kamleshwar, balkavi bairagi, caricature
पाक्षिक ब्लॉग विवेक मेहता की कलम से....

नामचीन साहित्यकारों की चुटकियां-4

             पिछली कड़ियों में हिंदी साहित्य जगत के स्वनामधन्य लेखकों/कलमकारों के बीच के चुटकुलों/कटाक्ष/हास्य लहरियों को यहां प्रस्तुत किया गया, जिसे पाठकों ने पसंद किया। रस-परिवर्तन के लिहाज़ से हिंदी पट्टी से बाहर के लेखकों के भी ऐसे प्रसंग पेश किये जा चुके हैं। इस बार पढ़िए फिर हिंदी पट्टी के चर्चित नामों से जुड़ी कुछ रंग-बिरंगी यादें। विशुद्ध हास्य-व्यंग्य से गुदगुदाने का काम यह प्रस्तुति कर रही है, ऐसी आशा है। अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत करवाते रहिए…

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टाइमपास

नागपुर में हुए पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान एक गोष्ठी का संचालन कमलेश्वर कर रहे थे। अध्यक्ष थे फ़िजी के विवेकानंद, राजेंद्र यादव तथा अमृत राय। कमलेश्वर ने एक कथा सुनायी – “ट्रेन में दो व्यक्ति एक-दूसरे से परिचय कर रहे थे। उनकी बातों से पता चला कि वे दोनों दिल्ली के एक ही मुहल्ले की एक ही बिल्डिंग के एक ही कमरे में रहते हैं। आश्चर्य से पूछने पर उन्होंने बताया कि वे दोनों बाप-बेटे हैं और वक़्त काटने के लिए एक-दूसरे से परिचय कर रहे हैं।”

गोष्ठी के समाप्त होने पर दो श्रोताओं ने अमृत राय को अध्यक्षीय भाषण के लिए बधाई दी। अमृतराय ने पूछा, “आप कहां से आये हैं?”
“दिल्ली से।”- एक ने कहा।
“और आप?”
“दिल्ली से।”- दूसरे ने जवाब दिया।
“बस-बस, मैं समझ गया, आप दोनों बाप-बेटे हैं।”-अमृत राय बोले।

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हाज़िरजवाबी

कवि सम्मेलनों, संसद के कार्यों से मुक्त होकर बालकवि बैरागी जब मनासा आते, रविवार/छुट्टी का दिन होता तो कहानीकार, लेखक मंगल मेहता को बुलावा आ जाता। गप्प गोष्ठी चलती। ऐसे ही मज़ाक़ में बैरागी ने एक दिन सवाल दागा- “मंगल जी तुममें और मुझमें क्या समानता है?”
“तुम नंदरामदास से बालकवि बने और मैं, मांगीलाल से मंगल बना।”
“और हममें क्या असमानता है?”
“तुम्हारे पिता जवान नहीं हैं, मेरे पिता हैं।”
कमरे में ज़ोर का ठहाका गूंजा। मंगल मेहता के पिताजी का नाम जवानमल था। बैरागीजी के पिताजी द्वारकादास थे।
फिर कांग्रेसी विचारधारा के बैरागी ने लोहियावादी मेहता से पूछा- “समाजवादियों की पहचान क्या है?”
“किसी समाजवादी को कुछ समय के लिए एक कमरे में अकेला बंद कर दो। बाद में निकालो तो उसके बाल बिखरे होंगे, कपड़े मुड़े-तुड़े होंगे। उसका अंतर्विरोध ही इतना होता है कि कोई सामने नहीं होता तो वह ख़ुद ही, ख़ुद से लड़ता रहता है।”- मेहता ने जवाब दिया।

फिर से ठहाका गूंजा।

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कोई जल्दी नहीं

नागपुर के पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान एक कवि अपना विशाल महाकाव्य लेकर बालकवि बैरागी के कमरे में गया और बोला, “बैरागी जी, कृपया इसे पढ़कर अपनी राय दें।”

“अरे बाप रे, मैं तो थोड़ा-सा पढ़ते ही मर जाऊंगा।”- महाकाव्य की ओर देखते हुए बैरागी ने जवाब दिया।

“मुझे कोई जल्दी नहीं, आप चार-पांच जन्मों में किस्तों में पढ़िए, चलेगा।” कवि महोदय बोले।

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बेहतर जानवर की तलाश

सम्मेलन के दौरान राम सहाय पांडेय के कमरे में बंबईया (अब मुम्बईया) मित्रगण गपशप कर रहे थे कि महिलाओं का एक झुण्ड धर्मवीर भारती को खोजते हुए आया। ऑटोग्राफ़ वग़ैरह लेने के बाद एक पाठिका ने पूछा, “भारती जी, आपने ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ के बाद कोई उपन्यास क्यों नहीं लिखा?”

“इन्हें उससे बेहतर किसी जानवर की तलाश है!” महावीर अधिकारी ने पीछे से धीरे-से उत्तर दिया।

विवेक मेहता, vivek mehta

विवेक मेहता

पॉलिटेक्निक के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष पद से सेवा-निवृत्त। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से प्रसारित भी। कुछ समाचार-पत्रों के कॉलम किस्से बदरंग कोरोना के संग, 'वेताल कथाएँ', 'बेमतलब की चर्चित रहे। संपर्क: 94272 67470

2 comments on “नामचीन साहित्यकारों की चुटकियां-4

  1. बढ़िया है। इस क्रम को बनाए रखना।

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