
- July 15, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....
यादों की बारात: उर्दू अदब की सबसे बेहतरीन आत्मकथा
“यादों की बारात” एक महान शायर की जीवनी और इतिहास रचने वाले दौर के सांस्कृतिक जीवन की एक दिलचस्प कहानी है। इस कहानी में हमें गंगा और जमुना की वादियों और दक्कन के पुराने समाज की ख़ूबसूरत झलकियां देखने को मिलती हैं। लेखक ने अपने बचपन और जवानी के अमीर तबक़े के सामाजिक मूल्यों, उनके सोचने और महसूस करने के तरीक़े, उनके विश्वासों और अंधविश्वासों, उनके शौक़ और मनोरंजन, उनके त्योहारों और रस्मों, उनके जीने के तरीक़े और रीति-रिवाजों पर बहुत दिलचस्प बातें की हैं।
“यादों की बारात” जोश मलीहाबादी के सत्तर साल के अनुभव और देखने-समझने की कहानी है। इस कहानी में सोच और जोश, पागलपन और समझदारी गूंजती है। ख़ुशी और रंगों की महफ़िलें सजती हैं। लाल:रुख़ों के होठों और चेहरों की दिलकश कहानियां सुनायी जाती हैं। यारान-ए-मैकदा के प्यार और बेरुख़ी की कहानियां सुनायी जाती हैं और दौलत और राजनीति के शीर्ष लोगों के बारे में बताया जाता है और उनकी छोटी सोच का ज़िक्र किया जाता है।
शायर की आज और कल की यादों का यह कारवां कभी गैलेक्सी से तो कभी अंधेरे के समंदर से गुज़रता है, लेकिन वह खुशियों से भ्रमित होते हैं न विपत्तियों के तूफ़ानों से उनकी सच्चाई के पाये डगमगाते हैं। उनकी ज़िंदगी का कारवां विवेक की मशाल और इंसानी दोस्ती के गौरवगान करते हुए आगे बढ़ता है। (यादों की बारात का पहला फ्लैप)
संक्षेप में, यह किताब अपनी सांस्कृतिक और सभ्यता की परंपराओं को बनाये रखते हुए, हर तरह से पढ़ने वाले के दिल को खुशी और आनंद देती है और पढ़ने वाला उस दौर से गुज़रता हुआ दिखता है, जिसमें यह किताब लिखी गयी थी। इसे जोश मलीहाबादी की एक विवादित रचना भी माना जाता है। इस किताब में जोश के अनगिनत प्रेमिकाओं के ज़िक्र की वजह से उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा। भाषा पर अपनी महारत की वजह से मशहूर जोश ने यक़ीनन एक सुंदर और अनोखी आत्मकथा लिखी जिसे पढ़ने वाला उनकी शुरूआती ज़िंदगी की घटनाओं और माहौल से ख़ुद को जोड़ लेता है और उसमें डूब जाता है। “यादों की बारात” उर्दू में लिखी गयी सबसे दिलचस्प आत्मकथा है।” (Rekhta.com से लिया गया)

आत्मकथा की विषय-सूची
चैप्टर एक, कुछ शुरुआती बातें: इस शीर्षक के अंतर्गत, शक्ति और जीवन के नाम पर, मेरा बिस्मिल्लाह, लखनऊ की मेरी पहली यात्रा, फ़िरंगियों से मेरी नफ़रत, मेरी शादी, अलीगढ़ में मेरा पहला मुशायरा, युवा भारत में मेरी जवानी, राष्ट्रीय आंदोलन से मेरा जुड़ाव, फ़िल्मी दुनिया में कुछ दिन, पाकिस्तानी नागरिकता, मेरा धर्म आदि अन्य महत्वपूर्ण शीर्षकों में से कुछ हैं।
अध्याय दो, मेरा परिवार: उप-शीर्षक हैं: मेरे परदादा, मेरे दादा, मेरे पिता, मेरी माता, मेरे चाचा, मेरी पत्नी, मेरा बेटा।
अध्याय तीन, मेरे कुछ उल्लेखनीय मित्र: तैंतीस मित्रों का उल्लेख किया गया है, जिनमें मौलाना सुहा भोपाली, मानी जायसी, फ़ानी बदायूंनी, आग़ा शायर काजिलबाश, कुंवर महेंद्र सिंह बेदी सहर, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू, फ़िराक़ गोरखपुरी, वहीदुद्दीन सलीम, रोशन अली भीमजी (यह पुस्तक उन्हीं के नाम से समर्पित भी है), मुस्तफ़ा ज़ैदी, मजाज़ आदि के नाम महत्वपूर्ण हैं।
अध्याय चार, मेरे समय की कुछ अजीब पर्सनैलिटी: उन्नीस ऐसे लोगों का ज़िक्र है, जो ज़्यादा जाने-माने नहीं हैं लेकिन उनके ख़ाके जोश ने लिखे हैं। जैसे अलीगढ़ के एक अनजान पठान शायर, नवाब रुस्तम अली ख़ान मेहर, छिद्दू ख़ान वग़ैरह।
चैप्टर पाँच, मेरे प्रेम प्रसंग: इसमें उन्होंने अपनी प्रेमिकाओं के नाम न तो छिपाये और न ही बताये हैं। उन्होंने उन्हें अक्षरों से याद किया है, जैसे: S. H., A. J., मिस मैरी रोमुआल्ड, मिस ग्लैंसी, M. बेगम, R. कुमारी, T.J., J. B. A. Kh… अगले पेज पर एक क़ता है:
अतराफ़-ओ-जेहात को मुरत्तब कर ले
रूदाद-ए-हयात को मुरत्तब कर ले
इससे पहले कि भूल जाये सब कुछ
यादों की बारात को मुरत्तब कर ले
(आस-पास और पहलुओं को इकट्ठा करें, ज़िंदगी की घटनाओं को इकट्ठा करें, सब कुछ भूल जाने से पहले यादों की बारात इकट्ठा करें)
अगले पेज पर एक क़ता और एक ग़ज़ल जैसी चार शेरों वाली रचना है। “यादों की बारात” एक कॉन्ट्रोवर्शियल, रियलिस्टिक और मास्टरपीस ऑटोबायोग्राफ़ी है। अपने बोल्ड अंदाज़, पर्सनल ज़िंदगी के छिपे हुए कोनों को सामने लाने और लिटरेरी महफ़िलों के दिलचस्प क़िस्सों की वजह से, इसे उर्दू लिटरेचर में सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली ऑटोबायोग्राफ़ी में से एक माना जाता है।
जोश साहब ने अपनी ज़िंदगी के हर पहलू को बिना किसी डर के और बग़ैर बढ़ा-चढ़ाकर बताया है। उनकी प्राइवेट ज़िंदगी, रिश्ते और इमोशनल हालत इस किताब का ख़ास हिस्सा हैं। क्रिटिक्स के मुताबिक़, यह किताब सिर्फ़ एक बायोग्राफ़ी नहीं है बल्कि उनकी अंदर की दुनिया का पूरा रिफ्लेक्शन है। किताब में जोश साहब बार-बार सपनों का सहारा लेते दिखते हैं। लेखक ने अलग-अलग मुश्किलों और मानसिक उलझनों से निकलने के लिए अपने सपनों की ख़ूबसूरत वादियों का ज़िक्र किया है, जो किताब की कहानी को दिलचस्प और आकर्षक बनाते हैं। यह किताब महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर जैसी महान उपमहाद्वीपीय हस्तियों की निजी ज़िंदगी और आदतों के दिलचस्प और कभी-कभी विवादित पहलुओं को दिखाती है।
इसके अलावा, उनकी शायरी और बौद्धिक सफ़र पर भी रोशनी डाली गयी है। अपनी बोल्डनेस और असलियत की वजह से इस किताब की आलोचना भी हुई है। मुश्ताक अहमद यूसुफ़ी ने इसे “इरोटिक बायोग्राफ़ी” कहा। (सवानही उमरी को शहवानी उमरी)। जबकि कुछ दूसरे क्रिटिक्स के मुताबिक़, इसमें पारंपरिक बायोग्राफ़ी जैसी गंभीरता या फ़िलॉसफ़ी की कमी है। हालांकि, कोई भी इसके साहित्यिक आकर्षण और प्रवाह से इनकार नहीं कर सकता।
यह किताब एक बाग़ी, क्रांतिकारी और रोमांटिक शायर की आत्मा की बोलती हुई झलक है।
यह एक भारी-भरकम लेकिन दिलचस्प ऑटोबायोग्राफ़ी है। यह किताब उर्दू की लगभग सभी बायोग्राफ़ी से बेहतर है। किताब बहुत दिलचस्प है क्योंकि जोश ने अपनी ख़ूबियों के साथ-साथ अपनी कमज़ोरियों, कमियों, गुमरही, भटकाव, बग़ावत, अफ़ेयर्स और गुनाहों पर भी दिलचस्प तरीक़े से बात की है। यादों की बारात किताब में लेखक बार-बार सपनों की दुनिया में घूमता हुआ दिखता है।
किताब पढ़ने के बाद हमें पता चलता है कि कई मौक़ों पर जब कोई अपराध-बोध के दलदल में फंस जाता है, तो वह सपनों का सहारा लेकर अपनी मुश्किलों का हल ढूंढता है, जिससे पढ़ने वाला लेखक से हमदर्दी रखने पर मजबूर हो जाता है।
मौलाना अब्दुल माजिद दरियाबादी ने अपने मशहूर अख़बार “सद्दीक-ए-जदीद” में जोश मलीहाबादी की इस मशहूर और विवादित ऑटोबायोग्राफ़ी “यादों की बारात” पर बहुत तीखी और बेबाक बातें कहीं। चूंकि मौलाना ख़ुद अपनी शुरूआती ज़िंदगी के बागियाना और नास्तिक दौर से तौबा कर चुके थे और सूफ़ी और कट्टर मुसलमान बन चुके थे, इसलिए उन्हें जोश की बेवफ़ाई, नास्तिकता और बोलने का बोल्ड अंदाज़ बिल्कुल पसंद नहीं आया। उन्होंने इस किताब में धर्म, नैतिक मूल्यों और शालीनता की बुराई करने के लिए जोश मलीहाबादी की कड़ी आलोचना की और उनके विद्रोही विचारों को ख़ारिज कर दिया। सभी धार्मिक मतभेदों और नैतिक अस्वीकृति के बावजूद, मौलाना माजिद ने जोश की कलम की तेज़ी और उनकी साहित्यिक महानता को खुलकर माना। उनका मानना था जोश की हिम्मत अपनी जगह है, लेकिन उर्दू गद्य में इस किताब की साहित्यिक और कलात्मक अहमियत को नकारा नहीं जा सकता।
एक नज़र में जोश मलीहाबादी
शब्बीर हसन ख़ान पूरा नाम। पहले “शब्बीर” तख़ल्लुस इस्तेमाल किया, फिर जोश अपना लिया। उनका जन्म 1898 में मलीहाबाद में हुआ था। उनके पिता बशीर अहमद ख़ान बशीर, दादा मुहम्मद अहमद खान अहमद और परदादा फकीर मुहम्मद ख़ान सभी जाने-माने शायर थे। इस तरह, शायरी उन्हें विरासत में मिली। उनका परिवार ज़मींदारों का परिवार था। हर तरह के ऐशो-आराम की चीज़ें मौजूद थीं, लेकिन वे हायर एजुकेशन नहीं ले सके।
आख़िरकार, उन्हें पढ़ने का शौक़ हुआ और उन्होंने भाषा में महारत हासिल कर ली। जब उन्होंने शायरी लिखना शुरू किया, तो उन्होंने अज़ीज़ लखनवी से इस्लाह लिया। जब उन्होंने नौकरी ढूंढी, तो उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। आख़िर में, उन्हें दार-उल- तर्जमा उस्मानिया, ढकाव में नौकरी मिल गयी। वहां कुछ समय बिताने के बाद, वे दिल्ली आ गये और “कलीम” मैगज़ीन निकाली। वह ऑल इंडिया रेडियो से भी जुड़े थे। सरकारी मैगज़ीन ‘आज कल’ के एडिटर बने। वह पाकिस्तान जाने तक इसी मैगज़ीन से जुड़े रहे। पाकिस्तान में वहाँ एक लुग़त (डिक्शनरी) बनाने में बिज़ी थे कि 1982 में वहीं उनकी मौत हो गयी।
उन्हें देश भर में तब पहचान मिली जब उन्होंने आज़ादी की लड़ाई के सपोर्ट में कविताएँ लिखीं और उन्हें “क्रांति के कवि” (शायर-ए-इंक़लाब) के टाइटल से याद किया गया।
क्रांति के कवि होने के अलावा, जोश को “प्रकृति के कवि” (शायर-ए-फ़ितरत) का भी दर्जा हासिल है। प्रकृति के नज़ारे जोश को बहुत अच्छे लगते हैं। वह उनकी इतनी साफ़ तस्वीरें बनाते हैं कि मीर अनीस की याद ताज़ा हो जाती है। ख़लील-उर-रहमान आज़मी कहते हैं: “जोश ने कुदरत के नज़ारों पर जितनी कविताएँ लिखी हैं, उतनी पूरी उर्दू शायरी में नहीं मिलती।”
सुबह और शाम, बारिश की बहार, बारिश, बादलों का चाँद, सावन का महीना, गंगा के घाट, ये सारे नज़ारे जोश की कविताओं में नाचते-गाते हैं। बादलों का चाँद, बारिश की सुबह, सुबह की शान, झरने का गीत, बारिश का गीत, ये वो जीती-जागती और अमर नज़्में हैं, जिनकी वजह से जोश को कुदरत का शायर ही नहीं, कुदरत का पैगम्बर भी कहा जाता है।
जोश का तीसरा रुतबा “जवानी के शायर” (शायर-ए-शबाब) का है। वह प्यार के शायर हैं और प्यार से मिलने की चाहत रखते हैं। उनके लिए वियोग की तकलीफ़ें सहना नहीं चाहते। उन्हें हर अच्छी चीज़ पसंद है और वह भी तब तक जब तक हासिल न हो जाये।
“मेहतरानी”, “मालां” और “जामुन वालियां” जोश की मज़ेदार कविताएं हैं। इस तरह की दूसरी कविताओं के नाम हैं “उठती जवानी”, “जवानी के दिन”, “जवानी की रात”, “फ़ितना-ए-ख़ानकाह”, “पहली मफ़ारीक़त”, “जवानी की आमद”, “जवानी का ताम” जैसे अनोखे टाइटल।
जोश की कविता में सबसे ख़ास बात है उनकी प्यारी और जानदार भाषा! जोश को ज़बान पर पूरी महारत हासिल है। उन्हें सही मायने में शब्दों का बादशाह कहा गया।

डॉक्टर मो. आज़म
बीयूएमएस में गोल्ड मेडलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।
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