
- April 15, 2026
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21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण...
पाक्षिक ब्लॉग (भाग-7) मानस की कलम से....
क्यों प्रासंगिक बनी हुई है 'हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी'?
‘हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी’ ठीक 21 साल पहले, 15 अप्रैल 2005 को प्रदर्शित हुई, जो 1970 के दशक में भारत में हो रहे बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों के जटिल दौर में जटिल किरदारों के बीच एक उलझे हुए प्रेम त्रिकोण को दर्शाती है।
1960 के दशक के अंत और 1970 के शुरूआती वर्ष उथल-पुथल से भरे थे – वैश्विक तौर पर वियतनाम युद्ध और उससे उपजित ‘फ्लावर पावर’ (युद्ध-विरोधी आंदोलन जो वियतनाम युद्ध में अमेरिकी भागीदारी का विरोध कर रहा था), वहीं भारत में आपातकाल और नक्सल आंदोलन के उदय का समय था। बेचैन युवाओं की बढ़ती आबादी आदर्शवाद को कुचलने वाली किसी भी चीज़ के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने के लिए उत्सुक थी।
‘हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी’तब 6 महीनों में 12 फ़िल्म समारोहों में प्रदर्शित हुई थी, जिनमें तुर्की, एस्टोनिया, रिवर टू रिवर (फ्लोरेंस), बर्लिन, एडिनबर्ग, वाशिंगटन, गोवा, बाइट द मैंगो (ब्रैडफोर्ड), कॉमनवेल्थ (मैनचेस्टर), भारत (लॉस एंजिल्स), डलास और पैसिफ़िक रिम (कैलिफ़ोर्निया) शामिल हैं।
वैसे तो ‘हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी’ 2003 में बनकर तैयार हो गयी थी, लेकिन 2005 में रिलीज़ हुई। ग़ौरतलब यह कि 2004 में भारत में आम चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस सत्ता में आयी।
सुधीर मिश्रा की फ़िल्म ‘हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी’ आपातकाल की पृष्ठभूमि पर है। इसका नाम पहले “ट्विस्ट विद डेस्टिनी” था, जो नेहरू के प्रसिद्ध स्वाधीनता भाषण ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ पर एक तंज़ भी था लेकिन फ़िल्म के विडंबनापूर्ण कथानक को जस्टिफ़ाइ करता था। फ़िल्म के निर्माता प्रीतीश नंदी का मत था कि यह नाम हिंदोस्तानी फ़ील नहीं करवाता, इस बात से मिश्रा भी राज़ी हुए और फिर उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब की एक लोकप्रिय ग़ज़ल के शुरूआती शब्दों से नया शीर्षक गढ़ा ‘हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी’।
यह फ़िल्म राजनीति, रोमांस और राजिनीतिक रोमांस को बख़ूबी बयां करती है। फ़िल्म की शुरूआत में ही क्रेडिट रोल अख़बारों की कटिंग पर हैं। फ़िल्म और पॉलिटिक्स का क्या कनेक्शन है, मिश्रा ये शुरू से ही क्लीयर कर देना चाहते थे। हालाँकि पोस्टर में ऐसा कुछ निकलकर नहीं आता। पोस्टर में असल में वो कुछ भी निकलकर नहीं आता, जिस बारे में फ़िल्म बात करती है।
कथानक और निर्देशकीय
फ़िल्म तीन किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है। विक्रम (शाइनी आहूजा) गीता (चित्रांगदा सिंह) के प्यार में पागल है, लेकिन गीता उग्र नक्सलवादी सिद्धार्थ (केके मेनन) से प्यार करती है। और सिद्धार्थ आंदोलन के रोमांटिसिज़म (प्राकृतवाद) में है।

यह फ़िल्म अपने किरदारों के माध्यम से आम इंसान की पॉलिटिक्स को भी दर्शाती है। हर इंसान, चाहे वो पॉलिटिक्स में हो या नहीं, उसकी अपनी एक पॉलिटिक्स होती ही है। गांधीवादी के बेटे विक्रम को आदर्शवादियों से नफ़रत है और वह दिल्ली का सबसे बड़ा दलाल बन जाता है। सेवानिवृत्त जज के बेटे सिद्धार्थ ने आरामदेह ज़िंदगी छोड़कर क्रांति खड़ी कर दी। इंग्लैंड से लौटी सीधी-सादी और सभ्य लड़की गीता, बिहार के गाँव में जाकर काम करती है।
फ़िल्म भारत के राजनीतिक दृश्य को बख़ूबी उकेरती है। दिल्ली से बिहार की दूरी किलोमीटर नही सालों में नापी जाती है। जहाँ दिल्ली के राजनेता के कुत्ते को पकड़ने के लिए लगे दर्जनों लोग हैं, ठीक उसके पहले के दृश्य में हम देखते हैं बिहार के एक छोटे से गाँव के जेल में बंद दर्जनों निर्दोष गाँव वाले, कुत्ते की तरह पीटे जा रहे हैं।
फ़िल्म की कथा लीनियर है। फ़िल्म को देखकर ऐसा नहीं लगता जैसे सुधीर मिश्रा के पास फ़िल्म का क्लाइमैक्स पहले से होगा। फ़िल्म अपने किरदारों और पॉलिटिक्स से साथ-साथ चलती है। उनके हिसाब से मोड़ लेती है। रुकती है। जैसा ज़िंदगी में होता है। ये बड़ी वजह है फ़िल्म के प्रभावशाली होने की, कनेक्ट करने की। हालाँकि अगर आप किरदारों का गंतव्य देखें तो वो बिल्कुल उनकी सोच के उलट है। विक्रम आदर्शवाद से बहुत दूर एक प्रैक्टिकल इंसान की तरह जीना चाहता है। उसके जीवन पर उसका नियंत्रण है। लेकिन अंत में वो एक गाँव में मानसिक रूप से दुर्बल हो जीवन जीने पर विवश होता है। जिस सिस्टम को वो अपनी उँगलियों पर नचाना चाहता है, वो उसी सिस्टम के डंडों से पीटा जाता है। असल में विक्रम का किरदार ही अकेला किरदार है, जो पोएटिक जस्टिस (काव्यात्मक न्याय) का शिकार होता है। पूंजीवाद को विलन मानने वालों के अनुसार विक्रम को एक तरह से उसके किये की सज़ा मिली है।
सिद्धार्थ जो शुरू से क्रांति और आन्दोलन में यक़ीन रखता है, अंत में विदेश जाकर मेडिसिन की पढ़ाई करता है। और फिर गीता, जो फ़िल्म का सबसे सशक्त किरदार है। जो विदेश से लौटी है और विचारधारा की सीमाओं में नहीं बंधी रहती, बल्कि बिना किसी अपेक्षा या संस्था के प्रति किसी तरह की नाराज़गी के, अपने दम पर वही करती है जो उसे ‘सही’ लगता है। वो सिद्धार्थ की तरह उग्र और आक्रामक नहीं हैं, और न ही वह विक्रम की तरह धूर्त या चालाक है। वो आदर्शों का महिमामंडन नहीं करती और न ही वह बड़े पैमाने पर बदलाव की उम्मीद रखती है। जिसने कभी गाँव नही देखा, असली भारत नही देखा, जो सिर्फ़ और सिर्फ़ सिद्धार्थ के साथ रहना चाहती है, अंत में उसने गाँव में सिद्धार्थ से दूर अपना जीवन चुन लिया है।
मिश्रा, शिव सुब्रमण्यम और रुचि नारायण द्वारा लिखित पटकथा 1969 से शुरू होकर 1975 तक की कहानी बयां करती है। फ़िल्म दिल्ली की राजनीति और उससे उपजे सैकड़ों किलोमीटर दूर बिहार के सिस्टम को समानांतर तौर पर दिखाती है। दिल्ली में जहाँ गांधीवादी समाजवाद और नेहरूवादी आशावाद का समझौता बुरी तरह से टूट चुका है। भ्रष्टाचार ने सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी को दूषित कर दिया है, जिसके नेता सौदेबाज़ी करने वालों की भूमिका निभा रहे हैं। वहीं बिहार में सामाजिक वर्ग संघर्ष नक्सल आंदोलन का रूप ले रहा है। और इस धरातल पर खड़े हैं फ़िल्म के मुख्य किरदार। इसी बीच निर्देशक ने बड़ी ख़ूबसूरती से अपनी बात कहने का माध्यम चुना है- ख़त। तीनों किरदारो के एक-दूसरे को लिखे गये पत्रों के माध्यम से निर्देशक फ़िल्म की पॉलिटिक्स बताता है। ये पत्र एक ऐसे कथानक को आधार प्रदान करते हैं, जिसमें व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के साथ-साथ, किरदारों के मन की उथल-पुथल और उनके मध्य प्रेम की अंतरंगता भी दर्शाता है।
फ़िल्म पर व्यापक चर्चा
इस फ़िल्म को (फिल्म निर्माता) बसु चटर्जी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय पुरस्कार जूरी ने अस्वीकार कर दिया था। फ़िल्म उद्योग को लगा था इसे अकादमी पुरस्कारों के लिए भेजा जाएगा, लेकिन यह ‘पहेली’ (2005) से हार गयी। लेकिन ‘हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी’ कई फ़िल्म समारोहों में गयी और हर जगह पुरस्कार जीते। फ़िल्म निर्माता के अनुसार, “एक फ़िल्म, पुरस्कारों से बड़ी होती है। एक फ़िल्म की कसौटी यह है कि वह समय के साथ अपने दर्शकों के लिए मायने रखती है और नये दर्शकों को आकर्षित करती रहती है।”
जिस प्रकार ‘हासिल’ में पॉलिटिक्स, आम इंसानों के आपसी प्यार में कैसे दख़लअंदाज़ी करती है, वैसे ही ‘हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी’ में आपातकाल और उस दौर की राजनीति फ़िल्म के किरदारों के जीवन में दख़लंदाज़ी करते नज़र आते हैं। अब सिनेमाई तौर पर देखा जाये तो सवाल है, इन किरदारों के नीचे से आपातकाल का धरातल हटा दें तो क्या उनका जीवन और आपसी सम्बंध वैसा ही होगा? या बदल जाएगा? इसका जवाब ही यह तय करता है कि हम पॉलिटिक्स में चाहे दख़ल रखें या न रखें, पॉलिटिक्स हमारे जीवन में दख़ल ज़रूर रखती है। इस लिहाज़ से ‘हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी’ एक मुकम्मल पॉलिटिकल फ़िल्म है।
‘लॉस्ट द प्लॉट’ वेबसाइट पर रायसहेली भट्टाचार्य ने फ़िल्म की पॉलिटिक्स को सटीक संदर्भित किया है:
“यह प्रतिष्ठित फ़िल्म आपको अभिभूत और अनिश्चित महसूस करा सकती है, क्योंकि यह भारत का कोई सरल, पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत नहीं करती। रोमांस और छोटी-छोटी जीतों के बावजूद, फ़िल्म क्रांति का महिमामंडन नहीं करती। वास्तव में, यह किसी भी चीज़ का महिमामंडन नहीं करती। लेकिन यह किसी भी चीज़ को नीचा भी नहीं दिखाती। विक्रम को राजनीति से दूर रहने या खुलकर देशभक्त होने के लिए कभी भी दोषी नहीं ठहराया जाता या शत्रुतापूर्ण रूप में चित्रित नहीं किया जाता। यह किसी के प्रति निष्ठा नहीं दिखाती: न राज्य के प्रति, न विचारधारा के प्रति, न क्रांति के प्रति और न ही क्रांतिकारियों के प्रति (फ़िल्म के और इतिहास के)। फ़िल्म की एकमात्र निष्ठा हमारे इतिहास के उस काल के प्रति है, उन वर्षों में जो कुछ हुआ और देश के युवाओं पर उसका जो प्रभाव पड़ा। ‘सत्ता-विरोधी’, ‘वामपंथी’ या हाल ही प्रचलित ‘राष्ट्र-विरोधी’ जैसे लेबलों से मुक्त, क्योंकि यह फ़िल्म सूक्ष्मता और निष्पक्षता से भरी है। ‘हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी’ अपनी पहली रिलीज़ के 15 साल बाद और इसकी घटनाओं के 45 साल बाद भी पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक बनी हुई है।”
सुधीर मिश्रा का निडर और बेबाक राजनीतिक ड्रामा तीन अलग-अलग किरदारों और उनके नैतिक मूल्यों की पड़ताल करता है, जो एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और सामाजिक-राजनीतिक परिवेश से प्रभावित हैं। बहुत कम फ़िल्में ऐसी होती हैं, जो किसी ख़ास युग के सच्चे पलों, लोगों, उनके जीवन और विचारधाराओं के साथ उनके संघर्ष को इतने सुंदर और प्रामाणिक तरीक़े से सफलतापूर्वक दर्शाती हैं।
और यह ट्रिविया भी…
फ़िल्म के एक सीन में जहाँ एक हवेली को होटल बनाने के लिए डील होनी है, वहाँ दो भाइयों का किरदार है। एक भाई पागल है, जो इस डील का विरोध करता है और दूसरा इस डील में शामिल है। ये दोनों किरदार एक ही ऐक्टर ने निभाये हैं। निर्देशक सुधीर मिश्रा ने बड़ी चालाकी से एक किरदार का क्लोज़ अप ही नहीं लिया।

मानस
विवेक त्रिपाठी उर्फ़ मानस पूर्व बैंककर्मी हैं लेकिन फ़िल्मों के जुनून ने नौकरी छुड़वायी और फ़िल्में बनाने की दिशा में प्रेरित किया। आधा दर्जन शॉर्ट फ़िल्में बना चुके मानस की कुछ फ़िल्मों को फ़ेस्टिवलों में सराहना व पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म लेखन व निर्देशन के अलावा मानस का एक कहानी संग्रह 'बालकनी' प्रकाशित है। इन दिनों वह पूरी लंबाई की फ़िल्म के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं।
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