तहमीना का 'कुफ़्र'... धर्म और औरत
पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....

तहमीना का 'कुफ़्र'... धर्म और औरत

                  इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक की शुरूआत में पाकिस्तान की तहमीना दुर्रानी का अंग्रेज़ी में उपन्यास ‘ब्लासफ़ेमी’ आया और कुछ समय बाद उसका बेहतरीन हिन्दी अनुवाद ‘कुफ़्र’ वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। इससे पहले तहमीना दुर्रानी की पहली कृति ‘माय फ्यूडल लाॅर्ड’, लगभग दो दशक पहले आयी और वह भी बेस्टसेलर रही। उसी के साथ उनका शुमार इस उपमहाद्वीप की प्रमुख अंग्रेज़ी लेखिकाओं में होने लगा। ‘माय फ्यूडल लाॅर्ड’ का दुनिया की 22 भाषाओं में अनुवाद हुआ। यह पुस्तक न केवल समकालीन पाकिस्तानी सियासत की दशा और दिशा को बल्कि संवेदना के स्तर पर उस क्षेत्र के परिवारों और समाज की आधारभूत सामंती मानसिकता, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और सियासी उठापटक को पूरी ईमानदारी के साथ इस आत्मकथात्मक उपन्यास में चित्रित करती है।

‘कुफ़्र’ भी आत्मकथात्मक शैली में है और सत्य घटनाओं से प्रेरित धर्म तथा उसके संस्थागत ढांचे की क्रूरता और पाशविकता का कच्चा चिट्ठा है। सामंती समाज में एक ओर भूस्वामी है तो दूसरी ओर मशक्कत करते काश्तकार जो लगभग दासों की श्रेणी में हैं। उनका सर्वस्व, उनकी मेहनत, परिवार, बीवी-बच्चे और दिलो-दिमाग़ मालिक पर निर्भर रहा है। यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है।

सामंती समाज में अगर कुछ अच्छा हो, मानवीय संबंधों की गुंजाइश हो तो वह धर्म सत्ता के मद से नष्ट हो जाता है।

सामंती समाज में औरत भोग्या के रूप में ही रही है। घर-परिवार की औरत बेटी से लेकर पत्नी और माँ तक, एक तरह की ग़ुलामी ही उसकी नियति रही है और स्वतंत्र अस्तित्व तथा बराबरी का दर्जा एक धुंधला, मटमैला सपना।

इस व्यवस्था में धर्म हमेशा शोषण तंत्र के हाथ मज़बूत करता है और शोषण के विरोध में उठने वाले स्वरों को कुचलने के लिए आधार भी प्रदान करता है। उपन्यास, कहा जाता है किसी आपबीती से प्रेरित होकर लिखा गया है, तो इस रूप में हमारे सवालों और चिन्ता के संदर्भ में अधिक महत्वपूर्ण और विश्वसनीय हो जाता है। यहाँ पंद्रह साल की हीर की दो बहनें हैं, एक छोटा भाई और बेवा माँ है। निम्न मध्यवर्गीय परिवार की बड़ी बेटी हीर दसवीं कक्षा में पढ़ती है। उसे अपनी एक मित्र के भाई रांझा की अपने प्रति मुहब्बत का इल्म है, जिसने अपनी बहन के ज़रिये उस तक अपना फोटो पहुँचाया, जिसमें वह अपनी नयी लाल रंग की मोटर का स्टीयरिंग थामे बैठा है।

यह पश्चिमी क्षेत्र का एक इलाक़ा है। पीर साईं उस इलाके का धर्मगुरु है और अपनी हवेली से लगे मक़बरे का स्वामी है, जो उस समाज में धार्मिक सत्ता का केंद्र भी है। पीर उस इलाक़े का बेताज बादशाह है और उसकी हैसियत ईश्वर से भी ज़्यादा है। ईश्वर को तो किसी ने देखा नहीं लेकिन वह जीता जागता साक्षात है। लोगों का भरोसा है कि “वो उनको क़र्ज़ों से निजात दिला सकता है, उनकी बीमारी का इलाज कर सकता है, उनकी बांझ कोख को उपजाऊ बना सकता है और उनकी फसलें उगा सकता है। यह सब तब था, जबकि बारह दहाइयों से उनकी ज़िन्दगियों में बेहतरी का एक निशान भी नुमायां नहीं हुआ था।”

ऐसे पीर साईं के पास हीर की बेवा माँ अपनी तीनों लड़कियों को लेकर उनका आशीर्वाद लेने जाती है कि उसे कठिनाइयों से छुटकारा मिले और उसकी तीनों लड़कियों की जल्दी-जल्दी शादी हो जाये। पीर साईं ने बड़ी लड़की को देखा जो बहुत ख़ूबसूरत थी और उसने उस बेवा माँ को आश्वस्त किया कि उस पर जल्दी अल्लाह की मेहरबानी होगी और फिर उसी दिन पीर साईं की ओर से हीर के लिए शादी का पैग़ाम आ गया। पीर साईं की उम्र पैंतालीस के क़रीब है, जिसका बदन “गोश्त का पहाड़” है। उसकी दो शादियाँ पहले हो चुकी थीं। एक बीवी शादी की रात ही मर गयी और दूसरी दो दिन बाद पागल होकर मर गयी।

हीर की माँ के लिए यह रिश्ता ईश्वरीय वरदान के रूप में है। अब उसकी हैसियत बहुत बढ़ गयी है। उसके लड़के को अब नौकरी मिल जाएगी। तीनों लड़कियों की शादी हो जाएगी। वह तो हीर के “मक्खन से मुलायम कपड़े और ज़ेवर से लदे बदन” को देखकर भी खुश है और स्वयं को भाग्यशाली समझती है। सामंती समाज में औरत के सम्मान की यही अवधारणा है।

तहमीना का 'कुफ़्र'... धर्म और औरत

शादी के बाद शुरू होता है औरत की यंत्रणा का सफ़र, जिसकी गवाह है साईं की हवेली की चारदीवारी। बाहर की दुनिया के नाम पर आँगन की ऊंची चारदीवारी से दीखता छोटा-सा चौकोर आसमान है। बदलते मौसम का एहसास आँगन में लगे पेड़ और उन पर फूलते फूलों से तो कभी पीले पड़कर झड़ते पत्तों से होता है। उसने अपनी ज़िन्दगी के 15 साल तो आज़ादी में गुज़ारे लेकिन उसकी बेटियों का सफ़र तो एक हवेली की चारदीवारी से दूसरी हवेली की चारदीवारी तक ही रहता है। बाप नाम के एक आततायी से दूसरे पति नाम के आततायी पुरुष की सुपुर्दगी में ही उनका जीवन व्यतीत होना है।

इस उपन्यास में ढेर सारे नारी पात्र हैं। हवेली के भीतर होने वाली हर हरकत और हर औरत (पीर साईं की बीवी हीर समेत) पर नज़र रखने और हर शाम पीर साईं को पूरी रिपोर्ट देने के लिए पत्थर जैसे चेहरे वाली औरत चील है। अन्याय की शिकार तारा और तोती हैं, भीतर रहने वाली और काम करने वाली औरतें हैं। अपनी दो मासूम बच्चियों को लेकर रहने वाली बेवा है और है बारह-तेरह साल की बच्ची काली। हीर की बड़ी लड़की गुप्पी भी बारह साल की हो चुकी है और उसी की उम्र की है एक यतीमड़ी। हीर की मजबूरी है कि अपनी बेटी को बचाने के लिए वह यतीमड़ी को पीर साईं के सामने पेश कर देती है।

हवेली के अंदर आये-दिन लड़कियाँ ग़ायब होती रहती हैं और उन्हीं में अब बेवा की दो बच्चियाँ भी शामिल हो गयी हैं। ख़ुद हीर पीर साईं के ज़िन्दा रहने तक उसके द्वारा दी जाने वाली सज़ाओं और पाशविक हिंसा का शिकार होती रहती है। इस धार्मिक मक़बरे के और सत्ता के केंद्र के रूप में स्थापित होने के इतिहास पर भी लेखिका प्रकाश डालती हैं। हवेली की पुरानी सेविका तोती कहती है, “अंग्रेजों को वह चाबी मिल गयी थी जिससे वे यहाँ के बाशिन्दों के दिमाग़ों को खोल सकते थे। अगर कोई सिर उठाता, पीर उसे काट देता।” वर्तमान में भी यह मक़बरा और उसका तंत्र सरकार का मददगार है।

गाहे-ब-गाहे पीर साईं (और उन जैसे अन्य) सरकारी मीटिंगों में सलाह-मशविरे के लिए बुलाए जाते हैं। “चुनाव जीतने और वज़ीर या वज़ीरे-आज़म बनने के लिए बहुत सारे आरज़ूमंद सियासी लोग भी उसकी मदद लेने आते। मुल्क भर में बिखरे उसके मुरीद उसकी हिदायत के मुताबिक़ ही वोट देते।”

इस सामंती तंत्र में पीर साईं एक समय अपने बेटे से ही ख़तरा महसूस करने लगता है क्योंकि वह बाप की तरह निर्मम नहीं है और लोगों में अधिक लोकप्रिय होने लगता है। अपनी सत्ता पर ख़तरा महसूस होने पर वह अपनी कमसिन रखैल यतीमड़ी की मदद से पीट-पीटकर बड़े बेटे की हत्या कर देता है।

अंततः हवेली के भीतर होने वाले षड्यंत्रों के तहत पीर साईं की हत्या कर दी जाती है। हीर मुक्ति की साँस लेती है और उसका छोटा बेटा राजाजी गद्दीनशीन होता है। राजाजी जो अपने बाप से नफ़रत करता था और माँ से हमदर्दी रखता था लेकिन अब पुराने पीर साईं का ही प्रतिरूप है और वह उसी की तरह व्यवहार करने लगता है। इसके साथ अब हीर की यातनाओं का नया दौर शुरू होता है। अब की बार इसलिए कि उसने इस धार्मिक व्यवस्था की पोल खोलनी शुरू कर दी है। हवेली से बाहर उसने संदेश देने की कोशिश की है कि यह मक़बरा अनैतिक कार्यों और पापाचार का केंद्र है…पीरसाईं के पास कोई चमत्कारी शक्ति नहीं है…यह सब पाखंड लोगों से लंबा-चौड़ा लगान वसूलने और उन्हें उत्पीड़ित कर उनकी ज़मीने आदि हड़पने के हथियार हैं।

मक़बरे और उसकी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के बाद, जैसा कि कोई भी सोच सकता है, हीर को मरना पड़ता है।

पाकिस्तान में आज़ादी के बाद भी वहाँ की जनता को जनतांत्रिक अधिकार नहीं मिले तथा औरतें उसी पुरानी सामंती व्यवस्था में जीती रही हैं। हिन्दुस्तान के मुक़ाबिले वहाँ मध्यवर्ग भी विकसित नहीं हो पाया। धर्म पर आधारित उस देश में धार्मिकता और सामंती मूल्य सामाजिक सोच और विकास की दशा और दिशा निर्धारित करते हैं। इसके बावजूद बहुत कुछ ऐसा है जो दोनों देशों की औरतों और समाजों के लिए एक जैसा है। हीर की बड़ी बेटी गुप्पी जब माँ से पूछती है कि “बटन दबाने से बल्ब रोशन कैसे हो जाता है अम्माँ?” तो हीर का दिल बैठ जाता है। वहाँ धर्म शास्त्र पढ़ने के अलावा किसी भी तरह की तालीम की गुंजाइश नहीं है।

आज तो सभी जगह धर्म और परंपरा के नाम पर एक नये क़िस्म की मठ संस्कृति, मंदिर संस्कृति पैदा हो रही है। ये मठ, मंदिर और मक़बरे हिन्दुस्तान में भी सत्ता और सामाजिक वर्चस्व के केंद्र हैं और राजनीति इन सत्ता केन्द्रों के साथ गठबंधन करती है, उनके तथा उनके अनुयायियों का समर्थन प्राप्त करती है। इन संदर्भों में, स्त्री विमर्श के प्रश्नों के अलावा यह उपन्यास उन सभी समाजों के लिए प्रासंगिक है, जहाँ जनतांत्रिक व्यवस्था का लाभ हर वर्ग को नहीं मिल पा रहा है और अभी भी समाजी ढाँचा सामंती है।

इस उपन्यास के लिए तहमीना दुर्रानी की हिम्मत और बहादुरी की दाद देना ज़रूरी है।आमतौर पर समझदार और विशिष्ट लेखक भी ऐसे ख़तरनाक विषय को छेड़ने से गुरेज़ करते हैं। तहमीना बेबाकी से संस्थागत धार्मिकता के पाखंड और उसके अमानवीय चरित्र को उजागर करती हैं, जहाँ औरत का कोई अस्तित्व नहीं।

तसलीमा नसरीन के बाद तहमीना दुर्रानी का यह अत्यंत पठनीय और महत्वपूर्ण उपन्यास है।तसलीमा जहाँ धर्म को पूरी तरह ख़ारिज करती हैं वहीं तहमीना इस शोषण और अन्याय को धर्मच्युत व्यवहार बताते हुए कहती हैं कि ये शोषक और अत्याचारी धर्म के शत्रु हैं।

नारी की सत्ता में भागीदारी को लेकर बड़े आन्दोलन होते रहे हैं लेकिन इस आधी आबादी को पहले इंसान की तरह जीने का हक़ तो मिले। इस उपमहाद्वीप में हमारे समाजों का ढांचा, किसी भी धार्मिक आस्था का हो, धर्म आधारित है।

यहाँ रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के निर्देश भी कर्मकांडों से लिये जाते हैं। सामाजिक व्यवस्था के इन आधार स्तंभों को हिलाना और उन पर प्रहार करना आसान नहीं। उपन्यास में हीर की ज़िन्दगी एक धार्मिक संगठन के भीतर की ज़िन्दगी है, लौह कपाटों के भीतर की ज़िन्दगी है जहाँ बाहर तो धूप, अगरबत्ती और लोबान जल रहे हैं लेकिन भीतर झांकने की इजाज़त किसी को भी नहीं।

इन संदर्भों में स्त्री विमर्श के अर्थ भी बदल जाते हैं। आज वर्तमान स्थितियों में जब उत्तर आधुनिकता और भूमंडलीकरण के बीच नारीवादी विमर्शों की चर्चा होती रही है, यह उपन्यास हमें गहरी सुरंगों के भीतर ले जाता है और एक दूसरे यथार्थ से हमारा साक्षात्कार होता है।

तहमीना अपने उपन्यास का अंत इस रूप में करती हैं- “किसानों का एक कुनबा चलता हुआ वहाँ पहुँचा। उन्होंने इस (हीर की क़ब्र) पर गुलाब की पंखुड़ियाँ चढ़ायीं, अगरबत्तियाँ जलायीं और मिट्टी के ढेर पर काग़ज़ की छोटी-छोटी झंडियाँ गाड़ दीं।

एक औरत को दुआ-ए-ख़ैर मांगते सुना था- या अल्लाह, इस औरत की रूह को दुआ दे जिसने मक़बरे की इबादत के पतन का पर्दाफ़ाश किया था। उसको दुआ दे कि वह हमको तेरे क़रीब लायी थी। मेरी आँखें आँसुओं से भर गयीं। किसी ने तो समझ लिया था। लेकिन यह एक और मक़बरे की इब्तिदा थी।”

अंतिम पंक्ति ही संभवतः लेखिका का असली मंतव्य है, जिसने पूरे उपन्यास को अर्थवान बनाया है।

नमिता सिंह

नमिता सिंह

लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!