सिनेमा को जन-जन तक ले गये मदन की दास्तान
पाक्षिक ब्लॉग चारु शर्मा की कलम से....

सिनेमा को जन-जन तक ले गये मदन की दास्तान

           नमस्कार साथियो, सिनेमा की दुनिया में दो चीज़ें सबसे महत्वपूर्ण हैं, पहली फ़िल्में यानी कि सिनेमा और दूसरी हम उनको कहाँ देखें। आज से दो दशक पहले तक हम सब फ़िल्म देखने के लिए सिनेमाघर यानी कि थिएटर ही जाया करते थे। अब इस रिवाज में थोड़ा परिवर्तन आया है कि अब सिनेमा हमारे हाथ में यानी हमारे मोबाइल, लैपटॉप इत्यादि के ज़रिये हम तक पहुंच गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं जब फ़िल्में बननी शुरू हुई थीं, तब हर कोई सिर्फ़ फिल्म बनाने के बारे में सोच रहा था और बना भी रहा था लेकिन सिर्फ़ एक आदमी था, जो फ़िल्मों के प्रदर्शन और बाज़ार के बारे में सोच रहा था।

जब भारत में सिनेमा सिर्फ़ एक नवजात सपना था, तब एक आदमी था, जिसने समझ लिया था कि यह सपना सिर्फ़ परदे पर नहीं, बल्कि एक पूरे उद्योग का भविष्य बनने वाला है। उसका नाम था जमशेदजी फ़्रामजी मदन Jamshedji Framji Madan— एक ऐसा दूरदर्शी जिसने थिएटर, सर्कस और फ़िल्म को जोड़कर भारतीय मनोरंजन की पहली बड़ी कमर्शियल दुनिया खड़ी कर दी। क्या आप जानते हैं उनकी पूरी कहानी?

जेएफ़ मदन का जन्म 27 अप्रैल 1857 को बम्बई (आज का मुंबई) में एक उच्च मध्यम वर्गीय पारसी परिवार में हुआ था। हालांकि उनके जन्म और परिवार के बारे में बहुत दस्तावेज़ मौजूद नहीं हैं लेकिन इतिहासकारों की मानें तो उनके पिता आर्थिक रूप से बहुत संपन्न व्यक्ति थे। लेकिन बॉम्बे रिक्लेमेशन बैंक के साथ बम्बई के सात द्वीपों के विभाजन के दौरान उनको बहुत अधिक आर्थिक नुक़सान उठाना पड़ा, जिसके चलते परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ गयी। मदन को भी स्कूल छोड़कर एल्फिन्स्टन ड्रामा क्लब में एक प्रॉप बॉय के रूप में काम करना पड़ा।

इससे हुआ यह कि बहुत कम उम्र से ही मदन नाटक, थिएटर, सर्कस और सिनेमा की दुनिया से जुड़ गये। यहाँ वो स्टेज शो नियंत्रित करना, टिकटिंग और अन्य तरह के काम किया करते थे। साल 1882 में उन्होंने एल्फिन्स्टन से काम छोड़ दिया और वह कुछ समय के लिए कारोबारी अवसरों की तलाश में कराची (अब पाकिस्तान का एक शहर) चले गये। उस समय कराची (ब्रिटिश इंडिया के भीतर) एक तेज़ी से बढ़ता हुआ शहर था। लेकिन यहाँ बात नहीं बनी और साल 1883 में उन्होंने कलकत्ता में वापस आकर आर्मी कैन्टोन्मेंट सप्लाई का कारोबार शुरू किया। इस कारोबार में उनको बहुत सफलता तो मिली ही, साथ ही साथ उन्होंने पैसा और नेटवर्क भी मज़बूत किया।

फिर एक दौर आया, जब मदन ने अपने कैरियर की शुरूआत वाली एल्फिन्स्टन ड्रामा कंपनी को खरीदा। वैसे ये कोई एक बार में हुआ सौदा नहीं था, बल्कि पहले उन्होंने इसके आपरेशन कंट्रोल में भागीदारी की, फिर उसमें निवेश किया और धीरे-धीरे अपनी सूझ-बूझ से इसका नेतृत्व करने लगे। एक वक़्त आया जब जमशेद जी इसके प्रमुख नियंत्रक बन गये।

अब समय बदलने लगा था और सिनेमा ने दुनिया और भारत में भी दस्तक दे दी थी। विश्व भर से फ़िल्मों का प्रदर्शन होने लगा था, लेकिन जो एक बात थी वो मदन को खटक रही थी कि अभी तक फ़िल्मों का प्रदर्शन ड्रामा क्लब या स्टेज मंचन की जगहों पर ही किया जाता था। उनके लिए पहले से कोई अलग व्यवस्था नहीं थी। जमशेद जी एक बात पूरी तरह से समझ चुके थे कि सिनेमा भविष्य में मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम बनने वाला है और यहीं उनको एक अवसर नज़र आया, क्यों न फ़िल्मों के लिए अलग से थिएटर बनाये जाएं और उनमें बाहर से लाकर फ़िल्मों को प्रदर्शित किया जाये…

सिनेमा को जन-जन तक ले गये मदन की दास्तान

स्थायी सिनेमाघर बनने की यात्रा

यह एक बहुत महत्वपूर्ण और सिनेमा की स्थिति को बदलने वाला निर्णय था। लेकिन यह इतना आसान भी नहीं था। पहले इसके लिए एक रोडमैप की ज़रूरत थी, उसके बाद क़दम दर क़दम उसको व्यवहारिकता में लाना था।

ब्रिटिश समय से ही कलकत्ता गहन सांस्कृतिक केंद्र था। मदन जी अब फ़िल्मों के प्रदर्शन की तैयारी कर रहे थे। 19वीं सदी के शुरू में सबसे पहले उन्होंने Travelling Bioscope Shows का एक मॉडल बनाया, जिसके तहत कलकत्ता और भारत के दूसरे शहरों में टेंट लगाकर फ़िल्में दिखाना शुरू किया गया। इसके लिए फ्रांस की Pathé Frères कंपनी से कुछ प्रोजेक्शन उपकरण मंगवाये और साथ ही शुरुआत में ज़्यादातर फ़िल्में भी Pathé के प्रोडक्शन की ही दिखायी गयीं।

भारत में ये सभी फ़िल्में Elphinstone Bioscope Company के बैनर के तहत दिखायी जाती थीं। यहीं से भारत में सिनेमा पहली बार “जनसमूह का मनोरंजन” बना। इसे आसान भाषा में समझें तो यह एक पोर्टेबल सिनेमा सिस्टम था, जो शहर से गाँव तक घूम सकता था, जिसमें बड़े टेंट लगाकर पोर्टेबल प्रोजेक्टर सेटअप के ज़रिये विदेशी मूक फ़िल्में दिखायी जाती थीं, जिसके लिए टिकट आधारित सिस्टम होता था।

हालाँकि इसमें दिक्कतें भी आती थीं, मसलन बारिश या तेज़ हवा के चलते टेंट उड़ जाते थे और कई बार शो रद्द भी करने पड़ते थे। इस सबका सबसे बड़ा फ़ायदा हुआ कि मदन जी ने शहरों से गांवों तक एक डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क खड़ा कर लिया, जो बाद में उनके स्क्रीनिंग और डिस्ट्रीब्यूशन के व्यापार का सबसे फ़ायदेमंद सौदा साबित हुआ। इतना ही नहीं टेंट प्रदर्शनों का बड़ा नतीजा यह था कि सिनेमा अब सामूहिक अनुभव बन गया था… पहली बार भारत में यह मनोरंजन संभ्रांत वर्ग से बाहर निकलकर आम लोगों का बन गया।

1907–1910 तक टेंट शोज़ की सफलता के बाद मदन ने एक बड़ा निष्कर्ष निकाला कि अस्थायी टेंट की तुलना में स्थायी इन्फ़्रास्ट्रक्चर ज़्यादा महत्वपूर्ण विकल्प होगा। इस सोच के साथ उन्होंने कलकत्ता में स्थायी सिनेमा हॉल बनाने शुरू किये। नियमित रूप से फ़िल्में आयात कीं, और उनकी नियमित स्क्रीनिंग शुरू की। धीरे-धीरे टिकट आधारित शहरी सिनेमा कल्चर विकसित होने लगा। यही वह मोड़ था, जहाँ सिनेमा शहरों की जीवन शैली बन गया।

इससे क़रीब दस बरस पहले दुनिया के अन्य शहरों में स्थायी सिनेमा हॉल के निर्माण शुरू हो चुके थे। मिचेल एच. मार्क दुनिया के पहले स्थायी सिनेमाघर के निर्माता बन चुके थे। फिर भी यह कारनामा बहुत कम ही हो रहा था, जब भारत में यह सिलसिला शुरू हुआ।

मदन थिएटर्स बन गया इतिहास

1910–1915 के बीच मदन जी ने डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क का निर्माण किया। इस दौरान अब वह सिर्फ शो-मैन नहीं थे, ​बल्कि “फ़िल्म वितरण के जनक” बन चुके थे। उन्होंने पूरे भारत में फ़िल्म सर्किट बनाये, बहुत-से शहरों में एजेंट रखे, जो फ़िल्मों को किराया प्रणाली पर चलाया करते थे। इसका असर हुआ कि एक ही फ़िल्म कई शहरों में एक साथ चलने लगी और सिनेमा एक रिपीटेबल व्यवसाय बन गया।

1915 के बाद जमशेदजी का फ़ोकस तीन बड़े क्षेत्रों में बदल गया… पहला स्थायी सिनेमाहॉल्स का का तेज़ विस्तार, दूसरा अब फ़िल्मों को रैंडम तरीक़े से नहीं दिखाया जाता था बल्कि सोच-समझकर दर्शकों की रुचि को ध्यान में रखकर फिल्में का चयन किया जाता था और तीसरा उनका वितरण नेटवर्क और मज़बूत हुआ और वो पूर्वी भारत, उत्तरी सर्किट, बॉम्बे प्रेसिडेंसी और मद्रास सर्किट में बंट गया। इसके अलावा वो तकनीकी पहलू पर भी काम करते रहे और समय के साथ उन्हें भी मज़बूत देते रहे।

साल 1919 में उन्होंने कलकत्ता में मदन थिएटर्स लिमिटेड की स्थापना की। जो बाद के सालों में भारतीय सिनेमा का पहला संस्थाबद्ध व्यावसायिक साम्राज्य बना। जमशेदजी मदन और कन्हैयालाल कौशल (जो एक व्यापारी थे) इसके प्रमुख भागीदार थे। कंपनी का मुख्य काम फ़िल्म प्रोडक्शन, डिस्ट्रीब्यूशन और प्रदर्शन था।

इतिहास के अनसंग हीरो रह गये मदन

Madan Theatres ने ही सबसे पहले Literature-to-film आंदोलन की शुरुआत भी की। साल 1920 के अंत तक यह कंपनी 127 सिनेमाहॉल का नियंत्रण, भारतीय बॉक्स ऑफ़िस का 50% हिस्सा और बंगाल सिनेमा में अपना प्रभुत्व रखती थी। उनकी कंपनी के तहत कई सिनेमाहॉल चलते थे, जिनके नाम एल्फिन्स्टन थिएटर, कॉर्नवॉलिस थिएटर, क्लासिक मदन बायोस्कोप हॉल्स आदि थे, जो बाद में बदलती ओनरशिप के चलते इतिहास में कहीं खो गये।

जब भारतीय सिनेमा के जनक दादासाहेब फाल्के ने भारत में फ़िल्में बनाना शुरू किया, तो उनकी फ़िल्मों का प्रदर्शन भी मदन थिएटर कंपनी के ज़रिये हुआ। मदन थिएटर कंपनी क़रीब 1930 और उसके कुछ समय बाद तक अपने अस्तित्व में रही और बाद में स्टूडियो कल्चर के चलते उसमें भी बदलाव हुए और नये लोगों ने उसका स्वरूप बदल दिया।

मदन जी की पत्नी एक घरेलू महिला थीं और उनका नाम पीरोजबाई मदन था, हालांकि इतिहासकारों की मानें तो उनके परिवार के बारे में ज़्यादा दस्तावेज़ मौजूद नहीं हैं। उनकी पत्नी और बच्चे थे, जिन्होंने बाद में उनकी कंपनी को संभाला और उसे आगे बढ़ाया। उनके पुत्र जेजे मदन इस पेशे में महत्वपूर्ण साबित हुए, जो भारतीय फ़िल्म निर्माता और निर्देशक के रूप में ख्यात हुए। जेजे मदन अपने पिता के साथ कार्यरत रहे और मूक फ़िल्मों से शुरूआती टॉकी फ़िल्मों तक काम करते रहे।

इतना ही नहीं मदन जी के बाद उन्होंने मदन थिएटर्स लिमिटेड का नेतृत्व भी किया और उसे 20वीं सदी की सबसे बड़ी सिनेमा की कंपनी के रूप में विस्तारित किया। भारतीय अमेरिकी मूल के एक्टर Erick Avari मदन के ही पड़पोते हैं, जिन्होंने दुनिया में अपनी पहचान बनायी।

माना जाता है साल 1920 से 1923 के दौरान जमशेद जी बीमार रहे और 28 जून 1923 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। वो एक विरासत छोड़ गये थे कि कैसे भविष्य के उस व्यवसाय के सपने देखे जाते हैं, जो कला के विस्तार को केंद्र में रखे। जमशेद जी फ़िल्म बनाते नहीं थे लेकिन फैलाते थे। भारत के साथ-साथ उन्होंने भारतीय सिनेमा को विदेशों में पहुंचाया। उन्हें कोई अवॉर्ड या सम्मान नहीं मिला लेकिन आज जो हम फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूशन का एक मॉडल देखते हैं, उसकी नींव में जमशेद जी मदन जैसे नाम गुमनाम होकर रह गये हैं।

दादासाहेब फाल्के ने भारत को सिनेमा दिया इसलिए उन्हें “भारतीय सिनेमा का जनक” कहा जाता है तो इसी तरह जमशेदजी फ्रामजी मदन ने उसे प्रसार का रास्ता दिया। इस लिहाज़ से उन्हें “भारतीय फ़िल्म एग्ज़ीबिशन का जनक” कहा जाने लगा। एक ने सपना दिया, दूसरे ने उसे बाज़ार दिया और इन दोनों के बीच भारतीय सिनेमा की पूरी दुनिया आकार लेती है।

चारु शर्मा, charu sharma

चारु शर्मा

फ़िल्मकार, लेखक, प्रोड्यूसर और सांस्कृतिक क्यूरेटर। यथाकथा फ़िल्म एंड लिटरेचर फ़ेस्टिवल की संस्थापक। चारु मुख्यतः सामाजिक मुद्दों और ऐतिहासिक कथाओं संबंधी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और कंटेंट पर केंद्रित हैं। व्यक्तित्वों, विचारों आदि के दस्तावेज़ीकरण से जुड़े प्रोजेक्ट्स से जुड़ी रही हैं। फ़ीचर-लेंथ डॉक्यूमेंट्री “एम्बेसडर ऑफ़ सोशलिज़्म – लाइफ एंड टाइम्स ऑफ डॉ. राममनोहर लोहिया” उनके प्रमुख कार्यों में शामिल है। संपर्क: 9082050680

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