दिव्या जैन, divya jain, mere hisse ka qissa
मेरे हिस्से का क़िस्सा... आब-ओ-हवा पर एक विशेष शृंखला। उम्र और सृजन का यादगार कथानक लिख चुके हस्ताक्षरों की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी। इस सिलसिले में दूसरी दास्तान एक स्वतंत्र चेता स्त्री की, जिसने मुश्किल जीवन जीते हुए सरोकारों की पत्रकारिता में श्रीवृद्धि की और प्राण-प्रण से सक्रिय हैं। पिछले अंक से जारी...
दिव्या जैन की कलम से....

मेरे भीतर की स्त्री-2

(चार)
           अब मैं जो बात करना चाहती हूं, यहाँ फिर से पवन भाई का ज़िक्र स्वाभाविक रूप से आ जाता है। 2013 में भाई की मृत्यु के बाद मैं अपने आपको बहुत अकेला पाती हूँ। भाई का जाना इतना आकस्मिक था कि मेरे लिए कुछ भी समझ पाना मुश्किल था। मेरी मुश्किलें उनके चले जाने से बढ़ गयीं, यह तो एक अलहदा बात है, लेकिन हम दो बहनें और भाई थे तो हमें एक छोटे-से परिवार जैसा लगता था, जो उनके जाने से बिखर-सा गया है।

पिछली कड़ी पढ़ने के लिए क्लिक करें: मेरे भीतर की स्त्री-1

भाई का होना, हमारे लिए बहुत बड़ा सहारा था। आज हम दोनों बहनों को अकेले हो जाने का बहुत ज़्यादा अहसास होता है। छोटी बहन लवलीना को तो भाई बहुत चाहते थे, वह उनकी सबसे लाड़ली बहन थी। लवलीना जो भी मांगे उसे लाकर देते थे। उसके शब्दों का कभी अनादर नहीं होने देते थे। बहन को भी पवन भाई बहुत अच्छे लगते थे। यहाँ एक बात और बता दूं भाई पवनकुमार जैन कवि लेखक थे। सन् 2012 में ‘उनका पहला कविता संग्रह’ उन्होंने छोटी बहन लवलीना को समर्पित किया था। भाई ने इस बात को स्पष्ट करते हुए समर्पण पृष्ठ पर लिखा है कि ‘मेरी यह बहन इस किताब से कुछ भी पढ़ या समझ नहीं पाएगी लेकिन उसे इस बात की ख़ुशी होगी कि उसका नाम इस किताब में छपा है। अन्ततः तो और पाने वालों की ख़ुशी बड़ी बात होती है। होती है कि नहीं?’

बहरहाल समय के चलते बहुत कुछ बदला। माता-पिता का देहावसान तो पहले हो गया था। इस बीच छोटी बहन की उम्र भी बढ़ती गयी। सालों से वह पूरी तरह से मुझ पर निर्भर हो गयी और बहुत ज्यादा ज़िद्दी भी। इस अरसे में उसके मन-मस्तिष्क में आये बदलावों का क्या और कैसे इलाज करवाया जाये, यह समझ में नहीं आ रहा था। भाई ने छोटी बहन के इलाज के लिए एक मनोरोग चिकित्सक का संपर्क-सूत्र ढूंढ निकाला था। लेकिन लवलीना को डॉक्टर के पास कैसे ले जाना था, यह एक बड़ा प्रश्न था, चूंकि वह कहीं भी जाने के लिए राज़ी ही नहीं होती थी। ऐसे में इलाज करवाएं तो भी कैसे? यदि वह उग्र हो जाये तो स्थिति को संभालना हमारे लिए मुश्किल हो जाता था।

उसके मन की स्थिति को समझना हमारे लिए कठिन था। पूरा-पूरा दिन मैं उसके साथ होती। खाना खिलाना, पानी पिलाने की छोटी-छोटी प्रक्रिया में ही दिन कहाँ निकल जाता, पता ही नहीं चलता। बढ़ती चिंताओं के बीच दिन कट रहे थे। तब अचानक भाई के जाने के बाद मेरी मुश्किलें कई गुना बढ़ गयीं। छोटी बहन की देखभाल अकेली कैसे कर पाऊंगी, यह सवाल मेरे सामने बड़ी चुनौती के रूप में रहा। कई बार सोचते-सोचते थक जाती और आंखों से आंसू निकल जाते। कितना भी परेशान होऊं लेकिन करना तो मुझे ही था। मैंने अपनी सारी गतिविधियाँ, कामकाज सब कुछ पहले ही छोड़ दिया था। उसकी देखभाल और मेरा कामकाज साथ-साथ संभव नहीं थे।

पहली चुनौती थी बहन के लिए एक मनोरोग चिकित्सक को ढूंढना। इससे निपटी तो लवलीना को मोतियाबिंद के चलते दिखना लगभग बंद हो गया। उसका आपरेशन करवाना फिर एक बड़ी चुनौती बन गया। लंबी प्रक्रियाओं के बाद हुआ यह कि डॉक्टर ने विकल्प दिया कि दोनों आंखों का साथ ही करवा सकते हैं, लेकिन निर्णय मुझे लेना था। जर्मनी में थे तब बड़े भाई, उनसे और फिर बहन से भी चर्चा की। अन्ततः दोनों आंखों का एक-साथ आपरेशन हुआ। सब अच्छा हुआ फिर भी आपरेशन के अच्छे-बुरे परिणामों को झेलने का साहस और हिम्मत भी मुझे जुटानी थी क्योंकि छोटी बहन का जीवन एकदम निष्क्रिय और शरीर एकदम कमज़ोर। आये-दिन उसके शरीर में कोई न कोई तकलीफ़। जैसे उसके सिर में बहुत ज़्यादा दर्द हुआ तो वह मुझे ठीक से कुछ बता नहीं पा रही थी, ऐसे में उसे चिल्लाने और रोने के अलावा कुछ नहीं सूझ रहा था। ग़ुस्सा भी बहुत आ रहा था, जो मुझ पर किसी न किसी रूप में निकल रहा था। मेरी घबराहट और सहनशक्ति की उस दिन पराकाष्ठा हो गयी। रात का सन्नाटा था, मैं थी और मेरे आंसू थे जो इस निस्सहाय स्थिति में टपके जा रहे थे। बहन की पीड़ा इतनी ज़्यादा थी कि उसे उस दिन मां की बहुत याद आयी। तब वह एक सांस में कई बार मम्मी-मम्मी बोल गयी। मुझे लगा कि उसे लगा होगा कि मम्मी होती तो वह कुछ कर पाती उसके लिए, अपनी आग़ोश में ले लेती उसे और शायद उसकी पीड़ा ठीक हो जाती।

मेरे लिए यह पूरा घटनाक्रम एक डरावने सपने की तरह था। वास्तव में मैं डर गयी थी। स्थिति जब मेरे वश में नहीं होती है तब मैं बहुत घबरा जाती हूँ। शायद मेरे जैसे अति-संवेदनशील व्यक्ति के साथ ऐसा कुछ होता है। ऐसे मौक़े पर मुझे अपनी बड़ी बहन ज्योत्स्ना मिलन की बहुत याद आती है, जो मुझसे एकदम विपरीत थीं। मेरी निगाह में वे एक योद्धा की तरह थीं। चुनौतियों का सामना करना उन्हें भली-भांति आता था। मेरे डर के संबंध में उन्होंने मुझे एक बात कही थी, जो मुझे याद आ रही है। एक बार वह मुंबई आयी थीं, जब हमारे माता-पिता बीमार चल रहे थे। ऐसे मौकों पर हमेशा आती रहती थीं। माता-पिता की बीमारी के दौरान मेरे मन में एक डर बना रहता था तब बहन ने मुझे कहा था कि डरने से क्या होगा? इनकी मृत्यु हो जाएगी, यही ना? मृत्यु से क्या डरना, उसे तो एक दिन आना ही होता है, सबका अपना दिन निश्चित होता है। उन्होंने कहा, मैंने सुना, लेकिन मेरे मन में यह बात बैठी ही नहीं, जबकि सच भी यही है।

मेरा तर्क यह होता कि अलबत्ता मृत्यु को रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन पीड़ित व्यक्ति की अधिकाधिक सेवा करके मृत्यु को परे तो धकेला ही जा सकता है, लेकिन यह तभी संभव हो पाता है जब क़ुदरत या हालात आपको मौक़ा दें और ऐसा मौक़ा न मिलने पर मौत को साक्षात दस्तक देते हुए देखकर रूह कांप जाती है। यह कैसी विडंबना है। पवन भाई के जाने के साल भर के अंदर ही ज्योत्सना बहन भी चली गयीं।

दिव्या जैन, divya jain

ज्योत्स्ना बहन का दिल बहुत बड़ा था, खुले आसमान की तरह, जिसमें वह सभी को समाहित कर लेना चाहती थी। अपने से बन पड़े उतना सभी के लिए करने की प्रबल भावना उनमें थी। इसलिए आज उनकी कमी मुझे खलती है। अब वह नहीं हैं, उनकी आवाज़ मेरे कानों में नहीं गूंजती, उनका मार्गदर्शन, हिदायतें अब मुझे नहीं मिल पातीं- फिर भी मैं उन्हें अपने आसपास ही पाती हूँ। जब मैं उदास होती हूँ, जब मैं कमज़ोर पड़ती हूँ, मेरे आस-पास जब घना अंधेरा होता है, तब वे मेरे सामने होती हैं- प्रेरणास्रोत बनकर, तब फिर एक नई ऊर्जा के साथ मैं आगे बढ़ती हूँ जीवन से जुड़ी इस यात्रा में।

(पांच)
एक अंतराल के बाद मैं फिर से अपने भीतर की स्त्री को खोजने की कोशिश कर रही हूं। स्मृति पटल पर से जब कई बातें धुंध की तरह छंट गयी हों या ग़ायब हो गयी हों, तब उन्हीं बातों को, घटनाओं को याद करना, दोहराना और लिखना कितना मुश्किल होता है! लिखना भी अनिवार्य क्योंकि “मेरे भीतर की स्त्री”, इस फ़साने में कुछ बातें जोड़ना ज़रूरी हैं।

मुझसे दस साल छोटी और बचपन से ही मानसिक रूप से भिन्नक्षम बहन की आठ साल तक लगातार उसकी सेवा करना मेरे लिए न केवल कठिन काम था बल्कि एक बहुत बड़ी चुनौती भी। बढ़ती उम्र के साथ उसकी काया शिथिल होती जा रही थी। आख़िरी दो सालों में जिन-जिन हालात से वह गुज़री और जितना कुछ उसने भुगता, उतना ही उसकी देखभाल करते हुए मैंने भी, उसका वर्णन संभव नहीं है। उन हालात में मेरे लिए अपने तन और मन की सुध लेना संभव नहीं था। तब बस बहन की सेवा ही लक्ष्य था, ऐसे में हिम्मत हारने का प्रश्न ही नहीं था। 2019, वो समय था जब देश-दुनिया में कोरोना नामक महामारी फैली थी। ऐसे में अपने आपको और बहन को भी इस बीमारी से बचाना था। तब घर में किसी हेल्पर को भी बुलाना संभव नहीं था।

बहरहाल, इन तकलीफ़ों में ही समय बीतता गया। क्या याद करूं और क्या नहीं, एक समय आया जब बहन को अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा, फिर डिस्चार्ज करवाकर घर लाना और घर में ही एक छोटा-सा अस्पताल जैसा बन जाना। उस वातावरण में रहते बहुत डर लगता था लेकिन हिम्मत हारना विकल्प नहीं था।

अंततः 10 अगस्त 2021 में वह मुझे अकेला छोड़कर चली गयी। दुर्भाग्य ऐसा रहा कि तब भी कोरोना महामारी चल रही थी तो ऐसे मौक़े पर भी मेरे बड़े भाई या बहन मेरे पास नहीं आ सके। इसे विडंबना ही तो कह सकते हैं। पिछले दो सालों से बहन बोल भी नहीं पा रही थी ऐसे में उसके भीतर की तकलीफ़ और दर्द को मैं नहीं समझ पा रही थी। सेवा में कोई कमी नहीं रखी थी, लेकिन उसकी पीड़ा को समझना मुश्किल था, इससे दुखदायी स्थिति और क्या हो सकती है!

वैसे तो जीवन में अकेले होने का अहसास कई बार हुआ था लेकिन बहन के जाने के बाद यह अहसास बड़ी शिद्दत से महसूस होने लगा। इस अकेलेपन और ख़ालीपन को बयां नहीं किया जा सकता। कई द्वंद्व और… ज़िंदगी जैसे थम-सी गयी थी।

जब बहन की बड़ी ज़िम्मेदारी से मुक्त हुई तो लगा था कहीं चली जाऊं ताकि जीवन में कुछ परिवर्तन आ सके। तब मैं भाई के पास दिल्ली गयी और बाद में बहन के पास देहरादून। कुछ समय अच्छा बीता, मुंबई वापस आने पर कोई बदलाव नज़र नहीं आ रहा था, वही सन्नाटा और ख़ालीपन।

बहरहाल, इस स्थिति से उबरना बहुत ज़रूरी था इसलिए “ऐसा कब तक चलेगा”, यह प्रश्न मैं अपने आप से बार-बार पूछ रही थी। कई प्रकार के द्वंद्व थे मन में। आठ साल बीत गये थे कि मेरा कलम के साथ जैसे कोई वास्ता ही नहीं रह गया था।

उस स्थिति में यह स्वाभाविक भी था। लेकिन यह भी उतनी ही सच बात है कि कलम और काग़ज़ ने अच्छे-बुरे वक़्त में हमेशा मेरा साथ दिया है। इस अहसास से सच कहूं तो मुझमें नयी ऊर्जा का संचार हुआ। यहां यह बात भी बता दूं कि जहां तक लेखन की बात है तो मेरी कलम के दायरे में हमेशा स्त्रियां ही रही हैं और आज भी हैं, फिर चाहे मैंने कई अन्य विषयों पर भी क्यों न लिखा हो। स्त्रियों की सामाजिक समस्याओं पर मैंने ख़ूब लिखा है और उनकी समस्याएं मुझे हमेशा उद्वेलित करती रही हैं।

काम तो मैंने बहुत किया लेकिन मेरे लिए वो समय ऐसा था कि कुछ भी करने का मन नहीं होता था। उसी दौरान लेखन से जुड़ी मेरी कुछ सखियों ने मुझे कहा कि आप लिखना फिर से शुरू कीजिए, यही तरीक़ा है इस ख़ालीपन से निजात का। उनका सुझाव तो सही था लेकिन समय ही ने मेरे लिए यह तय किया।

2023 की बात है जब मैंने मन बनाया कि एक किताब पर काम करूंगी। विषय वही, एकल स्त्री: त्रासदी और ताक़त। इस विषय के अंतर्गत ऐसी स्त्रियों को ढूंढ़ना था जो शादी के बाद अपने पति द्वारा प्रताड़ित रही हों, बहुत कुछ सहती रही हों और फिर उस शादी के बंधन से मुक्त होकर अपनी ज़िंदगी अच्छे तरीक़े से जी पायी हों और अपने आपको साबित कर दिखा सकी हों। साल भर तक लगातार इस विषय पर काम करती रही। इस दौरान मैंने 13 स्त्रियों से बातचीत की, उनके दुखदर्द और अनुभव जाने। बहुत कठिन और भाव-विभोर कर देने वाला काम था यह। 2024 में किताब छपी, शीर्षक था, “खुदी को कर बुलंद, एकल स्त्रियों का ज़िंदगीनामा।”

एक महीने के बाद लोकार्पण हुआ, अच्छी चर्चा भी किताब पर हुई। इस विषय पर किये गये मेरे काम की सभी लोगों ने सराहना की, इसे अपनी उपलब्धि मानती हूं। किताब में शामिल कुल 13 जीवनगाथाओं को पढ़कर अन्य प्रताड़ित स्त्रियां प्रेरणा पा सकें और अपनी ज़िंदगी बेहतर जी सकें, यही मेरा प्रमुख उद्देश्य रहा। कई लेखकों ने अच्छी प्रतिक्रियाएं और समीक्षाएं लिखीं, जिससे मेरा मनोबल बढ़ा और हौसला भी। इसी हौसला अफ़ज़ाई ने मुझे इस किताब की शृंखला के दूसरे भाग पर काम करने पर मजबूर कर दिया। किताब जल्द ही प्रकाशित हो जाएगी। अस्तु।

13 comments on “मेरे भीतर की स्त्री-2

  1. संघर्ष पूर्ण जीवन में घबराहट के साथ धैर्य बनाए रखा,वक्त निकला और आप साखियों के सहयोग से पुनः बाहर निकल आईं।बधाई

  2. अत्यंत हृदयस्पर्शी कहानी । अकेले संघर्षों से जूझकर पुनः स्वयं को व्यवस्थित करना बहुत आसान नहीं है । साधुवाद ।

  3. मेरे भीतर की स्त्री का यह दूसरा भाग दिव्या जी की आंतरिक व्यथा को शब्द देने जैसा है। एक नदी की तरह हर विघ्न बाधा को पारकर खुद की खुद से लड़ाई लड़ते हुए इन्होंने अंततः विजय पा ली। मातापिता के बाद भाई की मृत्यु से उबरना इनके लिए कतई आसान नहीं था,लेकिन छोटी बहन की जिम्मेदारी भी इन्हीं की थी। लवलीना के साथ इनका बहन का सम्बंध नहीं था बल्कि एक माँ-बेटीसा ममत्व और स्नेह था। हमने इन्हें बहुत ही गहराई से परखा है। मैं सोचती थी कि ,शायद दिव्या जी की जगह पर मैं होती तो नहीं सम्भाल पाती।अपना भविष्य,कैरियर,नाम सबको इन्होंने तिलांजलि दे दी थी।इनका एक ही मकसद था छोटी बहन कैसे स्वस्थ रहे। हर सम्भव कोशिश के वाबजूद लवलीना को बचाया न जा सका। अंदर से बिल्कुल टूट गयी थीं दिव्या जी। लेकिन कुछ सालों के बाद स्वंय को पुनः इन्होंने खुद खड़ा किया या कह सकते है खुद को बुलंद किया और अपने अंदर की जिजविषा को *खुदी को कर बुलंद* नामक पुस्तक में जीवित कर दिया। रचनाकार की कभी भी मौत नहीं होती , उसकी रचना उसे अमर बनाती है। यही सिद्ध किया है इन्होंने। अथक परिश्रम अभी भी जारी है। नारी के मनोभाव,दुष्चिंता,उसका शोषण और उसकी प्रताड़ना पर इन्हों हमेशा आवाज बुलंद किया।
    दिव्या जी के इस जुझारू प्रवृति का मैं आदर करती हूँ।
    मृदुला मिश्रा

  4. दिव्या जैन ने पारिवारिक विपदाओं, एकाकीपन एवं दर्द से निकलकर फिर लेखन शुरू किया, सराहनीय हैं। उनके द्वारा लिखी गई कथाओं ने हममे भी अदम्य साहस भर दिया

  5. लिखना एक रूहानी पनाह है। जिंदगी और दुनिया को देखने का तरीका । यही वह जगह है जहां समझ में आता है कि दुख की भाषा एक है ,प्यार की भाषा एक है ,मौत का डर एक है और आजादी की चाहत एक है ।

    दिव्या जी के आत्म-कथ्य को प्रकाशित करने के लिए सर्वप्रथम मैं “आबो -हवा”के सम्पादन मंडल का अभिनंदन करती हूं। आपने मानवीयता के एक नायाब मोती की” आब ” से हम सब को रूबरू करवाया।
    स्त्री-जीवन उनकी संवेदना का मुख्य बिंदु रहा है ।शुरूआत ही “बदनाम जिंदगियां ” स्तंभ -लेखन से ,जहां पीड़ा ,अपमान ,अमानुषिक व्यवहार हर कदम -कदम पर टीस और चुभन भरते रहे। लेकिन कभी कदम पीछे हटाने की नहीं सोची ।अपने केन्द्र बिंदु का दायरा गहरा करते हुए स्त्री-समस्याओं पर पत्रिका प्रारंभ कर दी। संगिनी, अंतरंग -संगिनी में नारी जीवन के अनगिन उलझे ,बिखरे आयामों को 18 वर्षों तक समेटने में लगी रहीं,जो अत्यंत श्रमसाध्य एवं चिंतन-भरा क्षेत्र है ।
    सुनते आए हैं -आत्मा अनंत शक्ति का धारक है ।
    दिव्या जी के संकल्प की दृढ़ता , धैर्य ,सहन क्षमता और श्रमपूर्ण जागृति ने सिद्ध कर दिया है कि दूसरों के कष्ट को अपना महसूस करने वालों में यह असीम शक्ति प्रकट होती है। विपरीत परिस्थितियों में ,एकाकीपन के अंधेरों में फिर से नयी उर्जा संचरित होती है बस अपने लक्ष्य पर दृष्टि रहे ,संवेदना छलछलाती रहे,स्व -पर का भेद न रहे ।
    दिव्या जी अक्सर कहा करती हैं कि वे धार्मिक क्रिया आदि कर नहीं पातीं या कहें कि जरूरत नहीं समझती । मेरी नजर में निःस्वार्थ भाव से ,प्रेम से अपनी जिम्मेदारियों को स्वीकारते हुए लंबे समय तक ,स्वयं को भूलकर सेवा-टहल ,देख -भाल में लगे रहना तथा नारी हृदय की तकलीफ ,बेबसी ,यातनाओं और मरणांतक कष्ट से भरे पलों की साक्षी बनना क्या किसी धर्म से अलग है ?
    बड़ी बात तो यह है कि पीड़ित स्त्री की लाचारी दिखाकर दया-भाव जगाने के स्थान पर उनके जीवन को नयी दिशा देकर, खुशहाल जीते देखने के उपाय में रुचि रखती हैं।
    “खुदी को बुलंद ” करने वाले जीवट के साथ नयी आशा ,नयी उम्मीद का नया स्वर बुलंद कर रही हैं।
    ।। शुभ हो ।।
    उन जैसी शक्ति सबको मिले ।
    -नीरा नाहटा

  6. आत्म कथ्य के इस दूसरे भाग को पढ़ कर और दिव्या जी को जितना जान सकी हूँ पिछले 6,7 वर्षों में ,तो इतना तो अवश्य कह सकती हूँ कि मुझे उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के साथ उनका प्रेम भी बड़ा विशाल दिखा है। सबके दुःख के साथ वे अनायास ही जुड़ जाती हैं। सुना है दुःख किसी दो को आत्मीय संबंध के कारण जोड़ने का बड़ा सटीक माध्यम है,हमने तो उनमें यह भाव देखा भी है।
    दिव्या जी में उपस्थित यही उनकी बात ,समझ और सोच संवेदनशीलता की गहराई से हमें रूबरू कराती है।
    उनकी छोटी बहन के साथ का उनका स्नेह,लगाव और उनकी मृत्यु के बिछोह की मार्मांतक पीड़ा के और उनकी उस समय की भीतर की टूटन के हम लोग साक्षी रहे हैं।
    18 वर्षों तक *अंतरंग संगीनी *के हर अंक के तत्कालीन विषय उनकी जीवटता से और स्त्री तथा स्त्री विषयक समस्याओं से उनका जुड़ाव, यह सब उनके मन के भीतर के भावों को उजागर करता है कि वे बड़ी आसानी से जुड़ जाती हैं और यथासंभव उसके दुःख,दर्द के निवारण के लिए तत्पर भी हो जाती हैं।
    *आबो हवा* के इस अंक और पिछले अंक के भागों ने जिस तरह उनके जीवन के हर पहलू को खोला है,उनके हृदय के भीतर हम पाठकों को और गहराई से झाँकने और जुड़ने का अवसर दिया, वह सराहनीय है।उनका यह आत्म कथ्य उनके व्यक्तित्व की विराटता को और विस्तृत करता है।
    उनकी प्रकाशित क़िताब*खुदी को कर बुंलद ,एकल स्त्रियों का जिंदगीनामा* का पहला भाग और अब दूसरा भाग जो कि प्रकाशनाधीन है ,वह भी उनकी उम्र को धता बता कर जीने और जीवन में कुछ कर गुज़रने की प्रेरणा देता है।
    संघर्ष के बिना जीवन संभव नहीं ,इस बात को चरितार्थ करता है उनका जीवन।
    ख़ास कर दिव्या जी मेरे लिए एक प्रेरक व्यक्तित्व रही हैं,कुछ हमारे कार्यक्षेत्र ने हमें साथ जोड़ा और कुछ संवेदनशीलता ने।
    उन्हें मेरी हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित हैं।

  7. “दिव्या जैन जी की आत्मकथा पढ़ते हुए बार-बार यह महसूस हुआ कि जीवन का मूल्य उसकी सहजता में नहीं, बल्कि उसे सत्य के साथ जीने में है। उन्होंने अपने अनुभवों को न तो महिमामंडित किया और न ही करुणा बटोरने का प्रयास किया। यही उनकी लेखनी की सबसे बड़ी शक्ति है। उनके शब्दों में आत्मचिंतन है, संवेदना है और एक ऐसी दृष्टि है जो पाठक को अपने जीवन के प्रश्नों से भी रूबरू कराती है। यह केवल एक व्यक्ति की जीवन-यात्रा नहीं, बल्कि समय, समाज और मानवीय संबंधों का जीवंत दस्तावेज़ है।
    ऐसी ईमानदार और गरिमामयी रचना के लिए दिव्या जैन जी को मेरा सादर प्रणाम।”

  8. दिव्या जी के आत्मकथ्य का दूसरा भाग पढ़कर व्यक्तिगत रूप से एक मनुष्य के रूप में मैं और पुष्ट हुआ हूँ, क्योंकि मेरा जीवन भी बड़ा संघर्ष पूर्ण रहा है और अभी भी चल रहा है किन्तु, दिव्या जी का एकल स्त्री के रूप में इस प्रकार का सघन संघर्ष, विपरीत परिस्थितियों में, वह भी एक स्त्री होते हुए परिस्थितियों को धता बताते हुए आगे बढ़ने का साहस प्रेरणादायक है.ऐसे व्यक्तित्त्व की जीवन कथा पढ़कर या सुनकर ही सामान्य व्यक्ति प्रेरणा पाता है.ऐसी विपरीत परिस्थिति में जूझते हुए लिखना, वह भी एकल स्त्रियों के संघर्ष पर, न कि निजत्व पर! मैंने इनकी पहली कृति हौव्वा की बेटी पढी थी! मार्मिक और प्रेरक कथा थी, उसके पश्चात् खुदी को कर बुलंद… अब उसका दूसरा भाग आने वाला है. जानकर प्रसन्नता हुई, एक पाठक के रूप में उसकी प्रतीक्षा रहेगी. एक प्रखर और शोधक पत्रकार के रूप में दिव्या जैन जी की प्रतिष्ठा रही है, किन्तु एक रचनाकार के रूप में भी उन्होंने अपना लोहा मनवाया है. एक साथ कई मोर्चों पर जूझते हुए बढ़ना और साथ ही समाज के लिए सोचना, एक बड़े हृदय का व्यक्ति ही कर सकता है और यह गुण दिव्या जैन जी में स्पष्ट दिखाई देता है. उनका व्यक्तित्त्व मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से प्रेरणादायक है.उन्होंने जिस प्रकार से अपनी बहन की सेवा की; वह एक समाज के लिए मिसाल है. वे दिल से और बड़ी बेबाकी से लिखती है. इसकी अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी. दिव्या जी के इस संघर्ष को सलाम और मंगलकामनाएं

  9. दिव्या जी के संघर्षशील जीवन का परिचय उनके आत्म कथ्य के दूसरे भाग में वर्णित है। परिवार से जुड़े कर्तव्यों में बंधा उनका जीवन एक साथ ही स्नेह, प्यार की अनुभूति के साथ दृढ़ परिश्रम और अनुशासन की मिसाल है। अक्षम बहन के प्रति ममता ने उन्हें मातृत्व के शिखर पर स्थापित कर दिया है। कठिन परिस्थितियों के बावजूद भी उनका मन किसी समझौते के लिए तैयार नहीं था। हर ऑपरेशन, हर इलाज के लिए वे तत्पर रहीं। मजबूत सहारा बने अपने भाई को खोना और उसके बाद भी हिम्मत के साथ अपनी बहन की देखभाल करना और हर चुनौती का डटकर सामना करना ही उन्हें विजेता बना देता है। इन सारी बाधाओं के बाद भी साहित्य से जुड़े रहना उनकी जिजीविषा का प्रमाण है। उनकी
    पुस्तक खुदी को कर बुलंद, एकल स्त्रियों का जिंदगीनामा, में उन स्त्रियों को पहचान मिली है जो बाधाओं और पूर्वाग्रहों से लड़ते हुए आगे बढ़ी और उन्होंने जिंदगी में एक स्थाई मुकाम पाया है। ये सारी उपलब्धियां दिव्या जी को सचमुच में विशिष्ट बना देता है, भीड़ में।
    नीलांजना किशोर

  10. दिव्या मासी के इस संघर्ष को मैंने बचपन से देखा है। और इस सबके बीच उनका प्रेम, उत्साह और जीवंत व्यक्तित्व भी। अनेक दुखों तकलीफों के बीच छोटी छोटी बातों से सहज ही प्रसन्न हो जाना और हम बच्चों की छोटी छोटी बातों को याद रखना, उसे तवज्जो देना, ये बचपन में कैसे मायने रखता है, हम सब जानते हैं। एक वक़्त था जब मैं अपने wallet में उनकी तस्वीर रखा करती थी 🙂 वे तबसे ही मेरी बहुत प्रिय रही हैं। और आज भी अपने होने तथा अपने रचना कर्म से प्रेरित करती हैं। आज जब हम अल्ज़ाइमर्स से जूझते अपने कवि पिता के साथ हैं, सेवारत हैं, उनके उस प्रेमिल व्यक्तित्व की छाप और स्मृति हमारा बड़ा संबल है। साहित्य जीवन से ही निकलता है। और जिसने उसे भरपूर जिया है, उसके पास ही बाँटने के लिए असली कथाएं हुआ करती हैं। कामना है कि आप ऐसे ही कार्यरत रहें और यूँ ही अपने दूरपास के लोगों, स्त्रियों, बच्चों के साथ अपना यह रोशन व्यक्तित्व बांटती चलें!

  11. दिव्या मासी के इस संघर्ष को मैंने बचपन से देखा है। और इस सबके बीच उनका प्रेम, उत्साह और जीवंत व्यक्तित्व भी। अनेक दुखों तकलीफों के बीच छोटी छोटी बातों से सहज ही प्रसन्न हो जाना और हम बच्चों की छोटी छोटी बातों को याद रखना, उसे तवज्जो देना, ये बचपन में कैसे मायने रखता है, हम सब जानते हैं। एक वक़्त था जब मैं अपने wallet में उनकी तस्वीर रखा करती थी 🙂 वे तबसे ही मेरी बहुत प्रिय रही हैं। और आज भी अपने होने तथा अपने रचना कर्म से प्रेरित करती हैं। आज जब हम अल्ज़ाइमर्स से जूझते अपने कवि पिता के साथ हैं, सेवारत हैं, उनके उस प्रेमिल व्यक्तित्व की छाप और स्मृति हमारा बड़ा संबल है। साहित्य जीवन से ही निकलता है। और जिसने उसे भरपूर जिया है, उसके पास ही बाँटने के लिए असली कथाएं हुआ करती हैं। कामना है कि आप ऐसे ही कार्यरत रहें और यूँ ही अपने दूरपास के लोगों, स्त्रियों, बच्चों के साथ अपना यह रोशन व्यक्तित्व बांटती चलें!

  12. यह 1988/ 89 की बात है कि जब मैं दिव्या जी के विले पारले स्थित निवास स्थान पर गया था, जहाँ मेरी उनके मातापिता, उनके भाई पवन कुमार तथा छोटी बहन लवलीना से मिला था, सभी को मिलकर बहुत अच्छा लगा था।
    खैर ये तो हुई व्यक्तिगत बात, मैंने कुछ समय पहले उनके आत्म कथ्य का पहला भाग पढ़ा था तब मैं उनके बारे में इतना कुछ जान पाया जो व्यक्तिगत रूप से मिलने पर नहीं जान पाता। कल ही मैंने उनके आत्म कथ्य का दूसरा भाग पढ़ा तो मैं अचंभित रह गया। पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ साथ अपने बुज़ुर्ग माता पिता की सेवा करना और साथ ही अपना लेखन कार्य भी करते रहना, आसान काम नहीं हो सकता।
    उन्होंने आठ साल तक अपनी छोटी बहन की जास तरह सेवा की और उस वक्त उन्हें जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और तब उन्हें जो भी अनुभव हुए उसका जो वर्णन उन्होंने किया, उनकी कुछ पंक्तियां पढ़कर मेरा दिल भर आया।
    उनके सामने जो भी परिस्थितियां आईं, उनका उन्होंने डटकर सामना किया और अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ती रही।
    अपनी कलम के माध्यम से वे जिस तरह महिलाओं के हित में काम कर रहीं हैं, मैं उन्हें आगे भी इसी तरह काम करते रहने के लिया प्रोत्साहित करता हूँ और शुभकामनाएं देता हूं।

  13. प्रिय दिव्या जी, बरगद जैसे घने दर्द के वृक्ष के नीचे आप
    जैसी ज़िन्दगी गुज़ार रही है और उसके लिए बड़े से बड़े शब्द भी बौने हो गए। इतने में भिन्न क्षम बहन की देखभाल करने में आपका साथ देने वाले उनके भाई की भी मृत्यु हो जाना जैसे कुदरत की और से उनके ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने जैसा है जो दिव्या जी को कितना तोड़ गया होगा। परंतु फ़िर भी उन्होने हिम्मत नहीं हारी और उस पीड़ा को ही सीढ़ी बना कर पुनः साहित्य सृजन में अपने आपको व्यस्त कर के नए आयाम गढ़ दिए आपने ।सच में उनकी मानसिक दृढ़ता को तहे दिल से सलाम ।

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