
- January 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग सलीम सरमद की कलम से....
दरिया, कुहरा, मौत और नरेश कुमार शाद
पता नहीं मैं अपनी कच्ची उम्र के किस पड़ाव पे था, जब किसी किताब या मैगज़ीन में पढ़ा था कि ‘एक सुब्ह नरेश कुमार शाद दरिया की तरफ़ गए और फिर कभी लौट कर नहीं आये।’ ये चंद अल्फ़ाज़ कंकर की तरह मेरी याददाश्त के तलवों में धंसे रह गये। मैंने कई शायरों को पढ़ा, समझा और प्यार के धागों में गूंथा मगर न जाने क्यों नरेश कुमार शाद का न कोई शे’र याद रहा, न उनका चेहरा… कौन थे नरेश कुमार शाद? किस शहर के निवासी थे और किस दरिया में जाकर डूब गये? नरेश कुमार शाद की मौत का वो मंज़र ही मेरे लिए उनकी पहचान बना रहा.. एक सर्द सुब्ह का घना कुहरा, इस वक़्त सुब्ह का तारा उफ़क़ पर रहना चाहिए था मगर नहीं था, हर सिम्त सिर्फ़ कुहरे की दीवार थी, सूरज का चक्कर भी पूरा नहीं हुआ था, तभी धुंध के पर्दे से बाहर आकर एक शख़्स धीमे क़दमों से आगे बढ़ता है, अपने सीने में कई वर्षों की घुटन समेटे, पूरी रात का जागा हुआ, हाँ वो शायर, जिसका बदन तप रहा है वो दरिया के किनारे पहुँचता है… आहिस्ता-आहिस्ता ठंडे पानी की गहराई में उतरता ही चला जाता है और फिर.. फिर वो नहीं लौटता। दरिया, कुहरा, मौत और नरेश कुमार शाद एक हो जाते हैं।
डूबकर पार उतर गये हैं हम
लोग समझे कि मर गये हैं हम
ऐ ग़मे-दहर तेरा क्या होगा
ये अगर सच है मर गये हैं हम
कोई देखे तो बज़्मे-ज़िंदगी में
उजालों ने अंधेरा कर दिया है
कहाँ हूँ शाद मैं तो शाद-सा हूँ
वो शादे-ख़ुशनवा तो मर चुका है
ज़िंदगी से तो ख़ैर शिकवा क्या
मुद्दतों मौत ने भी तरसाया

मैंने ग़ालिबन उनको कभी पढ़ा ही नहीं था और न उनका चेहरा मेरे ध्यान की अल्बम में शामिल था। ये मंज़र भी मेरे तसव्वुर की हिमाक़त थी, पता नहीं किस किताब के किस वरक़ पर उनकी मौत की सच्ची ख़बर थी लेकिन मैं अब नरेश कुमार शाद को दरिया की लहरों से निकालना चाहता हूँ। मैं उनकी मौत को वक़्त का बेहूदा मज़ाक़ बना देना चाहता हूँ। मेरे पास कुछ सवाल हैं जो मैं नरेश कुमार शाद से पूछना चाहता हूँ। क्या ज़िंदगी की कड़वाहट कम करने के लिए शराब के कड़वे घूँट पीना ज़रूरी है? क्या एक टैलेंटेड आदमी को सुसाइड करना चाहिए? क्या मौत हर मसअले का हल है? अगर मेरी कच्ची उम्र किसी अनजाने दुख से बेज़ार होकर नरेश कुमार शाद के तजर्बे को दुहरा देती तो… लफ़्ज़ों के धनी क्या ग़ैर-ज़िम्मेदार होते हैं?
मयख़्वार शाद भी है बस इतनी-सी बात है
इतनी-सी बात का मगर अफ़साना हो गया
कौन सुलगते आंसू रोके आग के टुकड़े कौन चबाये
ऐ हमको समझाने वाले कोई तुझे क्यूंकर समझाये
हाए मेरी मायूस उम्मीदें वाए मेरे नाकाम इरादे
मरने की तदबीर न सूझी जीने के अंदाज़ न आये
कबीर कहते हैं, पीर मरे पैगम्बर मरि हैं, मरि हैं जिंदा जोगी, साधो ये मुर्दों का गांव… हाँ यहाँ रेला लगा हुआ है, सब मरते जा रहे हैं। आँखों से ओझल हो रहे हैं। मौत आँखों के चारों ओर काले घेरे बना रही है। चेहरा सूखी कड़क मिट्टी-सा, जिसकी नमी काफ़ूर है। अधखुली आँखों से गाढ़ा तरल रिस रहा है। अधखुले मुंह से लार बह गयी है। जैसे इन अधखुले मुंह और आँख से रूह बाहर आने के लिए मौत ने एक रास्ता बनाया है। जिस्म भी ढांचा है, जिसमें पसलियों की गिनती हो सकती है।
फिर इस दुनिया से उम्मीदे-वफ़ा है
तुझे ऐ ज़िंदगी क्या हो गया है
मुतलक़न दिलकशी न थी उसमें
कौन सुनता मेरे फ़साने को
न जाने जाग उठे शाद कब नसीबे-जहाँ
बहुत दिनों से मिज़ाज-ऐ-हयात बरहम है
हमारी कहानियों और पौराणिक कथाओं में भी मौत मुस्कुराती है इसीलिए जिसने मौत पर तमाशे का अंत किया वो हिट हो गया। हीर-राँझा उफनती लहरों में समा जाते हैं। देवदास पारो की चौखट पर अपनी सांसों से मुक्ति पा लेते हैं। कृष्ण पीपल के पेड़ के नीचे आराम करते हैं, तभी कोई बहेलिया उनके तलवे में तीर मार देता है। राम सरयू नदी में अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं। स्वर्ग की ओर प्रस्थान करते हुए पांडव एक के बाद एक अपना दम तोड़ते जाते हैं।
नारवा है किसी की हमरही
राह में जा रहा हूँ तन्हा ही
एक धोका है ये शब रंग सवेरा क्या है
ये उजाला है उजाला तो अंधेरा क्या है
तू मेरे ग़म में न हंसती हुई आँखों को रुला
मैं तो मर के भी जी सकता हूँ मेरा क्या है
जिस नदी का रंग काला है उसे हमने यमुना कहा, यमराज की बहन, मौत का देवता काले रंग का है। काली रात में सोते हुए जिस्म से उजली आत्मा निकालकर ले जाता है। काला रंग मौत की अलामत है लेकिन मेरे शायर ने तो सुब्ह के सफ़ेद कोहरे को अपना कफ़न बना लिया था। नरेश कुमार शाद… शाद यानी मसर्रत, ख़ुशी नरेश कुमार शाद तुम अपनी ज़िंदगी से नाख़ुश क्यों थे?
शाद वही आवारा शायर जिसने तुझसे प्यार किया
शहरों-शहरों घूम रहा है अरमानों की लाश उठाये
ख़ैर मक़दम किया हवादिस ने
ज़िंदगी में जिधर गये हैं हम
मौत को मुंह दिखाएं क्या यारब
ज़िंदगी ही में मर गये हैं हम

सलीम सरमद
1982 में इटावा (उ.प्र.) में जन्मे सलीम सरमद की शिक्षा भोपाल में हुई और भोपाल ही उनकी कर्म-भूमि है। वह साहित्य सृजन के साथ सरकारी शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों को भौतिक विज्ञान पढ़ाते हैं। सलीम अपने लेखन में अक्सर प्रयोगधर्मी हैं, उनके मिज़ाज में एकरंगी नहीं है। 'मिट्टी नम' उनकी चौथी किताब है, जो ग़ज़लों और नज़्मों का संकलन है। इससे पहले सरमद की तीन किताबें 'शहज़ादों का ख़ून' (कथेतर) 'दूसरा कबीर' (गद्य/काव्य) और 'तीसरा किरदार' (उपन्यास) प्रकाशित हो चुकी हैं।
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