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पाक्षिक ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से.....
सिकन्दर के देश में, स्त्रुगा की काव्य संध्या
ज़्यादातर आक्रमणकारी दुश्मनी के दायरे में आ जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे हैं जो दिलों के तार जोड़ते जाते हैं। सिकन्दर संभवतया उन कपितय योद्धाओं में अग्रणी माना जा सकता है। पता नहीं यह सिकन्दर की आत्मा है या फिर इस देश की मिट्टी, जो आज भी पुरातन कलाओं और संस्कृति के प्रति जागरूक है। सिकन्दर की जन्मभूमि मैसिडोनिया के एक छोटे से प्रान्त में नदी और झील के संगम में कविता की जो लहर 1962 में शुरू हुई, वह आज भी बह रही है। इसे Struga Poetry Evening के नाम से जाना जाता है।
मैसिडोनिया की ख़ूबसूरत झील Ohrid है, और इसे काटती हुई नदी Drin है, इसके ऊपर ख़ूबसूरत पुल है, जिस पर हर वर्ष अगस्त के महीने में पोइट्री फेस्टिवल मनाया जाता है, जो यहाँ से शुरू होकर मैसिडोनिया के अन्य शहरों में फैल जाता है। सबसे पहले 1962 में मैसिडोनिया के प्रसिद्ध कवि Konstantin और Dimitar Milndinar के सम्मान में इस फ़ेस्टिवल की शुरूआत हुई थी। फ़ेस्टिवल के आरंभ में मैसिडोनिया के प्रसिद्ध कवि का लोकप्रिय गीत गाया जाता है, Tgaza gug ke, जिसे उन्होंने रूस में युवाकाल में रहते हुए लिखा था, इसका अर्थ है दक्षिण की यादें। यह गीत आज तक कार्यक्रम के आरम्भ में गाया जाता है।
49वें पोइट्री फ़ेस्टिवल में विश्व के साठ कवियों के साथ मैसिडोनिया के क़रीब पचास कवियों ने भाग लिया, कवियों का चयन पूर्व प्रतिभागियों की सलाह पर किया गया। मेरा नाम मैसिडोनिया के निकोला और वियेना के पीटर दोनों ने दिया था।
जब मुझे आमन्त्रण मिला तो मैं इसलिए भी उत्साहित थी कि सिकन्दर के देश में जाने का मौक़ा मिलेगा। इस बार वीज़ा की ज़्यादा परेशानी नहीं हुई। बस समस्या यह थी कि मुझे दो वीज़ा लेने पड़े क्योंकि पीटर ने वियेना में आयोजित Hofleier Donavweilen Festival में भाग लेने के लिए भी आमन्त्रित किया, जो स्त्रुगा के तुरन्त बाद होने वाला था। कृत्या फ़ेस्टिवल की तैयारी ने मुझे ज़्यादा सोचने का समय नहीं दिया, बस किसी तरह सामान बाँध कर इस्तान्बुल के रास्ते स्त्रुगा पहुँच गयी।

यह आयोजन इतना पुराना है कि आयोजन की रूपरेखा निश्चित हो गयी है। नदी और झील के तीर पर एक होटल है, जिसे नदी के नाम पर द्रिन होटल के नाम से जाना जाता है। फ़ेस्टिवल के लिए ख़ासतौर से बनवाया गया है। बेहद ख़ूबसूरत होटल, गोलाकार, बीच में खुलता-सा आँगन। मेज़बानों के नाम पर ज़्यादातर युवा लड़कियाँ, जो बेहद चुस्ती से काम कर रही थीं। मेरे लिए सब कुछ नया-नया-सा था, भाषा की समस्या थी, क्योंकि अंग्रेज़ी जानने वाले गिनती के थे, हाँ यदि फ्रेंच और जर्मन आती तो शायद काम चल जाता।
मैं क़रीब 18 घंटे से घर से बाहर थी, इसलिए कमरे में जाकर नहाना और सोना ही सबसे बड़ा काम लग रहा था। समय का भान मिट गया था, मैं कुछ पता लगाने के लिए नीचे गयी तो पता चला खाना लग गया है, हम जाकर भोजन कर सकते हैं। भौजनशाला में तरह-तरह के यूरोपीय पकवान थे, ज्यादातर मांसाहारी। लेकिन फल देखने लायक़ थे, मैंने फलों पर ज़ोर देकर थोड़ा-बहुत खाया और कमरे में आ गयी, दूसरे दिन हमें क़रीब नौ बजे हॉल में इकठ्ठा होने की सूचना दी गयी थी।
19 अगस्त 2010
अभी सारे कवि नहीं आ पाये थे, लेकिन जो थे, वे सब नदी के मुहाने पर चलते हुए एक उपवन में जा पहुँचे। यहाँ अभी तक के “Golden Wreath” सम्मान से सम्मानित कवियों ने पौधे रोपे थे, जिनमें से कुछ अच्छे-ख़ासे दरख़्त बन चुके थे। मैं अज्ञेय जी द्वारा रोपा दरख़्त खोजना चाहती थी, लेकिन खोज नहीं पायी। मैं सोच रही हूँ हमारे देश के कितने पाठकों या कवियों को जानकारी भी है कि यह पुरस्कार अभी तक मात्र एक भारतीय कवि को मिला है जिनका नाम अज्ञेय है।
वस्तुतः गोल्डेन रीथ पुरस्कार विश्व का सबसे बड़ा पुरस्कार है जो मात्र कविता के लिए है। यह सम्मान कवियों के लिए नोबेल पुरस्कार से भी बड़ा है। जब इस बार के विजेता Lyudomir Levcev ने पौधा रोपा तो मैंने भी एक फावड़ा मिट्टी अपने देश के नाम से डाल दी। मन में अज्ञेय जी को प्रणाम किया। इसके बाद हम लोगों को नदी के तट पर जलपान के लिए इकट्ठा किया गया। तभी एक टीवी प्रोड्यूसर ने मुझसे आकर कहा कि वे उन कवियों का साक्षात्कार करना चाहते हैं, जो दूर देशों से आये हैं। यूरोपीय कवि तो साधारणतया आते ही रहते हैं, एशिया से किसी का आना मायने रखता है। मुझे अच्छा लगा कि उनकी फ़िल्म की शुरूआत भारत से हुई। इन्टरव्यू अच्छा रहा, दरअसल उन्होंने भारतीय कवियों के बारे में पूछा ही नहीं था, वे तो बस अपने देश और धरती के बारे में राय जानना चाह रहे थे।
इसके उपरान्त प्रेस रिलीज़ था, जिसमें पुरस्कृत कवि से सवाल किये जाते थे। मैंने भी एक सवाल पूछा कि इस ज़मीन पर पैर रखते ही मुझे ऐसा लगा कि यह देश भी अपने पड़ोसी देशों के द्वारा वैसा ही बर्ताव झेल रहा है जैसा कि भारत। यानी विरोध की राजनीति और आतंकवादी समस्या इस देश में भी है, क्या हम सब कवि मिलकर स्नेह और भाईचारे का आह्वान करेंगे? मेरा सवाल अनुवाद द्वारा सम्मानीय कवि को पहुँचा दिया गया। उनका जवाब काफ़ी कुछ पुस्तकीय-सा लगा… भारत दर्शन की भूमि है, जो प्यार और भाईचारे का संदेश देती है। आपके यहाँ अमृता प्रीतम थीं, जिन्होंने प्रेम की कविताएँ लिखीं आदि-आदि।
मैं जवाब से संतुष्ट नहीं थी, लेकिन यह जानकर प्रसन्नता हुई कि अमृता प्रीतम को चाहने वाले यहाँ भी हैं। प्रेस रिलीज़ के बाद वाइन पार्टी थी, कुछ उन कवियों से मुलाक़ात हुई, जिन्हे मैं कृत्या के कारण पहले से जानती थी, लेकिन मिली नहीं थी। वाइन के साथ कॉफ़ी चबैना था, वह भी मेवे का, चबा लिया और दोपहर के भोजन की छुट्टी कर नींद पूरी करने चली गयी। अभी तक हमें मालूम नहीं था कि हमें कब कविता पढ़ना है और कौन-सी।
शाम को हमें सूचना मिली कि मेरा नाम भी आरंभिक सत्र में पढ़ने वालों में है। मैं अपने साथ एक काली साड़ी लायी थी, हालाँकि ज़ेवर कुछ नहीं रखा था, पिछली यात्रा में हुई चोरी से डरी हुई थी, इसलिए काफ़ी कम सामान लायी थी। तब तक पता चला मुझे ‘भाषा’ नामक कविता पढ़नी है। ओपनिंग से पहले फिर वाइन पार्टी थी, अब तक काफ़ी लोग आ चुके थे, कुछ जाने-पहचाने लोग भी थे, जैसे मरीना, ओदिवे आदि।
इसके बाद हमारा काफ़िला नदी के किनारे चल दिया, सैकड़ों लोग हमारे साथ थे, हम मस्ती में चले जा रहे थे। एक थिएटरनुमा इमारत, जिसका नाम ‘House of Poetry’ था, के सामने जाकर रुक गये। वहाँ पूरे यूरोप से पत्रकार जुटे हुए थे, हर पल रोमांचकारी लग रहा था। अचानक मैसिडोनिया की मस्त-सी धुन बजने लगी। लाल काफ्तान पहने क़रीब दस-बीस लड़कियाँ हाथ में मशाल लिये थिएटर की सीढ़ियों पर दोनों ओर खड़ी हो गयीं, तभी सांस्कृतिक मन्त्री ने आकर मशाल जलायी।
काफ़ी कुछ ग्रीक की ओलंपिक मशाल जैसा ही। मशाल जलते ही पास के ग्राउंड में आतिशबाज़ी शुरू हो गयी। हज़ारों की संख्या में लोग घेरा बनाकर खड़े थे, बच्चों से लेकर बूढ़े तक। इस उत्सव के प्रति कितना प्यार है यहाँ के आम आदमी के मन में, इसकी जानकारी मुझे सुबह ही मिल गयी थी, जब मैंने एक वृद्ध व्यक्ति को स्कूल की नोटबुक हाथ में लिये हम सब कवियों के हस्ताक्षर लेते देखा था।
अनेक हलचलों के बाद कविता पाठ आरंभ हुआ। आयोजकों की कुछ ख़ामियाँ तो रह गयी थीं, कविता मूल भाषा में पढ़ी गयी, उसका अनुवाद मैसिडोनियन भाषा में स्क्रीन पर दिखाया गया। अनुवाद पढ़ने का इंतज़ाम शायद नहीं हो पाया था। जो भी हो, पाठ बेहद उम्दा हुआ। सारे कार्यक्रम का देश भर में सीधा प्रसारण हुआ था। कविता पाठ समाप्त होते-होते आधी रात बीत गयी, लेकिन स्त्रुगा अभी जाग रहा था, रात भर कवियों का पाठ जो चलना था, जिसका नाम था ‘Night without Punctuation’ जिसमें Esonia के युवा कवि Siim Kera की कविताओं का पाठ था। हर वर्ष एक युवा कवि की पहली पुस्तक को पुरस्कार मिलता है, इस बार उन्हें मिला था, जिसे ‘Struga Bridge Award’ के नाम से जाना जाता है। बाद में संगीत का कार्यक्रम भी था।
20 अगस्त 2010
दूसरे दिन की शुरूआत सिम्पोसिअम से थी। विषय था, मीडिया और कविता। जैसा प्रायः होता है, श्रोताओं की उपस्थिति काफ़ी कम थी। अधिकतर पाठ मैसिडोनियन भाषा में हुआ, जैसा प्रायः भारत में होता है, देशीय भाषा में प्रस्तुत लेख काफ़ी खिंच जाते हैं। मेरा नम्बर बहुत बाद में आया। मुझसे पहले आयरलैंड के Gabriel Rosenstock ने लम्बे भाषणों पर व्यंग्य कसते हुए कहा “मेरा भाषण भी काफ़ी लम्बा था। लेकिन मैंने कल अपनी कमीज़ धुलने को दी, तो भूल से मेरा लेख भी उसकी जेब में रह गया, तो वह भी सिकुड़ गया।”
उनका यह व्यंग्य हम विदेशी वक्ताओं के कम लम्बे भाषण का आधार बन गया। इस उत्सव में मैसिडोनिया के युवा कवियों को बड़ा आयाम देने का काम भी होता है। हर वर्ष उनकी कविताओं का विदेशी भाषा में अनुवाद करवाया जाता है। इस बार सारा अनुवाद Flaman भाषा में करवाया गया था।
शाम को कुछ कवियों ने प्रोग्राम बनाया कि सब ओहरिद झील के केन्द्र ओहरिद नामक स्थान पर जाएँ, जहाँ अनेक भग्नावशेष हैं, यह यात्रा कुछ अलग थी क्योंकि हमारा मैसिडोनिया का साथी निकोला हमें उन जगहों पर ले जा रहा था, जो उसे प्रिय थीं। हम छोटे-से नगर में घूमने लगे, यह नगर एक छोटी-सी पहाड़ी पर बसा हुआ है। अधिकतर पुराने मकान, लोग बेहद ही खिले-खिले, हँसमुख। झील के किनारे अनगिनत रेस्टोरेंट, जिनसे गाने की आवाज़ आ रही थी, कहीं-कहीं लोग नाच गा रहे थे, एक मस्ती, जैसे शाम बस नाचने-गाने के लिए है।
एयरपोर्ट से आते वक़्त मेरी बातें ड्राइवर से हुईं तो मालूम पड़ा था कि मैसिडोनिया ग़रीब देश की श्रेणी में आता है। सिकन्दर के वक़्त इसकी सीमाएँ ग्रीस, अल्बानिया और बुल्गारिया के कई हिस्सों तक फैली हुई थीं। लेकिन वक़्त के साथ यह सिकुड़कर छोटा-सा रह गया। निकोला कहता है उसकी माँ ने बिना अपनी जगह से हिले कई देश बदल लिये हैं। इस वक़्त मैसिडोनिया के पास काफ़ी कम हिस्सा रह गया है। जितना हिस्सा है उसमें भी जनसंख्या कुछ ज़्यादा नहीं है, बेरोज़गारी और अशिक्षा की भी कमी नहीं। बड़ी उपजाऊ ज़मीन, इतनी कि वे पूरे यूरोप का पेट भर दें, लेकिन लोग ज़मीन से टूट रहे हैं, सफ़ेद कॉलर नौकरियों की तलाश में दुनिया घूम रहे हैं।
राजनीति भी यहाँ कम नहीं, ड्राइवर बता रहा था यहाँ दो धर्मों को मानने वाले लोग हैं, जब राजनीतिज्ञ देश की आर्थिक समस्याओं का हल नहीं खोज पाते तो दोनों धर्मों के बीच आग लगा देते हैं। आम आदमी मेल भाव से रहना चाहता है, इसलिए सोचता है पेट भर रोटी मिले या नहीं, कोई बात नहीं। लड़ाई-झगड़े तो न हों… लेकिन बीच में जिस तरह से लोगों की भीड़ थी, ऐसा लग ही नहीं रहा था कि लोगों को ग़म है। कभी दुःखों की बहुतायत स्वाभाविक रूप से उत्सव के माहौल की ओर धकेल देती है। वही जीवन रस देती है।

रति सक्सेना
लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।
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