
- July 15, 2026
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बृजेंद्र श्रीवास्तव की कलम से....
संगीत का चित्रकला में रूपांतरण-2
‘संगीत का चित्रकला में रूपांतरण: कैसे और कितना सम्भव?’ पिछली कड़ी में हमने इस चर्चा में विभिन्न कला माध्यमों में अंतर्संबंधों की आवश्यकताओं और सीमाओं को लेकर पांच बिंदु रखे थे।
पिछली कड़ी पढ़ने के लिए क्लिक करें: संगीत का चित्रकला में रूपांतरण-1
इस चर्चा को और आगे बढ़ाते हुए अब हम कलाकारों से सीधे संवाद के मार्ग पर चलकर एक निष्कर्ष की ओर पहुंचने की चेष्टा करते हैं।
6- आर्टिस्ट धृतिवर्धन गुप्त का प्रयोग
यहाँ इस पर एक दिलचस्प प्रयोग की चर्चा आपको रुचिकर लगेगी। संगीत किस सीमा तक और किस रूप में चित्रकला में रूपांतरित हो सकता है? इस पर कला वीथिका, ग्वालियर में आर्टिस्ट धृतिवर्धन गुप्त के सदाशय मंच ने विगत वर्ष 25 मई 2025 को एक अभिनव प्रयोग किया। उन्होंने वाद्य संगीतकला और चित्रकला के समागम का आयोजन किया, जो सितार वादक स्व. प्रमोद बापट जी और कलागुरु स्व. एल.एस. राजपूत जी की स्मृति में था। उन्होंने कहा कि इस कार्यशाला में दिन दस बजे से एक बजे तक शुद्ध सारंग और वृंदावनी सारंग और दूसरे सत्र में अपराह्न चार बजे से शाम सात बजे तक राग यमन सितार पर बजाये जाएंगे और इन रागों से होने वाली अमूर्त अनुभूति को चित्रकार अपने कैनवास पर साकार करेंगे।
उस दिन संगीत और चित्र इन दो कलाओं के समागम में सारे दिन डॉक्टर संध्या बापट की जादुई उंगलियों से ये राग अनवरत निःसृत होते। पाँच सुरों वाले वृंदावनी सारंग में दोनों निषाद और ऋषभ के प्रयोग से ज्येष्ठ की गर्मी में आंतरिक शीतलता-सी मिल रही थी। उनका सितार वादन उनकी नादानुसंधान की उत्कृष्ट साधना को दर्शाता रहा था, जिससे कक्ष में और मन के आकाश में भी एक अनकहा-सा सम्मोहक वातावरण निरंतर बन रहा था।
दूसरी ओर इस वादन कला की पृष्ठभूमि में चित्रकला आकार ले रही थी। कलाकारों का समूह संगीत श्रवण से उत्पन्न अनुभूति को अपने तरीक़े से चित्र में रूपांतरित करने में तल्लीन था। ब्रश के स्ट्रोक कहीं-कहीं तबला वादक महोदय की ताल का मुक़ाबला-सा करते लग रहे थे। कलाकारों का ध्यान विकर्षित नहीं हो, इस सावधानी के साथ मैं सभी चित्रकारों के कैनवास निकट जाकर देखता रहा कि सितार की ध्वनि का असर चित्रकार के मन से फ़िल्टर होकर कैनवास पर तूलिका के माध्यम से किस तरह के रंग के साथ, किस तरह के रूप और आकार ले रहा है। देखा कि अधिकतर सभी अमूर्त अथवा एब्स्ट्रैक्ट का चित्रण कर रहे हैं, एक अपवाद को छोड़कर।
7- संगीत-चित्रकला समागम और कुछ प्रश्न
इन दो कलाओं के समागम के आयोजन से और सुनने-देखने के मिले आनन्द से इतर कुछ प्रश्न मन में उठे, उनके जो उत्तर चित्रांकन के माध्यम से मिले वे कुछ इस तरह से हैं:
- — इस प्रयोग में रागों की प्रकृति को और इसके भाव को किस सीमा तक चित्रकारों ने समझा? कुछ चित्रकारों ने जो राय दी, उस से ज़ाहिर हुआ कि राग की तकनीकी समझ के प्रति उनमें कोई जिज्ञासा नहीं है पर संगीत से मन में उत्साह बना रहा।
- — राग के अमूर्त भाव को मूर्त भाव में बदला या अमूर्त भाव में? लगभग 21 कलाकारों ने इस आयोजन में भागीदारी की, सभी ने राग के अमूर्त को अमूर्त में ही बदला। केवल एक कलाकार ने शिवलिंग बनाये।
- — अमूर्त भाव में कला का पैटर्न क्या दिखा? सभी में जो पैटर्न थे, उनमें ध्वनि को त्रिकोण, चतुष्कोण इत्यादि में, केवल एक कलाकार ने ज्यामितियों में बद्ध किया था। शेष सभी के मन में संगीत की धुन, वृत्त, दीर्घवृत्त की तरह तरंगित हो रही थी। ब्रश के स्ट्रोक के माध्यम से सीधी-आड़ी रेखाओं में झरने-सी उन्मुक्तता होकर झर रही थी। इससे यह लगा कि एक ही राग की लहरियाँ हर एक के मन में अलग-अलग भाव का उद्रेक करती हैं, पर एक स्तर पर एकरूपता सम्भव हो सकती है।
दर्शकों की दृष्टि से देखें तो संगीत और चित्रकला के समागम से निकले प्रत्येक चित्र के समक्ष दर्शक कुछ समय ठहर रहे थे, बहुत-से विचारमग्न भी दिख रहे थे, जैसे चित्र का संदेश पढ़ रहे हों। इसलिए भी कि चित्र एकदम-से चित्ताकर्षक थे और चित्रों में विविधता भी थी। दर्शकों की रुचि और कलाकारों की सहभगिता यह इस प्रदर्शन की बड़ी सफलता रही।
8- ‘रंजयति इति राग:’
चित्रकारों के सांगीतिक अनुभव की चर्चा के पहले संगीत सभाओं में श्रोताओं के अनुभव की बात करें तो संगीत सभा में श्रोताओं के सामूहिक आनंद का आधार वादक की रंजकता सृजन क्षमता होता है। श्रोता का संगीत रसिक होना पहली आवश्यकता है। अन्यथा ऐसे श्रोता तानसेन समारोह में केवल मूंगफली का आस्वाद लेते हुए देखे जाते हैं। जैसे कि जब गायक वादक सम पर आता है तो सभी श्रोता एक साथ वाह-वाह कर उठते हैं, कुछ वैसे ही बिना किसी दार्शनिक ऊहापोह के कह सकते हैं कि राग का व्यंजनामूलक अर्थ है कि वह मन को अपने रंग में रंग दे अर्थात ‘रंजयति इति राग:’।
संगीत रत्नाकर तकनीकी परिभाषा में भी यही कहा गया है: “रंजकों जन चित्तानाम् स: राग”। चित्त तो राग की प्रफुल्लता, खिन्नता, शांतता या उत्तेजना जैसी किसी भी वृत्ति के रंगमय हो सकता है। बाँसुरी की भटयारी लोक धुन मन में कुछ खिन्नता, उदासी का भाव भर सकती है, संतूर पर राग भीमपलासी में ग-नि स्वर की कोमलता अव्यक्त वेदना से मन को आकुल कर सकती है।
9- कलाकारों के अनुभव
यह तो हुई श्रोता के अनुभव की बात। अब बात करते हैं संगीत और चित्रकला के समागम में स्वयं चित्रकारों का क्या अनुभव रहा।

“निराकार की अगर आकार लेकर प्रस्तुति करें तो उसमें क्या निराकार ठहरा? और मेरे लिए उस कार्यशाला की प्रेरणा मिलना मेरे द्वारा निर्मित कलाकृति स्वयं व्यक्त कर रही है। जहां मेरे चित्रों की मुख्य विषय-वस्तु में भीड़ होती है चाहे वृक्ष हों, वस्तु हो, पशु-पक्षी या मनुष्य, कार्यशाला में बनाये चित्र में रंग-प्रवाह है। मेरे शब्दों से ज़्यादा वह चित्र अपने को कहने के लिए और अधिक बताने के लिए पर्याप्त है।”
-डॉ. रश्मि सिंह का अभिमत और उनका लाल रंग का चित्र
“सितार की तरंग पर मन के रंग, वाह क्या यादगार इवेंट था। सितार की धुन पर इतना खो गयी थी कि मुझे नहीं पता कि मेरे हाथ, मेरा ब्रश और रंग कैनवास पर कैसे थिरक रहे थे। बहुत आनन्द आ रहा था। वो पल मैं कभी नहीं भूलूँगी।”
-मीरा मिड्ढा का अभिमत और उनका ग्रे, गुलाबी रंग का चित्र
“सितार की धुन पर चित्रांकन अपने आप में एक अनूठा संगम था। उस कार्यशाला में मैंने भी राग यमन को चुना। नीले एवं श्वेत रंग के मिश्रण से शिवलिंग को कैनवास पर विराजमान किया एवं साथ ही शिव के शृंगार स्वरूप सर्प को लहलहाते हुए नृत्य मुद्रा में चित्रित करने का प्रयास किया। मुझे उस समय ऐसा अहसास हो रहा था, जैसे मेरे सामने कैनवास नहीं सितार रखा हुआ है और तूलिका उस सितार के तारों को छेड़ रही है। मानो उस अनूठे संगम को वह भी पूरी तन्मयता के साथ महसूस कर रही है।”
-नीलू शर्मा का अभिमत और उनका शिवलिंग का चित्र
ग्वालियर में प्रथम बार आयोजित ऐसी कार्यशाला में भागीदारी करने का जो अवसर मिला, उसका अनुभव शब्दों में व्यक्त कर पाना नामुमकिन-सा है। क्योंकि अपने मन और मस्तिष्क में तीन रंगों के साथ सात स्वरों को भरना नवीन प्रयोग इतना आसान न था। रागों पर आधारित रंगों द्वारा कैनवास पर अपने भावों को उतारना मेरे लिए एवं चित्रकारों के लिए भी यह एक चुनौती से कम नहीं था।
रंजन कलाओं में संगीत और चित्रकला दोनों अभिव्यक्ति के अलग-अलग माध्यम हैं। साहित्य बहुत हद तक चित्रकला के समीप है किंतु संगीत आत्मा को और मस्तिष्क को आत्मिक लय में डुबो लेने की सामर्थ्य रखता है… 1990 में मुझे हस्तशिल्प कला केंद्र द्वारा मिनिएचर पेंटिंग के लिए स्वर्ण पदक दिया गया था, तो रंगों से मेरा पुराना नाता रहा है। इस कार्यशाला में मैं भी स्वरों के साथ रंगों में रंग गयी और मालूम ही नहीं हुआ कि हमारे दो घंटे कहाँ व्यतीत हो गये।
सुबह के सत्र में राग शुद्ध सारंग व वृंदावनी सारंग और शाम को राग यमन के साथ ‘रघुपति राघव राजा राम’ धुन के साथ आलाप, जोड़, झाला, मध्य लय एवं द्रुत लय में बंदिश प्रस्तुति की।
मेरे समक्ष कैनवास पर जब चित्रकार राग कल्पना को साकार कर रहे थे, उस समय मेरा मन भी, एक चित्रकार होने से रंगों के साथ तानों और रागों में समा रहा था। मैं अंतर्मन को साधते हुए सितार वादन कर रही थी क्योंकि चित्रकारी भी मेरे ख़ून में है इसलिए उंगलियाँ मिज़राब की जगह रंगों को पकड़ने के लिए आतुर थीं। ऐसा अनुभव देने के लिए सदाशय मंच और धृतिवर्धन जी को धन्यवाद।
-सितार वादक संध्या प्रमोद बापट का अभिमत
10- सितारवादक पं. श्रीराम उमड़ेकर के विचार
दोनों कलाओं के मन व आत्मा तक पहुँचने के मार्ग अलग-अलग हैं। इनमें कुछ सामंजस्य बिठाने के प्रयास में, राग-रागिनियों के ध्यान वाचक श्लोक लिखे गये, जिनके गायन से निर्मित वातावरण में भाव-विश्व का चित्रमय रूपांकन करने के सफल प्रयास हो चुके हैं, जो रागमाला चित्रों के समृद्ध चित्रांकन रूप में उपलब्ध है। जैसा कि आपने लिखा है “पंडित विद्याधर व्यास जी का मानना है संगीत व चित्रकला का कोई संबंध नहीं है”। परंतु मेरा विचार है दृश्य कला नृत्य व नाट्यकला में संगीत वातावरण निर्मिति का एक प्रबल साधन है। तब संगीत व चित्रकला का संबंध क्यो नहीं हो सकता?
मध्यकाल की अपेक्षा आज के राग-रूपों व उनके बरतने में बहुत अंतर आ गया है। अतः रागमाला जैसे प्रयोगों के सफल होने की संभावना बहुत कम है। वैसे भी प्रयोग के सफल अथवा असफल होने के पीछे अनेक कारक जैसे प्रयोग में प्रयुक्त साधन, उपादान, आधारभूत सिद्धांत, ज्ञान और सबसे बढ़कर सिद्ध प्रयोगकर्ता का योगदान होता है। संगीत श्रवण से चित्रांकन… ऐसे प्रयोग के सफल होने के लिए भी सिद्ध गायक, वादक और सांगीतिक कर्ण, जो ईश्वर कृपा से या प्रयत्नपूर्वक संगीत सुनने, सीखने से प्राप्त होते हैं- ऐसे कान वाले चित्रकारों के साथ ऐसे प्रयोग करने से सफलता मिल सकती है अन्यथा यह संदिग्ध रहती है।
मै भी आज से 50 वर्ष पूर्व एक ऐसे प्रयोग में सम्मिलित हुआ हूं। तब उस समय के एक बहुप्रतिष्ठित विद्वान चित्रकार ने मेरे सितार वादन के साथ वर्षा राग पर चित्र बना दिया था।
11- निष्कर्ष: रूपांकन में चित्रकार की मनोवृत्ति महत्वपूर्ण
अब हम ‘संगीत का चित्रकला में रूपांतरण: कैसे और कितना सम्भव है’, इस पर निष्कर्ष आपके साथ साझा करना चाहते हैं। संगीत के रागों से होने वाली अमूर्त अनुभूति को चित्रकारों ने अपने कैनवास पर मूर्त रूप कैसे और कितना दिया, इसका साक्षी रहने के बाद और फिर कलाकारों से चर्चा के बाद, संगीत मर्मज्ञ पण्डित श्री राम उमड़ेकर जी से मार्गदर्शन लेने के बाद हम कुछ इस तरह के निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि संगीत के स्वर में कुछ वैसा ही द्वैत है जैसा कि क्वांटम फ़िज़िक्स में है… पदार्थ अपने सूक्ष्म स्तर पर कण भी है और तरंग भी है।
इसी तरह संगीत चाहे शब्द-पद युक्त हो या लय-तान युक्त हो अथवा शब्द रहित आलाप हो या झंकार हो, यह श्रोता के मन में कुछ व्यक्त-सा और कुछ अव्यक्त-सा, दोनों तरह का भाव सृजित करता है।
संगीत की पृष्ठभूमि में चित्रांकन के प्रसंग में प्रत्येक चित्रकार इसे अनुभूति के अनुसार ग्रहण करता है। क्योंकि हर एक की ग्रहणशीलता समुनरूप नहीं हो सकती। कोई कवि भी प्राकृतिक दृश्य को देखकर अपनी संवेदना के अनुसार काव्य सृजन करता है।
मन की इस वृत्ति पर पातंजल योगसूत्र में बहुत ही प्रामाणिक बात कही गयी है, जो यहाँ इस चर्चा में प्रासंगिक है और समाधान-कारक भी। पतंजलि कहते हैं, “वृत्ति सारूप्यम् इति रत्र”। समाधि अवस्था को छोड़कर व्यक्ति अपनी चित्त वृत्ति के अनुसार ही स्वयं को समझता है। (यहाँ वृत्ति अर्थात मन का झुकाव। सारूप्यम्- अर्थात किसी भाव के साथ उसी के रूप का हो जाना। इति रत्र- अर्थात समाधि से भिन्न सामान्य अवस्था में) इसलिए संगीत की ध्वनि का चित्रकार या श्रोता पर उसकी अपनी मनोवृत्ति के अनुसार असर पड़ेगा। चित्रकार की मनोवृत्ति अनुसार मूर्त/अमूर्त प्रारूप का चित्रांकन एवं रंग चयन होगा।
अमूर्त के मामले में एक बात और ध्यान में रखना होती है कि अमूर्त में रंग और रूप, इन दोनों उपादानों का पारंपरिक प्रयोग नहीं होता है इसलिए अमूर्त को समझना एक अलग प्रक्रिया है। उदाहरण के लिए निर्गुण ब्रह्म को समझने की भाषा और प्रक्रिया दोनों ही सगुण ब्रह्म की साधना से कुछ अलग तो होती ही हैं। निर्गुण ब्रह्म की साधना में कबीर, जो सधुक्कड़ी बोलते हैं, उसे अलग से ही समझना होता है।
क्या ही अच्छा हो कि अब किसी प्राकृतिक रमणीक स्थल पर, जहां प्रकृति का दृश्य चित्र उपस्थित होता है, वहाँ बैठकर अथवा किसी अभावग्रस्त गाँव में जाकर, वहाँ चित्र भी बनाये जाएं और काव्य रचना भी हो और संगीत के सुर भी साधे जाएं। प्रकृति, संगीत और चित्रकला और काव्यकला के समागम होते रहना चाहिए, तभी इस प्रश्न का बेहतर समाधान मिलेगा और ऐसे अन्तः विषयक (inter-disciplinary) आदान-प्रदान से किसी नयी कला का अंकुरण भी हो सकेगा।

ब्रजेन्द्र श्रीवास्तव
साहित्य, संस्कृति व कला, विज्ञान, धर्म, अध्यात्म व दर्शन, ज्योतिष और वास्तु, वैदिक विद्या एवं ब्रह्मांड विज्ञान जैसे विभिन्न विषयों पर 50 से अधिक वर्षों से निरंतर लेखन। आपके लिखे दो कथक नृत्य-नाटक दिल्ली कथक केन्द्र के कलागुरुओं के निर्देशन में मंचित। ज्योतिर्विज्ञान में नये विचार शिक्षा मंत्रालय से डिजिटलीकृत। संपर्क: shrivastava.brijendra@gmail.com
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