
- July 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग ए. जयजीत की कलम से....
बग़ैर दुनिया के एआई की क्या अहमियत?
गूगल डीपमाइंड के सीईओ डेमिस हसाबिस ने हाल ही (21 मई 2026) एक इंटरव्यू में कहा है, जिस तरह से एआई का विकास हो रहा है, उससे हम ‘टेक्नीकल सिंगुलैरिटी’ (जिसे अमूमन ‘सिंगुलैरिटी’ कहा जाता है) की स्थिति के काफ़ी क़रीब पहुंच गये हैं। यह 2030 तक हक़ीक़त बन सकती है।
हबाबिस के इस ताजे़ बयान ने ‘सिंगुलैरिटी’ टर्म को फिर चर्चा में ला दिया है।
सिंगुलैरिटी को लेकर समय-समय पर तकनीकी क्षेत्र की लगभग सभी हस्तियां बात कर चुकी हैं। ओपनएआई के सैम ऑल्टमैन और स्पेसएक्स के इलॉन मस्क का मानना है कि 2026 से 2028 के बीच ही हमें एजीआई (आर्टिफ़िशियल जनरल इंटेलिजेंस-AGI) देखने को मिल सकती है। एजीआई यानी ऐसी मशीन या तकनीक, जो बिल्कुल मनुष्य की तरह काम करे और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं निर्णय ले सके। यानी उसके प्रत्येक काम में एक तरह का मानवीय स्पर्श हो। इसका अगला पड़ाव ही सिंगुलैरिटी होगा।
किंतु हममें से अधिकांश लोगों को सिंगुलैरिटी के बारे में उतना नहीं मालूम है, जितना कि एआई के बारे में पता होगा। हो सकता है कुछ लोग इसका नाम भी पहली बार इसी आलेख के माध्यम से सुन-जान रहे हों।
एआई को लेकर चिंताएं जग-ज़ाहिर हैं। ख़ासकर नौकरियों पर पड़ने वाला असर इन चिंताओं के केंद्र में रहा है। मगर सिंगुलैरिटी तो इंसानी वजूद पर ही ख़तरे का रेड अलार्म है। इसलिए हम सभी को उसी तरह से सिंगुलैरिटी के बारे में जानना-समझना ज़रूरी है, जैसे कि जलवायु परिवर्तन के बारे में जानते और समझते हैं, ताकि भले ही हम व्यक्तिगत तौर पर कुछ करने में असमर्थ हों, लेकिन सामूहिक तौर पर हमारी सरकारों को कुछ क़दम उठाने के लिए प्रेरित या विवश कर सकें।
क्या हैं सिंगुलैरिटी के मायने?
अगर थोड़ा तकनीकी इतिहास में जाएं तो ‘सिंगुलैरिटी’ शब्द का सबसे पहले ज़िक्र 1950 के दशक में मशहूर गणितज्ञ जॉन वॉन न्यूमैन ने एक वार्तालाप के दौरान किया था। उन्होंने कहा था, “तकनीक की तेज़ रफ़्तार हमें उस सिंगुलैरिटी (Singularity) की तरफ़ ले जा रही है, जिसके पार इंसानी जीवन वैसा नहीं रहेगा जैसा हम जानते हैं।”
यह उस वक़्त की बात है, जब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का कोई नामलेवा भी नहीं था, लेकिन तकनीक के नतीजों का डर ज़रूर था। न्यूमैन ने सब कुछ बदल जाने की स्थिति के लिए ‘सिंगुलैरिटी’ शब्द को भौतिकी से उधार लिया था। भौतिकी में ‘सिंगुलैरिटी’ शब्द का इस्तेमाल ‘ब्लैक होल’ के केंद्र के लिए किया जाता है।
ब्लैक होल के केंद्र (सिंगुलैरिटी) पर जाकर गुरुत्वाकर्षण अनंत हो जाता है और स्थान तथा समय का कोई अस्तित्व नहीं बचता है। यानी तकनीक के संदर्भ में अगर सिंगुलैरिटी के मायनों को तलाशें तो यह उस क्षण की कल्पना करता है, जब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस स्वयं में बार-बार सुधार करते हुए इतनी उन्नत स्थिति में पहुंच जाएगी कि उस पर मानव का नियंत्रण नहीं रह जाएगा। इसके बाद दुनिया में क्या बदलाव आएंगे, उसकी कल्पना आज का इंसान नहीं कर सकता।

जाने-माने भौतिक वैज्ञानिक स्टीफ़न हॉकिंग ने आज से क़रीब 12 साल पहले 2014 में ही कह दिया था कि पूर्ण कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास मानव जाति के अंत का कारण बन सकता है। हालांकि उन्होंने ‘सिंगुलैरिटी’ टर्म का उपयोग नहीं किया था, लेकिन उसकी विशेषताओं का ज़िक्र करते हुए कहा था कि यह अपने आप आगे बढ़ते हुए स्वयं को लगातार अप्रत्याशित गति से बार-बार रीडिज़ाइन करती जाएगी। जैविक विकास की मंद रफ़्तार की सीमा में बंधे मनुष्य उसके साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे और अंततः वो इंसानों की जगह ले लेगी।
सॉफ़्टवेयर में हर साल 10 गुना की ग्रोथ
वैज्ञानिक इस पर एकमत हैं कि धरती के लिए ब्लैक होल का कोई ख़तरा तो कभी नहीं होगा, लेकिन एआई के संदर्भ में सिंगुलैरिटी के ख़तरे को अनेक तकनीकिविद् महसूस करने लगे हैं। इनमें एक प्रमुख नाम रे कुर्ज़वील का है। इस अवधारणा को सबसे ज़्यादा लोकप्रियता देने का श्रेय भी कुर्ज़वील को ही जाता है। कुर्ज़वील जाने-माने तकनीकिविद् और आविष्कारक ही नहीं, तकनीक के भविष्यवक्ता भी माने जाते हैं। उन्होंने तकनीकी और तकनीकी नवाचार को लेकर अब तक 147 भविष्यवाणियां की हैं, जिनकी सटीकता 86 फ़ीसदी रही है। इसलिए कुर्ज़वील जब भी तकनीक की कोई बात करते हैं तो विज्ञान जगत कभी भी उसे हल्के में नहीं लेता।
उन्होंने अपनी 2024 की पुस्तक ‘द सिंगुलैरिटी इज़ नियरर’ (The Singularity Is Nearer) में कहा है कि 2029 तक एआई का विकास ‘एआईजी’ के स्तर तक हो सकता है, यानी एआई मनुष्य के स्तर पर आकर सोचने लगेगी। साल 2045 तक यह मनुष्य को पीछे छोड़ सकती है, यानी सिंगुलैरिटी के मुकाम पर पहुंच जाएगी।
न्यूयॉर्क टाइम्स के बेस्ट सेलिंग ऑथर टॉनी रॉबिन्सन के साथ 11 जून 2026 के एक पॉडकास्ट में कुर्ज़विल अपनी इस भविष्यवाणी का आधार भी बताते हैं। उनकी अपनी गणितीय गणनाओं के मुताब़िक वर्ष 1939 के बाद से सॉफ़्टवेयर हर साल 10 गुना ग्रोथ से आगे बढ़ रहा है और इस गति से देखें तो 1939 से अब तक इसमें 75 हज़ार ट्रिलियन गुना ग्रोथ हो चुकी है। अगले साल इसका दस गुना कर लीजिए और उसके अगले साल फिर दस गुना। यह अकल्पनीय रफ़्तार है। इस रफ़्तार के अनुसार तो वे अपनी भविष्यवाणी के नज़दीक हैं! बक़ौल कुर्ज़विल, अगले 36 महीने काफ़ी अहम हैं और इस दौरान हमें कई क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
इसलिए एंथ्रोपिक के संस्थापक की सुनिए
एंथ्रोपिक के संस्थापक और सीईओ डारियो अमोदेई एआई के क्षेत्र में नैतिकता के सबसे बड़े समर्थक माने जाते हैं। उन्होंने हाल ही darioamodei.com पर एक लिखे एक आलेख ‘एआई के विस्फोटक विकास पर नीति’ (Policy on the AI Exponential) में एआई को लेकर सख़्त नियंत्रण और क़ानून बनाने की पैरवी की है।
अपने आलेख में वे दुनिया के समक्ष तीन ख़तरों को इंगित करते हैं- जैविक हथियार, साइबर सिक्योरिटी और एआई ऑटोनॉमी (यानी एआई का स्वयं विकास करते जाना)। इसमें भी वे ‘एआई ऑटोनॉमी रिस्क’ को सबसे गंभीर मानते हैं। उनके मुताबिक़ इस तीसरे ख़तरे से शुरू के दोनों ख़तरे और भी विनाशकारी हो जाएंगे।
अमोदेई इसके नियंत्रण के लिए वैश्विक नियामक जैसी व्यवस्था की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं। उनका मानना है कि वैश्विक स्तर पर जिस तरह से सरकारों ने जलवायु परिवर्तन और परमाणु हथियारों के जोखिमों को स्वीकार कर इससे निपटने के लिए कुछ कार्यक्रम बनाये, उसी तर्ज़ पर एआई के ख़तरों का सामना करने के लिए भी पूरी दुनिया को मिलकर काम करना होगा।
हालांकि इस तरह के वैश्विक कार्यक्रमों से जलवायु परिवर्तन और परमाणु हथियारों का ख़तरा पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ है और न होगा। लेकिन इससे दुनिया कम से कम जागरूक तो हुई है। यह जागरूकता एआई के ख़तरों को लेकर और भी ज़रूरी है। आज एआई के बग़ैर दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती, मगर यह सवाल भी मौज़ू है कि बग़ैर दुनिया के एआई की क्या अहमियत रह जाएगी?

ए. जयजीत
27 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल तीनों माध्यमों में और रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क पर कार्य करने का लंबा अनुभव। ये अपने आप को व्यंग्यकार भी मानते हैं। प्रमाण-स्वरूप 'पाँचवाँ स्तंभ' नाम से व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित करवा चुके हैं। अनुवाद इनकी वर्क प्रोफ़ाइल का हिस्सा होने के साथ-साथ शौक़ भी रहा। स्टीव जॉब्स की ऑफ़िशियल बायोग्राफी ‘स्टीव जॉब्स’ (वॉल्टर आइज़ैक्सन) के हिंदी अनुवाद का श्रेय इन्हीं को है। कुछ और पुस्तकों का अनुवाद भी कर चुके हैं।
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