मंटो, manto, krishan chander
गूंज बाक़ी... इस लेख के लेखक उर्दू के मशहूर कहानीकार कृश्न चंदर हैं। यह लेख 'मंटो साब दोस्तों की नज़र में' किताब में संकलित है। उर्दू से हिन्दी लिप्यंतरण और सम्पादन ज़ाहिद ख़ान ने किया है। आब-ओ-हवा के लिए विशेष रूप से प्राप्त पुस्तक अंश...

उर्दू अदब में एक ही मंटो है

             मंटो ने ज़िंदगी के निरीक्षण में अपने आप को एक मोमी शमा की तरह पिघलाया है। वो उर्दू अदब का अकेला शंकर है, जिसने ज़िंदगी के ज़हर को ख़ुद घोल के पिया है। और फिर उसके ज़ाइक़े को, उसके रंग को खोल-खोल के बयान किया है। लोग बिदकते हैं, डरते हैं, मगर उसके निरीक्षण क्षमता की वास्तविकता और उसकी धारणा की सच्चाई से इनकार नहीं कर सकते। ज़हर खाने से अगर शंकर का गला नीला हो गया था, तो मंटो ने भी अपनी सेहत गँवा ली है। उसकी ज़िंदगी इंजेक्शन की मोहताज होकर रह गयी है। ज़हर मंटो ही पी सकता था। और कोई दूसरा होता, तो उसका दिमाग़ चल जाता। मगर मंटो के दिमाग़ ने ज़हर को भी हज़म कर लिया है। उन दरवेशों की तरह, पहले गांजे से शुरू करते हैं और आख़िर में सँखिया खाने लगते हैं और साँपों से अपनी ज़ुबान डसवाने लगते हैं। मंटो के अदब की तेज़ी और उग्रता और उसकी जु़बान की निश्तर-ज़नी (शल्य चिकित्सा का काम) इस बात को अभिव्यक्त करती है कि मंटो की दरवेशी आख़िरी मंज़िल पर पहुँच चुकी है।

मंटो से मिलने से पहले मैंने मंटो के अफ़साने पढ़े थे। हफ़्तावार ‘मुसव्विर’ में मंटो के अफ़साने शाए होते थे। ये अफ़साने इतने नुकीले थे, इतने अजीब-ओ-ग़रीब अल्फ़ाज़ में लिखे गये थे। इस क़दर टेढ़े थे कि क़ाइल होना पड़ा। ‘शो शो’, ‘ख़ुशियां’, ‘दीवाली के दिये’ संभवतः ये अफ़साने मैंने ‘मुसव्विर’ ही में पढ़े थे। और मंटो को उनके बारे में तारीफ़ के ख़ुतूत भी लिखे थे। उन दिनों मंटो बंबई में रहता था। वीकली अख़बार ‘मुसव्विर’ के एडिटर की ज़िम्मेदारी संभाले हुए था। ‘कीचड़’ की कहानी, स्क्रिप्ट और डायलॉग भी लिख रहा था। प्रेमचंद के बाद, मंटो पहला अदीब है, जो अदब से फ़िल्म की तरफ़ गया। शायद मंटो के लिए यह कहना सही न होगा, इसलिए कि उसकी अदबी शोहरत, उसकी फ़िल्मी ज़िंदगी के बाद शुरू होती है।

मंटो, manto, krishan chander

शायद मंटो वो पहला अदीब है, जो फ़िल्म से अदब की तरफ़ आया। और अपनी शोहरत की बुनियादें मज़बूत कर के फिर फ़िल्म की तरफ़ चला गया। उसकी हर बात अजीब है। इन अफ़सानों के पढ़ने के बाद मैंने उसका अफ़साना ‘लालटेन’ पढ़ा, जो बटोत से मुताल्लिक़ है, जहाँ मंटो शायद अपनी गंभीर बीमारी के दौरान में रहा था। मुझे तो इस अफ़साने का बेश्तर हिस्सा मंटो की जीवनी से संबंधित मालूम होता है, उसकी बारीकियों में और अफ़साने के आख़िर में जो उदासी और ऊब झलकती है, वो ख़ुद रूमानी मंटो की ज़िंदगी का हिस्सा मालूम होती है। गोया कि मंटो के अफ़सानों से किसी ने सारी मुलायमियत और नरमी, और मिठास छीन ली या शायद उसने ख़ुद उन ख़ासियत को अपनी कहानियों से धक्के मार-मारकर निकाल दिया हो। मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि वह किसी मानसिक पीड़ा, कोशिश, जज़्बे के असर में ऐसा करता रहता है।

‘निकलो-निकलो….. ज़िंदगी बहुत तल्ख़ है, इसमें इन जज़्बात का गुज़र नहीं। बेहतर यही है कि यहाँ से निकल जाओ।’

उसके अक्सर अफ़सानों में मालूम होता है, गोया वो उन जज़्बात को जानबूझकर धक्के मारकर बाहर निकाल रहा हो। कभी बच्चों की तरह बिसूरने लगता है, कभी तल्ख़ लहजे में निहायत ही नाख़ुशगवार लहजे में उनका मज़ाक़ उड़ाता है, और कोई नहीं समझता कि इस तल्ख़ी, ज़हरीलापन और व्यंग्यात्मक हँसी के पीछे कितनी नरमी और मुलायमियत, और ज़िंदगी की चाहत छिपी हुई है। ऐसी चाहत, जिसकी भूख अनादि है। और कभी नहीं मिटती। मंटो अनादिकाल से भूखा है। उसके हर अफ़साने में इंसानी मुहब्बत की पुकार है। आप उसके अंदाज़ पर न जाइए। वो हज़ार बार कहता है,

‘मुझे इंसानों से मुहब्बत नहीं है। मैं एक गले सड़े कुत्ते के पिल्ले से मुहब्बत कर लूँगा, मगर इंसानों से नहीं।’

वो कहेगा, ‘मुझे दोस्ती, इनायत, दया किसी पर ऐतबार नहीं। मेरा यक़ीन शराब है। ये प्रगतिशीलता सब बकवास है। मैं तरक़्क़ी-पसंद नहीं हूँ। मैं सिर्फ़ मंटो हूँ। और शायद वो भी नहीं हूँ।’

वो ये सब बातें औपचारिकतावश कहता है। कभी आपका जी जलाने के लिए, मुँह चिढ़ाने के लिए, अपने आपको धोखा देने के लिए भी। वो सब बातें कहता है, लेकिन उसकी आँखें कुछ और कहती हैं। उसका क़लम कुछ और कहता है। और हमारी ख़ुशकिस्मती है कि उसकी ज़ुबान की तरह, उसका क़लम उसके क़ाबू में नहीं है। वो अपनी इंसानी हमदर्दी, अपनी तरक़्क़ी-पसंदी, अपनी मानवजनित मुहब्बत पर पर्दा डालने की हज़ार कोशिश करता है। अपने अफ़सानों पर मज़ाक़ का रोग़न चढ़ाता है। लेकिन उसका क़लम उसके क़ाबू में नहीं है। और हर अफ़साने के पर्दे के पीछे इंसानी मुहब्बत उबली पड़ती है।

उन दिनों मैं ‘नये ज़ाविये’ की पहली जिल्द संपादित कर रहा था। मैंने मंटो से इसमें शिरकत के लिए कहा, तो उसने बहुत जल्द अपनी वो कहानी भेजी, जो मेरे ख़याल में आज तक अपनी जगह उर्दू की बेहतरीन कहानी है। और अदब में उसका मुक़ाम वही है, जो राजिंदर सिंह बेदी की ‘कृश्न’ और हयातुल्लाह अंसारी की ‘आख़िरी कोशिश’ का है। इतने अच्छे अफ़साने अब उर्दू में मुश्किल से लिखे जा सकेंगे।

मैंने रूसी शाहकार ‘माया’ भी पढ़ा है और इसी मौज़ूअ पर कई फ्राँसीसी कहानियाँ भी पढ़ी हैं। और ‘उमराव जान’ के किरदार का भी अध्ययन किया है, लेकिन ‘हतक’ की हीरोइन की टक्कर का एक किरदार भी उन नॉवेलों और अफ़सानों में नहीं नज़र आया। एक-एक करके मंटो ने मौजूदा समाजी निज़ाम के अंदर बसने वाली तवाइफ़ की ज़िंदगी के छिलके उतारकर अलग कर दिये हैं, इस तरह कि इस अफ़साने में सिर्फ़ तवाइफ़ का जिस्म, बल्कि उसकी रूह भी नंगी नज़र आती है। एक शीशे की तरह आप उसके आर-पार देख रहे हैं। इस बेदर्दी और बेरहमी से मंटो ने उसे नंगा किया है। लेकिन इस बदसूरत ख़ाके का हर रंग बदसूरत होते हुए भी एक नये सौंदर्य का सृजन करता है। तवाइफ़ से मुहब्बत नहीं होती, सौगँधी और उसकी ज़िंदगी पर रहम नहीं आता, लेकिन सौगँधी की मासूमियत और उसके औरतपने पर, और उसकी ज़िंदगी और उसकी चाहत, और उसके सृजन पर विश्वास पैदा हो जाता है। और यही सच्चे और शाश्वत साहित्य की महानता का गुण है।

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