
- July 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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प्रो. नौमान ख़ान की कलम से....
नयी सदी की नयी आवाज़: बशीर बद्र
जदीद उर्दू ग़ज़ल को नया चेहरा, नया रंग-रूप, नये आयाम, नया ट्रेंड, नयी इमेजरी, नयी शब्दावली, नया लबो-लहजा, नयी मख़मली आवाज़, नये पैकर अता करके नये जहानों की सैर कराने वाला जादूगर शायर पद्मश्री बशीर बद्र भले ही अब हमारे दरमियान नहीं है, परंतु उनका मनमोहक कलाम हमेशा अपनी ख़ुशबू, अपना रंग बिखेरता रहेगा। पढ़ने और सुनने वालों को मंत्रमुग्ध करके उनके दिलों में ठंडक और रोशनी पहुंचाकर, कानों में रस घोलकर मशामे-जां को मुअत्तर करता रहेगा। प्यार की डगर पर चलने वालों को मुहब्बत और इंसानियत का पैग़ाम देता रहेगा।
बशीर बद्र की शायरी दिलो-नज़र, ख़याल और अहसास की शायरी है, जिसका केंद्र बिंदु मुहब्बत का वो अनंत जज़्बा है जो कि दिलों को जोड़ता, सरहदों को तोड़ता, जीने की राह बताता, जीने का सलीक़ा सिखाता, भेदभाव को मिटाता, धर्मों एवं भाषाओं की दूरियों को समीप लाकर एक जान, दो क़ालिब करता है। हैरतों और अहसासात को जगाता, मनमुटाव को मिटाता, अंधेरों को उजालों में और जीवन की कुरूपताओं को नर्म एवं नाज़ुक़ अहसासात की सुंदरताओं में परिवर्तित करने में अपना योगदान अदा करता है।
बशीर बद्र शायरी को लतीफ़ (आनंदादायक) अहसासात का तरजुमान समझते थे। शे’रियत उनकी नज़र में शायरी की पहली एवं लाज़मी शर्त थी। उनकी शायरी किसी ख़ास पसमंज़र (पृष्ठभूमि), तहरीक (आंदोलन), फ़ल्सफ़े या नज़रिये की तरजुमान नहीं है। वो एक ऐसा आईना है जिसमें हर श्रोता या पाठक अपना चेहरा देख सकता है। इश्क़ो-मुहब्बत बशीर बद्र की शायरी का बुनियादी मौज़ू (विषय) है। उनकी शख़्सियत और शायरी इंसानियत के इसी वालिहाना (प्राकृतिक) जज़्बे से सरशार है। वो कायनात की हर शय को इसी दृष्टि से देखते, महसूस करते और फिर दिलनशीन अंदाज़ में अपने दिल की किताब को पन्नों में उतार देते हैं।
मुहब्बत का यही मासूम, पवित्र जज़्बा, यही अहसास उनकी पूरी शायरी में रचा-बसा है, जो कि नग़्मा बनकर उनके हर शे’र से फूटता और बहारिस्तान का समां पैदा कर देता है। बशीर बद्र शायरी को लफ़्ज़ों की मीनाकारी और आंसुओं की तहरीर से ताबीर करते हुए कहते हैं:
तितली के नाज़ुक पंखों पर आंसू की तहरीर ग़ज़ल है
लफ़्ज़ों की मीनाकारी को इल्हामी अशआर न जानो
ये आंसू हैं इन्हें फूलों में शबनम की तरह रखना
ग़ज़ल अहसास है अहसास का मातम नहीं होता
ग़ज़ल के प्रति उनका यह दावा भी ग़लत नहीं है कि:
चमकती है कई सदियों में आंसुओं से ज़मीं
ग़ज़ल के शे’र कहां रोज़-रोज़ होते हैं
कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बंधा हुआ
वो ग़ज़ल का लहजा नया-नया न कहा हुआ न सुना हुआ
बशीर बद्र ने ख़ुशबू की कहानी को शबनमी लहजे में तितली की ज़ुबानी बयान करते हुए कहा है:
आहिस्ता ग़ज़ल पढ़ना, ये शबनमी लहजा है
ख़ुशबू की कहानी है तितली की ज़ुबानी है
जमालियाती अहसास (Aesthetics Sense) और ज़बानी बयान के तख़लीकी रचाव ने उनकी शायरी को जो हुस्न और पारदर्शिता बख़्शी है, उसके कारण उनकी ग़ज़ल की जादूनिगारी ने ज़ौक़ और विज़दान (विवेक) के फैलाव को अपने दायर-ए-असर में मेहसूर (बाधित) कर लिया है। उनकी ग़ज़ल जज़्बाती और महसूसाती तत्व के साथ लिसानी (भाषाई) और इज़हारी (अभिव्यक्ति) की ख़ूबी भी रखती है।
बशीर बद्र का महबूब (प्रेमिका) उनके वजूद का ऐसा अटूट हिस्सा है, जो कि उनकी रूह, उनकी सांसों में समाया हुआ प्रतीत होता है और चलते-फिरते, सोते-जागते, हर वक़्त, हर शय में वो उसी का नज़ारा करते हैं। उपर्युक्त बातों के प्रमाण में उनके चन्द शे’र प्रस्तुत हैं:
दिल मुहब्बत दीन दुनिया शायरी
हर दरीचे से तुझे देखा करें
मेरे बिस्तर पे सो रहा है कोई
मेरी आंखों में जागता है कोई
मुहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ चलती है
कोई इंसान तनहाई में भी तनहा नहीं रहता
इतनी मिलती है मेरी ग़ज़लों से सूरत तेरी
लोग तुझको मेरा महबूब समझते होंगे
बशीर बद्र ग़ज़ल के शायर हैं और ग़ज़ल उन्हें कितनी अज़ीज़ है, इसका अनुमान उनके इस शेर से लगाया जा सकता है:
वो माथे का मतला हो कि होंठों के दो मिसरे
बचपन से ग़ज़ल ही मेरी महबूब रही है
फ़न को वह रूह और दिल की रियाज़त समझते हुए कहते हैं:
फ़न अगर रूहो-दिल की रियाज़त न हो
ऐसी मस्जिद है जिसमें इबादत न हो
बशीर बद्र ने ज़िंदगी धूप-छांव में गुज़ारी और उसके अच्छे-बुरे दिन देखे। वो एक नाज़ुक मिज़ाज, हस्सास (संवेदनशील) इंसान थे। उनकी ग़ज़लों में दर्दमंदी, सोज़ और मलाल की जो कसक और तड़प निहित है, वो उनकी गहरी सोच एवं दर्द भरे अनुभवों की देन है और दर्द और कसक के इसी अहसास ने उनसे रूह और दिल में उतर जाने वाले ऐसे पुरअसर शे’र कहलवाये हैं, जो कि सुनते ही दिल में उतर जाते हैं:
हमारा बदन धूप का बाग़ है
यहां चांदनी और शबनम कहां
आंसू कभी पलकों पर तादेर नहीं रुकते
उड़ जाते हैं ये पंछी जब शाख़ लचकती है
उदासी का ये पत्थर आंसुओं से नम नहीं होता
हज़ारों जुगनुओं से भी अंधेरा कम नहीं होता
कभी बरसात में शादाब बेलें सूख जाती हैं
हरे पेड़ों के गिरने का कोई मौसम नहीं होता
ख़ूबसूरत उदास ख़ौफ़ज़दा
वो भी है बीसवीं सदी की तरह
बशीर बद्र के कलाम को पढ़कर या सुनकर यूं लगता है जैसे हम ख़याल के मौसमों से हमकलाम हो रहे हैं। वो फ़िराक़ (वियोग) के क़िस्से या पतझड़ों की कहानियां सुनाकर अपने श्रोताओं को उदास या ग़मगीन नहीं करते अपितु ख़्वाबो-ख़याल के नये जहानों की सैर कराते हुए, नये दिलकश मौसमों का पता बताते हुए, खुल जा सिमसिम की तरह उस तिलिस्मी दुनिया में पहुंचा देते हैं, जहां ज़िंदगी मर्सरतों और हैरतों का आईनाख़ाना बन जाती है। उनके ये अशआर इसकी मिसाल हैं:
जिसकी मुख़ालफ़त हुई मशहूर हो गया
इन पत्थरों से कोई परिंदा गिरा नहीं
जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता
उम्र बीत जाती है एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में
अब रोये कहां सावन अब तड़पे कहां बादल
आंगन न बग़ीचा एक छोटा सा कमरा है
हंसी मासूम सी बच्चों की कापी में इबारत सी
हिरन की पीठ पर बैठे परिंदे की शरारत सी
लॉन में एक बेल भी ऐसी नहीं जो देहाती परिंदे के पर बांध ले
जंगली आम की जानलेवा महक जब बुलाएगी वापस चला जाएगा
बैद के ज़र्द मौढ़े पे बैठी हुई
शाम ने उठ के बत्ती जलायी नहीं
वो ज़ाफ़रानी पुलोवर उसी का हिस्सा है
कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे
बशीर बद्र की शायरी और उसकी शोहरत, मक़बूलियत का सबसे सशक्त, दिलचस्प, आम आदमी को समझ में आने वाला या हर एक व्यक्ति को प्रभावित करने वाला पहलू उनका सीधा-सादा, सरल और सरस वो डिक्शन है, जिसके सहारे वो आम बात को भी एक ख़ास चौंकाने वाले अंदाज़ में इस तरह कह देते हैं कि धनक के रंगों की तरह उसके मआनी काग़ज़ पर बिखरकर लफ़्ज़ों का गुलदस्ता बना देते हैं।
सादगी, सलासत, रवानी, नग़्मगी और शे’रियत ने उनकी शैली में चुंबकीय आकर्षण पैदा कर दिया है। उन्होंने दिनचर्या में पेश आने वाले वाक़िआत को, आम आदमी के अनुभवों को सीधी-सादी मगर पुरअसर शायराना ज़ुबान में फ़नकारी के साथ प्रस्तुत कर दिया है।
ऐसे शायर बहुत कम हैं, जिनके चंद शे’र भी लोगों के ज़हनों में महफ़ूज़ हों। बशीर बद्र उन ख़ुशनसीब शायरों में से थे, जिनके एक नहीं कई-कई शे’र लोगों को याद रहते हैं और वो उन्हें मुहावरों की तरह इस्तेमाल करके अपनी अन्तरात्मा को संतुष्ट कर लेते हैं।
बशीर बद्र अपनी शायरी का रिश्ता अमीर ख़ुसरो, संत कबीर और नज़ीर अकबराबादी जैसे अज़ीम अवामी शायरों से जोड़ते थे। यही सबब है कि उनकी शायरी आम और ख़ास सभी में लोकप्रिय है।
भारत एक बहुभाषीय, बहुसांस्कृतिक देश है। बशीर बद्र ने उर्दू, फ़ारसी, हिंदी एवं अंग्रेज़ी के आम प्रचलित शब्दों को इस्तेमाल करके उक्त भाषाओं को एक-दूसरे के क़रीब लाने में और एक-दूसरे को जोड़ने में पुल का काम किया है। उनकी शायरी भारतेंदु हरिश्चंद्र ‘रसा’, दुष्यंत कुमार त्यागी और गोपालदास नीरज की भांति उर्दू एवं हिंदी साहित्य प्रेमियों में समान रूप से पसंद की जाती और चाव से पढ़ी-सुनी जाती है। वो बहते हुए पवित्र नीर की भांति हर प्यासे की प्यास बुझाती है। हर एक को आनंदित व प्रसन्नचित्त करके मर्सरत एवं बसीरत (विवेक) अता करती है।
बशीर बद्र तहज़ीबे-ग़ज़ल के ऐसे नुमाइंदा लोकप्रिय शायर हैं, जिनका नाम तारीख़े-अदब के पन्नों में हमेशा जगमगाता रहेगा और नस्ल दर नस्ल उनकी यादें दिलों में जीवित रहेंगी।

मो. नौमान ख़ान
उर्दू साहित्य की सात किताबों के लेखक, 6 किताबों के संपादक और दर्जनों पाठ्यपुस्तकों के संकलक/संपादक रह चुके हैं डॉ. नौमान। सवा सौ ज़्यादा शोधपत्र प्रकाशित हैं। आधा दर्जन साहित्यिक किताबें प्रकाशनाधीन हैं। दर्जनों सेमिनार में बतौर एक्सपर्ट वक्ता शामिल होने के साथ ही आपको आधा दर्जन से ज़्यादा महत्वपूर्ण सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है। 2 जुलाई 1952 को जन्मे डॉ. नौमान एनसीईआरटी में प्रोफ़ेसर रहे हैं और बतौर पत्रकार और महत्वपूर्ण अकादमिक संस्थानों में सेवाएं दे चुके हैं।
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