दिव्या जैन, divya jain, mere hisse ka qissa
मेरे हिस्से का क़िस्सा... आब-ओ-हवा पर एक विशेष शृंखला। उम्र और सृजन का यादगार कथानक लिख चुके हस्ताक्षरों की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी। इस सिलसिले में दूसरी दास्तान एक स्वतंत्र चेता स्त्री की, जिसने मुश्किल जीवन जीते हुए सरोकारों की पत्रकारिता में श्रीवृद्धि की और प्राण-प्रण से सक्रिय हैं। पिछले अंक से जारी...
दिव्या जैन की कलम से....

मेरे भीतर की स्त्री-2

(चार)
           अब मैं जो बात करना चाहती हूं, यहाँ फिर से पवन भाई का ज़िक्र स्वाभाविक रूप से आ जाता है। 2013 में भाई की मृत्यु के बाद मैं अपने आपको बहुत अकेला पाती हूँ। भाई का जाना इतना आकस्मिक था कि मेरे लिए कुछ भी समझ पाना मुश्किल था। मेरी मुश्किलें उनके चले जाने से बढ़ गयीं, यह तो एक अलहदा बात है, लेकिन हम दो बहनें और भाई थे तो हमें एक छोटे-से परिवार जैसा लगता था, जो उनके जाने से बिखर-सा गया है।

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भाई का होना, हमारे लिए बहुत बड़ा सहारा था। आज हम दोनों बहनों को अकेले हो जाने का बहुत ज़्यादा अहसास होता है। छोटी बहन लवलीना को तो भाई बहुत चाहते थे, वह उनकी सबसे लाड़ली बहन थी। लवलीना जो भी मांगे उसे लाकर देते थे। उसके शब्दों का कभी अनादर नहीं होने देते थे। बहन को भी पवन भाई बहुत अच्छे लगते थे। यहाँ एक बात और बता दूं भाई पवनकुमार जैन कवि लेखक थे। सन् 2012 में ‘उनका पहला कविता संग्रह’ उन्होंने छोटी बहन लवलीना को समर्पित किया था। भाई ने इस बात को स्पष्ट करते हुए समर्पण पृष्ठ पर लिखा है कि ‘मेरी यह बहन इस किताब से कुछ भी पढ़ या समझ नहीं पाएगी लेकिन उसे इस बात की ख़ुशी होगी कि उसका नाम इस किताब में छपा है। अन्ततः तो और पाने वालों की ख़ुशी बड़ी बात होती है। होती है कि नहीं?’

बहरहाल समय के चलते बहुत कुछ बदला। माता-पिता का देहावसान तो पहले हो गया था। इस बीच छोटी बहन की उम्र भी बढ़ती गयी। सालों से वह पूरी तरह से मुझ पर निर्भर हो गयी और बहुत ज्यादा ज़िद्दी भी। इस अरसे में उसके मन-मस्तिष्क में आये बदलावों का क्या और कैसे इलाज करवाया जाये, यह समझ में नहीं आ रहा था। भाई ने छोटी बहन के इलाज के लिए एक मनोरोग चिकित्सक का संपर्क-सूत्र ढूंढ निकाला था। लेकिन लवलीना को डॉक्टर के पास कैसे ले जाना था, यह एक बड़ा प्रश्न था, चूंकि वह कहीं भी जाने के लिए राज़ी ही नहीं होती थी। ऐसे में इलाज करवाएं तो भी कैसे? यदि वह उग्र हो जाये तो स्थिति को संभालना हमारे लिए मुश्किल हो जाता था।

उसके मन की स्थिति को समझना हमारे लिए कठिन था। पूरा-पूरा दिन मैं उसके साथ होती। खाना खिलाना, पानी पिलाने की छोटी-छोटी प्रक्रिया में ही दिन कहाँ निकल जाता, पता ही नहीं चलता। बढ़ती चिंताओं के बीच दिन कट रहे थे। तब अचानक भाई के जाने के बाद मेरी मुश्किलें कई गुना बढ़ गयीं। छोटी बहन की देखभाल अकेली कैसे कर पाऊंगी, यह सवाल मेरे सामने बड़ी चुनौती के रूप में रहा। कई बार सोचते-सोचते थक जाती और आंखों से आंसू निकल जाते। कितना भी परेशान होऊं लेकिन करना तो मुझे ही था। मैंने अपनी सारी गतिविधियाँ, कामकाज सब कुछ पहले ही छोड़ दिया था। उसकी देखभाल और मेरा कामकाज साथ-साथ संभव नहीं थे।

पहली चुनौती थी बहन के लिए एक मनोरोग चिकित्सक को ढूंढना। इससे निपटी तो लवलीना को मोतियाबिंद के चलते दिखना लगभग बंद हो गया। उसका आपरेशन करवाना फिर एक बड़ी चुनौती बन गया। लंबी प्रक्रियाओं के बाद हुआ यह कि डॉक्टर ने विकल्प दिया कि दोनों आंखों का साथ ही करवा सकते हैं, लेकिन निर्णय मुझे लेना था। जर्मनी में थे तब बड़े भाई, उनसे और फिर बहन से भी चर्चा की। अन्ततः दोनों आंखों का एक-साथ आपरेशन हुआ। सब अच्छा हुआ फिर भी आपरेशन के अच्छे-बुरे परिणामों को झेलने का साहस और हिम्मत भी मुझे जुटानी थी क्योंकि छोटी बहन का जीवन एकदम निष्क्रिय और शरीर एकदम कमज़ोर। आये-दिन उसके शरीर में कोई न कोई तकलीफ़। जैसे उसके सिर में बहुत ज़्यादा दर्द हुआ तो वह मुझे ठीक से कुछ बता नहीं पा रही थी, ऐसे में उसे चिल्लाने और रोने के अलावा कुछ नहीं सूझ रहा था। ग़ुस्सा भी बहुत आ रहा था, जो मुझ पर किसी न किसी रूप में निकल रहा था। मेरी घबराहट और सहनशक्ति की उस दिन पराकाष्ठा हो गयी। रात का सन्नाटा था, मैं थी और मेरे आंसू थे जो इस निस्सहाय स्थिति में टपके जा रहे थे। बहन की पीड़ा इतनी ज़्यादा थी कि उसे उस दिन मां की बहुत याद आयी। तब वह एक सांस में कई बार मम्मी-मम्मी बोल गयी। मुझे लगा कि उसे लगा होगा कि मम्मी होती तो वह कुछ कर पाती उसके लिए, अपनी आग़ोश में ले लेती उसे और शायद उसकी पीड़ा ठीक हो जाती।

मेरे लिए यह पूरा घटनाक्रम एक डरावने सपने की तरह था। वास्तव में मैं डर गयी थी। स्थिति जब मेरे वश में नहीं होती है तब मैं बहुत घबरा जाती हूँ। शायद मेरे जैसे अति-संवेदनशील व्यक्ति के साथ ऐसा कुछ होता है। ऐसे मौक़े पर मुझे अपनी बड़ी बहन ज्योत्स्ना मिलन की बहुत याद आती है, जो मुझसे एकदम विपरीत थीं। मेरी निगाह में वे एक योद्धा की तरह थीं। चुनौतियों का सामना करना उन्हें भली-भांति आता था। मेरे डर के संबंध में उन्होंने मुझे एक बात कही थी, जो मुझे याद आ रही है। एक बार वह मुंबई आयी थीं, जब हमारे माता-पिता बीमार चल रहे थे। ऐसे मौकों पर हमेशा आती रहती थीं। माता-पिता की बीमारी के दौरान मेरे मन में एक डर बना रहता था तब बहन ने मुझे कहा था कि डरने से क्या होगा? इनकी मृत्यु हो जाएगी, यही ना? मृत्यु से क्या डरना, उसे तो एक दिन आना ही होता है, सबका अपना दिन निश्चित होता है। उन्होंने कहा, मैंने सुना, लेकिन मेरे मन में यह बात बैठी ही नहीं, जबकि सच भी यही है।

मेरा तर्क यह होता कि अलबत्ता मृत्यु को रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन पीड़ित व्यक्ति की अधिकाधिक सेवा करके मृत्यु को परे तो धकेला ही जा सकता है, लेकिन यह तभी संभव हो पाता है जब क़ुदरत या हालात आपको मौक़ा दें और ऐसा मौक़ा न मिलने पर मौत को साक्षात दस्तक देते हुए देखकर रूह कांप जाती है। यह कैसी विडंबना है। पवन भाई के जाने के साल भर के अंदर ही ज्योत्सना बहन भी चली गयीं।

दिव्या जैन, divya jain

ज्योत्स्ना बहन का दिल बहुत बड़ा था, खुले आसमान की तरह, जिसमें वह सभी को समाहित कर लेना चाहती थी। अपने से बन पड़े उतना सभी के लिए करने की प्रबल भावना उनमें थी। इसलिए आज उनकी कमी मुझे खलती है। अब वह नहीं हैं, उनकी आवाज़ मेरे कानों में नहीं गूंजती, उनका मार्गदर्शन, हिदायतें अब मुझे नहीं मिल पातीं- फिर भी मैं उन्हें अपने आसपास ही पाती हूँ। जब मैं उदास होती हूँ, जब मैं कमज़ोर पड़ती हूँ, मेरे आस-पास जब घना अंधेरा होता है, तब वे मेरे सामने होती हैं- प्रेरणास्रोत बनकर, तब फिर एक नई ऊर्जा के साथ मैं आगे बढ़ती हूँ जीवन से जुड़ी इस यात्रा में।

(पांच)
एक अंतराल के बाद मैं फिर से अपने भीतर की स्त्री को खोजने की कोशिश कर रही हूं। स्मृति पटल पर से जब कई बातें धुंध की तरह छंट गयी हों या ग़ायब हो गयी हों, तब उन्हीं बातों को, घटनाओं को याद करना, दोहराना और लिखना कितना मुश्किल होता है! लिखना भी अनिवार्य क्योंकि “मेरे भीतर की स्त्री”, इस फ़साने में कुछ बातें जोड़ना ज़रूरी हैं।

मुझसे दस साल छोटी और बचपन से ही मानसिक रूप से भिन्नक्षम बहन की आठ साल तक लगातार उसकी सेवा करना मेरे लिए न केवल कठिन काम था बल्कि एक बहुत बड़ी चुनौती भी। बढ़ती उम्र के साथ उसकी काया शिथिल होती जा रही थी। आख़िरी दो सालों में जिन-जिन हालात से वह गुज़री और जितना कुछ उसने भुगता, उतना ही उसकी देखभाल करते हुए मैंने भी, उसका वर्णन संभव नहीं है। उन हालात में मेरे लिए अपने तन और मन की सुध लेना संभव नहीं था। तब बस बहन की सेवा ही लक्ष्य था, ऐसे में हिम्मत हारने का प्रश्न ही नहीं था। 2019, वो समय था जब देश-दुनिया में कोरोना नामक महामारी फैली थी। ऐसे में अपने आपको और बहन को भी इस बीमारी से बचाना था। तब घर में किसी हेल्पर को भी बुलाना संभव नहीं था।

बहरहाल, इन तकलीफ़ों में ही समय बीतता गया। क्या याद करूं और क्या नहीं, एक समय आया जब बहन को अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा, फिर डिस्चार्ज करवाकर घर लाना और घर में ही एक छोटा-सा अस्पताल जैसा बन जाना। उस वातावरण में रहते बहुत डर लगता था लेकिन हिम्मत हारना विकल्प नहीं था।

अंततः 10 अगस्त 2021 में वह मुझे अकेला छोड़कर चली गयी। दुर्भाग्य ऐसा रहा कि तब भी कोरोना महामारी चल रही थी तो ऐसे मौक़े पर भी मेरे बड़े भाई या बहन मेरे पास नहीं आ सके। इसे विडंबना ही तो कह सकते हैं। पिछले दो सालों से बहन बोल भी नहीं पा रही थी ऐसे में उसके भीतर की तकलीफ़ और दर्द को मैं नहीं समझ पा रही थी। सेवा में कोई कमी नहीं रखी थी, लेकिन उसकी पीड़ा को समझना मुश्किल था, इससे दुखदायी स्थिति और क्या हो सकती है!

वैसे तो जीवन में अकेले होने का अहसास कई बार हुआ था लेकिन बहन के जाने के बाद यह अहसास बड़ी शिद्दत से महसूस होने लगा। इस अकेलेपन और ख़ालीपन को बयां नहीं किया जा सकता। कई द्वंद्व और… ज़िंदगी जैसे थम-सी गयी थी।

जब बहन की बड़ी ज़िम्मेदारी से मुक्त हुई तो लगा था कहीं चली जाऊं ताकि जीवन में कुछ परिवर्तन आ सके। तब मैं भाई के पास दिल्ली गयी और बाद में बहन के पास देहरादून। कुछ समय अच्छा बीता, मुंबई वापस आने पर कोई बदलाव नज़र नहीं आ रहा था, वही सन्नाटा और ख़ालीपन।

बहरहाल, इस स्थिति से उबरना बहुत ज़रूरी था इसलिए “ऐसा कब तक चलेगा”, यह प्रश्न मैं अपने आप से बार-बार पूछ रही थी। कई प्रकार के द्वंद्व थे मन में। आठ साल बीत गये थे कि मेरा कलम के साथ जैसे कोई वास्ता ही नहीं रह गया था।

उस स्थिति में यह स्वाभाविक भी था। लेकिन यह भी उतनी ही सच बात है कि कलम और काग़ज़ ने अच्छे-बुरे वक़्त में हमेशा मेरा साथ दिया है। इस अहसास से सच कहूं तो मुझमें नयी ऊर्जा का संचार हुआ। यहां यह बात भी बता दूं कि जहां तक लेखन की बात है तो मेरी कलम के दायरे में हमेशा स्त्रियां ही रही हैं और आज भी हैं, फिर चाहे मैंने कई अन्य विषयों पर भी क्यों न लिखा हो। स्त्रियों की सामाजिक समस्याओं पर मैंने ख़ूब लिखा है और उनकी समस्याएं मुझे हमेशा उद्वेलित करती रही हैं।

काम तो मैंने बहुत किया लेकिन मेरे लिए वो समय ऐसा था कि कुछ भी करने का मन नहीं होता था। उसी दौरान लेखन से जुड़ी मेरी कुछ सखियों ने मुझे कहा कि आप लिखना फिर से शुरू कीजिए, यही तरीक़ा है इस ख़ालीपन से निजात का। उनका सुझाव तो सही था लेकिन समय ही ने मेरे लिए यह तय किया।

2023 की बात है जब मैंने मन बनाया कि एक किताब पर काम करूंगी। विषय वही, एकल स्त्री: त्रासदी और ताक़त। इस विषय के अंतर्गत ऐसी स्त्रियों को ढूंढ़ना था जो शादी के बाद अपने पति द्वारा प्रताड़ित रही हों, बहुत कुछ सहती रही हों और फिर उस शादी के बंधन से मुक्त होकर अपनी ज़िंदगी अच्छे तरीक़े से जी पायी हों और अपने आपको साबित कर दिखा सकी हों। साल भर तक लगातार इस विषय पर काम करती रही। इस दौरान मैंने 13 स्त्रियों से बातचीत की, उनके दुखदर्द और अनुभव जाने। बहुत कठिन और भाव-विभोर कर देने वाला काम था यह। 2024 में किताब छपी, शीर्षक था, “खुदी को कर बुलंद, एकल स्त्रियों का ज़िंदगीनामा।”

एक महीने के बाद लोकार्पण हुआ, अच्छी चर्चा भी किताब पर हुई। इस विषय पर किये गये मेरे काम की सभी लोगों ने सराहना की, इसे अपनी उपलब्धि मानती हूं। किताब में शामिल कुल 13 जीवनगाथाओं को पढ़कर अन्य प्रताड़ित स्त्रियां प्रेरणा पा सकें और अपनी ज़िंदगी बेहतर जी सकें, यही मेरा प्रमुख उद्देश्य रहा। कई लेखकों ने अच्छी प्रतिक्रियाएं और समीक्षाएं लिखीं, जिससे मेरा मनोबल बढ़ा और हौसला भी। इसी हौसला अफ़ज़ाई ने मुझे इस किताब की शृंखला के दूसरे भाग पर काम करने पर मजबूर कर दिया। किताब जल्द ही प्रकाशित हो जाएगी। अस्तु।

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