
- May 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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प्रासंगिकता के चलते आब-ओ-हवा पर प्रस्तुति के लिए 'हम देखेंगे' पत्र से विशेष रूप से प्राप्त, ईरानी सिनेमा पर यह चर्चा सुधन्वा देशपांडे की कलम से निकली है, जिसका अनुवाद राम आल्हाद चौधरी ने किया है....
ईरानी सिनेमा में प्रतिरोध और मानवतावाद
वाहिद, जो एक मैकेनिक है, संयोग से वह एक ऐसे व्यक्ति से टकराता है, जिसे वह ईरानी जेल में अपने पूर्व यातनादाता (टॉर्चर करने वाला) के रूप में पहचानता है, तो वह उसे अगवा कर लेता है और ज़िंदा दफ़नाने की कोशिश करता है। वह व्यक्ति अपनी बेगुनाही की गुहार लगाता है और वाहिद को संदेह होने लगता है कि कहीं यह पहचानने की भूल तो नहीं है। वह एक पूर्व क़ैदी से संपर्क करता है, जो उसे एक और व्यक्ति से मिलवाता है। जल्द ही, तीन पुरुष और दो महिलाएँ इस बात की पड़ताल में जुट जाते हैं कि क्या वह व्यक्ति सचमुच वही यातनादाता है और यदि है भी, तो उसके साथ क्या किया जाये।
यह ‘इट वाज़ जस्ट एन एक्सिडेंट’ का कथानक है, जिसे जाफ़र पनाही ने निर्देशित किया है और जिसने कान फ़िल्म महोत्सव में प्रतिष्ठित पाल्म द’ओर पुरस्कार जीता। जो कहानी एक राजनीतिक थ्रिलर और प्रतिशोध-प्रधान नाटक के रूप में शुरू होती है, वह आगे चलकर एक तनावपूर्ण नैतिक कथा और रोड मूवी में बदल जाती है (जिसकी अधिकांश घटनाएँ वाहिद की पुरानी वैन में या उसके आस-पास घटित होती हैं), जिसमें सूक्ष्म, व्यंग्यात्मक हास्य के अप्रत्याशित क्षण भी हैं। पनाही हमें प्रतिशोध और मानवता, क्रोध और करुणा के बीच के विरोधाभासी खिंचावों का सामना करने के लिए मजबूर करते हैं और अंततः अपराध और दंड तथा सत्तावाद और प्रतिरोध के संबंधों पर विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं।
जाफ़र पनाही उन कई ईरानी फ़िल्मकारों में से एक हैं जिन्होंने इस्लामी गणराज्य के तहत सेंसरशिप का सामना करते हुए ऐसे सवालों की पड़ताल की है। उन्होंने कई बार इस दमनकारी व्यवस्था को चकमा दिया है, हालांकि उन्हें कानूनी चुनौतियों, यहाँ तक कि कारावास का भी सामना करना पड़ा है। उनकी फ़िल्म ऑफ़साइड, जिसमें कुछ लड़कियाँ लड़कों का भेष बदलकर फ़ुटबॉल विश्व कप क्वालीफ़ाइंग मैच देखने के लिए स्टेडियम में घुसने की कोशिश करती हैं, आंशिक रूप से उसी वास्तविक मैच के दौरान शूट की गयी थी। इसके लिए अधिकारियों को एक नक़ली स्क्रिप्ट सौंपी गयी और एक सहायक निर्देशक को फ़िल्म का निर्माता बताया गया।
अपनी फ़िल्म ‘दिस इज़ नॉट ए फ़िल्म’ में पनाही ने अपने ऊपर लगाये गये प्रतिबंधों और सेंसरशिप को ही फ़िल्मी सामग्री में बदल दिया।
ईरानी फ़िल्मकारों को गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जिनमें सेंसरशिप, विषय-वस्तु पर प्रतिबंध और लैंगिक निषेध शामिल हैं और ऐसे में यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे डरपोक और निष्प्रभावी सिनेमा बनाएँगे। लेकिन इसके विपरीत, ईरान दुनिया की सबसे सशक्त, सक्रिय, सृजनशील और विद्रोही फ़िल्म संस्कृतियों में से एक है। राजनीतिक प्रतिबंधों का सामना करते हुए, ईरानी फ़िल्मकारों ने रूपक की कला में महारत हासिल कर ली है। वे साधारण और निरापद दिखने वाली कहानियों के माध्यम से गहन और प्रभावशाली कथन प्रस्तुत करते हैं।
उदाहरण के लिए ‘वेयर इज़ द फ्रेंड्स होम?’ को देखा जा सकता है, जिसका निर्देशन अब्बास कियारोस्तामी ने किया था, जो जाफ़र पनाही के गुरु थे। इसमें एक छोटा लड़का ग़लती से अपने दोस्त की स्कूल की कॉपी घर ले आता है। उसका शिक्षक एक तानाशाह है, जो अपने छोटे-से अधिकार का मनमाने ढंग से उपयोग करता है। लड़का डरता है कि यदि उसका दोस्त होमवर्क प्रस्तुत नहीं कर पाया, तो उसे सज़ा मिलेगी। इसलिए वह अपने दोस्त के घर की तलाश में पड़ोसी गाँव की ओर निकल पड़ता है। रास्ता कठिन है और यात्रा बेहद थकाऊ। अपने दोस्त की मदद के लिए लड़के की ज़िद्दी और कष्टपूर्ण यात्रा में कियारोस्तामी हमें एक गहरी सच्चाई दिखाते हैं यानी एकता (solidarity) को नैतिक आवश्यकता के रूप में। ऐसे देश में, जहाँ नागरिकों से लंबे समय तक धार्मिक सत्ता के सामने निष्क्रिय रहने की अपेक्षा की जाती रही है, यह साधारण-सा नैतिक कार्य भी एक मौन क्रांति बन जाता है।
यह फ़िल्म उत्तरी ईरान के गीलान क्षेत्र के कोकर गाँव में शूट की गयी थी। तीन साल बाद, 1990 में, इस क्षेत्र में एक भीषण भूकंप आया, जिसमें लगभग 50,000 लोगों की जान चली गयी। इसके बाद कियारोस्तामी ने ‘एंड लाइफ़ गोज़ ऑन’ बनायी, जिसमें एक आदमी और उसका बेटा ‘वेयर इज़ द फ्रेंड्स होम?’ के उन लड़कों की तलाश में निकलते हैं।
पिछले चार दशकों में, ईरानी फ़िल्मकारों ने दर्जनों ऐसी फ़िल्में बनायी हैं, जो अपने लोगों के धैर्य, मानवता, करुणा, आत्मनिर्भरता और प्रतिरोध के साथ-साथ उनकी छोटी-छोटी कमज़ोरियों और रोज़मर्रा की क्रूरताओं को भी चित्रित करती हैं। इन फ़िल्मों में से कई कल्पना और यथार्थ के बीच की रेखा को धुंधला कर देती हैं, और अधिकांश फ़िल्में अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बनायी जाती हैं। यहाँ कुछ उदाहरण दिये जा रहे हैं:
द एप्पल (1998): दो किशोर लड़कियों की कहानी है, जिन्हें तेहरान में उनके अत्यंत पितृसत्तात्मक पिता ने ‘दुनिया की बुराइयों’ से बचाने के नाम पर घर में क़ैद कर रखा है। इस फ़िल्म की निर्देशक समीरा मखमलबाफ़ उस समय केवल सत्रह वर्ष की थीं। लगभग उतनी ही उम्र की, जितनी फ़िल्म की वे लड़कियाँ, जिनकी यह वास्तविक जीवन की कहानी भी है।
द डे आई बिकेम अ वुमन (2000): जिसे मरज़िएह मेश्किनी ने निर्देशित किया, तीन महिलाओं की कहानी दिखाती है, जो अपने जीवन के अलग-अलग चरणों में हैं। एक छोटी लड़की को अचानक लड़कों के साथ खेलने से रोक दिया जाता है। एक युवती को साइकिल चलाने और अपने विवाह के बीच चयन करना पड़ता है। और एक वृद्ध महिला ख़रीदारी के लिए निकलती है, उन सभी चीज़ों को ख़रीदने के लिए, जिनसे उसे विवाह के दौरान वंचित रखा गया था।
ए हीरो (2021): असग़र फ़रहादी की फ़िल्म, एक नैतिक रूप से जटिल कहानी है। इसमें एक व्यक्ति, जो कर्ज़ न चुका पाने के कारण जेल में है, दो दिनों की पैरोल पर बाहर आता है। उसकी प्रेमिका को बस-स्टॉप के पास एक पर्स में सोने के सिक्के मिलते हैं, और वे उसे बेचकर उसके कर्ज़ का कुछ हिस्सा चुकाने की सोचते हैं। अंततः वह ऐसा नहीं करता और पर्स उसके मालिक को लौटा देता है। यह अच्छा कार्य उसे अनजाने में एक नायक बना देता है, जिसका उपयोग जेल प्रशासन अपने हित में करना चाहता है। लेकिन जल्द ही परिस्थितियाँ नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं, और यह अनचाहा नायक समझता है कि एक अन्यायपूर्ण दुनिया में कोई भी अच्छा कार्य बिना दंड के नहीं रहता।
ईरानी सिनेमा आम स्त्री-पुरुषों की उन कहानियों को सामने लाता है, जो पितृसत्तात्मक, अलोकतांत्रिक, कठोर और अपारदर्शी व्यवस्थाओं और संस्थाओं के बीच अपना रास्ता तलाशते हैं। एक ऐसे तंत्र के सामने, जो छिपाव और समझौते को बढ़ावा देता है, अपनी ईमानदारी बनाये रखने का उनका संघर्ष सच्चा और यथार्थपूर्ण है।
एक ऐसा समाज, जिसने दशकों तक धार्मिक और पितृसत्तात्मक अधिनायकवाद का प्रतिरोध किया है, अब उससे कहीं अधिक क्रूर शक्तियों का सामना कर रहा है। वे साम्राज्यवादी और ज़ायनिस्ट बमों की मार झेल रहे हैं। ये बम शहरों को ध्वस्त कर सकते हैं, लेकिन उनकी आत्मा को कुचल नहीं सकते।
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