बशीर बद्र, bashir badr, bashir badr shayari
डॉ. आज़म की कलम से....

बशीर बद्र: महानता और महानता का दंभ

            ग़ज़ल की सच्ची किताब पूरी हुई… हम इस अज़ीम इन्सान और अह्दसाज़ शायर को ख़राज-ए-अक़ीदत पेश करते हैं, जिनकी आवाज़ ने उर्दू ग़ज़ल को नये रंग, नये इस्तिआरे और नयी ज़िंदगी बख़्शी। जदीद उर्दू ग़ज़ल के सबसे मक़बूल और मोतबर शायर, डॉक्टर बशीर बद्र हमारे दरम्यान नहीं रहे। ये वो नुक़्सान है जिसका ख़ला सदियों भरा नहीं जा सकता।

बशीर बद्र ने ग़ज़ल की रिवायती ज़बान को आम आदमी के दिल की धड़कन बना दिया। उनकी शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी ये थी कि वो मुश्किलतरीन जज़्बात को भी इतने सलीक़े और सादगी से बयान करते कि क़ारी या सुनने वाला महसूस करता कि ये तो उसी के दिल की बात है। उन्होंने दर्द-ए-तन्हाई, मुहब्बत और हिज्र के एहसासात को जिस ख़ूबसूरती से अल्फ़ाज़ का रूप दिया, वो उन्हीं का ख़ास्सा था।

वो सिर्फ़ लफ़्ज़ों के जादूगर नहीं थे, बल्कि उर्दू ज़बान और तहज़ीब के सफ़ीर भी थे। उनकी शायरी में मेरठ की गलियाँ और भोपाल की शामें अपनी पूरी आब-ओ-ताब के साथ ज़िंदा हैं। उन्होंने अदब की दुनिया में जो पद्म-श्री और साहित्य अकैडमी जैसे सम्मान (एज़ाज़ात) हासिल किये, वो दरअसल उर्दू ज़बान ख़सूसन सिन्फ़-ए-ग़ज़ल की प्रतिष्ठा (तौक़ीर) में इज़ाफे़ का बाइस बने।

उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को मुश्किल लफ़्ज़ों की क़ैद से निकालकर रोज़मर्रा की बोल-चाल, सादगी और जज़बाती गहराई बख़्शी। उनके अशआर हर ख़ास-ओ-आम की ज़बान पर ऐसे मचलते हैं, जैसे वो ख़ुद उनके अपने दिल की आवाज़ हों। घर, चौराहों, महफ़िलों, असेंबलियों और पार्लियामेंट में जो अशआर ज़्यादा कोट किये जाते हैं, बशीर बद्र के ही होते हैं।

चंद बेहद मशहूर और उनमें से चंद कहावत जैसे बनकर (ज़रबुल अमसाल) सभी लोगों की ज़बान (ज़बान ज़द ख़ास-ओ-आम) पर आ चुके अशआर पेश हैं:

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाये

दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता

मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी

ज़िंदगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पांव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नये मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो

यहां लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तीयां जलाने में

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला

कभी कभी तो छलक पड़ती हैं यूँ ही आँखें
उदास होने का कोई सबब नहीं होता

इसी शह्र में कई साल से मिरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं
उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं मुझे उनका कोई पता नहीं

अजीब शख़्स है नाराज़ हो के हँसता है
मैं चाहता हूँ ख़फ़ा हो तो वो ख़फ़ा ही लगे

जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता

आँखों में रहा दिल में उतरकर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समंदर नहीं देखा

ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है
रहे सामने और दिखायी न दे

इसकी आँखों को ग़ौर से देखो
मंदिरों में चिराग़ जलते हैं

आशिक़ी में बहुत ज़रूरी है
बेवफ़ाई कभी कभी करना

मुझसे क्या बात लिखानी है कि अब मेरे लिए
कभी सोने कभी चांदी के क़लम आते हैं

ये सच है कि जो शायर अपनी शायरी के ज़रिये लोगों के दिलों में घर कर ले, वो कभी मरा नहीं करता। बशीर बद्र साहिब हमेशा अपने लाज़वाल अशआर के ज़रिये हमारे दरम्यान ज़िंदा रहेंगे।

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यहां एक वाक़िए का ज़िक्र करना चाहूँगा। बात तब की है, जब वो मध्य प्रदेश उर्दू अकैडमी के चेयरमैन थे। उनकी एक ग़ज़ल किसी रिसाले में छपी थी। इसमें कहीं मामूली-सी अरूज़ी लग़्ज़िश (ग़ज़ल के छन्द शास्त्रीय हिसाब से मामूली चूक) थी। मैं नया-नया अरूज़ी बनने के ज़ोअम (दंभ) में गिरफ़्तार था। मेरा मक़सद शायद उनकी नज़रों में आना ज़्यादा था इसलिए उनके चैंबर में दाख़िल हो गया। उन्होंने मेरी निशानदेही पर जवाब दिया:

“ख़ुदा की क़सम मुझे अरूज़ में महारत नहीं… मुझसे अरुज़ी लग़्ज़िशें हो जाया करती हैं… आप जैसे लोग उसकी निशानदेही कर देते हैं, तो मैं अपनी बयाज़ (डायरी जिसमें शायर अपनी रचनाएं फ़ाइनल रूप में लिख लेता है) में ठीक कर लेता हूँ।”

बड़ी बुर्दबारी (सहनशीलता) से उन्होंने जवाब दिया। मैं अत्यंत प्रभावित हुआ। कोई वाद-विवाद नहीं। ख़ुद को सही साबित करने की कोई हुज्जत नहीं। इतना अज़ीम शायर और ये इन्किसार (विनम्रता)। उस दिन मुझे यक़ीन आ गया शायरी के लिए अरूज़ (छन्द शास्त्र) की गहरी जानकारी की पेशगी ज़रूरत नहीं। तबीयत अगर शायराना है, तो अरूज़ की बुनियादी जानकारी से भी अज़ीम शायरी की जा सकती है। तबीयत शायराना नहीं तो अरूज़ के अल्लामा भी एक शे’र जैसा शे’र मौज़ूं नहीं कर सकते:

“ये कार-ए-सुख़न तब्-ए-ख़ुदादाद करे है”

वैसे ऐसी अज़ीम शख़्सियत पर हम जैसे हक़ीर लोग जो कुछ कहें इससे उनकी क़दर-ओ-मंजिलत (मान-सम्मान) में भला क्या इज़ाफ़ा होगा? जब उनके क़द्रदानों में मारूफ़ नक़्क़ाद (प्रसिद्ध आलोचक) उस्लूब अहमद अंसारी, उर्दू के अज़ीम नक़्क़ाद और मुहक़्क़िक़ (महान आलोचक और शोधकर्ता) डॉक्टर गोपीचंद नारंग, मारूफ़ शायर और माहिर-ए-लिसानियात (भाषाविद) शान उल-हक़ हक़्क़ी, शे’र-ओ-अदब की दुनिया में “सहर” के नाम से पहचाने जाने वाले कुँअर महिन्द्र सिंह बेदी, नामवर शायर निदा फ़ाज़ली, ग़ुलाम अली व अनूप जलोटा जैसे आलमी शौहरत याफ़्ता गुलूकार (विश्वप्रसिद्ध गायक) और जावेद अख़तर जैसे दानिश्वरों जैसे दर्जनों नाम हों।

अब बात एक और पहलू की। हर शायर को अपनी तअल्ली (बड़ाई) का इख़्तियार है, यह एक मान्य सनअत (कलात्मक दक्षता) है। इसका भरपूर इस्तिमाल हर दौर के शायरों ने किया है। मगर मुआमला तब बिगड़ता है, जब ये तकब्बुर और तफ़ाख़ुर (अहंकार और डींग) की सरहदों में पहुंच जाती है और शायर नर्गिसीयत (आत्ममुग्ध, नार्सिसिज़म) का शिकार हो जाता है।

ख़ब्त-ए-अज़मत (MEGALOMANIA) दरअसल एक नफ़्सियाती इस्तिलाह और कैफ़ीयत (मनोवैज्ञानिक टर्म और मनःस्थिति) है, जिसमें इन्सान ख़ुद को इंतिहाई अहम, बरतर, ताक़तवर या अज़ीम (महान) समझने लगता है। इस कैफ़ीयत में मुब्तला शख़्स को अपनी क़ाबिलियत, हैसियत, इल्म (ज्ञान) का मुबालग़ा आमेज़ (अतिशयोक्ति पूर्ण) और ग़ैर हक़ीक़त पसंदाना ग़रूर (झूठा दंभ) होता है, जिसे “ख़ब्त-ए-अनानीयत” (अहंवाद का उन्माद) भी कहा जाता है।

जैसा मैंने अर्ज़ किया कि हर छोटे-बड़े शायर में एक हद तक तअल्ली का शौक़ होता है। इसमें कोई हर्ज भी नहीं। जवाज़ (दलील) ये दिया जाता है कि शायर बराह-ए-रस्त अल्लाह के शागिर्द होते हैं यानी “तलमीज़-उर-रहमान”। दूसरे ये कि जिस तरह अल्लाह अपने पैग़ंबरों को इल्म-ए-ग़ैब (भविष्यज्ञान) और अहकामात (आदेश) बराह-ए-रास्त (सीधे) अता फ़रमाता है, इसी तरह शायर के दिल में भी अल्फ़ाज़, ख़्यालात और जज़्बे अचानक ख़ुद-ब-ख़ुद (दैवीय रूप से) उतरते हैं।

“शायरी जुज़वी‌सत अज़ पैग़ंबरी” ۔ मौलाना जलालुद्दीन रूमी इस मिसरे से अपनी शायरी को इल्हामी (Divine Inspiration) मानते हैं और ख़ुद को आम इन्सान तो क्या दीगर शाइरों से भी बरतर समझने की नर्गिसीयत में मुब्तला हो जाते हैं।

मगर कुछ के अंदर ख़ुद-पसंदी बहुत ज़्यादा होती है। “मैं अच्छा हूँ” ये सेहतमंद सोच है मगर “मैं ही अच्छा हूँ”, ये नर्गिसीयत का आरिज़ा (लक्षण) है। फ़िराक़ गोरखपुरी, जोश मलीहाबादी ऐसे कई शायर गुज़रे हैं, जो अपने आगे किसी को गरदानते नहीं थे और अशआर, तहरीर और तक़रीर से अपनी बरतरी का इज़हार करते थे। आइए कुछ शोअरा के आत्मुग्धता और दंभ भरे अशआर देखते हैं। वैसे इनकी तादाद सैकड़ों में है! (इस सिलसिले में मेरी किताब “शायराना त’अल्ली” का अध्ययन किया जा सकता है, जिसमें क़दीम (प्राचीन) शायरों से लेकर बशीर बद्र तक के शेर यकजा कर दिये गये हैं।)

रेख़्ता रुतबे को पहुंचाया हुआ उसका है
मोतक़िद कौन नहीं मीर की उस्तादी का
ـ मीर
सारे आलम पर हूँ मैं छाया हुआ
मुस्तनद है मेरा फ़रमाया हुआ
۔ मीर
हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और
ـमिर्ज़ा ग़ालिब
होगा कोई ऐसा भी कि ग़ालिब को न जाने
शायर तो वो अच्छा है प’ बदनाम बहुत है
ـग़ालिब
आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हमअसरो
जब भी उनको ध्यान आएगा तुमने फ़िराक़ को देखा है
ـफ़िराक़ गोरखपुर
ढूंढ़ोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं नायाब हैं हम
जो याद न आए भूल के फिर ए हम-नफ़सो वो ख़्वाब हैं हम
-शाद अज़ीमाबादी
और होते हैं जो महफ़िल में ख़मोश आते हैं
आँधियाँ आती हैं जब हज़रत-ए-जोश आते हैं
ـजोश मलसियानी
मेरा हर शे’र है इक राज़-ए-हक़ीक़त बेख़ुद
मैं हूँ उर्दू का नज़ीरी मुझे तू क्या समझा
ـबेखुद देहलवी
मीर का तर्ज़ अपनाया सबने लेकिन ये अंदाज़ कहाँ
आज़मी साहिब आपकी ग़ज़लें सुन सुनकर सब हैरान हैं
-ख़लील उल रहमान आज़मी

अब बशीर बद्र की तरफ़ चलते हैं। बशीर बद्र ने भी शायरी के हवाले से या नस्र (गद्य) के पैराए में अपनी अज़मत को बढ़-चढ़कर बयान किया और कई बार लोगों के इस्तिहज़ा (परिहास) का निशाना भी बने। कुछ अशआर जो मेरी नज़रों से गुज़रे, मुलाहिज़ा फ़रमाइए:

हज़ार सफ़्हों का दीवान कौन पढ़ता है
बशीर बद्र का कोई इंतिख़ाब दे जाओ

नहीं मैं मीर के दर पर कभी नहीं जाता
मुझे ख़ुदा से ग़ज़ल का कलाम लेना है

एक मीर था सो आज भी काग़ज़ में क़ैद है
हिन्दी ग़ज़ल का दूसरा अवतार मैं ही हूँ

शायराना तअल्ली के अशआर अक्सर-ओ-बेशतर हर छोटे-बड़े शायर ने तो कहे ही हैं लेकिन कुछ लोगों ने नस्र में भी बेपनाह तफ़ाख़ुर और तकब्बुर (अहंकार) का इज़हार किया है। इस मुआमले में बशीर बद्र सर-ए-फ़ेहरिस्त (सूची में सबसे ऊपर) हैं।

अपने शे’री मजमुए “आमद” (1985 नाशिर मकतब दीन-ओ-अदब, लखनऊ) में एक ख़त बशीर बद्र ने 2035 के पाठकों को लिखा है। आप भी मुलाहिज़ा फ़रमाइए। उस ख़त को वक़्त से पहले यानी आज पढ़कर तजज़िया (विश्लेषण) कीजिए कि बशीर बद्र के दावे कितने बजा और कितने बे-जा हैं। ये ख़त कई सफ़्हों पर मुश्तमिल है। मैं सिर्फ़ उन जुमलों को यहां दर्ज करता हूँ, जिसमें तअल्ली और तकब्बुर का तड़का है।

मेरा मक़सद क़तई तौर पर बशीर बद्र जैसे अज़ीम शायर की तज़हीक (उपहास) नहीं है, बस इस पहलू से बाख़बर करना है, जो उनका अपना हिस्सा ही था। कोई भी शख़्सियत सिर्फ़ मुस्बत (पॉज़िटिव) पहलुओं से ही मुकम्मल नहीं होती। इसमें मनफ़ी (निगेटिव) पहलू भी हो सकते हैं। यही बशरी तक़ाज़ा (मानव की मूलभूत आग्रह) है। बशीर बद्र भी एक बशर (मानव) थे और बशरी तक़ाज़ों (मानुषिक आग्रहों) से मुबर्रा (बरी) नहीं थे।

“एक ख़त: 2035 के पढ़ने वालों के नाम
-बशीर बद्र

ये ख़त आप पढ़ सकते हैं, मैं इसका जवाब नहीं पढ़ सकता। आज 1985 की ग़ज़ल में मुझसे ज़्यादा मक़बूल और महबूब शायर ब-क़ैद-ए-हयात नहीं। हिन्दोस्तान की 75 करोड़ आबादी, पाकिस्तान के अदबी मराकज़, मग़रिब में टोरंटो, शिकागो, न्यूयॉर्क और लंदन के उर्दू हलक़ों में कितने लोग मुझे पसंद करते हैं, इसका अंदाज़ा लगाना दुश्वार है, मगर ये यक़ीन के साथ कहा जा सकता है कि जो उर्दू और हिन्दी बोल सकता है, वो मेरी ग़ज़ल से नहीं बच सकता। ये मेरा इतराना होगा कि अगर मैं कहूं कि रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, दफ़्तरों और हर जगह ये ख़तरा मौजूद रहता है कि आटोग्राफ़ लेने वाले मासूम लड़के-लड़कियां मुझे पहचान सकते हैं।”

(इसके बाद मुहम्मद हुसैन आज़ाद, नयाज़ फ़तहपुरी, ज़िया अहमद बदायूँनी, अब्दुर्रहमान बिजनौरी की सुख़नशनासी और ना-शनासी की बातें हैं)

“पार साल की बात है एक हिंद-ओ-पाक मुशायरे में ये अशआर पढ़कर मैंने मुशायरा लूट लिया”

(दो शे’र दिये गये हैं और इस मुशायरे की कन्वीनर की बात की गयी है, जिसके मुताबिक़ मुशायरा तो लूट लिया मगर शे’र पार-साल पढ़ा था… इसके बाद उर्दू अदब के नामवर शोअरा ओ उदबा/साहित्यकारों का नाम है, जिन्होंने उनकी शायरी पर अपनी आरा (राय) दी हैं। चंद ग़ैर-मुल्की अंग्रेज़ी अख़बारों की अंग्रेज़ी हेडिंग/सुर्ख़ियाँ भी हैं। अगले सफ़हे पर पाकिस्तान के कुछ अख़बारों के तराशे/कटिंग्स हाज़िर किये गये हैं और साक़ी फ़ारुक़ी का क़ौल भी है कि अहमद फ़राज़, बशीर बद्र का नाम सुनकर क्यों काँपता है। फिर…)

“हमसे पहले ग़ज़ल में अंग्रेज़ी से आया हुआ उर्दू लफ़्ज़ ग़ज़ल को हज़ल बना देता था। वक़्त के बदलते हुए मिज़ाज और हमारी शे’री जसारत ने इन अल्फ़ाज़ को ग़ज़ल की रमज़ीत, तहदारी, हुस्न-ओ-वक़ार अता किया। हमारे पैरों से चलकर ग़ज़ल बीसवीं सदी से इक्कीसवीं सदी की सम्त-ए-सफ़र पैमां है।”

(सिन्फ़-ए-ग़ज़ल के हवाले से मीर-ओ-ग़ालिब का कुछ नर्मी से हवाला है)

“ग़ज़ल ख़ुद ग़ज़ल के हर शायर से बड़ा किरदार है”

(अच्छा जुमला है मगर सुना-सुना-सा लगता है शायद किसी मग़रिबी शायर/पश्चिमी कवि के बयान से मुतास्सिर है। ख़ैर आगे सिन्फ़-ए-ग़ज़ल की तारीफ़ है और इसके मसले मसाइल का ख़ूबसूरत जायज़ा है। अब वो ग़ालिब को आड़े हाथों लेते हैं)

“कभी-कभी बड़े ज़बान-दां, लुग़तसाज़ ग़ज़ल के एहसास को महसूस करने से महरूम हो जाते हैं। ग़ालिब इन्सानी ज़हन की बुलंदियों, अय्यारियों और मासूमियत का नमूना थे। ग़ालिब के अंदर कम अज़ कम दस मुख़्तलिफ़ ग़ालिब थे और सब एक दूसरे से नबर्द-आज़मा रहे। इन बड़े ग़ालिबों में सबसे कमज़ोर ग़ालिब वो हैं, जिन्होंने जज़्बों की सदाक़त का मुतरादिफ़ अरबी और फ़ारसी ज़बान की पेचीदा, अकली तराक़ीब जाना। मेरे नज़दीक ग़ालिब का कलाम का वो थोड़ा हिस्सा कमज़ोर ग़ज़ल और बुरी ज़बान का बेहतरीन मॉडल है।”

(और फिर ख़ब्त-ए-अज़मत अपनी इंतिहा पर पहुंचता है)

“आज ग़ज़ल के करोड़ों आशिक़ों का ख़्याल है कि मेरी नाचीज़ ग़ज़ल उर्दू ग़ज़ल के कई सौ साला सफ़र में नया मोड़ है। अब ग़ज़ल का आलमी और जदीद मंज़र-नामा फ़ारसीज़दा उर्दू ग़ज़ल के तरीक़ा-ए-कार और मंज़रनामे से मुख़्तलिफ़ हो चला है। ये कारनामा मेरा है कि मेरी ग़ज़ल इस सफ़र का आग़ाज़ थी… नये अल्फ़ाज़ की शमूलीयत से लोगों ने मुझसे पहले ग़ज़ल नहीं हज़ल लिखी थी। मैं जिस ग़ैर-ग़ज़लिया लफ़्ज़ को छूता गया, उनमें से अक्सर-ओ-बेशतर ग़ज़ल बनते गये… आज मेरा उस्लूब आज की ग़ज़ल का उस्लूब बन चुका है। तन्क़ीद की बददियानती और नाफ़हमी के अक्सर हरबे अपने आप में महदूद हो गये हैं… ये मैं था, जो एक तरफ़ इस गुमराह तन्क़ीद को हक़ारत से देखता हुआ ग़ज़ल के जदीद तग़ज़्ज़ुल को अपनी रूह के नग़मे से गुनगुनाता आगे बढ़ता गया।”

(शुक्र है कि फ़ैज़, फ़िराक़, अली सरदार जाफ़री, निदा फ़ाज़ली, वसीम बरेलवी और बेकल उत्साही की कुछ तारीफ़ कर गये हैं।)

“ऐतराफ़ करता हूँ आपके अह्द में जो ग़ज़ल रवाँ-दवाँ है, इसका आग़ाज़ मुझ नाचीज़ के चराग़ों से हुआ। मैंने नयी लफ़्ज़यात, नये रूपों में, नये इस्तिआरों से नयी ग़ज़ल को इस क़दर आम कर दिया कि हाफ़िज़ और सादी के नजम उलतरफ़ैन ग़ज़ल, माज़ी का वक़ार हो कर रह गयीं। आप मेरे शुक्रगुज़ार हैं तो मैं आपका शुक्रिया अदा करता हूँ अगर आप मुझे मातूब समझते हैं तो मेरा क्या बिगाड़ लेंगे कि मैं आपकी गली की ख़ाक हो चुका हूँ।”

इसमें कोई शक नहीं कि बीसवीं सदी की निस्फ़ से अस्र-ए-हाज़िर तक उनकी शायरी के सब ही दिलदादा रहे हैं। सादा, सलीस ज़बान में शायरी करने वालों में वो सर-ए-फ़ेहरिस्त हैं, जिन्होंने शऊरी तौर से अरबी-फ़ारसी के भारी-भरकम अल्फ़ाज़ और तराक़ीब के बग़ैर उम्दा शायरी की। वो उमूमी तौर से हर तबक़े में मक़बूल थे, हैं और रहेंगे। उनकी शायरी तग़ज़्ज़ुल का नया रूप है। बाक़ौल शख़से:

“उनकी शायरी वो ख़ुशबू है, जो हमारा रिश्ता आर्यायी मिज़ाज से, हमारी धरती से, गंग-ओ-जमन की वादी से और हिन्दी, ब्रज, अवधि बल्कि तमाम मुक़ामी बोलियों से जोड़ती है।”

कोई 15 साल से ज़्यादा वक़्त से उनका ज़ेहन माऊफ़ होता गया और “डिमेंशिया” (Dementia) के शिकार हो गये थे। अब उन्हें अपने अशआर भी याद नहीं रहते थे। मगर क़ाबिल-ए-तारीफ़ है उनका परिवार। अहलिया राहत बद्र और फ़र्ज़ंद अर्जुमंद तय्यब बद्र, जो अपनी-अपनी ज़िंदगी के साथ बशीर बद्र की ज़िंदगी भी जीते रहे।

कभी-कभी उनके सामने उनके शे’र का कोई मिसरा जब पढ़ते थे, तो बशीर बद्र भी दूसरा मिसरा या कुछ अल्फ़ाज़ बोल उठते थे। ये जज़्बाती मंज़र हम सबकी आँखों को नम कर जाता था। बशीर बद्र को इस सूरत-ए-हाल का शायद अंदाज़ा हो गया था इसलिए उन्होंने ये शे’र मौज़ूं किया होगा:

सुना है बद्र साहिब महफ़िलों की जान होते थे
बहुत दिन से वो पत्थर हैं न हंसते हैं न रोते हैं

डेढ़ दहाई से लोगों से दूर रहने से एक तरह से सभी को मालूम था कि किसी दिन भी बुरी ख़बर आ सकती है। और ये मुतवक़्क़े ख़बर 28 मई 2026 को गर्दिश करने लगी। मुझसे कई लोगों ने तसदीक़ की, जिनमें हिन्दोस्तान और हिंदुस्तान से बाहर के दोस्त-ओ-अदीब शामिल थे। मेरे ज़ाती व्हाट्सऐप पर मशहूर अदीबा, मुहक़्क़िक़ और बशीर बद्र साहिब की अहलिया राहत बद्र साहिबा की बड़ी बहन मुहतरमा रज़िया हामिद साहिबा का उनके इंतिक़ाल का पुर मलाल का संदेश आ चुका था।

लोग उनके साथ ली गयी तसावीर को महफ़ूज़ रखे हुए थे। इंतिक़ाल की ख़बर के साथ ही शायद ही कोई छोटा या बड़ा शायर हो, जिसने बशीर बद्र के साथ अपनी तस्वीर सोशल साईट्स पर पेश न की हो। ये अज़मत थी बशीर बद्र की!

नाचीज़ के क़लम से नज्र-ए-बशीर बद्र:

रहेगा ता-क़यामत जलवा तेरा क़ायम-ओ-दाइम
ज़बां ज़द तेरी ग़ज़लें और तिरे कित’आत रहने हैं
ये माना शाम की तारीकियों में खो गया है तू
उजाले तेरी यादों के हमारे साथ रहने हैं

बशीर बद्र: एक नज़र में ज़िंदगी

असल नाम सय्यद मुहम्मद बशीर, तख़ल्लुस “बद्र”। साहित्य अकैडमी अवॉर्ड 1990 में “आस” के लिए हासिल हुआ। भारत सरकार ने पद्मश्री अवॉर्ड बराए अदब-ओ-तालीम (साहित्य व शिक्षा के लिए) से 1999 में नवाज़ा।

आपकी पैदाइश 15 फरवरी 1935 में उतर प्रदेश के ज़िला अंबेडकर नगर (तब फ़ैज़ाबाद) के क़स्बा हंसवर के क़रीब स्थित गांव बुकिया में हुई। इन के पिता सय्यद मुहम्मद नज़ीर पुलिस महकमा में मुलाज़िम थे।

बशीर 7वीं जमात (क्लास) में जब थे तो बावक़ार रिसाला (प्रतिष्ठित पत्रिका) “निगार” में पहली ग़ज़ल छपी। 20 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते हिंदुस्तान और पाकिस्तान के रिसालों में ग़ज़लें प्रकाशित होने लगीं। बचपन में तालीम का सिलसिला हाई स्कूल के बाद रुक गया। पुलिस की नौकरी (मुलाज़मत) करने लगे। चचाज़ाद बहन क़मर जहां से शादी हुई, जिनसे तीन औलादें हुईं।

तालीम का सिलसिला दुबारा अलीगढ़ से शुरू किया। जामिआ अलीगढ़ से अदीब माहिर, अदीब कामिल करके अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से बीए, एमए और पीएचडी की डिग्री 1974 में हासिल की। मुशायरों में मक़बूल होते गये। फिर मेरठ यूनिवर्सिटी में नियुक्ति (तक़र्रुर) हुई। 1984 में पहली बीवी का इंतिक़ाल हुआ, तब वो एक मुशायरे में शिरकत के लिए पाकिस्तान में थे। पड़ोसी, जिनमें अधिकतर हिन्दू थे, उनकी पत्नी के कफ़न-दफ़न के फ़र्ज़ पूरे किये।

1987 के मेरठ फ़सादात में उनका घर लूटकर जला दिया गया। 1988 में भोपाल की डॉक्टर राहत सुल्तान से शादी करके भोपाल में ही सुकूनत इख़तियार कर ली। मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी के चेयरमैन भी रहे।

आपके छह मजमूए-कलाम मंज़र-ए-आम पर आये। “इकाई”, “इमेज”, “आमद”, आस” “आसमान”, और “आहट” और बाद में कुल्लियात (समग्र)।

azam

डॉक्टर मो. आज़म

बीयूएमएस में गोल्ड मे​डलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।

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