nirala, निराला, वीणावादिनी, veenavadini, suryakant tripathi nirala

निराला और वीणावादिनी

महाप्राण निराला के काव्य में ​वीणावादिनी की गूंज, आभा और उपस्थिति अपरम्पार दिखती है। वह भारती वंदना करते हैं तो उसका स्वरूप भी वीणावादिनी का है, वह मां की आराधना करते हैं तब भी और वह प्रिय स्मृतियों में भी इसी रूप के मोह से बिंधे दिखते हैं। वसंत पंचमी के अवसर पर छायावाद के एक स्तंभ सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के काव्य से ऐसी रचनाएं, जिनमें प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से वीणावादिनी का स्वर/रूप/गन्ध/वर्ण है। और कवि का एक उद्बोधन भी…

nirala, निराला, वीणावादिनी, veenavadini, suryakant tripathi nirala

1. क्या गाऊँ

क्या गाऊँ? माँ! क्या गाऊँ?

गूँज रहीं हैं जहाँ राग-रागिनियाँ,
गाती हैं किन्नरियाँ कितनी परियाँ
कितनी पंचदशी कामिनियाँ,

वहाँ एक यह लेकर वीणा दीन
तन्त्री-क्षीण, नहीं जिसमें कोई झंकार नवीन,
रुद्ध कण्ठ का राग अधूरा कैसे तुझे सुनाऊँ? —

माँ! क्या गाऊँ?

छाया है मन्दिर में तेरे यह कितना अनुराग!
चढते हैं चरणों पर कितने फूल
मृदु-दल, सरस-पराग;

गन्ध-मोद-मद पीकर मन्द समीर
शिथिल चरण जब कभी बढ़ाती आती,
सजे हुए बजते उसके अधीर नूपुर-मंजीर!

वहाँ एक निर्गन्ध कुसुम उपहार,
नहीं कहीं जिसमें पराग-संचार सुरभि-संसार
कैसे भला चढ़ाऊँ?–

माँ? क्या गाऊँ?

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2. वीणावादिनी

तव भक्त भ्रमरों को हृदय में लिये वह शतदल विमल
आनन्द-पुलकित लोटता नव चूम कोमल चरणतल।

बह रही है सरस तान-तरंगिनी,
बज रही है वीणा तुम्हारी संगिनी,
अयि मधुरवादिनि, सदा तुम रागिनी-अनुरागिनी,

भर अमृत-धारा आज कर दो प्रेम-विह्वल हृदयदल,
आनन्द-पुलकित हों सकल तव चूम कोमल चरणतल!

स्वर हिलोरें ले रहा आकाश में,
काँपती है वायु स्वर-उच्छ्वास में,
ताल-मात्राएँ दिखातीं भंग, नव रति रंग भी

मूर्च्छित हुए-से मूर्च्छना करती उठाकर प्रेम-छल,
आनन्द-पुलकित हों सकल तव चूम कोमल चरणतल!

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3. वर दे

वर दे, वीणावादिनि वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे!

काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे!

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर नव स्वर दे!

वर दे, वीणावादिनि वर दे।

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4. धन्य कर दे माँ

धन्य कर दे माँ, वन्य प्रसून;
दिखा जग ज्योतिर्मय, मुख चूम।

दलों के दृग कलिका के बन्द,
भर गयी पर उर में मृदु गन्ध,
कृपामयि, मलय बहा दे मन्द,
वन्दना करे छन्द में झूम।

तारकोज्ज्वल हीरक-हिम-हार
गगन से पहना दे कर प्यार,
सजा दे, प्रिय-पथ पर प्रतिवार
लजाती रहे स्नेह-दल तूम।

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5. तुम्हीं गाती हो

तुम्हीं गाती हो अपना गान;
व्यर्थ मैं पाता हूँ सम्मान।

मेरा पतझड़-हरा हृदय हर
पत्रों के मर्मर के सुखकर तुम्हीं
सुनाती हो नूतन स्वर
भर देती हो प्राण।

मेरा दुख अरण्य, किसलय-दल
ज्वाल, जली काली तुम कोयल,
दैन्य-डाल पर बैठी प्रतिपल
सुना रही हो तान।

भ्रम गोधूलि, धूसरित नभ-तन,
तुम शशि, कला-किरण-दृग-चुम्बन;
ज्ञान-तन्तु तुम, जग-अजान-मन-
शव-शिव-शक्ति महान।

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6. रहा तेरा ध्यान

रहा तेरा ध्यान,
जग का गया सब अज्ञान।

गगन घन-विटपी, सुमन नक्षत्र-ग्रह, नव-ज्ञान
बीच में तू हँस रही ज्योत्स्ना-वसन परिधान।

देखने को तुझे बढ़ता विश्व पुलकित-प्राण,
सकल चिन्ता-दुरित-दुख-अभिमान करता दान।

वहाँ प्राणों के निकट परिचय, प्रथम आदान,
प्रथम मधु-संचय, नवल-वयसिके, नव सम्मान।

मौन इंगित से तरंगित, तरुणि, नव-युग यान,
अरणियों की अग्नि, तू दिक्-दृगों की पहचान।

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7. उद्बोधन

गरज-गरज घन अंधकार में गा अपने संगीत,
बन्धु, वे बाधा-बन्ध-विहीन,
आखों में नव जीवन की तू अंजन लगा पुनीत,
बिखर झर जाने दे प्राचीन।

बार-बार उर की वीणा में कर निष्ठुर झंकार
उठा तू भैरव निर्जर राग,
बहा उसी स्वर में सदियों का दारुण हाहाकार
संचरित कर नूतन अनुराग।

बहता अन्ध प्रभंजन ज्यों, यह त्यों ही स्वर-प्रवाह
मचल कर दे चंचल आकाश,
उड़ा-उड़ा कर पीले पल्लव, करे सुकोमल राह–
तरुण तरु; भर प्रसून की प्यास।

काँपे पुनर्वार पृथ्वी शाखा-कर-परिणय-माल,
सुगन्धित हो रे फिर आकाश,
पुनर्वार गायें नूतन स्वर, नव कर से दे ताल,
चतुर्दिक छा जाये विश्वास।

मन्द्र उठा तू बन्द-बन्द पर जलने वाली तान,
विश्व की नश्वरता कर नष्ट,
जीर्ण-शीर्ण जो, दीर्ण धरा में प्राप्त करे अवसान,
रहे अवशिष्ट सत्य जो स्पष्ट।

ताल-ताल से रे सदियों के जकड़े हृदय कपाट,
खोल दे कर, कर-कठिन प्रहार,
आये अभ्यन्तर संयत चरणों से नव्य विराट,
करे दर्शन, पाये आभार।

छोड़, छोड़ दे शंकाएँ, रे निर्झर-गर्जित वीर!
उठा केवल निर्मल निर्घोष;
देख सामने, बना अचल उपलों को उत्पल, धीर!
प्राप्त कर फिर नीरव संतोष!

भर उद्दाम वेग से बाधाहर तू कर्कश प्राण,
दूर कर दे दुर्बल विश्वास,
किरणों की गति से आ, आ तू, गा तू गौरव-गान,
एक कर दे पृथ्वी आकाश।

(कविताएं निराला के काव्य संग्रहों ‘अनामिका’ एवं ‘अपरा’ में संग्रहीत)

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