ज़द पे अगर हूँ तो ख़ुश-गुमान न हो
चराग़ सब के बुझेंगे हवा किसी की नहीं

बदलती हवा हमसे बहुत कुछ छीन रही है। हमारे चराग़ टिमटिमाते हुए भी हवाओं का मुक़ाबला कर रहे हैं। ग़ज़ल ने इन टिमटिमाते चराग़ों का दामन थाम रखा है। ये रोशनी ही कल की उम्मीद है। आइए, इस रोशनी के दामन को हम भी थाम लें।

आशीष दशोत्तर

आशीष दशोत्तर

ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।

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