
- April 30, 2026
- आब-ओ-हवा
- 1
शशि खरे की कलम से....
आब-ओ-हवा अर्धशतक पर नाबाद
शब्द साधक, वाग्योद्धा के लिए, प्रबुद्ध समाज को चेताना आवश्यक है कि समकालीन साहित्यिक कर्म, भविष्य के समाज को क्या सौंपेगा!
अतः पत्रिका जगत में कलमसेवी आब-ओ-हवा उस निर्भय, निर्द्वंद्व निर्झरिणी की तरह आयी, जिसका रास्ता अनेक बाधाओं से भरा है किन्तु वह दृढ़ संकल्पित है सत्य को खोजने के लिए।
भाषाओं के साथ ही साहित्य, कला और परिवेश के बीच पुल बनाने के लिए सतत् प्रयत्नशील रहना, हम इसकी दो वर्षों या यों कहें कि 50वें अंक तक आने की अनवरत यात्रा के विभिन्न पड़ावों को देखें तो, सही साबित होता है।
आब-ओ-हवा के कवर चित्र अपने आप में एक पूरे लेख, एक सामयिक रिपोर्ट होते हैं। विषयानुकुल थ्री-डी इफ़ेक्ट जैसे। एक वक़्त था जब लोग धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान, रविवार जैसी पत्रिकाओं को अपनी बैठक में गर्व से रखते थे, वैसी कोई पत्रिका अब नहीं है लेकिन लोगों को प्रतीक्षा रही। एक ऐसी पत्रिका जो जिज्ञासु मन के लिए समाधान जुटाये, साहित्य और वर्तमान परिवेश साथ इतिहास को भी देखे, ललित कलाओं को भी भरपूर स्थान हो, ऐसी पत्रिका की प्रतीक्षा पूरी हुई आब-ओ-हवा से।
स्तरीय पठन सामग्री, रंगमंच, चित्रकला लोककलाओं सहित सिनेमा के साथ महत्वपूर्ण राजनीतिक, सामाजिक घटनाक्रम पर पैनी नज़र… आब-ओ-हवा की पूरी परिभाषा में यह सब कुछ शामिल है।
संपादकीय तो किसी भी पत्रिका का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग होता है। संपादकीय शीर्षक ‘हम बोलेंगे’ आब-ओ-हवा की पहचान बन चुका है…
दुनिया के देशों से साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के पंजों की पकड़ ढीली हुई तो कुछ समय तक, शायद एकाध सदी तक बहुत मुल्कों में प्रजातंत्र की बयार-सी बही। लेकिन सत्ता का ख़ून चखे हुए दिमाग़ों ने फिर से एकल पद, एक व्यक्ति की तानाशाही के कीटाणु हवा में फैला दिये हैं।
दुनिया का प्रत्येक आम आदमी धर्म, जाति, वर्ग, नस्ल यहाँ तक कि राष्ट्रवाद से भी ऊपर उठकर चिल्ला रहा है- युद्ध नहीं चाहिए- जनजन के मन की इस बात को आब-ओ-हवा ने स्थान दिया।

वर्तमान समय में मीडिया पर सख़्ती है, कलम पर दबाव है चुप रहने का। इस माहौल में आब-ओ-हवा ने निडर होकर कहा ‘हम बोलेंगे’, ग़लत नीतियों के ख़िलाफ़… सत्ताधारियों की मनमानी के ख़िलाफ़। आम जनता के पक्ष में, अमन-चैन के पक्ष में, पर्यावरण और धरती को बचाने के पक्ष में हम आवाज़ उठाते रहेंगे। भवेश दिलशाद का संपादकीय आब-ओ-हवा की आत्मा है। इसी साहस ने पत्रिका में निश्चिंत, बेबाक लिखते लेखकों को प्रेरणा दी है।
जिन खोजा तिन पाइयां…
समकाल का गीत विमर्श एवं नवगीत व आलोचना से संबंधित लेख-राजा अवस्थी, तत्वान्वेषण में विवेक रंजन श्रीवास्तव, बियांड द ब्रेन ब्लॉग में ए. जयजीत के लेख उत्कंठा का संवर्धन करते हैं, इन्हें मैं बार-बार पढ़ती हूँ, हर बार एक नया विचार मन में आता है।
ताज़ा उदाहरण लें तो ‘महिलाएंँ काम और शांति’ जैसी जाने कितनी ही किताबों का परिचय यहां मिला और विशेष उल्लेखनीय लेखों की एक लंबी सूची है, जिन्होंने पाठक मन पर गहरी, अमिट छाप छोड़ी है, इनसे स्वाध्याय जैसा सुख मिला है।
हिंदी और उर्दू की मिठास के साथ-साथ विदेशी साहित्य भी आब-ओ-हवा के मारफ़त सुलभ है, जिसे हम श्रीविलास सिंह, निशांत कौशिक और समय-समय पर अन्य लेखकों के ज़रिये प्राप्त करते रहे हैं। पाठकों के बौद्धिक क्षितिज को विस्तार देती हैं ये अनुवाद। सभी क्षेत्रों के गद्य-पद्य का, अनुवादों का यहाँ दिग्दर्शन होना पत्रिका का एक बड़ा हासिल है।
हेल्थ पर डॉक्टर आलोक त्रिपाठी के रूप में वह 70-80 तक मौजूद चिकित्सक धर्म साँसें ले रहा है, जिसके कारण लोग सच्चाई से डॉक्टर को बहुत आदर देते थे। स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं और चिंतनों पर उनके लेख अनुपम हैं।
‘जो है सो है’, ज्ञान प्रकाश पाँडे की निर्भीक किंतु निष्पक्ष समालोचना का खरा स्वर आज के साहित्य जगत में वैक्सीन की तरह अत्यंत अनिवार्य है। ‘क़िस्सागोई’ के बहाने विभिन्न उपन्यासों व कहानी संकलनों आदि पर नमिता सिंह जी की संश्लेषणात्मक एवं अनुभवजन्य दृष्टि न केवल उपयोगी है, बल्कि समीक्ष्य पुस्तक पढ़ने को लालायित करती है। उर्दू किताबों की दुनिया से देवनागरी के पाठकों को जोड़ देते है डॉ. आज़म का कॉलम।
आब-ओ-हवा के लेख पारिभाषिक ज्ञान से अलग हटकर लेखन कर्म की व्यावहारिक सच्चाई बतलाते हैं। अनेक व्यंग्यकारों के हास्य-व्यंग्य के लेख बहुत सराहनीय रहे हैं। इस विधा की परंपरा व स्वरूप को अरुण अर्णव खरे ने शोधपरक बारीकियों से उभारा है, व्यंग्य विधा पर इतना गंभीर विवेचन किया है, वह श्लाघनीय है।
पत्रिका में केवल शब्दों की दुनिया नहीं है, इंद्रधनुषी रंग हैं। विश्व प्रसिद्ध कलाकारों की कृतियों के परिचय की बराबरी से विभिन्न प्रदेशों की लोककला की सौंदाहट बिखेरते लेख हैं।
गहरे पानी पैठ…
आब-ओ-हवा जिसने शुरू से देखा-पढ़ा है, वह यह भी जानता है कि साहित्य और कला जगत के बेहतरीन हस्ताक्षरों के साथ बातचीत, साक्षात्कार इस ब्लॉग आधारित पत्र की एक बड़ी उपलब्धि रहे हैं। अभिनेत्री मीनाक्षी शेषाद्रि हों या मंजरी फडनिस, नृत्यांगना अमिता दत्ता हों या साहित्य-कलाविद प्रयाग शुक्ल या फिर असग़र वजाहत, अवधेश प्रीत व ज़किया मशहदी जैसे लेखक हों और राजेश रेड्डी, चंद्रभान ख़याल जैसे शायर… अनेक हस्ताक्षरों से आब-ओ-हवा लगभग नियमित रूप से रू-ब-रू करवाती रही। और हां, वार्ताओं की इस शृंखला में हमने नीरज, भरत व्यास और अनुपम मिश्र जैसे स्मृतिशेष व्यक्तित्वों की यादगार वार्ताओं का भी लाभ लिया। इतना कुछ है आब-ओ-हवा के एक लिंक पर कि किसका ज़िक्र करें और किसका नहीं! जैसा पिछले अंकों में बताया गया कि इस महज़ एक वर्षीय वेबसाइट पर क़रीब 900 पोस्ट हैं। मुझे यह भी सुखद आश्चर्य होता है कि इतना साहित्य यहां है और उसमें से भी अधिकतर दस्तावेज़ी महत्व का है।
अभी मैं पहले के पूरे पढ़ भी नहीं पाती कि नये-नये विषयों पर चौंकाने वाले, हैरान करने वाले प्रफुल्लित करती जानकारियों के लेख आ जाते हैं। आब-ओ-हवा के 50वें अंक तक के सफ़र में एक पाठक की हैसियत से मैं पूरे समय साथ रही हूँ और इस साथ की प्रेरणा-संगत के प्रभाव से कभी कुछ लिखने का प्रयास भी करती रही हूँ। साहित्यिक साधना की ज्ञान यात्रा का मैंने एक पाठक के रूप में भरपूर आनंद लिया है।
यह पचास अंकों की अविचल यात्रा वैचारिक प्रतिबद्धता संपादकीय कर्मठता, साहित्यिक निष्ठा का प्रमाण है। सभी शब्द-शिल्पियों की इस यात्रा के अगले पड़ाव का इंतज़ार पाठकों को रहता है फ़रहत एहसास के इस अंदाज़ के साथ-
इक रात वो गया था जहांँ बात रोक के
अब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के

शशि खरे
ज्योतिष ने केतु की संगत दी है, जो बेचैन रहता है किसी रहस्य को खोजने में। उसके साथ-साथ मैं भी। केतु के पास मात्र हृदय है जिसकी धड़कनें चार्ज रखने के लिए लिखना पड़ता है। क्या लिखूँ? केतु ढूँढ़ता है तो कहानियाँ बनती हैं, ललित लेख, कभी कविता और डायरी के पन्ने भरते हैं। सपने लिखती हूँ, कौन जाने कभी दुनिया वैसी ही बन जाये जिसके सपने हम सब देखते हैं। यों एक कहानी संकलन प्रकाशित हुआ है। 'रस सिद्धांत परम्परा' पुस्तक एक संपादित शोधग्रंथ है, 'रस' की खोज में ही। बस इतना ही परिचय- "हिल-हिलकर बींधे बयार से कांटे हर पल/नहीं निशाजल, हैं गुलाब पर आंसू छल-छल/झर जाएंगी पुहुप-पंखुरी, गंध उड़ेगी/अजर अमर रह जाएगा जीवन का दलदल।
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1 comment on “आब-ओ-हवा अर्धशतक पर नाबाद”