
- July 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
वैज्ञानिक/लेखक, चेतावनी की हर आवाज़ बेअसर!
सन 1972 में ‘क्लब ऑफ़ रोम’ ने अपने ऐतिहासिक शोध पत्र “द लिमिट्स टू ग्रोथ” में स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यदि अनियंत्रित औद्योगिकीकरण और संसाधन दोहन जारी रहा, तो 21वीं सदी की शुरूआत में पृथ्वी अपने तापीय और पारिस्थितिक संतुलन को खो देगी। इसके बाद 1988 में नासा के वैज्ञानिक जेम्स हैनसेन ने अमेरिकी कांग्रेस के सामने पुख़्ता वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ गवाही दी कि वैश्विक तापमान (Global Warming) अब एक दूर का अंदेशा नहीं है।
दशकों से दुनिया भर के पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) ने अपनी हर असेसमेंट रिपोर्ट में चीख-चीख कर चेतावनी दी है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर लगाम नहीं लगायी गयी, तो चरम मौसमी घटनाएं आम हो जाएंगी। परंतु इन चेतावनियों को सम्मेलनों की फ़ाइलों और अलमारियों में बंद कर दिया गया। नतीजा आज हमारे सामने है।
यूरोप में ग्रीष्मकालीन आपदा: सांख्यिकीय विश्लेषण
इस वर्ष यूरोपियन स्टेट ऑफ़ द क्लाइमेट (ESOTC) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) द्वारा जारी किये गये आंकड़े बताते हैं कि यूरोप में ‘हीटवेव’ की आवृत्ति और तीव्रता अब सारे पुराने अनुमानों को पीछे छोड़ चुकी है। पश्चिमी और मध्य यूरोप के कई हिस्सों में तापमान 41 डिग्रीC से 43 डिग्रीC के पार पहुंच गया है, जिसने फ्रांस, जर्मनी और नीदरलैंड्स जैसे देशों के ऐतिहासिक मौसमी रिकॉर्ड्स को ध्वस्त कर दिया है। लंदन में यहां हमें पहली बार एसी का उपयोग करने पर विवश होना पड़ा है। बाज़ार से एसी ग़ायब हो चुके हैं।
इस संकट का सबसे चिंताजनक पहलू रातों के तापमान में होने वाली अभूतपूर्व वृद्धि है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘उष्णकटिबंधीय रातें’ (Tropical Nights) कहा जाता है। कई शहरी क्षेत्रों में रात का न्यूनतम तापमान 28 डिग्रीC से नीचे नहीं जा रहा है। इसका सीधा वैज्ञानिक असर यह हो रहा है कि मानव शरीर, जीव-जंतुओं और स्थानीय वनस्पतियों को ‘थर्मल रिकवरी’ यानी तापीय संतुलन बनाने का समय ही नहीं मिल पा रहा है।
यही कारण है कि यूके मेट ऑफिस (UK Met Office) सहित कई यूरोपीय मौसम एजेंसियों को इतिहास में पहली बार लगातार अत्यधिक गर्मी की ‘अल्ट्रा-रेड चेतावनियां’ जारी करनी पड़ी हैं।
कनाडा की विडंबनाएं
दूसरी ओर, कनाडा का भौगोलिक परिदृश्य और भी तेजी से बदल रहा है। आर्कटिक वृत्त के समीप होने के कारण यह क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में दोगुनी तेज़ी से गर्म हो रहा है। उच्च वायुमंडलीय दबाव के कारण जब गर्म हवा एक ही क्षेत्र में क़ैद हो जाती है, तो वह ‘हीट डोम’ का निर्माण करती है, और कनाडा के पश्चिमी प्रांत इन दिनों इसी का मुख्य केंद्र बन चुके हैं।
इस अत्यधिक ऊंचे तापमान और हवा में कम आर्द्रता के कारण कनाडा के जंगलों में लगने वाली आग (Wildfires) पूरी तरह बेक़ाबू हो चुकी है। यह दावानल न केवल विशाल वन क्षेत्र को नष्ट कर रहा है, बल्कि गीगाटन पैमाने पर कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) वातावरण में मुक्त कर रहा है।

पर्यावरण विज्ञान में इसे ‘पॉज़िटिव फ़ीडबैक लूप’ कहा जाता है। यानी एक ऐसी आत्म-विनाशकारी स्थिति जहां ग्लोबल वार्मिंग के कारण जंगलों में आग लगती है, और उस आग से निकलने वाला धुआं वैश्विक तापमान को और ज्यादा बढ़ा देता है।
बुनियादी ढांचे और पारिस्थितिकी पर बहुआयामी आघात
इन गंभीर तापीय विसंगतियों के कारण केवल जनजीवन ही प्रभावित नहीं हुआ है, बल्कि हमारे बुनियादी ढांचे और नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र पर भी गहरा आघात लगा है।
पारिस्थितिक स्तर पर, तीव्र गर्मी के कारण मिट्टी की नमी में ऐतिहासिक गिरावट आयी है, जिससे कृषि व्यवस्था चरमरा गयी है और महत्वपूर्ण जलस्रोत सूख रहे हैं। जीव-जंतु तापीय तनाव के कारण दम तोड़ रहे हैं, जिससे जैव विविधता का अपूरणीय ह्रास हो रहा है।
दूसरी ओर, हमारा आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर भी इस गर्मी को झेलने के लिए तैयार नहीं है। अत्यधिक तापमान के कारण रेलवे पटरियों में विकृति (Thermal Expansion) आ रही है, जिससे रेल नेटवर्क ठप हो रहे हैं। इसके साथ ही, एयर कंडीशनिंग की मांग अचानक बढ़ने से पावर ग्रिड्स पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है, जिससे बिजली आपूर्ति ठप होने का ख़तरा बढ़ गया है।
इन हालात में मानव स्वास्थ्य पर सीधा हमला हुआ है। हीट स्ट्रोक, कार्डियोवैस्कुलर (हृदय संबंधी) बीमारियां और तापीय तनाव के कारण अस्पतालों में मरीज़ों की संख्या और मृत्यु दर में भारी वृद्धि दर्ज की गयी है।
‘वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन’ (WWA) समूह के वैज्ञानिकों ने अपने हालिया एट्रिब्यूशन अध्ययनों में यह साफ़ कर दिया है कि औद्योगिक काल के बाद से मानवीय गतिविधियों के कारण बढ़े वैश्विक औसत तापमान के बिना यूरोप और कनाडा में ऐसी विनाशकारी हीटवेव का आना सांख्यिकीय रूप से पूरी तरह असंभव था।
यह स्थिति इस कड़वे सच को उजागर करती है कि केवल अकादमिक विमर्श, अंतरराष्ट्रीय संधियों (जैसे पेरिस समझौता) और ‘नेट-ज़ीरो’ के काग़ज़ी लक्ष्यों से प्रकृति के इस प्रकोप को नहीं रोका जा सकता। जब तक वैश्विक शक्तियां जीवाश्म ईंधन के दहन और वनों की कटाई को रोककर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तत्काल और वास्तविक कटौती नहीं करेंगी, तब तक पृथ्वी का यह बुख़ार बढ़ता ही जाएगा।
एशिया अलग-थलग नहीं
यहां विचारणीय यह है कि एशिया और भारत को इन स्थितियों से असंबद्ध नहीं समझा जा सकता। वैज्ञानिक अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि मौसम के लिहाज़ से दुनिया का हर क्षेत्र दूसरे क्षेत्रों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से प्रभावित करता ही है, इसे टेलिकनेक्शन भी कहा जाता है।
कनाडा और एशिया के बीच प्रशांत महासागर एक ज़रिया है, मौसमों के बदलाव के परिप्रेक्ष्य में ये क्षेत्र एक-दूसरे को इस माध्यम से प्रभावित करते हैं। वहीं, यूरोप और एशिया का मौसम भी आपस में गहरे जुड़ा हुआ है।
वैज्ञानिक अध्ययन (जैसे कि Nature और Science में प्रकाशित) कहते हैं पूर्वी यूरोप से लेकर पूर्वी एशिया तक हीटवेव और सूखे की घटनाएं एक साथ सिंक (Sync) हो सकती हैं। इसे ‘ट्रांस-यूरेशियन हीटवेव-ड्रॉट ट्रेन’ कहा जाता है।
जेट स्ट्रीम (वायुमंडल में तेजी से बहने वाली हवाएं) में बनने वाली विशाल और धीमी गति की तरंगों को रॉस्बी तरंगों के नाम से जाना जाता है। जब यूरोप में ‘हीट डोम’ या ‘ओमेगा ब्लॉक’ जैसी प्रणालियां बनती हैं, तो ये जेट स्ट्रीम को मोड़ती हैं। इनका प्रभाव यह होता है कि एशिया में गर्म और शुष्क मौसम या मानसूनी बारिश में बदलाव दिखता है।
कुल मिलाकर बात यह है कि यूरोप की मौसमी आपदाएं भारतीय उपमहाद्वीप में मॉनसून के कमज़ोर या बाधित होने की बड़ी वजहें बन सकती हैं। इसी तरह एशिया में होने वाले मौसमी बदलावों से यूरोप और दुनिया के अन्य भाग भी प्रभावित होते हैं। मौसम पृथ्वी पर एक अन्योन्याश्रित संबंध की तरह है।
समय आ गया है हम ‘लेखन और विमर्श’ के विलासितापूर्ण चरण से बाहर निकलें, क्योंकि यदि अब भी कठोर धरातलीय क़दम नहीं उठाये गये, तो इतिहास लिखेगा कि वैज्ञानिक चेतावनी देते रह गये, लेखक लिखते रह गये और मानव सभ्यता अपने ही हाथों रचे गये तापीय नरक में समा गयी।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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