
- July 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....
तुलसी, मीरा, सूर, कबीर और बशीर
ज्यौं रहीम या वृंद हैं, तुलसी सूर, कबीर
त्यौं संग सबके बैठ के लिखते शे’र बशीर
यह दोहा मैंने उस वक़्त लिखा था, जब सदी के बड़े शाइर डॉ. बशीर बद्र साहब का दो बार इंटरव्यू लेने का अवसर मिला। उनसे बातचीत में हमारे पुरखे भक्त कवियों, शाइरों, सूफी-संतों का ज़िक्र बार-बार आया। कई बार उन्हें किसी दीवार या तख़्ती पर लिखे गये किसी पुराने दोहे को अपनी डायरी में लिखते हुए भी देखा। तब सहसा यह जिज्ञासा हुई कि आख़िर वे ऐसा क्यों करते हैं? उन्होंने बहुत ईमानदारी से जवाब दिया कि जो कुछ हम लिखते हैं, वह सब कुछ हमारे ये पुरखे लिख चुके हैं। हमें इनके लिखे हुए से ही एक नयी राह मिलती है। लफ़्ज़ों को बरतने का सलीका, ख़्याल को बांधने का तरीक़ा अगर हमें आ गया, तो हमारी राह को रोशन करने वाले तो हमारे असातज़ा मौजूद हैं।
बशीर बद्र साहब की शाइरी में कई जगह हमारे इन पुरखों का अक्स नज़र आता है। उन्होंने ज़िन्दगी की बारीकियों को इन पुरखों के अनुभवों के साथ शामिल कर अपने यादगार शेर कहे। उनके कई-कई शेर हमें भक्तिकालीन कवियों के क़रीब ले जाते हैं। कबीर ने कहा-
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय
इसी चिन्तन को अपने समय के पैकर में ढालकर बशीर बद्र कहते हैं-
काग़ज़ में दब के मर गये कीड़े क़िताब के
दीवाना बे पढ़े-लिखे मशहूर हो गया
बशीर बद्र साहब को पढ़ते हुए लगता है वे कबीर के चिंतन से बहुत ज़्यादा प्रभावित थे। कबीर जिस तरह अपने शब्दों के ज़रिये समाज की विसंगतियों को उभारते हैं, कटाक्ष करते हैं और सही राह दिखाते हैं, वैसा ही चिंतन बशीर बद्र साहब के यहां पर भी नज़र आता है। जैसे कबीर ने कहा-
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माहिं
ऐसें घटि-घटि राम हैं, दुनिया देखै नाहिं
ईश्वर की खोज करने वाले लोगों को अपने भीतर ईश्वर को तलाशने की बात बशीर बद्र साहब ने भी कुछ इसी अंदाज़ में कही। उन्होंने कहा-
ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है
रहे सामने और दिखाई न दे
ऐसा नहीं है कि एक शाइर जदीद ख़्यालों के नाम पर समाज को कुछ पैग़ाम न दे। बशीर साहब ने अपनी शाइरी में नयापन तो शामिल किया ही, उसे रवायती अंदाज़ से निकालकर एक नया लिबास पहनाकर सामने रखा। यही कारण है कि वे कबीर की तरह समाज में सर्वाधिक दोहराये जाते रहे। पूजा-इबादत के नाम पर दिखावा करने वालों के लिए कबीर ने कहा-
पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजूं पहार
ताते तो चाकी भली, पीस खाय संसार
बशीर साहब का सबसे मशहूर शेर भी इसी बात की ताईद करता है-
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा
भक्तिकाल के संतों ने संसार को नश्वर बताया है। कबीर ने कहा-
जिसको दुनिया सब कहे, वो है दर्शन-मेला
इक दिन ऐसा आये, छूटे सब ही झमेला
उड़ जा हंस अकेला
ठीक इसी दर्शन को बशीर बद्र ने अपनी गज़लों में नये रूप में ढाला-
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पर बैठे हो वो टूट भी सकती है
हर दौर के अपने तकाज़े रहे हैं और हर दौर की अपनी मुश्किलें भी। रचनाकार जिस दौर में होता है उस दौर को अपने क़लम के ज़रिये अभिव्यक्त करता है। भक्तिकालीन कवियों के सामने भी बहुत सारे संकट थे। वे जिस दौर में अपनी रचना कर रहे थे, उन्हें दबाने के लिए उस समय के हुक्मरानों ने बहुत प्रयास किये। उनकी आवाज़ बंद करने की कोशिश की। लेकिन फिर भी वे नहीं रुके। कबीर ने तब लिखा-
साधौ देखो रे जग बौराना
सांची कहूं तो मारन लागे, झूठी कहें पतियाना
अपने समय की अक्कासी करते हुए बशीर बद्र साहब ने कहा-
मैं बोलता हूँ तो इल्ज़ाम है बग़ावत का
मैं चुप रहूँ तो बड़ी बेबसी सी होती है
भक्तिकाल के कवियों में निर्गुण और सगुण दो धाराएं सक्रिय रहीं। यह ऐसा काल था, जिसका असर समूचे भारतीय साहित्य पर पड़ा। चाहे हिंदी साहित्य हो उर्दू साहित्य हो या अन्य भाषाओं का साहित्य, इन सब पर भक्ति काल की छाप स्पष्ट दिखायी देती है। यही प्रभाव बशीर बद्र साहब की शाइरी में भी नज़र आता है। कृष्ण भक्ति धारा के भक्त कवि सूरदास जी ने कहा-
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै
जैसे उड़ि जहाज की पंछी, फिरि जहाज पै आवै
सदियों के बाद सूरदासजी की इस दार्शनिकता को बशीर बद्र साहब ने यूं समझाया-
आँखों में रहा दिल में उतरकर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा
भक्तिकाल के ही संपन्न कवि वृंद का दोहा है-
करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान
रसरी आवत-जात ते, सिल पर परत निसान
यह जीवन के अनुभव पर आधारित है। जीवन में निरंतर अभ्यास से एक दिन सफलता ज़रूर मिलती है। इसी संदर्भ को जब बशीर बद्र के यहां देखते हैं तो वह कुछ इस तरह हमें दिखायी देता है-
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
नफ़रतों का दौर तब भी था, अब भी है। नफ़रतों के दौर को जवाब देने के लिए तब के कवियों ने भी बहुत कुछ लिखा और प्रेम को उसका पर्याय बताया। नये दौर के रचनाकारों ने भी नफ़रत का मुक़ाबला प्रेम से करने की बात की। ज़रा रहीम के इस दोहे को देखें-
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय
इसी बात को बशीर बद्र ने अपने अंदाज़ में कुछ इस तरह कहा-
दुश्मनी जम कर करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
मीर और ग़ालिब के बाद मुशाहिदे और मुताअले के लिहाज़ से बड़े शाइर फ़िराक़ गोरखपुरी गोस्वामी तुलसीदास को सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण कवि कहते थे। वे कहते थे हर रचनाकार को तुलसीदास को पढ़ना चाहिए और तुलसीदास से बहुत कुछ सीखना भी चाहिए। तुलसीदासजी ने लिखा-
तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुं ओर
बसीकरण इक मंत्र हैं, परिहरु बचन कठोर
तुलसी के इस दर्शन से बशीर बद्र साहब कहीं प्रभावित ज़रूर हुए होंगे। बशीर साहब की शाइरी में तुलसीदास का चिंतन और दर्शन महसूस किया जा सकता है। उन्होंने कहा-
गले में उस के ख़ुदा की अजीब बरकत है
वो बोलता है तो इक रौशनी सी होती है
या फिर तुलसीदासजी की इन पंक्तियों को देखें-
तुलसी पावस के समय, धरी कोकिलन मौन
अब तो दादुर बोलि हैं, हमें पूछि है कौन
कुछ ऐसा ही चिंतन बशीर बद्र साहब के यहां कुछ इस तरह मिलता है-
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहां दरिया समंदर से मिला दरिया नहीं रहता
सच की राह पर चलने वालों को हमेशा ही ज़हर दिया गया। सुकरात से लेकर मीराबाई तक इस सिलसिले को देखा जा सकता है। इस पीड़ा को मीराबाई ने अपने पद में व्यक्त किया-
राणाजी थें ज़हर दियौ म्हे जाणी
जैसे कंचन दहत अगिन में निकसत बारह बाणी
बशीर बद्र ने ज़माने की तल्ख़ियों को अपने अंदाज़ में व्यक्त करते हुए कहा-
मैं ख़ुदा का नाम लेकर पी रहा हूँ दोस्तो
ज़हर भी इसमें अगर होगा दवा हो जाएगा
बशीर बद्र साहब रवायती दौर से अलहदा शाइर थे। उनके यहां तसव्वुफ़ का रंग बहुत अलग अंदाज़ में दिखायी देता है। एक इंटरव्यू में मैंने उनसे गुज़ारिश की कि वे अपनी कोई नाते-पाक गुनगुना दें। दरअसल उस वक़्त मैं माहे-रमज़ान प्रोग्राम अपने चैनल के लिए बना रहा था। इसी संदर्भ में मैंने उनसे इस तरह के कलाम पढ़ने की गुज़ारिश की थी। वे मुस्कुराये और कहने लगे, मेरा अंदाज़ थोड़ा अलग है, लेकिन फिर भी मैं कुछ गुनगुना देता हूं। यह कहते हुए उन्होंने नाते-पाक पढ़ी। वह कौन सी नाते-पाक थी इस वक़्त ठीक से याद नहीं आ रहा, मगर उनके इसी अंदाज़ के ये शेर हमें उनके तसव्वुफ़ के रंग से भी परिचित करवाते हैं-
मुझे ऐसी जन्नत नहीं चाहिए
जहाँ से मदीना दिखाई न दे
मैं अश्कों से नाम-ए-मुहम्मद लिखूँ
क़लम छीन ले रोशनाई न दे
इस तरह उनका यह अंदाज़ हमें प्रेरित भी करता है और लिखने के लिए अपने पुरखों को पढ़ने की सीख भी देता है। एक रचनाकार जब तक अपने अतीत के लेखन से परिचित नहीं होता और वर्तमान को सामने नहीं लाता वह भविष्य में स्थायित्व नहीं पाता है।
बशीर बद्र साहब स्वयं कहते थे कि एक शाइर को अपने वक़्त की अक्कासी के साथ आने वाले पचास साल बाद के हालात का भी चिंतन करना चाहिए। यही कारण है कि उनके शेर हमें आज भी ताज़ा लगते हैं और आने वाले वक़्त में उनके शेर बार-बार ज़िंदा होते रहेंगे।

आशीष दशोत्तर
ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।
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