
गूंज बाक़ी… दुनिया के हालात के मद्देनज़र कैसे कोई कविता प्रासंगिक हो जाती है! गोपालदास नीरज की एक कविता जैसे फिर ज़िंदा हो गयी है। दशकों पहले कविता पढ़ते हुए नीरज की इन पंक्तियों में हालात हैं, बिम्ब हैं, कई प्रश्न हैं, यादें हैं और भविष्य की चिंता के साथ एक कविहृदय संदेश भी… ‘गूंज बाक़ी’ में इस बार इस धरोहर कविता के पूरे पाठ के साथ जुड़िए —
अगर तीसरा युद्ध हुआ तो? …नीरज की यादगार कविता
मैं सोच रहा हूँ अगर तीसरा युद्ध हुआ
इस नयी सुबह की नयी फसल का क्या होगा?
मैं सोच रहा हूँ अगर ज़मीं पर उगा ख़ून
इस रंगमहल की चहल पहल का क्या होगा?
ये हंँसते हुए गुलाब, महकते हुए चमन
जादू बिखराती हुई रूप की ये कलियाँ
ये मस्त झूमती हुई बालियाँ धानों की
ये शोख़ सजल शरमाती गेहूँ की गलियाँ
गदराते हुए अनारों की ये मंन्द हँसी
ये पैंगें बढ़ा-बढ़ा अमियों का इठलाना
ये नदियों का लहरों के बाल खोल चलना
ये पानी की सितार पर झरनों का गाना
मैनाओं की नटखटी, ढिठाई तोतों की
ये शोर मोर का, भोर भृंग की ये गुनगुन
बिजली की कड़क-तड़क, बदली की चटक-मटक
ये जोत जुगनुओं की, झींगुर की ये झुनझुन
किलकारी भरते हुए दूध-से ये बच्चे
निर्भीक उछलती हुई जवानों की टोली
रति को शरमाती हुई चाँद सी ये शक्लें
संगीत चुराती हुई पायलों की बोली
आल्हा की ये ललकार, थाप ये ढोलक की
सूरा मीरा की सीख, कबीरा की बानी
पनघट पर चपल गगरियों की ये छेड़छाड़
राधा की कान्हा से गुपचुप आना-कानी
क्या इन सब पर ख़ामोशी मौत बिछा देगी?
क्या धुंध धुआँ बनकर सब जग रह जाएगा?
क्या कूकेगी कोयलिया कभी न बगिया में?
क्या पपीहा फिर न पिया को पास बुलाएगा?
मैं सोच रहा युग जो इतिहास लिख रहा है
क्या रक्त घुलेगा उसकी सादी स्याही में?
क्या लाशों के पहाड़ पर सूरज डूबेगा?
क्या चांद सिसकियां लेगा ध्वंस तबाही में?
क्या ख़िज़ां चाट लेगी शबाब इन फूलों का?
क्या धूप अंधेरे की दासी हो जाएगी?
क्या क्रांति पहन लेगी ज़ंजीरें सोने की?
क्या शांति मरघटों में छिपकर सो जाएगी?
क्या पी जाएगा रेगिस्तान नर्मदा को?
क्या गंगा का सैलाब भाप बन जाएगा?
झुक जाएगा क्या शीश हिमालय योगी का?
विंध्याचल में पतझार दोबारा आएगा?
जो अभी-अभी सिंदूर दिये घर आयी है
जिसके हाथों की मेंहदी अब तक गीली है
घूँघट के बाहर आ न सकी है अभी लाज
हल्दी से जिसकी चूनर अब तक पीली है
क्या वो अपनी लाड़ली बहन, साड़ी उतार
जाकर बेचेगी नित चूड़ियाँ बज़ारों में?
जिसकी छाती से फूटा है मातृत्त्व अभी
क्या वो माँ दफ़नाएगी दूध मज़ारों में?
क्या गोली की बौछार मिलेगी सावन को?
क्या डालेगा विनाश झूला अमराई में?
क्या उपवन की डालों में फूलेंगे अँगार?
क्या घृणा बजेगी भौंरों की शहनाई में?
असहाय बुढ़ापा तड़पेगा क्या मरघट में?
बारूद करेगी क्या सिंगार जवानी का?
क्या मानवता पर विजयी दानवता होगी?
क्या होगा अंत पुराना नयी कहानी का?
चाणक्य मार्क्स एंजिल लेनिन गांधी सुभाष
सदियाँ जिनकी आवाज़ों को दुहराती हैं
तुलसी वर्जिल होमर गोर्की शाह मिल्टन
चट्टानें जिनके गीत अभी तक गाती हैं
मैं सोच रहा क्या उनकी कलम न जागेगी?
जब झोपड़ियों में आग लगायी जाएगी
करवटें न बदलेंगीं क्या उनकी क़ब्रें जब
उनकी बेटी भूखी पथ पर सो जाएगी?
जब घायल सीना लिये एशिया तड़पेगा
तब वाल्मीकि का धैर्य न कैसे डोलेगा?
भूखी क़ुरान की आयत जब दम तोड़ेगी
तब क्या न ख़ून फ़िरदौसी का कुछ बोलेगा?
जब सुंदरता की लाश सड़ेगी सड़कों पर
साहित्य पड़ा महलों में कैसे सोएगा!
जब क़ैद तिजोरी में रोटी हो जाएगी
तब क्रांति बीज कैसे न पसीना बोएगा!
ऐसे ही घट छलके ऐसे ही रस ढुलके
ऐसे ही तन डोले ऐसे ही मन डोले
ऐसी ही चितवन हो ऐसी ही चितचोरी
ऐसे ही भौंरा भ्रमे कली घूँघट खोले
ऐसे ही ढोलक बजें, मँजीरे, झंकारें
ऐसे ही हँसे झुनझुनें, बाजें पैजनियाँ
ऐसे ही झुमके झूमें, चूमें गाल बाल
ऐसे ही हों सोहरें, लोरियाँ, रसबतियाँ
ऐसे ही बदली छाये कजली अकुलाये
ऐसे ही बिरहा बोल सुनाये साँवरिया
ऐसे ही होली जले दिवाली मुस्काये
ऐसे ही खिले, फले हरियाये हर बगिया
ऐसे ही चूल्हे जलें राख के, रहें गरम
ऐसे ही भोग लगाते रहें महावीरा
ऐसे ही उबले दाल बटोही उफनाए
ऐसे ही चक्की पर गाये घर की मीरा
बढ़ चुका बहुत आगे रथ अब निर्माणों का
बम्बों के दलबल से अवरुद्ध नहीं होगा
है शान्ति शहीदों का पड़ाव हर मंज़िल पर
अब युद्ध नहीं होगा अब युद्ध नहीं होगा
