बशीर बद्र, bashir badr

शायरों की यादों में बशीर बद्र

             शायरी की कई पीढ़ियों के लिए एक रोल मॉडल और शायरी के चाहने वालों के लिए सेलिब्रिटी बन जाने की हैसियत डॉ. बशीर बद्र को हासिल थी। उनके साथ को, उनके एक आटोग्राफ़ को और उनके साथ फ़ोटोग्राफ़ को कितनों ही ने अनमोल यादों की तरह सहेजे रखा। डॉ. बशीर बद्र की बाद की पीढ़ी के कुछ चर्चित शायरों की कलम से कुछ ख़ास यादें…

बशीर बद्र, bashir badr

आह! डॉ. बशीर बद्र

-डॉ. परवीन कैफ़ (शायर, भोपाल)

माना के चेहरे और भी आंखों में हैं मगर
ऐ चांद कोई ढूंढ़कर तुझसा कहां से लाएं

हमें फख़्र है कि आलमी शोहरतयाफ़्ता शायर और ग़ज़ल के अहदसाज़ फ़नकार पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र पिछले 25 साल से हमारे पड़ोसी रहे।

उन्हे मुशायरों में तो ख़ूब सुना था, लेकिन रूबरू होने का शरफ़ मेरे भाई शाहिद कैफ़ की शादी में (सन 1987 में) हासिल हुआ। बहुत ही ख़ुशगवार लम्हा था, जब वालिद-ए-मोहतरम हज़रत कैफ़ भोपाली ने उनसे मिलवाया। मेरे सलाम का जवाब आपने खडे़ होकर बड़े तपाक और गर्मजोशी से दिया। उनकी सादगी, अपनेपन और ख़ुलूस ने मुझे हैरान कर दिया।

वक़्त गुज़रता गया और मुशायरों मे उनसे मुलाक़ात होती रही। कई मुशायरे उनकी सदारत और निज़ामत में पढे़। सन 1994 मे दुबई में आयोजित मुशायरे ‘जश्ने-जगन्नाथ आज़ाद’ के दौरान दस दिनों तक उनकी सोहबत में रहने का मौक़ा मुझे मिला। वहां उनके बहुत से प्रशंसक मौजूद थे। लोग उनसे मिलकर अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते यानी
‘हर इक समझ रहा था कि मैं ख़ुशनसीब हूं’

कैफ़ साहब के इन्तेकाल (1991) के लगभग तीन साल बाद बी.डी.ए. की जानिब से एक मुशायरा आयोजित किया गया। शायरों को दावतनामे बांटने की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी गयी थी। जब मैं दावतनामा लेकर उनके घर गयी, तो वो बहुत ख़ुश हुए। मसरूफ़ियात के बावजूद उन्होंने शिरकत का वादा किया। मुशायरे मे तशरीफ़ फ़रमा होकर निज़ामत के फ़राइज़ बा-हुस्न-ओ-ख़ूबी अंजाम दिये। डा. साहब ने कैफ़ साहब के कलाम पर तफ़सीली तबसिरा भी किया है।

जिन दिनों डॉ. साहब अलज़ाइमर के शिकार थे, अक्सर घर के बाहर टहलते हुए अपना घर भूल जाते, मुझे सामने देखकर पूछते ‘हमारा घर कहां है’, उस वक़्त उनकी बेबसी और लाचारी पर बहुत अफ़सोस होता, और डॉ. साहब कैफ़ साहब के इस शेर की ज़िन्दा मिसाल नज़र आते:

कौन है ये दीवाना, तेरे घर के पास आकर
पूछता है अपना घर सारे राहगीरों से
…………..

उजाले अपनी यादों के

-धर्मेंद्र तिजोरीवाले आज़ाद (शायर, नरसिंहपुर)

वैसे तो मैं बशीर बद्र साहब से एक ही बार मिला हूँ, लेकिन उस एक मुलाक़ात का ऐसा असर रहा कि मुझे हमेशा यही लगता रहा है मैं उनसे रोज़ मिलता रहा हूँ। दरअसल मैं उनका सिर्फ़ प्रशंसक नहीं था, बल्कि अनुयायी हो गया। यूँ तो मैंने शायरी की पहली किताब ग़ालिब की खरीदी थी। लेकिन जब बद्र साहब को पढ़ा तो बस उनका ही हो गया। उनको पढ़कर हमेशा ऐसा लगता था कि ये लिखा तो उन्होंने है, लेकिन एहसास मेरा है। ऐसा ज़्यादातर लोगों को लगता होगा, तभी उनके शे’र इतने लोकप्रिय हुए।

बद्र साहब अब इस दुनिया को छोड़कर किसी और दुनिया में चले गये हैं तो उनसे हुई वो पहली मुलाक़ात याद आ रही है। 5 अप्रैल 2000 को ज़िला मुख्यालय नरसिंहपुर में एक कवि सम्मेलन था, जिसमें उनके अलावा नीरज जी भी आने वाले थे। कवि सम्मेलन की फूहड़ता मैं पहले देख चुका था, इसलिए जाने का मन नहीं था, लेकिन बद्र साहब को देखने की लालसा में ख़ुद को रोक नहीं पाया। वहाँ पहुँचकर पता चला सारे मेहमान शायर एवं कवि-कवयित्री सर्किट हाउस में ठहरे हैं, तो हम सभी दोस्त वहीं पहुँच गये।

सर्किट हाउस में जब हम लोग उनसे मिलने के लिए उनके कमरे की तरफ़ जा रहे थे तो हम सभी को ये कहकर रोक दिया गया कि आप कार्यक्रम स्थल पर उनसे मिल सकते हैं, यहाँ वो किसी ज़रूरी मीटिंग में हैं। लेकिन मुझे तो बद्र साहब से हर हाल में मिलना था, इसलिए मैंने एक तुक्का मारा। मैंने रोकने वाले उस व्यक्ति से कहा कि अंदर जाकर बद्र साहब से कहो कि धर्मेन्द्र आज़ाद आये हैं और मिलना चाह रहे हैं।

उस वक़्त मेरी उम्र सिर्फ़ चौबीस साल थी, इसलिए उस व्यक्ति ने मुझे बड़े अचरज से देखा, लेकिन मेरे आत्मविश्वास के कारण वो झांसे में आ गया और बताने के लिए अंदर चला गया। उसने जब अंदर मेरा नाम बताया होगा तो तख़ल्लुस लगा हुआ नाम सुनकर बद्र साहब समझ गये होंगे कि कोई साहित्यिक रुचि का ही होगा। लौटकर उस व्यक्ति ने बताया कि चलिए बद्र साहब बुला रहे हैं। लेकिन वो सिर्फ़ मुझे ले जाने लगा तो मैंने कहा कि नहीं, ये सब लोग भी साथ जाएंगे।

कमरे में पहुँचते ही मैंने बद्र साहब के चरण स्पर्श किये और अपनी एक किताब ‘उसके बारे में’ भेंट की, जिसमे मेरी ग़ज़लनुमा कविताएँ हैं। मैंने इन्हें ग़ज़लनुमा इसलिए कहा था क्योंकि तब मुझे मीटर का ज्ञान नहीं था, और सिर्फ़ क़ाफ़िया-रदीफ़ मिलाकर लिखने की कोशिश करता था। लेकिन मेरी उन टूटी-फूटी कविताओ को देखकर बद्र साहब ने मेरा उत्साह बढ़ाते हुए मुझे अपना कुछ सुनाने के लिए कहा। मुझे उनके इस आदेश पर ख़ुशी तो थी लेकिन संकोच भी बहुत था। मगर एक रटी-रटायी रचना सुना दी:

पूछते हो कि ज़िंदगी क्या है
पूछता हूँ कि ट्रेजडी क्या है

यह मतला सुनकर वो बड़े ख़ुश हुए और मेरी पीठ थपथपा कर शाबाशी दी। दरअसल इस मतले का शिल्प फ़िराक़ साहब के यहाँ से उठाया गया था क्योंकि तब मैं उन्हें भी पढ़ रहा था। उनका शे’र इस तरह है:

पूछा किये हैं इश्क़ से फ़ायदा है क्या
मैं पूछता हूँ फ़ायदे से क्या फ़ायदा

इसके बाद मैंने अपनी डायरी में बद्र साहब का ऑटोग्राफ़ लिया। वहां उनके साथ अंजुम बाराबंकवी जी, चंद्रसेन विराट जी, प्रकाश प्रलय जी, पूर्णिमा पूनम जी एवं सुरेश उपाध्याय जी भी मौजूद थे। मैंने इन सबके भी ऑटोग्राफ़ लिये। कवि सम्मेलन में नीरज जी भी आमंत्रित थे, लेकिन वो अभी यहाँ नहीं थे। बद्र साहब से मेरे बाक़ी दोस्तों ने भी ऑटोग्राफ़ माँगा, लेकिन उन्होंने ये कहकर टाल दिया कि बाकी सबको कार्यक्रम स्थल पर दिया जाएगा। इसके बाद हम लोग कार्यक्रम स्थल जनपद मैदान आ गये।

कवि सम्मेलन शुरू हो चुका था। यहाँ मंच पर नीरज जी भी दिखायी दे रहे थे। कार्यक्रम का संचालन नरसिंहपुर के ही राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कहे जाने वाले एक कवि कर रहे थे, जो बीच-बीच में साली, घरवाली और बाहर वाली पर काफ़ी कुछ सुना रहे थे। उनकी बातों से श्रोताओं को मज़ा आ रहा था, लेकिन मुझे बहुत चिढ़ हो रही थी। क्योंकि मैं तो बद्र साहब को सुनने आया था।

काफ़ी इंतज़ार के बाद बद्र साहब माइक पर आये और कुछ चुनिंदा शे’र सुनाये:

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता

ज़िंदगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाये

ख़ुदा हमको ऐसी खुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे

ऐसे कई ज़बर्दस्त शे’र, जिन पर श्रोता वाह-वाह किये जा रहे थे। लेकिन जब उन्होंने अपनी ये ग़ज़ल तरन्नुम में सुनायी तो पूरे पंडाल में सन्नाटा छा गया:

दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों

बद्र साहब की शायरी तो बेमिसाल है ही, लेकिन उनका क़द औरों से इसलिए ऊंचा है कि उन्होंने मंच की मर्यादा और गरिमा को हमेशा बरकरार रखा। जहाँ इसी कार्यक्रम में गीतऋषि कहे जाने वाले गीतकार और अन्य लोग भी मंच पर ही शराब पी रहे थे, बद्र साहब ने उस तरफ़ देखा तक नहीं। शायद वो भी इस क्रियाकलाप से चिढ़ रहे हों, लेकिन उन्होंने इसे ज़ाहिर नहीं होने दिया। पूरे पच्चीस साल बाद उनकी यह बात मेरी समझ में आयी कि किसी चीज़ से नफ़रत करने की बजाय उसे नज़रअन्दाज़ करना ज़्यादा बेहतर है।

उनकी अमिट स्मृति को प्रणाम।
…………..

ग़ज़ल का अफ़सानवी शायर

-सरवत ज़ैदी भोपाली (शायर, भोपाल)

डॉ. बशीर बद्र, एक शख़्सियत, एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर, जिसने मीर और ग़ालिब की उर्दू को चार चांद लगाये, चांदनी और ख़ुशबू के मौसम दिल में लिये हुए ग़ज़ल के हुस्न को निखारा और मशहूर गायकों ने जिनकी ग़ज़लों को संगीत में ढाला..

डॉ. साहब के बहुत अशआर दुनिया भर में मशहूर हैं। उन्होंने उर्दू और हिंदी दोनों ज़ुबानों को हमसफ़र की तरह साथ रखा। यही वजह है फ़िक्र और ख़्याल को मोहब्बत के लफ़्ज़ों से समाज का आईना बना दिया। मुझे यह बहुत अच्छा लगता है जब मेरे रिश्तेदार और दोस्त कहते हैं कि सरवत ज़ैदी ने भी डॉ. साहब के साथ स्टेज शेयर किया है।

हिंदोस्तान में और अरब मुल्क में मुशायरे में हम उनके साथ शरीक रहे। अरब में (दम्माम अल खोबर, जुबैल) में वे मेरे घर पर रहे। मेरी फ़ैमिली के साथ भी शानदार फोटो है, जो हमारे ख़ानदान की एक ख़ूबसूरत मेमोरी है।

बेहतरीन और असरदार शख़्सियत के मालिक डॉ. बशीर बद्र ने ही ग़ज़ल की मेरी पहली किताब, ‘पहले की तरह लोग’, का विमोचन भोपाल में 2002 में किया था। उस मौक़ै पर तमाम मोहतरम लोग शामिल थे।

अक्सर सफ़र के दौरान ट्रेन में लोग उनको पहचान लिया करते थे। वे बुज़ुर्ग, नौजवान, सबसे बहुत दोस्ताना अंदाज़ में गुफ्तगू करते थे। कोई अजनबीपन नहीं, गंगा जमनी तहज़ीब का एक रोशन सितारा, उजालों का मुसाफ़िर, जब महफ़िल सजती थी तो एक आलिम, प्रोफ़ेसर और फ़िलॉस्फ़र की तरह बहुत संजीदा बातें करते थे। मुशायरे की शमा रोशन हुई और बशीर बद्र साहब उजालों में नज़र आये।

इश्क़ हो, हुस्न हो, समाज की मुश्किलात हों, हर रस्ते में मोहब्बत, अपनाइयत और आँखों से मोतियों की बरसात, शाइस्ता लहजा, नर्म आवाज़.. डॉ. साहब को सदियों याद रखा जाएगा।

यूपी से चले और दुनिया का सफ़र करके भोपाल में बस गये। बीमारी ने संभलने नहीं दिया और वह इसी शहर में मिट्टी में होकर रह गये। डॉ. बशीर बद्र के लिए बहुत लिखा जा रहा है, लिखा जाता रहेगा।

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