hareram sameep, हरेराम समीप
नियमित ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से....

हरेराम समीप और हिंदी ग़ज़ल में कन्फ़्यूज़न

            ग़ज़ल एक ऐसी सिन्फ़ है, जिसमें शब्दों के रख-रखाव का विशेष महत्व है। शब्दों के स्थान, यहां काव्य की आत्मा की हैसियत रखते हैं। ऐसा नहीं कि स्थान का महत्व दूसरी काव्य विधाओं में नहीं है, मैं फ़क़त यह कहना चाह रहा हूं कि स्थान का महत्व यहां अधिक है। भाषा का थोड़ा-सा असंतुलन भी काव्य की प्राण-वायु खींच सकता है। इस लेख में हम हरेराम समीप जी के माध्यम से यह जानने की कोशिश करेंगे कि समीप जी ने इस संतुलन का अनुपालन कहां तक किया है।

समीप साहब अपने समय के सबसे बड़े संकलनकर्ता माने जाते हैं। बहुत चर्चित संपादक भी हैं। आपकी विशेषता यह है कि आपने चिलगोज़ों तक पर लेख लिखे मारे हैं। चूज़े अंडे से बाहर नहीं निकलते कि आप उन पर लिखने बैठ जाते हैं। कभी-कभी तो अंडे का छिलका आप स्वयं उतारते हैं और जो बचता है उस पर लेख लिखने लगते हैं। यही कारण है कि इन्होंने अपने चारों तरफ़ कचरे का ढेर और बेकार की भीड़ खड़ी कर रखी है। यही भीड़ इन्हें न जाने क्या-क्या सिद्ध करने में लगी रहती है। कभी सबसे बड़ा संपादक, कभी सबसे बड़ा ग़ज़लकार और कभी सबसे बड़ा संकलनकर्ता। हमारे यहां कहते हैं– “हगनी पदनी (man of no worth) बिनिया (hand fan) डोलावे, सतभतरी (courtesan) के सिरे भवानी आवे”। लोकोक्ति का मूल भाव यह है कि कुछ ‘हगनी-पदनी’ टाइप के लोग बेमतलब समीप साहब को बरम बाबा बनाने पर लगे हैं। इससे दोनों को फ़ायदा है ही। ख़ैर… मुझे इन सब बातों से कुछ लेना-देना नहीं। मेरी दिलचस्पी इनकी ग़ज़लगोई में है।

समीप साहब की क़रीब सात-आठ ग़ज़ल पुस्तकें शाया हो चुकी हैं, अतः आपसे संतुलन की अपेक्षा रखना न्यायसंगत भी होगा, तो चलिए इस लेख में समीप साहब की शे’रगोई से दो-चार होते हैं। शे’र देखें:

बाढ़ सूखा अकाल काग़ज़ पर
और हम मालामाल काग़ज़ पर

इस शे’र में रदीफ़ ‘काग़ज़ पर’ एक वक्रोक्ति या व्यंगात्मक उक्ति है, जो यह दर्शा रहा है कि विकास की सारी बातें झूठी या कोरी कल्पना हैं। कहने का अर्थ यह कि जो कुछ भी है, सब सिर्फ़ काग़ज़ पर दिखाया गया है। तो इस बात को ध्यान में रखते हुए हम शेर की तरफ़ चलते हैं। शेर में यह कहा जा रहा है कि बाढ़ सूखा और अकाल जैसी आपदाएं काग़ज़ पर हैं और हम मालामाल भी काग़ज़ पर ही हैं।

थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि हम सचमुच मालामाल नहीं है। हम मूल रूप से ग़रीब हैं, लेकिन काग़ज़ में हमें मालामाल दिखाया गया है, ठीक है, लेकिन समीप साहब का यह कहना कि बाढ़ सूखा और अकाल जैसी आपदाएं काग़ज़ पर हैं, और इस बात के लिए रोनी सूरत बनाना मुझे तर्कसंगत नहीं लग रहा है। क्योंकि अगर आपदाएं वास्तव में नहीं हैं, तो इसमें बुरा क्या है? यह तो बड़ी अच्छी बात है। समीप साहब क्यों चाहते हैं बाढ़, सूखा, और अकाल जैसी आपदाएं वास्तविक रूप में हमारे जीवन में आएं?

hareram sameep, हरेराम समीप

इस पुस्तक की भूमिका में समीप साहब ने स्वयं इस बात को स्वीकारा है कि उन्होंने कई लोगों से इस किताब को जंचवाया है, ऐसे में पहली ग़ज़ल के शे’रों का ही घुटने पर आ जाना प्रश्न खड़ा कर रहा है। इसी को कहते हैं—जैसे उदई वैसे भान न इनके चुनई न उनके कान। सीधा-सा मतलब है, जैसे समीप साहब हैं वैसे ही उनके प्रशंसक। समझ दोनों की क़ाबिले-तारीफ़ है। यहां सूप और चलनी दोनों ज़बरदस्त वक्ता बनकर सामने आये हैं। दोनों का चकचोन्हरापन साफ़ नज़र आ रहा है। इसी ग़ज़ल का एक और शे’र:

ख़ुशियां मिल जाएं तो ज़रा कहना
भेज दे हाल-चाल काग़ज पर

इस शेर को पढ़कर ऐसा लग रहा है कि समीप साहब सिर्फ़ अच्छे दिनों के ही साथी हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो वे क्यों कहते कि हाल-चाल भेजने का काम ख़ुशियां मिलने पर ही करना? ख़ैर, आपने इतने लोगों से किताब जंचवायी है तो कुछ सोचकर ही उन लोगों ने स्वीकृति दी होगी। कभी-कभी समीप साहब मुझे कनफ़्यूज़-से लगते हैं। अब यह देखें:

सोचना भी बंद है और बात करना भी मुहाल
इस समय का यह भयानक हादसा है दोस्तों

इस शेर को पढ़कर एक विचित्र-सी स्थिति बन रही है। क्या समीप जी इस बात से अनजान हैं कि जहाँ सोचने तक पर पाबंदी है, वहां बात करने की छूट नहीं मिल सकती। यह तो ऐसी बात हुई कि कोई कहे रोटी नहीं मिल पा रही है और केक भी नहीं मिल पा रहा है! अपने गांव की एक कहावत और याद आ रही है, माज़रत चाहूंगा कि कहावत भले ही अश्लील लगे लेकिन सार्थक कटाक्ष है। अवध क्षेत्र में गालियों का भी एक विशेष महत्व है, जैसा कि सुधी पाठक जानते ही हैं। कहावत है, “मुँह में दाँत नहीं गाँ** में खंभा”। जहाँ सोचने तक पर पाबंदी है, समीप साहब को कैंडल लाइट डिनर चाहिए। अब पाठक एक और शेर कनफ़्यूज़न वाला शे’र देखें:

आजकल दुःख दर्द चीखें मौत बिखराते हैं ये
खौफ़ के अनुयायियों को आप क्या जानें हुजूर

एक भ्रम समीप जी को बार-बार अपनी गिरफ़्त में ले रहा है। समीप जी को ऐसा क्यों लग रहा है कि ख़ौफ़ के अनुयायी पहले आनंद और सुख बाँटा करते थे? कहने का सीधा अर्थ यह है कि पहले मिसरे में आया ‘आज-कल’ ऐसा ही भ्रम पैदा कर रहा है। ऊपर से दंभ यह कि साहब पाठ्यक्रमों में पढ़ाये जाते हैं। इनके ऊपर पीएच.डी. हो चुकी है। कितना शर्मसार करती होगी इन्हें यह बात। आइए कुछ और भी देखें:

मारने में उसको थोड़ा वक़्त लग सकता है दोस्त
राक्षस इस बार का पहले से ताक़तवर मिला

शेख़ी बघारना तो हिंदी ग़ज़ल की पहली विशेषता है। यह बात इस ब्लॉग के पहले के लेखों में एकाधिक बार उठायी जा चुकी है। विज्ञ पाठक जानते हैं। समीप जी ने भी शेख़ी बघारी है। हिंदी ग़ज़ल की जन्मपत्री भी बड़ी अजीब है। पूरी हिंदी ग़ज़ल के लिए एक बात बड़ी ही सार्थक लगती है कि “जहां जाए दूला रानी वहां पड़े पाथर पानी”, जहां हिंदी ग़ज़ल जाती है वहां ओलापात शुरू हो जाता है। अब यह समस्या स्वयं शुरू हो जाती है या हिंदी ग़ज़ल वाले यह समस्या ज़बरदस्ती, जनकवि बनने के लिए ठूंस देते हैं? कुछ लोग तो समस्याएं इसलिए भी डाल देते हैं कि अपनी प्रशंसा कर सकें यह शे’र भी ठीक वैसा ही है।

अब इस शे’र में समीप जी की बहादुरी देखी जाये। देखते हैं राक्षस को यह कैसे मारते हैं? इस शे’र में इतनी ख़ामियां नज़र आ रही हैं कि कनफ़्यूज़न पीछे छूटता दिख रहा है। मगर पहले कनफ़्यूज़न की ही बात कर लेते हैं। दोनों मिसरे दो अलग-अलग दिशा में जाते दिखायी दे रहे हैं। पहले मिसरे में आया ‘उसको’ और दूसरे मिसरे में आया ‘राक्षस’ यह अनुभूति पैदा नहीं कर पा रहे हैं कि दोनों पदबंध एक ही संज्ञा के लिए आये हैं।

दूसरा भ्रम बताने से पहले यह बता दूं कि इस शे’र में आया ‘राक्षस’ अपने अत्यधिक सपाटपन के कारण अपने आप को मुसीबत के प्रतीक रूप में स्थापित नहीं कर पा रहा, जिसके कारण पूरा शे’र संदर्भहीन लग रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे कोई न कोई राक्षस रोज़ आता है और समीप जी रोज़ ही पटक-पटककर मारते हैं। इस बार का थोड़ा तगड़ा है, इसलिए इस बार थोड़ा ज़्यादा समय लगेगा।

इस तरह के बचकाने शेरों और बचकानी बातों के बाद किसी भी शे’र के बारे में कुछ भी बढ़ा-चढ़ाकर कहना ठीक वैसा ही लगता है जैसे– “अरहरी कऽ टटिया और गुजराती ताला”। ख़ैर आगे बढ़ते हैं। समीप जी शब्दों का तालमेल बैठाने में प्रायः गच्चा खाते ही दिखते हैं मगर फ़ील्डिंग बड़ी अच्छी सजा लेते हैं। देखिए:

ख़ौफ़ बेचा जा रहा बाज़ार में कम दाम पर
क्योंकि ज़ालिम को मुनाफ़े में तबाही चाहिए

पुस्तक के परिचय वाले स्थान पर समीप जी की जितनी बहादुरी दिखायी गयी थी, जितना बड़ा उनके शे’रों को बताया गया था, न तो वह बहादुरी नज़र आ रही है और न ही शे’रों में वह गहराई। क़दम-क़दम पर घिर जाते हैं। इन्ही सब वजहों से यह कहावत आ जाती है कि “अँधरन के दरबार में सब गदहा पंजीरी फाँक रहे हैं”।

जो व्यक्ति विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है, उसका जगह-जगह इस तरह घिर जाना क्या अच्छा लगता है? अब उपर्युक्त शेर को ही देख लें। आज तक हम लोगों ने यही सुना था कि ख़ौफ़ फैलाया जा रहा है। समीप जी वाला ख़ौफ़ कितना ख़ूबसूरत है कि लोग पैसा देकर ख़रीद रहे हैं। चलिए कम दाम में सही, मगर ख़रीद तो रहे हैं। क्या यह बात आपको बचकानी नहीं लग रही?

अगर कोई तबाही चाहता है तो वह अंधाधुंध ख़ौफ़ फैलाएगा या बेचेगा? अजीब-सा बचकानापन है। ज़ालिम को तबाही के अलावा अगर कुछ और चाहिए तो ख़ौफ़ को किस दाम में बेचेगा? कहने का अर्थ यह है कि इस शे’र में न तो कोई बात बन पायी है और न ही कोई मेटाफ़र डेवलप हो पाया है। बस एक भ्रामकता से युक्त तुकबंदी है। हिंदी ग़ज़ल के 50 साल के इतिहास में आप एक भी ऐसा शायर नहीं बता सकते कि जिसने अपना कोई डिक्शन तैयार किया हो। हर जगह एक उछल-कूद ही नज़र आती है। ख़ैर, आगे चलते हैं।

जहां कुछ आग के बच्चे शरारत पर उतारू हैं
वहीं हुक्काम ने बारूद बिछवाने की है ठानी

समीप जी फिर घिर रहे हैं। दूसरे मिसरे में आया ‘वहीं’ एक विशेष तरह की नाराज़गी की ओर संकेत कर रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे शायर यह चाह रहा हो कि बारूद वहां बिछवाया जाये, जहां ‘आग के बच्चे’ न हों। पहले मिसरे में आया ‘आग के बच्चे’ भी ‘आबला-पा’ ‘मय-ओ-साक़ी’ या ‘मयख़ाना’ जैसा मेटाफ़र तो नहीं बना पा रहा है।

एक बार एक ख़बर आयी थी कि समीप साहब की एक पुस्तक को किसी ने चुराकर अपने नाम से छपवा लिया था। मैं तो कहूंगा उस व्यक्ति ने ऐसा करके समीप साहब का कोई नुक़सान नहीं किया, बल्कि एहसान ही किया। उसने समीप साहब को पिछवाड़े के एक फोड़े से बचा लिया। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उनका सारा लेखन पिछवाड़े के फोड़े जैसा ही है। यक़ीन तो हो ही गया होगा, नहीं यह शे’र भी देखें:

समय के ज़ंग खाये पेंच दांतों से नहीं खुलते
समझ भी लो मेरे यारों बग़ावत के नये मानी

यहां असमंजस यह है कि आख़िर कौन-से पेंच दांतों से खुल जाते हैं। दूसरा कन्फ़्यूज़न यह कि इसमें बग़ावत का कौन-सा मानी है? चलिए थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं पुरानी रूढ़ियों को बदलने के लिए एक अदम्य जिजीविषा और जुझारूपन की ज़रूरत है। उन्हें इतनी आसानी से नहीं बदला जा सकता। हमें बग़ावत के नये तरीक़े खोजने होंगे। पर क्या पाठक मान जाएंगे कि यह अंदाज़े-बयां स्वाभाविक है? या इसमें किसी तरह का उलझाव नहीं है? इसी मिज़ाज का एक दूसरा शे’र अल्लामा इक़बाल का है, हालांकि यह तुलना बहुत वाजिब नहीं है, मगर समझने का काम बड़े रचनाकारों के शे’रों से ही किया जा सकता है।

आईन-ए-नौ से डरना तर्ज़ कुहन पे अड़ना
मंज़िल यही कठिन है क़ौमों की ज़िंदगी में

समीप जी के शे’र में इतनी गड़बड़ी आने का कारण यह है कि ‘समय के ज़ंग खाये पेंच’ और ‘दांत’ रूपक नहीं बन पाये हैं। ये बिल्कुल अस्वाभाविक हैं। समीप साहब के शे’रों में इतनी उलझनें है कि उन्हें हिंदी ग़ज़ल में उलझनों का जनक माना जाना चाहिए। थोड़े और पन्ने पलटे जाएं।

कीर्तन ऊंची अज़ानों प्रार्थनाओं का है शोर
आप क्या बहरे हुए हैं पूछिए भगवान से

इस शेर में समीप जी ने कबीर बनने का ड्रामा ज़रूर किया है मगर न तो बे-लौसपन ला पाये हैं न निडरता। समीप जी कबीर की तरह इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाये कि कबीर की तरह ‘सिर्फ़’ अज़ान पर कुछ कह पाएँ या भगवान की जगह अल्लाह से कुछ पूछ सकें। सबको एक साथ लसेड़ दिया है। यह भी देखिए:

सड़ गये हैं फूल इनको अब बदलना है हमें
आ रही दुर्गंध इस जनतंत्र के गुलदान से

यहां भी समीप साहब दुष्यंत बनने के चक्कर में कुछ बारीक बातों को नज़रअंदाज़ कर गये हैं। दुष्यंत का शेर है:

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं

इस शेर में दुष्यंत साहब ने लिखा है ‘फूल कुम्हलाने लगे हैं’, यहां क्रिया अपूर्ण वर्तमान काल में है। अर्थात पानी बदलने का कार्य दुष्यंत तब करना चाह रहे हैं, जब फूल पूरी तरह ख़राब नहीं हुए हैं। समीप जी ने थोड़ा अधिक बहादुरी और उत्साह दिखाने के चक्कर में फूलों को सड़ाकर उसमें से दुर्गंध तक निकाल दी है। यही अस्वाभाविकता हिंदी ग़ज़ल का एक और ऐब बनकर उभरने लगी है। अस्वाभाविक भाषा, अस्वाभाविक प्रतीक, प्रयोग आदि हर जगह एक बनावटीपन। कपड़े जब पुराने होने लगते हैं, तब नया ख़रीदा जाता है। ऐसा कभी नहीं होता कि कपड़ों को पुराना करके फाड़ के सड़ा दो, फिर बिना कपड़े के ही कपड़ा ख़रीदने जाओ। ख़ैर… उलझनें अभी और भी हैं:

जाने कहां गये वो सपने देकर बौनी ख़ामोशी
यादों के धागों में हमको पड़ी पिरोनी ख़ामोशी

मतले में यह बताने की कोई ज़रूरत ही नहीं है कि ‘बौनी’ और ‘पिरोनी’ को हम-क़ाफ़िया मानने के लिए सर के बल खड़े होना भी शायद काफ़ी न हो। हम यहां समीप जी की एक और उलझन पर चर्चा करेंगे। समीप जी ने मतले के ऊला मिसरे में बौनी ख़ामोशी का प्रयोग किया है, सिर्फ़ प्रयोग ही नहीं किया है गहरा असंतोष व्यक्त किया है। यहां मैं यह कहना चाह रहा हूं कि किरदार का बौना होना नकारात्मक अर्थ देता है क्योंकि किरदार को ऊंचा होना चाहिए जबकि इस शेर में ख़ामोशी पहले से ही नकारात्मक अर्थ में आयी है। दूसरे मिसरे तक आने पर शे’र का कोई सेन्स समझ नहीं आता। इस उलझन को मिसरों का बेरब्त होना कहते हैं। सपने बौनी ख़ामोशी देकर चले गये, यादों से ख़ामोशी पिरोनी पड़ रही है… कोई आलोचक अर्थ लादकर ज़रा बताये कि समीप जी आख़िर कहना क्या चाहते हैं?

इस ग़ज़ल में अजीब-अजीब-से शे’र हैं। दूसरे शे’र में ख़ामोशी के पहले शब्द ‘घिनौनी’ उचित लग भी जाये लेकिन इसके बाद ‘अनहोनी ख़ामोशी’ अनुचित, क्योंकि ख़ामोशी में ही अनहोनी का भाव निहित है। बाद का एक और शे’र:

हमने अपने प्यारे रिश्ते भाव-ताव कर बेच दिये
बदले में घर ले आये हैं आधी-पौनी ख़ामोशी

इस शेर में समीर साहब आधी-पौनी ख़ामोशी की बात कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो समीर साहब को पूरी ख़ामोशी न ले आ पाने का दुःख हो रहा है, अपने आप में हास्यास्पद नहीं है! एक और देखिए:

सबकी यही शिकायत है यह क्यों बरपा सन्नाटा आज
लेकिन कोई नहीं चाहता यहां बिलोनी ख़ामोशी

इस पूरी ग़ज़ल में समीप साहब ख़ुद तो कनफ़्यूज़ हैं ही, ख़ामोशी के इतने प्रकार बता दिये हैं कि पाठक भी कनफ़ूज़िया जाएंगे। अब भला ‘बिलोनी ख़ामोशी’ क्या बला है! अभी कहां चल दिये आप, ज़रा रुकिए…

मेरा लेखन बिल्कुल जैसे धरती की हलचल से दूर
चांद जुलाहिन कात रही है पोनी-पोनी ख़ामोशी

इस शेर में कनफ़्यूज़न का आलम यह है कि समीप साहब ने पहले तो चांद को स्त्रीलिंग बना डाला है। कनफ़्यूज़न अगर यूं ही बढ़ता रहा तो समीर साहब मुसीबत में पड़ सकते हैं। इस शे’र में आये ‘पोनी-पोनी’ के भी माई-बाप नज़र नहीं आ रहे। एक और शे’र देखें जिसमें समीर साहब ने ख़ुद से ज़्यादा दूसरे को कनफ़्यूज़ किया है। इन्हें तोप सिद्ध करने वाले लोगों को मैं इस शे’र के माध्यम से बता देना चाहता हूं कि ‘तोपों के दहाने ठंडे हैं’, अब जब तोपों के दहाने ही ठंडे हैं तो बेकार की उछल-कूद से कौन-सा सृजन हो जाएगा! इसी तरह का एब्नाॅर्मल सृजन होगा।

अब आंख की नगरी पर बस नींद का शासन है
पाया है जिसे हमने सपनों की तिजारत में

आश्चर्य और कनफ़्यूज़न की बात यह है कि सपनों के बिक जाने के बाद समीप साहब को नींद कैसे आ गयी! ऐसे में तो नींद उड़ जाती। उलझाने वाला एक और:

आएगा नया मौसम बदलाव को जब लेकर
उठेंगी हवाएं भी पुरज़ोर बग़ावत में

यहां सोचने वाली बात यह है कि बग़ावत बदलाव आने के बाद होगी या बदलाव के पहले! एक ही शे’र में ‘नया मौसम’, ‘बदलाव’, ‘पुरज़ोर बग़ावत’… कमाल है!

हिंदी ग़ज़ल की एक बहुत बड़ी विशेषता इसकी मित्रवत्सलता है। यह मित्रवत्सलता तुलसी बाबा की मित्रवत्सलता से अलग है। तुलसी बाबा उवाच:

जे न मित्र दुख होइ दुखारी
तिनहिं विलोकत पातक भारी

मगर हिंदी ग़ज़ल की मित्रवत्सलता आपको चापलूसी की तरफ़ ले जाती है। सब एक-दूसरे की पीठ सहलाने में लगे हैं। किसी को शायर बनना है, किसी को समीक्षक बनना है। आलोचना की बात आते ही हिंदी के तथाकथित समीक्षक तुलसी बाबा की इस पंक्ति, ‘चलेउ प्रसंग दुराएउ तबहूँ’, को मिस इंटरप्रेट कर लेते हैं। समीप साहब ने अपनी आलोचना पुस्तक ‘समकालीन हिंदी ग़ज़लकार एक अध्ययन’ में जीभ लंबी करने के अलावा और कुछ नहीं किया है। जितना कचरा इन्होंने इकट्ठा किया है, शायद ही किसी ने किया हो। भावनामय लोगों ने भी इतनी चाटम-चाट नहीं की है। ध्यान रहे यह भावना व्यक्तिवाचक नहीं, भाववाचक है।

कितने शर्म और आश्चर्य की बात है कि हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा ‘महाकवि सूरदास’ सम्मान और महाकवि मैथिली शरण गुप्त सम्मान पाने वाला व्यक्ति दो मिसरे लिखने में भी कनफ़्यूज़ हो जाता है। ऐसी स्थिति में हरियाणा साहित्य अकादमी भी प्रश्नों के घेरे में आती दिखती है। ख़ैर, ग़ज़लकारों की आत्ममुग्धता भी इनके भ्रामक रवैये का ही कुपरिणाम है।

इस सिलसिले में मैं एक पुस्तक का ज़िक्र ज़रूर करना चाहूंगा। पुस्तक का नाम है ‘चुने हुए शे’र’ इस पुस्तक में 500 से अधिक शेर हैं। सबके सब चुनिंदा शेर हैं, जहां तक मैं समझता हूं, ग़ालिब मीर, ज़ौक़, फ़िराक़ और दाग़ के पास भी इतने चुनिंदे शेर नहीं होंगे। इसी को कहते हैं- “गगरी दाना शुद्र उतारना”। दो-चार तुकबंदी क्या कर ली पांच सौ चुनिंदा शेर निकल आये। सीधा मतलब यह हुआ कि समीप साहब सदियों में सबसे बड़े रचनाकार हैं। ऐसी स्थिति में पाठक स्वयं निर्णय करें कि इसे क्या कहा जाये। आत्ममुग्धता, कनफ़्यूज़न या बेशर्मी? कुछ चुने हुए शे’र न देखे आपने तो आप अधूरे रह जाएंगे:

विलायत से मुस्कानें आयात करके
तुम्हारी उदासी का उपचार होगा

यह ग़ज़लकार स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जा रहा है। समीप जी को पता होना चाहिए था मुस्कान भाववाचक संज्ञा है, इसका बहुवचन नहीं होता। उदाहरण के तौर पर एक वाक्य देखें। “बच्चों की मुस्कान सबका मन मोह लेती है।” यहां “बच्चों की मुस्कानें” नहीं हुआ। हां! आप कभी-कभी इस तरह के वाक्य देख सकते हैं, “लाखों मुस्कानों के पीछे दर्द छुपा है”। इस वाक्य में ‘मुस्कानों’ बहुवचन नहीं है बल्कि ‘के’ विभक्ति के कारण शब्द का तिर्यक रूप है। और शब्द के बाद इन दो पंक्तियों से कोई अभूतपूर्व अर्थ आप निकाल लें, तो मुझे भी बताइएगा।

यहां तो प्यास भर पानी भी अब सस्ता नहीं आता
मगर अख़बार में इस बात का चर्चा नहीं आता

इस शे’र में त्रासदी यह है कि इतने पुरस्कारों से नवाज़े गये इस रचनाकार का दुःख यह नहीं है कि पानी जैसी प्रकृति प्रदत्त चीज़ बेची जा रही है, बल्कि दु:ख यह है कि पानी महंगा है। यह तो वही बात हुई कि कोई करोड़पति अपना दु:ख व्यक्त करते हुए कह रहा हो कि मेरे बाप ने मेरे लिए फ़रारी नहीं ख़रीदी, मुझे मर्सिडीज़ से स्कूल जाना पड़ता था।

इस शे’र से हिंदी ग़ज़ल में भाषा को लेकर तथाकथित बहस का सिरा भी खुल जाता है। वही हिंदी ग़ज़ल जो उर्दू के शह्र को श-हर बोलने की हामी है, ताज़ा का ताज़ी करने की दलील देती है, उर्दू के पुल्लिंग क़लम को स्त्रीलिंग कलम बनाती है, क्या उस हिंदी ग़ज़ल को ‘चर्चा’ पुल्लिंग शब्द स्वीकार्य है? हिंदी ग़ज़ल के बड़े संकलनकर्ता, संपादनकर्ता, ग़ज़लकर्ता और आलोचनकर्ता, सभी ज़रा गिरेबान में झांकें कि उनके खीसे में कोई सिद्धांत, कसौटी सच में है या सब मौक़ापरस्ती के हिसाब से कुछ भी किये जा रहे हैं!

देखकर रेल के डब्बे बुहारता बचपन
लोग कह देते हैं पांवों पर खड़ा है तो सही

इस शेर में ‘पांवों पर खड़ा है’ क्या बला है? यह तो ज्ञानप्रकाश विवेक जी वाली बात हो गयी कि ‘चावलों के कुछ दाने उठा लाया हूं’। ‘पांव पर खड़ा होना’ तो मुहावरा है, ‘पांवों पर’ क्या होता है? यही होता तुकबंदी के लिए आप भाषा, कथ्य, शिल्प सब कुछ क़ुर्बान करने पर तुल जाते हैं। पहले मिसरे का शब्द क्रम भी इतना उटपटांग है कि सूरदास सम्मान से सम्मानित कवि को ‘आंखों का अंधा नाम नैनसुख’ कहने की नौबत आ जाती है।

सुना है विवेक जी और समीप जी में गहरी मित्रवत्सलता है, अतः एक-दूसरे का प्रभाव पड़ ही सकता है। हमारे गांव में कहावत है– जस मतंग तस पादन घोड़ी, बिधना भली मिलाई जोड़ी। ख़ैर…

आद्योपांत विवेचन के बाद यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि हिंदी ग़ज़ल में इतनी अस्वाभाविकता क्यों है? हिंदी ग़ज़ल की आलोचना का उद्देश्य आख़िर क्या है? क्या किसी रचनाकार की पुस्तकों की संख्या गिनना, उसके सम्मान और पुरस्कारों का उल्लेख करना, उसे पाठ्यक्रमों में शामिल किये जाने (यह जुगाड़ ज़्यादा है) को उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण मान लेना, अथवा रचना के भीतर उतरकर उसकी भाषिक संगति, शिल्पगत संतुलन, प्रतीक विधान, रूपक योजना और कथ्य की प्रामाणिकता की पड़ताल करना आलोचना का दायित्व है?

मेरी दृष्टि में आलोचना का मूल उद्देश्य रचनाकार की प्रतिष्ठा का विस्तार करना नहीं, बल्कि रचना की वास्तविक सामर्थ्य और उसकी सीमाओं को रेखांकित करना है। दुर्भाग्य से हिंदी ग़ज़ल के परिदृश्य में यह दायित्व प्रायः मित्रता, पारस्परिक प्रशंसा और प्रतिष्ठा-निर्माण की गतिविधियों के नीचे दबता दिखायी देता है।

लेख के अंत में दो बातें और स्पष्ट कर दूं। पहली, कि यहां मैंने क़ाफ़िया, तक़ाबुला-रदीफ़ और बहर आदि के संबंध में समीप जी के दोष नहीं गिनाये हैं, इसका मतलब यह नहीं कि उनकी ग़ज़लों में ये दोष नहीं हैं। इनके यहां भी भरमार है। इस ब्लॉग के पिछले लेखों में एकाधिक बार बताया जा चुका है कि हिंदी ग़ज़ल के लगभग सभी कथित चर्चित ग़ज़लकार इस व्याधि से ग्रस्त हैं। और दूसरी, यह कि यह अस्वाभाविकता है, शे’र कहने में कनफ़्यूज़न है, यह सिर्फ़ समीप जी का नहीं बल्कि हिंदी ग़ज़ल के कई ‘प्रतिष्ठितों’ का सिम्पटम है। इसके सबूत भी पिछले लेखों में देख सकते हैं।

दरअसल, प्रतिष्ठा किसी रचना को आलोचना से मुक्त नहीं करती; बल्कि प्रतिष्ठा जितनी बड़ी होती है, रचनात्मक उत्तरदायित्व भी उतना ही बढ़ जाता है, लेकिन समीप साहब की सारी रचनाधर्मिता “ऊंट की चोरी निहुरे निहुरे” लोकोक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है।

इसका कारण यह है कि इन्होंने हर जगह लेखकीय सिद्धांतों से समझौता किया है। इन्हें यश और ऊंचाई तो चाहिए मगर निष्पक्ष होकर नहीं, तीन-पांच करके। इन्होंने बहुत-से ऐसे लोगों पर नहीं लिखा है जिन पर इन्हें ज़रूर लिखना चाहिए था, और बहुत-से ऐसे लोगों पर ज़रूरत से ज़्यादा लिखा है, जिन पर इन्हें लिखना ही नहीं चाहिए था। ख़ैर, अब पाठक ही निर्णय लें कि यह लेखन इनका लेखकीय कपट है या कनफ़्यूज़न?

ज्ञानप्रकाश पांडेय, gyan prakash pandey

ज्ञानप्रकाश पांडेय

1979 में जन्मे, पेशे से शिक्षक ज्ञानप्रकाश को हिन्दी और उर्दू की शायरी में समकालीन तेवरों के लिए जाना जाता है। अमिय-कलश (काव्यसंग्रह), सर्द मौसम की ख़लिश (ग़ज़ल संग्रह), आसमानों को खल रहा हूँ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हैं। कुछ एक प्रतिष्ठित संस्थाओं से नवाज़े जा चुके हैं।

2 comments on “हरेराम समीप और हिंदी ग़ज़ल में कन्फ़्यूज़न”

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