व्यंग्य की काव्य-यात्रा: कबीर से समकाल तक
पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से....

व्यंग्य की काव्य-यात्रा: कबीर से समकाल तक-2

प्रयोगवाद और नई कविता (1943-1953) : बौद्धिक और संरचनात्मक व्यंग्य

प्रगतिवाद के बाद प्रयोगवाद और नई कविता के दौर में व्यंग्य का स्वर और अधिक जटिल तथा बौद्धिक हो जाता है। इस काल की कविताओं में व्यंग्य अक्सर आयरनी, प्रतीक और भाषा की संरचना के भीतर निहित मिलता है। अज्ञेय को प्रयोगवादी काव्यधारा का प्रमुख प्रवर्तक माना जाता है। उन्होंने हिंदी कविता को नए बौद्धिक और शिल्पगत आयाम दिए। उनकी कृतियाँ – ‘हरी घास पर क्षण भर’, ‘आँगन के पार द्वार’ तथा ‘इत्यलम्’ में आधुनिक मनुष्य की आत्म-संघर्षशील चेतना के साथ एक सूक्ष्म व्यंग्य भी निहित है, जो जीवन की कृत्रिमता और अस्तित्वगत विडंबना को उद्घाटित करता है। अज्ञेय का व्यंग्य प्रत्यक्ष न होकर अंतर्मुखी और दार्शनिक है, जो पाठक को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करता है। 1953 के बाद, यही प्रवृत्तियाँ अधिक सघन रूप में ‘नई कविता’ के रूप में विकसित हो गईं, जिसके कारण प्रयोगवाद एक नवोन्मेषी आंदोलन के रूप में इतिहास में दर्ज हुआ। नई कविता के बारे में डॉ. नगेंद्र का मत हिंदी साहित्य में इसकी रचनात्मक भूमिका और महत्त्व को प्रतिपादित करता है – “प्रयोगवाद वस्तुगत, मूर्त और ऐंद्रिय चेतना का विकास है, जिसमें कविता को अधिक यथार्थवादी और कलात्मक बनाने का प्रयास किया गया है।”

1943 में अज्ञेय के संपादन में ‘तार सप्तक’ का प्रकाशन हुआ, जिसने प्रयोगवाद को एक संगठित रूप दिया। इसमें सात कवियों – अज्ञेय, गिरिजा कुमार माथुर, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, रामविलास शर्मा, गजानन माधव मुक्तिबोध और नेमीचंद जैन की कविताएँ संकलित थीं। इनके अलावा धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, भवानी प्रसाद मिश्र, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता आदि कवियों ने भी इस धारा को आगे बढ़ाया। नलिन विलोचन शर्मा और केसरी कुमार भी इस काव्य-प्रवृत्ति से जुड़े रहे।

इस काल की कविताओं में व्यंग्य बौद्धिक और अंतर्मुखी रूप में व्यक्त होता है लेकिन उसकी मारकता गहरी और विचारोत्तेजक होती है। अज्ञेय की प्रसिद्द कविता ‘साँप’ में इसे स्पष्ट देखा जा सकता है –

“साँप!

तुम सभ्य तो हुए नहीं,

नगर में बसना

भी तुम्हें नहीं आया।

एक बात पूछूँ—(उत्तर दोगे?)

तब कैसे सीखा डसना?

विष कहाँ पाया?”

यहाँ साँप के माध्यम से तथाकथित सभ्य मनुष्य की हिंस्रता और आंतरिक विषाक्तता पर तीखा, किंतु बौद्धिक व्यंग्य किया गया है।

‘हम होंगे कामयाब एक दिन’ जैसा लोकप्रिय गीत रचनेवाले गिरिजा कुमार माथुर की ‘नाश और निर्माण’ तथा भारत भूषण अग्रवाल की ‘जागते रहो’ जैसी कृतियों में आधुनिक जीवन की विसंगतियों, विशेषतः शहरी मध्यवर्गीय जीवन की कृत्रिमता, पर व्यंग्य मिलता है। ये कवि नए प्रतीकों और शिल्प के माध्यम से सामाजिक अंतर्विरोधों को उजागर करते हैं। मुक्तिबोध के बारे में आलोचकों का मत है कि “आधुनिक हिंदी कविता में निराला के बाद मुक्तिबोध ही ऐसे कवि हुए हैं, जिन्होंने कविता के बने-बनाए साँचे को बार-बार तोड़ा है। उनकी कविताओं में मध्यवर्गीय बौद्धिकता, सामाजिक अन्याय और आत्म-विसंगति पर गहरा प्रहार मिलता है।” उनकी कविता ‘अँधेरे में’ की ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं –

“राजनीति-साहित्य क्षेत्र भी

महा शूकरों का है एक तमाशा,

यद्यपि बोली जाती मुँह से

भारतीय संस्कृति की भाषा।”

इन पंक्तियों में राजनीति और साहित्य, दोनों क्षेत्रों में व्याप्त नैतिक पतन पर तीखा व्यंग्य किया गया है। मुक्तिबोध का व्यंग्य बहुआयामी है; जहाँ उन्हें विसंगति दिखाई देती है, वहीं वे तीखी चोट करते हैं। ‘ब्रह्मराक्षस’ में ज्ञान के अहंकार और निष्क्रिय बौद्धिकता पर मारक व्यंग्य मिलता है, जबकि ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ में यथार्थ की विकृतियों और सामाजिक कुरूपता पर संकेतात्मक व्यंग्य दृष्टिगोचर होता है।

प्रयोगवाद के सामानांतर विकसित नई कविता के दौर में व्यंग्य का स्वर और अधिक जटिल तथा बौद्धिक हो जाता है। इस परंपरा में शमशेर बहादुर सिंह, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय, कुँवर नारायण आदि का उल्लेख किया जा सकता है।

दूसरे तार सप्तक के कवि भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं में व्यंग्य सहज, जनोन्मुख और नैतिक चेतना से युक्त रूप में मिलता है। उनकी कविता का मूल स्वर गाँधीवादी जीवन-मूल्यों से जुड़ा है, इसलिए उनका व्यंग्य विशेषतः सत्ता और समाज के पाखंड, भाषा और आचरण के दोहरेपन तथा मनुष्य के नैतिक पतन पर केंद्रित रहता है। वह कविता को संवाद का माध्यम बनाते हैं जिसमें व्यंग्य हलके ढंग से गहरी चोट करता है। वह अपनी प्रसिद्ध कृति ‘गीतफरोश’ की इस कविता में बाजारवादी प्रवृत्ति और साहित्य के वस्तुकरण पर तीखा व्यंग्य करते हैं –

“जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,

मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,

मैं सभी क़िस्म के गीत बेचता हूँ।”

यहाँ कवि उस समाज पर कटाक्ष करते हैं जहाँ लोग अपना “धैर्य” और “ईमान” तक बेच रहे हैं, जबकि वह केवल अपने गीत बेचने की बात करता है। यह उपभोक्तावादी मानसिकता पर करारा व्यंग्य है।

इसी प्रकार ‘मैं असभ्य हूँ’ कविता में वे लिखते हैं –

“मैं असभ्य हूँ क्योंकि खुले नंगे पाँवों चलता हूँ,

और आप सभ्य हैं क्योंकि हवा में उड़ जाते हैं,

आप सभ्य हैं क्योंकि आग बरसा देते हैं भू पर।”

इन पंक्तियों में आधुनिक सभ्यता की कृत्रिमता, हिंसा और अलगाव पर सूक्ष्म व्यंग्य निहित है। उनकी कविता ‘चार कौए’ में, जो पिछले दिनों सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई थी, कौओं के माध्यम से सत्ता-तंत्र, सामूहिक दमन और एकरूपता थोपने वाली प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया गया है। कौए तय करते हैं कि सारे उड़ने वाले उनके ढंग से उड़ें, यह तानाशाही या एकरूपता थोपने वाली व्यवस्था पर व्यंग्य है।

साठोत्तरी कविता: व्यंग्य का बहुआयामी और तीखा रूप

साठोत्तरी कवित्रों में धूमिल का विशिष्ट स्थान है। उनकी अनेक कविताओं में व्यंग्य प्राण तत्व के रूप में उपस्थित है। वह अपनी कविताओं में समाज, राजनेता, शिक्षा, रूढ़िवादिता, बाह्याडम्बर आदि पर करारा व्यंग्य करते हैं। कहा जाता है कि धूमिल ने अपने जीवन में अनेक अभावों का सामना किया और इसी अभावग्रस्त जीवन की वजह से उनकी कविताओं में इसका प्रतिबिम्ब चित्रित हुआ है। ‘मोचीराम’ कविता में एक मोची के माध्यम से धूमिल एक साथ समाज की कई बुराइयों पर चोट करते हैं। कविता लंबी है, उसकी प्रारंभिक पंक्तियाँ देखिए –

“बाबूजी! सच कहूँ

मेरी निगाह में

न कोई छोटा है

न कोई बड़ा है,

मेरे लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता है..”

इसी प्रकार ‘रोटी और संसद’ में वे पूँजीवादी और शासक वर्ग पर करारा व्यंग्य करते हैं –

“एक आदमी रोटी बेलता है,

एक आदमी रोटी खाता है,

एक तीसरा आदमी भी है

जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है,

वह सिर्फ रोटी से खेलता है…

मेरे देश की संसद मौन है।”

यहाँ संसद की चुप्पी, राजनीतिक उदासीनता और वर्ग-शोषण का प्रतीक के रूप में उभरती है।

आलोचकों का मानना है कि उनका व्यंग्य आवेशपूर्ण है, जो अक्सर व्यंजना, विडंबना और सूक्तियों के रूप में सामने आता है। वे कविता को हथियार बनाकर व्यवस्था को चुनौती देते हैं। यह उनकी कुछ कविताओं में पूरी तरह चरितार्थ होता है –

“जनतंत्र एक ऐसा तमाशा है

जिसकी जान मदारी की भाषा है।” (‘किस्सा जनतंत्र’)

“संसद तेल की वह घानी है,

जिसमें आधा तेल और आधा पानी है।(संसद से सड़क तक)

“एकता युद्ध की और दया

अकाल की पूँजी है।” (अकाल-दर्शन)

इस काल के दूसरे महत्वपूर्ण कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना हैं। व्यंग्य उनकी कविता का एक महत्वपूर्ण आयाम है, लेकिन यह धूमिल की तरह तीखा और आक्रोशपूर्ण न होकर सूक्ष्म, विडंबनापूर्ण और मार्मिक है। वे सत्ता की क्रूरता, नेताओं के झूठे वायदे, समाज की अंधी अनुकरणशीलता, सामाजिक ढोंग और आम आदमी की उपेक्षा पर करारा प्रहार करते हैं। ‘पिछड़ा आदमी’ कविता की इन पंक्तियों को देखिए जिनमें राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में हाशिए के आदमी की नियति को मार्मिकता से उजागर किया गया है-

“जब सब बोलते थे / वह चुप रहता था,

जब सब चलते थे / वह पीछे हो जाता था,

जब सब खाने पर टूटते थे / वह अलग बैठा टूँगता रहता था,

लेकिन जब गोली चली तब सबसे पहले / वही मारा गया।”

उनकी एक अन्य कविता ‘पोस्टमार्टम की रिपोर्ट’ भी गहरे व्यंग्य के साथ झकझोरने वाली है –

“गोली खाकर

एक के मुँह से निकला, ‘राम’,

दूसरे के मुँह से निकला, ‘माओ’,

लेकिन तीसरे के मुँह से निकला, ‘आलू’।

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है

कि पहले दो के पेट भरे हुए थे।”

यहाँ भूख की समस्या के माध्यम से विचारधारात्मक खोखलेपन पर तीखा व्यंग्य किया गया है। उनकी ‘भेड़िया’, ‘हम ले चलेंगे’, ‘अंधेरे का मुसाफिर’, ‘व्यंग्य मत बोलो’ आदि कविताओं में भी इसी प्रकार का व्यंग्यात्मक स्वर मिलता है।

इस समय के अन्य प्रमुख कवियों – केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, रघुवीर सहाय और शमशेर बहादुर सिंह, की कविताओं में भी व्यंग्य की उपस्थिति महत्वपूर्ण है। केदारनाथ सिंह के प्रसिद्ध संग्रह ‘अकाल में सारस’ की कविताओं में व्यंग्य विशेष रूप से दृष्टिगोचर होता है। कुँवर नारायण की कृति ‘आत्मजयी’ में सत्ता, विजय और नैतिकता के प्रश्नों के माध्यम से मानव के अहंकार पर अप्रत्यक्ष व्यंग्य किया गया है, जबकि ‘कोई दूसरा नहीं’ में मनुष्य की संकीर्णता और आत्मकेंद्रित दृष्टि पर सूक्ष्म व्यंग्य निहित है। शमशेर बहादुर सिंह के काव्य में व्यंग्य अत्यंत सूक्ष्म, संवेदनात्मक और कलात्मक रूप में उपस्थित है। उनकी कृतियाँ ‘कुछ कविताएँ’, ‘उदिता’ और ‘चुका भी हूँ मैं नहीं’ में यह व्यंग्य बिंबों और वातावरण के माध्यम से व्यक्त होता है। रघुवीर सहाय के यहाँ व्यंग्य सबसे अधिक प्रत्यक्ष, तीखा और राजनीतिक-सामाजिक चेतना से युक्त रूप में सामने आता है। उनकी कृतियाँ ‘हँसो, हँसो जल्दी हँसो’ और ‘लोग भूल गए हैं’ सत्ता, लोकतंत्र और मध्यवर्गीय मानसिकता की विसंगतियों पर करारा प्रहार करती हैं। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘अधिनायक’ इस बात का प्रमाण है –

“राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत-भाग्य-विधाता है,

फटा सुथन्ना पहने जिसका गुन हरचरना गाता है।”

समकालीन कविता : प्रयोगशील व्यंग्य

समकालीन हिंदी कविता में व्यंग्य और अधिक बहुआयामी, तीक्ष्ण और प्रयोगशील रूप में सामने आता है। हिंदी आदाब में भूपेंद्र पांडे लिखते हैं – “समकालीन कविता की अंतर्वस्तु अत्यंत व्यापक है। इसमें पूरे देश की जनता के दुखते, कसकते अनुभव व्याप्त हैं। साथ ही इसमें नव साम्राज्यवाद, नव पूंजीवाद नव उपनिवेशवाद और उत्तर आधुनिकतावाद का दबदबा है। स्त्री की स्वतंत्रता, पहचान, यौनिकता, हिंसा, दमन, उत्पीड़न, दलित व् आदिवासी अस्मिता, पलायन, बदलती संस्कृति, मशीनी जीवन, सोशल मीडिया, डिजिटल उपकरणों पर निर्भरता, जलवायु संकट, पर्यावरणीय असंतुलन और समानता के विषय भी इसमें शामिल हैं।” वे यह भी संकेत करते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की विफलताओं और दिशाहीनता के कारण समकालीन कविता में व्यंग्य की प्रचुरता दिखाई देती है। 

सत्तर अस्सी के दशक में ‘अकविता’ और ‘जनवादी कविता’ जैसे अनेक आंदोलन उभरे लेकिन इन सबको आलोचकों द्वारा समकालीन कविता के बृहत्तर छाते के अंदर ही रखा जाता है। अकविता आंदोलन से जुड़े कवियों में जगदीश चतुर्वेदी, श्याम परमार, गंगाप्रसाद विमल, सौमित्र मोहन, मणिक मोहिनी, मोना गुलाटी और राजकमल चौधरी प्रमुख हैं। इन कवियों के रचनाकर्म में भी व्यंग्य की ताप स्पष्ट रूप से महसूस की जाती है। उदाहरणस्वरूप राजकमल चौधरी की कविता का यह अंश देखिए, जिनमें लोकतांत्रिक व्यवस्था की विडंबनाओं और मनुष्य की असहायता पर गहरा व्यंग्य व्यक्त हुआ है। –

“आदमी को तोड़ती नहीं हैं लोकतांत्रिक पद्धतियाँ,

केवल पेट के बल उसे झुका देती हैं,

धीरे-धीरे अपाहिज,

धीरे-धीरे नपुंसक बना लेने के लिए।”

समकालीन कविता के कवियों में विजयदेवनारायण साही, लीलाधर जगूड़ी, बोधिसत्व, कैलाश बाजपेयी, चंद्रकांत देवताले, विनोद कुमार शुक्ल, मणि मधुकर, राजकुमार कुंभज, जगदीश चतुर्वेदी, गंगाप्रसाद विमल, अशोक बाजपेयी, आलोक धन्वा, विष्णु नागर, इब्बार रब्बी, अरुण कमल, श्रीकांत वर्मा, गोरख पाण्डेय, ऋतुराज, सोमदत्त, राजेश जोशी, उदय प्रकाश, मंगलेश डबराल, वेणुगोपाल आदि अनेक प्रमुख हैं। मंगलेश डबराल की कविताओं में बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद पर व्यंग्य मिलता है। उनकी ‘कवि का अकेलापन’ तथा राजेश जोशी की ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ हमारी सामूहिक संवेदनहीनता पर प्रश्न उठाती हैं।

मंगलेश की कविता में व्यंग्य शांत लेकिन गहरा है। वह बौद्धिक स्वतंत्रता पर पड़ रहे दबाव और वैचारिक एकरूपता पर व्यंग्य करते हैं –

“वे चाहते हैं

कि मैं उनकी तरह सोचूँ,

और मैं चाहता हूँ

कि वे सोचें।”

इसी तरह विष्णु खरे की कविताओं में राजनीतिक व्यंग्य का अद्भुत पुट दिखाई देता है –

“इस देश में

जो सबसे अधिक बोलते हैं

वे सबसे कम जानते हैं।”

इस आलेख के लेखक अरुण अर्णव खरे की ये पंक्तियाँ भी समकालीन समाज की स्मृतिहीनता और प्रतीकात्मक श्रद्धा पर व्यंग्य प्रस्तुत करती हैं –

“बापू! तुम सच मानो

हम तुम्हें भूले नहीं हैं…

हमें अभी तक याद हैं

तुम्हारे जन्म और मृत्यु की तारीखें।

समकालीन कविता में स्त्री लेखन

समकालीन कविता परिदृश्य में महिला कवयित्रियों की सशक्त उपस्थिति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। नई कविता के दौर में शकुन्त माथुर, कीर्ति चौधरी, स्नेहमयी चौधरी, अमृता भारती, इन्दु जैन, सुनीता जैन आदि का योगदान उल्लेखनीय है। आगे चलकर कात्यायनी, अनामिका, निर्मला गर्ग, नीलेश रघुवंशी, तेजी ग्रोवर, अर्चना वर्मा, सविता सिंह, क्षमा कौल, इला कुमार आदि कवयित्रियों ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। इनमें से अनेक कवयित्रियों की कविताएँ में भी व्यंग्य की अंतर्धारा दिखाई देती है, विशेषतः स्त्री-अस्मिता, पितृसत्ता और सामाजिक असमानताओं के संदर्भ में। उदाहरण के लिए अनामिका की ये पंक्तियाँ इस बात का प्रतिनिधित्व करती हैं –

“औरतें हँसती हैं

तो इतिहास काँपता है।”

नवगीत और हिंदी गजल में व्यंग्य

नवगीत आंदोलन भी समकालीन कविता की एक विशिष्ट धारा है जिसमें ठाकुर प्रसाद सिंह, रमानाथ अवस्थी, रमेश रंजक, चन्द्रदेव सिंह, वीरेन्द्र मिश्र, शिवमंगल सिंह “सुमन”, रामदरश मिश्र, देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’, जहीर कुरेशी, नचिकेता, गुलाब सिंह, महेश्वर तिवारी, यश मालवीय आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। नवगीतों का रचना संसार बहुत विशाल है और उनमें व्यंग्य की मार भी उतनी ही गहरी है। इस बड़े संसार में डुबकी लगाकर कायदे के रत्नों को निकाल पाना आसान नहीं है। यहाँ नवगीत में व्यंग्य की उपस्थिति को रेखांकित करने वाले कुछ उद्धरणों को उदाहरणार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है –

नवगीत के प्रवर्तकों में से एक, शंभुनाथ सिंह ने व्यवस्था में आम आदमी की स्थिति पर कटाक्ष किया है –

“इतिहास लिख रहा है कलंक की कथाएँ,

हम मौन खड़े देख रहे अपनी ही चिताएँ।”

ग्रामीण यथार्थ और विसंगति पर ठाकुर प्रसाद सिंह की ये पंक्तियाँ गौरतलब हैं –

“शहर की सड़कों पर सन्नाटा है,

और गाँव की पगडंडियों पर सलीबें गड़ी हैं।”

वर्तमान में रिश्तों में उपयोगितावाद और भौतिकवाद को केंद्र में रखकर, संबंधों के क्षरण पर जहीर कुरेशी ‘नवगीत दशक’ में लिखते हैं –

“रिश्तों की सड़कें, अब जाती नहीं भावना तक।

आज आदमी पर होता है, कम्प्यूटर का शक।”

इसी तरह मूल्यों के ह्रास पर नचिकेता ने ‘आदमकद खबरें’ में अत्यंत तीखी टिप्पणी की – “अंधे अंधियारे का, गला हम दबोच लें।” व्यवस्था के प्रति देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ का आक्रोश भी कुछ क्षण रुककर सोचने पर विवश करता है – “खदबदाते क्रोध की असहायता में, कसाई के ठिये पर लटके। हम जिम्मेदार है इस व्यवस्था के, शैल से गिर झाड़ पर अटके।“

हिंदी ग़ज़ल में व्यंग्य की बात हो तो ‘दुष्यंत कुमार’ और आदम गोंडवी के नाम तुरंत दिमाग में कोंधते हैं। इन दोनों ने गजल को व्यंग्य की जिन ऊँचाइयों तक पहुँचाया, वहाँ से हिंदी गजल अन्य छांदिक काव्य विधाओं से सर्वथा अलग नजर आती है।

दुष्यंत के सैकड़ों शेरों में दो-चार को अलग से रेखांकित करना बहुत चुनौतीपूर्ण काम है। दरबारी संस्कृति और सत्ता की चापलूसी पर उनका यह शेर बहुत कुछ बयां करता है –

“यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है,

चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।”

वह एक अन्य शेर में वादों और वास्तविकता के बीच के विरोधाभास पर तीखा कटाक्ष कुछ इस तरह करते हैं –

“कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए,

कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।”

वह आम आदमी की पीड़ा और उस पर हुए अत्याचारों को बिना सीधे आरोप लगाए, पूरी व्यवस्था पर गहरा कटाक्ष करते हैं –

“वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है,

माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है।”

अदम गोंडवी की ग़ज़लें व्यंग्य की चरम सीमा हैं। वे शोषित वर्ग के पक्ष में खड़े होकर व्यवस्था पर सीधा हमला करते हैं। राजनीतिक व्यवस्था के पतन पर उनकी ये पंक्तियाँ झकझोरने वाली हैं – “काजू भुने प्लेट में विस्की गिलास में,

उतरा है रामराज विधायक निवास में।”

उनके एक अन्य शेर को देखिए –

“तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है,

मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है।”

आज हिंदी ग़ज़ल लिखने वालों की संख्या बहुत अधिक है और उनमें से अनेक ग़ज़लकारों की रचनाओं में व्यंग्य की ओजस्विता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यहाँ उदाहरणस्वरूप कुछ चुनिंदा शेर प्रस्तुत हैं –

“बदला तो कई बार किताबों का मौसम, मजदूर के माथे का पसीना नहीं बदला।” (देवेंद्र आर्य)

“कोइ समझता ही नहीं दोस्त बेबसी मेरी, महानगर ने चुरा ली है जिंदगी मेरी।” (ज्ञान प्रकाश विवेक)

“सियासत और संसद में अजूबे रोज होते हैं, जरा सा डाँट दे गूँगा, तो बहरा बैठ जाता है।” (बल्ली सिंह चीमा)

“लोक बेचे, तंत्र बेचे, बेच खाया संविधान, वाह दलदल के मसीहा यह तेरी सरकार है।” (श्रीराम मेश्राम)

“जंगल में एक चिड़िया बची है तो बहुत है, वो चीख के खामोशियाँ तो तोड़ रही है।” (हरेराम समीप)

“कहीं तलाक, कहीं अग्नि परीक्षाएँ हैं, आज भी इंद्र है, गौतम है, अहिल्याएँ हैं।” (अशोक अंजुम)

“जिसको पढ़कर ये लगे लोग अभी ज़िंदा हैं, कोई तो ऐसी खबर लाओ कभी अखबारों में।” (बालस्वरूप राही)

““सियासतों में ज़रूरत है झूठ की अक्सर, सच बोलने वाले अकेले पड़ जाते हैं।” (मुनव्वर राणा)

“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।” (बशीर बद्र)

“शाम को जिस वक्त खाली हाथ घर जाता हूँ मैं, मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं।” (राजेश रेड्डी)

“हाथों मे ख़ंजर लेकर आते हैं अब, मज़हब का मतलब हमें समझाने लोग।” (अरुण अर्णव खरे)

मंचीय कविता और व्यंग्य

मंचीय कविता हिंदी साहित्य की एक अत्यंत लोकप्रिय धारा रही है, जिसमें गीत, ग़ज़ल आदि के साथ-साथ हास्य-व्यंग्य कविता का भी विशेष स्थान रहा है। कवि-सम्मेलनों और सार्वजनिक मंचों पर प्रस्तुत होने वाली यह कविता सीधे श्रोताओं से संवाद स्थापित करती रही है, किंतु वर्तमान समय में मंचीय कविता की स्थिति कुछ हद तक चिंताजनक प्रतीत होती है। आज के अनेक मंचीय कवि मंच का उपयोग, हल्की-फुल्की आपसी छींटाकशी, चुटकुलों के माध्यम से त्वरित मनोरंजन तथा सतही हास्य को प्राथमिकता देने में अधिक करते दिखाई देते हैं। परिणामतः उनकी कविताओं से व्यंग्य का गहरा सामाजिक सरोकार धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा है।

एक समय था जब हिंदी कविता के मंच पर हरिवंश राय बच्चन, शिवमंगल सिंह सुमन, भवानी प्रसाद मिश्र, वीरेन्द्र मिश्र, रमानाथ अवस्थी, कन्हैयालाल नंदन, बलबीर सिंह ‘रंग’ और शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जैसे कवियों की सशक्त उपस्थिति हुआ करती थी। इन कवियों की रचनाओं में काव्यात्मकता और साहित्यिक गरिमा स्पष्ट रूप से विद्यमान रहती थी।

व्यंग्य के संदर्भ में मंच से सरोकार युक्त रचनाएँ सुनने को मिलती थीं। उदाहरणार्थ शम्सी मीनाई  की ये पंक्तियाँ देखिए –

“सब कुछ है अपने देश में, रोटी नहीं तो क्या,

वादा लपेट लो, जो लंगोटी नहीं तो क्या।”

इसी प्रकार मुकुट बिहारी सरोज जब “इन्हें प्रणाम करो, ये बड़े महान हैं” या “सचमुच बहुत देर तक सोए” जैसे व्यंग्य-गीत प्रस्तुत करते थे, तो श्रोता चमत्कृत रह जाते थे। काका हाथरसी, गोपाल प्रसाद व्यास और निर्भय हाथरसी के हास्य-व्यंग्य मिश्रित काव्य ने भी मंचीय परंपरा को समृद्ध किया। बाद के वर्षों में शैल चतुर्वेदी, प्रदीप चौबे और ओम व्यास ओम जैसे कवियों ने भी मंच की गरिमा को बनाए रखने का प्रयास किया।

समय के साथ मंचीय कविता का यह गौरवशाली दौर काफी हद तक अतीत का विषय बनता गया। आज जब कवि-सम्मेलनों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई है, तब कई मंचों पर कवियों की अपेक्षा ‘परफ़ॉर्मर्स’ का वर्चस्व अधिक दिखाई देता है, जिससे कविता स्वयं पृष्ठभूमि में चली जाती है। अब मंच पर ऐसे कवि अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं, जिनकी रचनाएँ काव्यात्मक संतुलन, वैचारिक गहराई और व्यंग्य की मारकता, तीनों को एक साथ साध पाती हों। इस प्रकार मंचीय कविता की वर्तमान स्थिति, उसके स्वर्णिम अतीत की तुलना में, अवनति की ओर संकेत करती है। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि हिंदी काव्य-परंपरा के लिए आत्ममंथन का विषय भी है।

इस समूची विवेचना से स्पष्ट होता है कि हिंदी कविता में व्यंग्य एक सतत विकसित होती हुई अभिव्यक्ति है, जो समय, समाज और परिस्थितियों के अनुरूप अपना स्वरूप बदलती रही है। कबीर की निर्भीक और प्रहारात्मक वाणी से आरंभ होकर रीतिकाल की परोक्षता, भारतेंदु युग की सामाजिक जागरूकता, द्विवेदी युग की नैतिक संयमता, छायावाद की सूक्ष्मता और प्रगतिवाद तथा समकालीन कविता की तीव्र यथार्थवादी दृष्टि तक व्यंग्य ने अनेक रूप धारण किए हैं।

यह भी स्पष्ट है कि व्यंग्य का स्वर केवल आलोचनात्मक नहीं, बल्कि रचनात्मक भी है। वह समाज की विसंगतियों को उजागर करने के साथ-साथ सुधार और परिवर्तन की दिशा भी इंगित करता है। आधुनिक समय में, जब सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जटिलताएँ और अधिक बढ़ गई हैं, व्यंग्य की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।

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संदर्भ

हिंदी कवि.इन

हिंदवी

हिंदी कुञ्ज

हिंदी पोयम.ऑर्ग

अभिव्यक्ति ब्लॉग

हिंदी साहित्य.कॉम

अपनी माटी

साहित्यशाला.इन

हस्ताक्षर

रेख्ता.ऑर्ग

अरुण अर्णव खरे, arun arnaw khare

अरुण अर्णव खरे

अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो ​विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।

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