
- July 15, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आलोक त्रिपाठी की कलम से....
विकसित भारत 2047: स्वास्थ्य का भविष्य कितना चिंताजनक?
क्या विकसित भारत 2047 का स्वास्थ्य मॉडल वास्तव में भारतीय स्वास्थ्य आवश्यकताओं पर आधारित है? या वह वैश्विक स्वास्थ्य एजेंडों की प्रतिध्वनि मात्र बनता जा रहा है? यह लेख इसी प्रश्न की पड़ताल करता है। लेखक के अनुसार स्वास्थ्य नीति की प्राथमिकताएँ मूलभूत अनुसंधान, पर्यावरणीय कारकों, ग्रामीण स्वास्थ्य संरचना और चिकित्सकीय क्षमता निर्माण से हटकर वैक्सीन, डिजिटल स्वास्थ्य और डेटा-आधारित निगरानी तंत्र पर केंद्रित होती जा रही हैं। लेख स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ते बाहरी प्रभावों, सीमित शोध निवेश और नीति-निर्माण की प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्न उठाते हुए वास्तविक स्वास्थ्य स्वराज और भारत-केंद्रित शोध दृष्टि की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
देश के सबसे बड़े स्वास्थ्य शोध संस्थान, आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने #ViksitBharat2047 के तहत स्वास्थ्य सेवाओं की अपनी रूपरेखा प्रस्तुत की है। इसे पढ़ने के बाद कुछ बातें तो स्पष्ट हो जाती हैं, जैसे कि अभी स्वास्थ्य की अवधारणा को समझ रहे हैं या उससे बिलकुल भिन्न है।
शोर-शराबे और प्रचार को एक तरफ़ रख दें, तो यह दृष्टिकोण दो स्तरों पर ग़लत और कई स्तरों पर ख़तरनाक प्रतीत होता है।
सबसे ख़तरनाक धारणा यह है कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र को एक बेहद संकीर्ण दिशा में मोड़ा जा रहा है, जहाँ टीकों को स्वास्थ्य समस्याओं के लगभग प्राथमिक समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, अगर एकमेव समाधान नहीं हो तो, जो चिंताजनक है।
डॉ. बहल के नेतृत्व में आईसीएमआर अब कोर बायोमेडिकल रिसर्च और भारत-विशेष स्वास्थ्य समस्याओं (जैसे कुपोषण, पुरानी बीमारियाँ, एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस) पर गंभीर शोध के बजाय वैक्सीन विकास, उत्पादन और वितरण पर अधिक ज़ोर दे रहा है। नैशनल हेल्थ रिसर्च प्रोग्राम (NHRP) में TB, AMR, NCDs जैसी बीमारियों का ज़िक्र है, लेकिन व्यावहारिक रूप से फ़ंडिंग, प्रोजेक्ट्स और पॉलिसी का बड़ा हिस्सा वैक्सीन इकोसिस्टम, डिजिटल हेल्थ और AI पर केंद्रित है।
रीजनल सेंटर्स का रूपांतरण डेटा कलेक्शन सेंटर में
ICMR के पुराने रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर्स (RMRCs) को अब नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हेल्थ रिसर्च (NIHR) के नाम से रीब्रांड किया जा रहा है। ये केंद्र पहले क्षेत्रीय बीमारियों (जैसे नॉर्थईस्ट में मलेरिया, राजस्थान में कुपोषण) पर फ़ील्ड रिसर्च करते थे, लेकिन अब इन्हें बड़े पैमाने पर डेटा संग्रह का केंद्र बनाया जा रहा है। इनका मुख्य काम अब डिजिटल स्वास्थ्य डेटा, रियल-टाइम सर्वेलेंस और AI आधारित मॉनिटरिंग बन गया है, जो बिल गेट्स फ़ाउंडेशन जैसे संगठनों के डिजिटल हेल्थ एजेंडे के अनुरूप भले न हो, तब भी काफ़ी मेल खाता है। इससे क्षेत्रीय स्वास्थ्य समस्याओं का वास्तविक समाधान कमज़ोर हो रहा है और डेटा माइनिंग तथा वैक्सीन कंज़म्प्शन की नींव मज़बूत हो रही है।
इस मॉडल का परिणाम
कुल स्वास्थ्य शोध बजट GDP का मात्र 0.02% होने के बावजूद i-Drone जैसी डिलीवरी टेक्नोलॉजी, वैक्सीन मैन्युफ़ैक्चरिंग इंसेंटिव्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश हो रहा है। ग्रामीण अस्पतालों के रखरखाव, डॉक्टरों की ग्रामीण तैनाती और बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे पर कोई गंभीर प्रयास नहीं दिख रहा है। नतीजा यह है कि भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था धीरे-धीरे सर्वेलेंस और वैक्सीन खपत का मॉडल बनती जा रही है, न कि वास्तविक स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान का।
यह स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।
इससे एक ओर प्राकृतिक प्रतिरक्षा (Natural Immunity) कमज़ोर होगी, दूसरी ओर नयी स्वास्थ्य समस्याओं और रोगों की भरमार का जोखिम बढ़ेगा, जिसके बारे में विज्ञान कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता। हमें याद रखना चाहिए कि हमें कोविड वैक्सीन के बारे में क्या-क्या बताया गया था और कैसे बेची गयी थी। साथ ही, भारतीय स्वास्थ्य नीति का झुकाव पश्चिमी फ़ार्मा लॉबी के हितों की ओर और अधिक हो जाएगा।
बिल एंड मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन के समर्थन से ध्यान मूलभूत अनुसंधान और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं से हटकर बड़े पैमाने पर टीका उपभोग के लिए आवश्यक ढाँचा तैयार करने पर केंद्रित हो गया है।
पूरी नीति को डिजिटल हेल्थ और एआई जैसे आधुनिक और आकर्षक शब्दों में लपेट दिया गया है।
लेकिन मूलभूत अनुसंधान एवं विकास (R&D) का क्या? रोग विज्ञान का मूलभूत सिद्धांत है कि किसी रोग के होने में वातावरण की बहुत बड़ी भूमिका होती है। जिसे पूरी तरह दरकिनार करके जिस शोध की प्राथमिकता भारत केंद्रित होनी चाहिए उसे वैश्विक शोध के लिए छोड़ दिया गया है और शोध को काफ़ी केंद्रित और संकीर्ण कर दिया गया है, जिसका उदाहरण मैं पहले भी दे चुका हूँ।
फ़ंडेड शोध से क्या निकला?
वैसे तो आज भी भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य अनुसंधान पर ख़र्च जीडीपी का मात्र 0.02% है, जो बेहद कम है। उसमें भी इसी संस्था ने किस तरह के शोध को फ़ंडिंग की है, उसका एक नमूना देखते हैं।

पिछले सालों में 2 शोध पत्रों को फ़ंड किया और दोनों शोध पत्र ने सिर्फ़ यह बताया कि कोविड वैक्सीन के बाद युवाओं में अचानक मौत का कारण वैक्सीन नहीं है। अपेक्षा तो यह थी कि इस तरह बढ़ी मृत्यु दर का कारण पता लगना था लेकिन इसके विपरीत वैक्सीन कंपनियों को क्लीन चिट मिल गयी। और मृत्यु के लिए पुराना हनुमान चालीसा सुना दिया गया यानी लाइफ़स्टाइल, स्ट्रेस, अल्कोहल का उपयोग आदि आदि।
ये नहीं बताया गया कि क्या 2022 के पहले जीवन तनावमुक्त था? या उसके पहले लोग मद्यसार का सेवन नहीं करते थे या बढ़ा है? ऐसा कुछ भी रिपोर्ट्स में नहीं है।
नाकामी पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
संसाधनों को वैक्सीन निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र, i-Drone वितरण प्रणालियों और क्षेत्रीय केंद्रों को डेटा संग्रह इकाइयों में बदलने पर ख़र्च किया जा रहा है। इस बात की पुष्टि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी के टिप्पणी से होती है:
“National Medical Commission (NMC) में लगातार पद ख़ाली पड़े हैं और केंद्र सरकार इन महत्वपूर्ण पदों को भरने में पूरी तरह नाकाम रही है। फलस्वरूप, मेडिकल एडमिशन, कॉलेज अप्रूवल, इंस्पेक्शन, अपील और काउंसलिंग में साल-दर-साल देरी हो रही है, जिससे पूरे अकादमिक कैलेंडर बिगड़ रहे हैं और छात्र सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं।”
आखिर किसका हित है प्राथमिकता?
यदि स्थिति इतनी गंभीर न होती तो यह हास्यास्पद लगती कि जो “राष्ट्रवादी सरकार” हर क्षेत्र में उपनिवेशवादी विरासत को समाप्त करने की बात करती है, वही स्वास्थ्य नीति जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में नये औपनिवेशिक आक़ाओं का अनुसरण करती दिखायी देती है।
उपनिवेशवादी विरासत को समाप्त करने के सरकारी प्रयासों की एक बानगी देखिए… कुछ दिन पहले कंगना रनौत जी नर्सों की वर्दी को भारतीय संदर्भ के अनुरूप बनाने और औपनिवेशिक विरासत से मुक्त करने की बात कर रही हैं। अवश्य कीजिए। मैं भी इस बात के पक्ष में हूँ कि नर्सों की वर्दी हमारे मौसम, संस्कृति और आवश्यकताओं के अनुरूप हो तथा ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रभाव के अवशेषों को हटाया जाये।
लेकिन प्रश्न यह है कि हमारी प्राथमिकताएँ क्या हैं?
स्वास्थ्यकर्मियों की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच, अस्पतालों का बुनियादी ढाँचा, प्रशिक्षण और उपचार की लागत — ये कहीं अधिक महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। और यदि वास्तव में उपनिवेश-मुक्ति (Decolonization) की बात हो रही है, तो फिर स्वास्थ्य नीति के मूल प्रश्नों पर पश्चिमी प्रोटोकॉल और बिल गेट्स जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों को भारत की दिशा तय करने का अधिकार क्यों मिलता है?
सिर्फ़ बाहरी प्रतीकों को बदलने से नहीं, बल्कि नीतिगत और बौद्धिक स्वतंत्रता से भारत की वास्तविक आत्मा जागृत होगी।
आख़िर वह दिन कब आएगा, जब भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था दिखावे से आगे बढ़कर वास्तव में स्वदेशी सोच और राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप संचालित होगी?

डॉ. आलोक त्रिपाठी
2 दशकों से ज्यादा समय से उच्च शिक्षा में अध्यापन व शोध क्षेत्र में संलग्न डॉ. आलोक के दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित हैं और अब तक वह 4 किताबें लिख चुके हैं। जीवविज्ञान, वनस्पति शास्त्र और उससे जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ. आलोक वर्तमान में एक स्वास्थ्य एडवोकेसी संस्था फॉर्मोन के संस्थापक हैं।
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