
- May 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....
FIR पे FIR, शायरी से इतनी दिक्कत क्यों?
जहां साहित्यिक चेतना दम तोड़ देती है, वह समाज मुर्दाघर से अधिक कुछ नहीं होता।
अगर आप कोई नज़्म, गीत या ग़ज़ल आदि अपने सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं तो क्या आपको यह डर होना चाहिए कि कुछ ही देर में पुलिस आकर गिरफ़्तार कर सकती है.. या फिर कुछ लोग आकर आपकी चीज़ें ज़ब्त कर सकते हैं, आपके लिए ख़तरनाक हो सकते हैं?
घर में मांस रखने की अफ़वाह उड़ी और व्यक्ति विशेष को भीड़ ने मार डाला; किसी ने कोई वस्त्र विशेष पहना तो भीड़ बेक़ाबू हो गयी; और किसी ने किसी पद्धति विशेष से सड़क पर पूजा कर ली तब भी… अब यूं है कि आपने कोई कविता पढ़ ली, दोस्तों से शेयर कर ली, तब भी भीड़ को ऐतराज़ होगा और आपकी शामत आ जाएगी?
माथे पे लिखी मेरी रुसवाई नहीं जाती
जब भूख लगी तब मैं या प्यास लगी जब, तब
मैं हाथ लगी अक्सर, बस मांस लगी जब-तब
बाक़ी किसी लमहे में, मैं पायी नहीं जाती.
या पेट के नीचे मैं या पेट के ठीक ऊपर
हस्ती है मेरी इतनी मैं वो हूं जो हूं बाहर
मैं पूरी की पूरी तो अपनायी नहीं जाती.
लहंगा कभी चुनरी हूं मुजरा कभी ठुमरी हूं
गीतों में या ग़ज़लों में इक हुस्न-सी उतरी हूं
क्यूं शब्द में मेरी सब सच्चाई नहीं जाती.
ज्ञानी भी रिषी भी वो औतार वही अक्सर
है मर्द ही सूफ़ी भी, है मर्द की पैग़म्बर
विश्वास के क़िस्सों में मैं लायी नहीं जाती
………
मैंने क़रीब दस बरस पहले यह नज़्म कही थी और फिर सोशल मीडिया पर इसे पाठक बाज़दफ़ा शेयर भी करते रहे। कोई सोच भी नहीं रहा था कि स्त्री विमर्श की कविताएं किसी के लिए ख़तरा हो सकती हैं या इन पर ‘सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने’ जैसे इल्ज़ाम आ सकते हैं। अब लगता है तब शायद माहौल में इतनी सनक नहीं थी वर्ना मैं और इस नज़्म को शेयर करने वाले पाठक किसी थाने-कचहरी के चक्करों में फंसे होते।

पाकिस्तान के इस्लामाबाद में रहने वाले शायर शोएब कियानी की नज़्म ‘बेहया’ हिंदोस्तान के मध्य प्रदेश के बेतूल में रहने वाले एक शिक्षक फ़ैज़ान अंसारी ने वॉट्सऐप पर क्या शेयर की, हंगामा हो गया। कहते हैं एक से ज़्यादा एफ़आईआर हो गयीं। पिछले बरस की बात है। अब उच्च न्यायालय इस मामले को रफ़ा-दफ़ा करते हुए साफ़ कहा कि ‘कुछ विशेष’ लोगों की आपत्ति से कोई वैधानिक मामला नहीं बनता है क्योंकि कविता पढ़ना-पढ़ाना कोई जुर्म नहीं है।
एफ़आईआर करवाने वालों की नीयत तो साफ़ तौर से किसी तरह की ‘सांप्रदायिकता’ ही समझ आ रही है लेकिन पुलिस भी कमाल करती है! कविता पढ़ना-पढ़ाना जुर्म नहीं है, पूरे थाने में कोई अफ़सर नहीं था, जो इतनी-सी बात समझ-समझा सकता। यह ज्ञान हासिल करने के लिए हाई कोर्ट जाना पड़ा और साल भर केस को खींचकर एक व्यक्ति को परेशान रखना पड़ा।
यहां आपको वो नज़्म ‘बेहया’ भी पढ़ लेना चाहिए, जिस पर इतना वबाल काटा गया…
हमीं तो हैं वो
जो तय करेंगे
कि इनके जिस्मों पे किसका हक़ है
हमीं तो हैं वो
जो तय करेंगे
कि किससे इनके निकाह होंगे
ये किसके बिस्तर की ज़ीनतें हैं
वो कौन होगा जो अपने होंठों को
इनके जिस्मों की आब देगा
भले मोहब्बत किसी के कहने पे
आज तक हो सकी न होगी
मगर ये हम तय करेंगे
इनको किसे बसाना है अपने दिल में
हम इनके मालिक हैं
जब भी चाहें
इन्हें लिहाफ़ों में खींच लाएँ
और इनकी रूहों में दाँत गाड़ें
ये माँ बनेंगी
तो हम बताएँगे
इनके जिस्मों ने कितने बच्चों को ढालना है
हमारे बच्चों के पेट भरने
अगर ये कोठे पे जा के अपना बदन भी बेचें
तो हम बताएँगे
किसको कितने में कितना बेचें
हमीं को हक़ है
कि इनके गाहक जो ख़ुद हमीं हैं से
सारी क़ीमत वसूल कर लें
हमीं को हक़ है कि इनकी आँखें
हसीन चेहरे शफ़्फ़ाफ़ पाँव
सफ़ेद रानें दराज़ ज़ुल्फ़ें
और आतिशीं-लब दिखा-दिखाकर
क्रीम साबुन सफ़ेद कपड़े और आम बेचें
दुकाँ चलाएँ नफ़’अ कमाएँ
हमीं तो हैं जो ये तय करेंगे
ये किस सहीफ़े की कौन-सी आयतें पढ़ेंगी
ये कौन होती हैं
अपनी मर्ज़ी का रंग पहनें
स्कूल जाएँ हमें पढ़ाएँ
हमें बताएँ
कि इनका रब भी वही है जिसने हमें बनाया
बराबरी के सबक़ सिखाएँ
ये लौंडियाँ हैं ये जूतियाँ हैं
ये कौन होती हैं अपनी मर्ज़ी से जीने वाली
बताने वाले हमें यही तो बता गये हैं
जो हुक्मरानों की बात टालें
जो अपने भाई से हिस्सा माँगें
जो शौहरों को ख़ुदा न समझें
जो क़द्रे-मुश्किल सवाल पूछें
जो अपनी मेहनत का बदला माँगें
जो आजिरों से ज़बाँ लड़ाएँ
जो अपने जिस्मों पे हक़ जताएँ
वो बे-हया हैं
………
यह नज़्म पढ़कर यही ख़याल आया कि इस नज़्म पर काहे की आपत्ति? कैसा ऐतराज़? क्यों इतना बखेड़ा? सादा-सी नज़्म है। ठीक यही क्यों, काहे तब ज़ेह्न में आये थे, जब पिछले दिनों रूपम मिश्र की कविता को लेकर भी किसी ने एफ़आईआर करवा दी थी। वह कविता तो इससे भी ज़्यादा सपाट थी। वैसे अच्छा भी है कि ऐसी कविताओं से कोई डर रहा है। कम से कम कोई अपने गिरेबान में झांक तो पा रहा है। सीधी-सीधी बातें करती ये कविताएं आख़िर वर्ग विशेष को इतना हैरान-परेशान कर क्यों रही हैं?
हमारा यह समाज बिल्कुल ही निकम्मा और जाहिल हो चुका है शायद! उसने भारतीय साहित्य और दर्शन का क ख ग भी नहीं पढ़ा क्या? जिस देश में चार्वाक हो गये, बुद्ध, कबीर हो गये, राबिया से लेकर कमला दास तक हो गयीं और आचार्य रजनीश हो गये.. इन दिनों कहीं-कहीं मुरारी बापू के तेवर भी। वहां ये सब बातें क्या नयी हैं? औरतों की पीड़ाओं पर साहिर, फ़ैज़, फ़हमीदा रियाज़ की शायरी से लेकर मंटो जैसे हिंदी व उर्दू के कितने ही लेखकों ने क्या-क्या नहीं लिख डाला…
विकसित होने की तरफ़ बढ़ रहे इस भारत के ये लोग अब इन कविताओं पर हंगामा कर रहे हैं तो आप लाख दावे करें, सच यही है जनाब कि ये लोग दशकों या सदियों पीछे के किसी दलदल में धकेले जा चुके हैं।
ये कविताएं वर्ग विशेष को इतना हैरान-परेशान कर क्यों रही हैं? इस सवाल पर सोचता हूं तो एक पल को यह भी लगता है कहीं कवि इतने सियासी तो नहीं हो गये कि उनकी पब्लिसिटी के लिए ऐसा कुछ करवाया जाता हो? फिर इस ख़याल पर हंसी भी आती है। जिस सियासत के लिए साहित्य और पत्रकारिता का कोई दबाव ही नहीं रह गया है, उसके समर्थक समाज में ये मुमकिन कैसे है।
जो सियासत नागरिकों को आपस में लड़ाने की हामी है, उसके समर्थक असल में किसी भी बात को ‘सांप्रदायिकता’ का रंग देने के लिए कुलबुलाये हुए हैं।
फ़ैज़ान अंसारी पर केस को ख़त्म करते हुए उच्च न्यायालय की टिप्पणियों से साफ़ है कि किसी क़िस्म के अपराध का सबूत नहीं था, बस ‘कुछ विशेष’ लोगों को आपत्ति थी। ऐसे में हमें देखना चाहिए कि ये ‘कुछ विशेष’ लोग हैं कौन?
एफ़आईआर करवाने वाले सचिन राय का ताल्लुक मध्य प्रदेश राज्य कर्मचारी संघ से है। आप गूगल करके आसानी से जान सकते हैं इस संघ की संबद्धता भारतीय मज़दूर संघ से है, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का अनुषांगिक संगठन है और वैचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के क़रीब माना जाता है।
अब आप कहेंगे कि पुलिस का दबाव में आ जाना मामूली बात ही तो है। लेकिन हम बतौर नागरिक इस समझ और इस परिपाटी को कब तक स्वीकार करते रहें?
बतौर समाज हमें बोलना चाहिए कि यह स्वीकार्य नहीं है। पूछना चाहिए कि पुलिस किसी स्थानीय नेता के दबाव में क़ानून, संविधान और कॉमन सेंस का दबाव कैसे दरकिनार कर देती है?
2025 की शुरूआत का आंकड़ा है कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में प्रति जज 14,000 से ज़्यादा केस पेंडिंग हैं। इस सूरत में कॉमन सेंस की दलील पर ही ख़ारिज दिखने वाले केस को तक़रीबन साल भर तक लटकाये रखकर एक नागरिक को मानसिक रूप से डर और प्रताड़ना का शिकार बनाना, केस उच्च न्यायालय तक ले जाना… क्या न्यायालय के सामने ग़ौरतलब नहीं है? कोर्ट का समय ज़ाया करने और एक नागरिक को तक़रीबन साल भर तक परेशान करने के लिए एफ़आईआर करने और करवाने वालों को दंडित नहीं किया जाना चाहिए? कोई एक्शन हुआ है, तो ख़बरों में कहीं उल्लेख नहीं मिला।
हम और आप देख रहे हैं कि उर्दू को पिछले कुछ समय से टारगेट करने के लिए अजीब-अजीब क़िस्म के खेल खेले जा रहे हैं। रेलवे स्टेशनों से, पाठ्यक्रमों से, सरकारी महक़मों से और हमारी सोशल साइकी से उर्दू को हटाने के लिए जैसे एक मुहिम चल रही है। फ़ैज़ान अंसारी पर जो केस बनाया गया, दरअसल वो इसी कड़ी का एक और मामला समझ आता है।
कुल-मिलाकर इस केस से दो बातें जो निकलकर आती हैं, आपको चिंता के लिए शायद उकसाएं। एक यह कि ऐसे मामलों को बहुत शुरूआती स्तर पर ही रोकने की कोशिशें होना चाहिए। क़ानून और कथित न्याय से जुड़ी संस्थाओं की इच्छाशक्ति से यह मुमकिन हो भी सकता है। इस तरह के मुक़द्दमे जब प्रवृत्ति के रूप में दिखने लगें तो इन संस्थाओं को सचेत होकर इसकी जड़ में जाकर इलाज करने की ज़रूरत है।
दूसरे यह कि ज़रा-ज़रा-सी बात को सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए चुनौती की तरह पेश किये जाने का चलन किसी गर्व की बात नहीं है। कोई समाज अगर प्रगतिशील है, मज़बूत है तो उसकी बुनावट और उसकी भावनाएं इतनी लचर, इतनी पिलपिली कैसे हो सकती हैं कि बात-बात पर ज़ख़्मी हो जाएं!
यक़ीन कीजिए यह इसलिए हो रहा है क्योंकि आप साहित्य और कला से एक लंबी दूरी बना चुके हैं। साक्षरता के आंकड़े तो बढ़ रहे हैं लेकिन उसी अनुपात में क्या समाज असहिष्णु और जाहिल नज़र नहीं आ रहा? अपने दिल-दिमाग़ की खिड़कियां खोलिए और गंभीर, सार्थक साहित्य के साथ रोज़ कुछ पल बिताइए। वॉट्सऐप यूनिवर्सिटियों जैसी संस्थाओं से नहीं प्रामाणिक किताबों से साहित्य और शायरी पढ़िए, समझिए और ख़ुद को सही अर्थों में विकसित होने की राह पर डालिए।
किसी भी भाषा की हो, सवाल उठाती हो या ‘नाविक के तीर’ सी चुभती हो… ऐसी शायरी/कविता पढ़ना-पढ़ाना अगर जुर्म ठहरा भी दिया जाये तो ख़ुद को यक़ीन दिलाइए, हम ये जुर्म करने से पीछे नहीं हटेंगे क्योंकि हम मुर्दे नहीं हैं और यह देश क़ब्र नहीं है।
………………..

एक और ज़रूरी बात
एक साहित्यिक घटना का ज़िक्र इस बार ज़रूर करना है। पिछले दिनों भोपाल में देह के 80 और लेखन यात्रा के 60 बरस पूरे कर चुके रामप्रकाश त्रिपाठी के नाम एक कीर्तिमान दर्ज हुआ, जब उनकी पहली पुस्तकें प्रकाशित होकर आयीं। ‘यदा कदा’ और ‘स्मरण में है आज जीवन’ शीर्षकों से प्रकाशित हुईं ये दोनों पुस्तकें संस्मरणों और समीक्षकीय टिप्पणियों के संकलन के तौर पर एक शहर, एक समय और अनेक शख़्सियतों को ख़ास ढंग से दर्ज करती हैं। इस बार हमने कवर चित्र इसी घटना को बनाया क्योंकि जिस दौर में रचनाकार सृजन में समय नहीं दे रहे, रचना के पकने के पहले ही उसे सार्वजनिक कर देते हैं, ऐसे में रामप्रकाश जी से यह सबक़ लिया जाना ज़रूरी है कि प्रकाशन नहीं, सृजन प्राथमिकता होता है।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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