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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आलोक त्रिपाठी की कलम से....

ऐसे ग़ायब हो गया आपका 'असली' खाना

             क्या सिर्फ़ मुझे लग रहा है — या असली बीज वाली सब्ज़ियाँ और फल गायब हो चुके हैं?

अगर आप ध्यान से देखें, तो यह बदलाव सिर्फ़ एक उत्पाद तक सीमित नहीं है। आज लगभग हर सब्ज़ी और फल — टमाटर, बैंगन, भिंडी, मिर्च, तरबूज़, पपीता — एक जैसे दिखते हैं। आकार समान, चमक ज़्यादा, बीज कम और स्वाद कमतर। और एक और बदलाव जो बहुत लोगों ने महसूस किया है: पहले सब्ज़ियाँ और फल सूखते थे, अब वे सीधे सड़ जाते हैं।

यह बदलाव किसी एक फसल का नहीं, बल्कि पूरी कृषि व्यवस्था के बदलने का संकेत है। भारत में सब्ज़ियों में हाइब्रिड किस्मों का हिस्सा आज कई क्षेत्रों में 80-90% तक पहुँच चुका है। इसका मतलब है कि जो आप मंडी या ठेले पर देखते हैं, वह मुख्यतः कुछ चुनिंदा हाइब्रिड लाइनों का आउटपुट है, न कि सैकड़ों स्थानीय क़िस्मों का।

पारंपरिक खेती से हाइब्रिड मॉडल तक

पहले भारत में खेती स्थानीय क़िस्मों पर आधारित थी। हर क्षेत्र की अपनी सब्ज़ियाँ और फल होते थे, जिनका स्वाद, बनावट और उपयोग अलग होता था। किसान अपने बीज ख़ुद बचाते थे और पीढ़ियों तक वही बीज चलता था। यह प्रणाली विविधता पर आधारित थी। लेकिन धीरे-धीरे “हाई यील्ड” और “हाइब्रिड” मॉडल को बढ़ावा मिला। किसानों को अधिक उत्पादन, रोग प्रतिरोध और बेहतर बाज़ार मूल्य का वादा किया गया। यह बदलाव अचानक नहीं था, लेकिन एक बार शुरू होने के बाद तेज़ी से फैल गया।

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टाइमलाइन: बदलाव कब तेज़ हुआ?

भारत में यह परिवर्तन तीन चरणों में हुआ:

1990s (उदारीकरण के बाद)
• निजी बीज कंपनियों को विस्तार मिला
• सब्ज़ियों में हाइब्रिड रिसर्च तेज़ हुई

2000–2010
• हाइब्रिड टमाटर, मिर्च, भिंडी का बड़े पैमाने पर प्रसार
• राज्यों के कृषि विभाग और KVKs ने “high-yielding varieties” को बढ़ावा दिया

2010–2020
• सप्लाई चेन लंबी हुई (inter-state transport)
• मंडियों में uniform grading कड़ा हुआ
• स्थानीय क़िस्में तेज़ी से गायब

कौन खिलाड़ी (players) शामिल थे?

यह बदलाव किसी एक कंपनी या एक निर्णय से नहीं हुआ। इसमें चार प्रमुख समूह थे। इन संस्थानों ने समय के साथ “recommended varieties” की सूची जारी की, demonstration trials किये और किसानों को high-yielding varieties (HYV) तथा hybrid बीज अपनाने के लिए प्रेरित किया।

महत्वपूर्ण बात यह है कि पारंपरिक क़िस्मों पर कोई औपचारिक प्रतिबंध (ban) नहीं लगाया गया, लेकिन उन्हें सिफ़ारिशों (recommendations) से धीरे-धीरे बाहर कर दिया गया। नतीजतन, जो क़िस्में सूची में नहीं थीं, वे व्यवहार में खेती से ग़ायब होने लगीं।

 

नीति स्तर पर, Protection of Plant Varieties and Farmers’ Rights Act का उद्देश्य breeder innovation को बढ़ावा देना था, लेकिन इसके प्रभाव में निजी कंपनियों को अधिक अधिकार मिले। formal seed system मज़बूत हुआ और community-based seed systems कमज़ोर पड़ गये। इसके साथ ही मंडी और सप्लाई चेन की संरचना ने भी इस बदलाव को तेज़ किया।

भारत की APMC मंडियों में grading standards लागू होते हैं, जहाँ uniformity, firmness और transport survival को प्राथमिकता दी जाती है। पारंपरिक क़िस्में, जो जल्दी ख़राब होती हैं, आकार में असमान होती हैं और लंबी दूरी के परिवहन में टिक नहीं पातीं, उन्हें या तो अस्वीकार (reject) कर दिया जाता है या बहुत कम क़ीमत मिलती है।
इसी वजह से जो बदलाव आपको दो-तीन साल में अचानक दिखा, वह वास्तव में एक tipping point था — एक ऐसा चरण जहाँ पारंपरिक क़िस्में पहले से ही कमज़ोर हो चुकी थीं और सिस्टम के दबाव में तेज़ी से पूरी तरह ग़ायब हो गयीं।

बीज नियंत्रण: असली बदलाव यहीं हुआ

हाइब्रिड बीजों की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उन्हें किसान दोबारा इस्तेमाल नहीं कर सकता। हर सीज़न नया बीज खरीदना पड़ता है। इसका सीधा असर यह हुआ कि पारंपरिक बीज बचाने की संस्कृति कुछ ही वर्षों में ख़त्म हो गयी। किसान लगातार हाइब्रिड पर निर्भर हो गया। यह किसी क़ानून से नहीं हुआ, बल्कि उपलब्धता ख़त्म होने से हुआ। आज कई क्षेत्रों में किसान चाहकर भी पुराने बीज नहीं ढूँढ़ सकता।

भारत में कुछ एनजीओ और उद्यमी अभी भी पारंपरिक/देशी बीजों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, जैसे अन्नदाता सीड बैंक (Auroville), जो हज़ारों ग़ैर-हाइब्रिड क़िस्मों को संरक्षित करता है; नवदान्य नेटवर्क, जिसे Vandana Shiva ने शुरू किया और जो 20+ राज्यों में बीज विविधता बचाने पर काम करता है; पाभोई ग्रीन्स (पूर्वोत्तर भारत), जो ऑर्गेनिक और दोबारा उगाये जा सकने वाले बीज देता है; और सीड्स ऑफ इंडिया, जो पारंपरिक बीजों का संग्रह उपलब्ध कराता है। इसके अलावा बीज बचाओ आंदोलन जैसे स्थानीय प्रयास भी कई राज्यों में सैकड़ों देशी क़िस्मों को संरक्षित कर रहे हैं।

मंडी और सप्लाई चेन की भूमिका

अक्सर लोग सोचते हैं बाज़ार वही देता है जो ग्राहक चाहता है। लेकिन असल में मंडी और सप्लाई चेन यह तय करती है कि क्या बिकेगा। मंडियों को ऐसी फसल चाहिए, जो लंबी दूरी तक ख़राब न हो, एक जैसी दिखे और जल्दी ख़राब न हो। हाइब्रिड क़िस्में इन्हीं ज़रूरतों के लिए बनायी जाती हैं — मोटी त्वचा, कड़ा गूदा, एकरूप आकार। पारंपरिक क़िस्में, जो नर्म होती हैं और जल्दी ख़राब होती हैं, इस सिस्टम में टिक नहीं पातीं। नतीजा यह हुआ कि किसान वही उगाने लगा जो मंडी लेती है, और मंडी वही लेती है जो सप्लाई चेन संभाल सकती है।

शहरों का खाना अब स्थानीय नहीं रहा

पहले शहरों को आसपास के खेतों से सप्लाई मिलती थी। अब अधिकतर शहर कुछ चुनिंदा उत्पादन क्षेत्रों पर निर्भर हैं, जहाँ बड़े पैमाने पर एक ही तरह की फसल उगायी जाती है। यह फसल सैकड़ों किलोमीटर दूर तक भेजी जाती है। इसलिए जो भी शहर में आता है, वह स्वाद या स्थानीय पसंद के आधार पर नहीं, बल्कि ट्रांसपोर्ट और स्टोरेज के हिसाब से चुना जाता है। इसीलिए चाहे आपके शहर में कोई प्रोसेसिंग यूनिट हो या न हो, आपको वही टमाटर मिलेगा जो पूरे देश में सप्लाई हो रहा है।

सड़ना बनाम सूखना: यह मामूली संकेत नहीं

एक बहुत महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि पहले फल और सब्ज़ियाँ समय के साथ सूख जाती थीं — सिकुड़ती थीं, पर टिकती थीं। आज वे जल्दी सड़ जाती हैं, फफूंद लगती है और गंध आने लगती है। इसका कारण सिर्फ़ स्टोरेज नहीं है। हाइब्रिड क़िस्मों को अधिक पानी, वज़न और दिखावट के लिए तैयार किया जाता है। इनमें ठोस पदार्थ (dry matter) कम होता है और ऊतक (tissue) नर्म होते हैं। ऐसे में वे प्राकृतिक रूप से “एज” नहीं करते, बल्कि जल्दी टूटते और सड़ते हैं। यानी हमने ऐसी फसलें विकसित की हैं जो दिखने में अच्छी हैं, लेकिन टिकाऊ नहीं हैं।

स्वास्थ्य का पहलू

यह बदलाव सिर्फ़ स्वाद तक सीमित नहीं है। पारंपरिक फसलें अक्सर धीरे-धीरे पकती थीं, जिससे उनमें प्राकृतिक रसायन (phytochemicals), एंटीऑक्सीडेंट और पोषक तत्व विकसित होते थे। तेज़ी से बढ़ने वाली और जल्दी तोड़ी जाने वाली हाइब्रिड फसलों में यह प्रक्रिया कम समय में होती है। इसका मतलब यह नहीं कि वे “ख़राब” हैं, लेकिन उनकी पोषण गुणवत्ता और विविधता पहले जैसी नहीं रहती। खाना पेट भर सकता है, लेकिन शरीर को वही गुणवत्ता नहीं मिलती, जो पहले मिलती थी।

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यह बदलाव हुआ कैसे?

यह किसी एक संस्था या एक निर्णय का परिणाम नहीं है। इसमें कई स्तर शामिल हैं:

  • • निजी बीज कंपनियाँ, जिन्होंने हाइब्रिड विकसित किये
  • • सरकारी कृषि सलाह (extension), जिसने इनकी “सिफ़ारिश” की
  • • मंडी सिस्टम, जिसने इन्हें स्वीकार किया
  • • बैंक और बीमा प्रणाली, जिसने इन्हें सुरक्षित विकल्प माना

इन सभी ने मिलकर एक ऐसी दिशा बनायी जिसमें पारंपरिक क़िस्में टिक नहीं सकीं। इसलिए जब आपको लगता है कि “असली” टमाटर या अन्य सब्ज़ियाँ गायब हो गयी हैं, तो यह सिर्फ़ आपकी कल्पना नहीं है। यह एक संरचनात्मक बदलाव है। अब हम जो खाते हैं, वह सिर्फ़ हमारी पसंद से तय नहीं होता, बल्कि उस पूरे सिस्टम से तय होता है जो खेत से लेकर शहर तक काम करता है।

और यही सबसे बड़ा बदलाव है — हमारा खाना अब हमारा “चुनाव” कम, और “सिस्टम का परिणाम” ज़्यादा बन चुका है।

 

डॉ. आलोक त्रिपाठी

डॉ. आलोक त्रिपाठी

2 दशकों से ज्यादा समय से उच्च शिक्षा में अध्यापन व शोध क्षेत्र में संलग्न डॉ. आलोक के दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित हैं और अब तक वह 4 किताबें लिख चुके हैं। जीवविज्ञान, वनस्पति शास्त्र और उससे जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ. आलोक वर्तमान में एक स्वास्थ्य एडवोकेसी संस्था फॉर्मोन के संस्थापक हैं।

1 comment on “ऐसे ग़ायब हो गया आपका ‘असली’ खाना

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