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21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण ...
पाक्षिक ब्लॉग (भाग-8) मानस की कलम से ....

फिल्म नहीं केस स्टडी है 'कोई मिल गया'

            ‘कोई मिल गया’ को अक्सर भारत की पहली मुख्यधारा साइन्स-फ़िक्शन फ़िल्म माना जाता है। और एलियंस पर बनी दूसरी हिंदी फ़िल्म (पहली फ़िल्म वहां के लोग, 1967 में बनी थी)। इस पर कई विदेशी फ़िल्मों से प्रेरित या कहें कॉपी होने के आरोप भी लगे, लेकिन उन बहसों से इतर एक बात निर्विवाद है: निर्माता-निर्देशक राकेश रोशन (Rakesh Roshan) ने अपनी फ़िल्म की सफलता सुनिश्चित करने के लिए मार्केटिंग और प्रोडक्शन के स्तर पर जितनी रणनीतिक तैयारी की, उसने आगे आने वाले फ़िल्मकारों के लिए एक टेम्पलेट तैयार कर दिया।

राकेश रोशन ने निर्देशक होने के नाते फ़िल्म की रचनात्मक बारीकियों पर ध्यान दिया, लेकिन निर्माता होने के नाते यह भी सुनिश्चित किया कि फ़िल्म व्यावसायिक रूप से अधिकतम लाभ दे। इसका सबसे बड़ा साधन है, ब्रांड इंटीग्रेशन (Product Placement)।
ब्रांड इंटीग्रेशन वह प्रक्रिया है, जिसमें किसी ब्रांड को फ़िल्म, टीवी शो या अन्य विज़ुअल मीडिया की कथा में इस तरह शामिल किया जाता है कि वह कहानी का स्वाभाविक हिस्सा लगे। उदाहरण के लिए जेम्स बॉण्ड (James Bond) का एक ब्रांड विशेष की कार (Aston Martin) चलाना, या किसी शो के किरदारों का किसी विशेष फ़ूड ब्रांड का उपयोग करना।

ब्रांड इंटीग्रेशन केवल विज्ञापन नहीं, मनोवैज्ञानिक रूप से संबद्धता है। ब्रांड इंटीग्रेशन इतना प्रभावी इसलिए है क्योंकि यह पारंपरिक प्रचार के मूलभूत ढांचे से अलग काम करता है। दर्शक प्रोडक्ट नहीं खरीदता, वह अपनत्व या संबद्धता खरीदता है।

इसीलिए अगर कल्पना करें कि शोले में वीरू किसी ख़ास मोटरसाइकिल का इस्तेमाल करता, या शाकाल अपने गंजेपन के लिए किसी ब्रांडेड इलाज या तकनीक का हवाला देता तो वे उत्पाद एकदम से दर्शकीय मन में जाते और जल्द ही सांस्कृतिक स्मृति में दर्ज हो सकते थे। ब्रांड इंटीग्रेशन की ताक़त इसी भावनात्मक विलयन में है।

लेकिन ‘कोई मिल गया’ में राकेश रोशन ने इस तकनीक को सिर्फ़ इस्तेमाल नहीं किया, उन्होंने उसे पूरी तरह एक्स्प्लॉइट किया।

बॉलीवुड के ज़्यादातर निर्देशकों की तरह उन्हें भी फ़िल्म निर्माण में दर्शकों के दिमाग़ से ज़्यादा उनके दिल पर भरोसा है। यह बात उन्होंने उत्पाद एकीकरण के मामले में भी ध्यान में रखी, जब एलियन ‘जादू’ ‘कोको-कोला’ ब्रांड का कोल्ड ड्रिंक पीता है। इसके अलावा फ़िल्म का हीरो बॉर्नवीटा का दीवाना है। वो टैगलाइन के साथ फ़िल्म में अनेक बार बॉर्नवीटा का नाम लेते सुना जाता है। वो हीरो होंडा की टी-शर्ट पहनता है और डायलॉग भी मारता है- “हीरो को होंडा लाओ” (ज़ाहिर है लेखक ने इसे नहीं लिखा होगा क्यूंकि ब्रांड के साथ डील तो स्क्रिप्ट के बाद हुई होगी)।

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एक तरह से फ़िल्म में साफ़ तौर पर ब्रांड की मार्केटिंग हो रही है। लेकिन इसके अलावा कई ब्रांड जैसे, नेस-कैफ़े, एचएसबीसी, सियाराम, संसुई, लेज़ चिप्स इत्यादि की प्लेसमेंट सटल तरीक़े से फ़िल्म के फ़्रेम्स में रखे गये हैं। इन प्लेसमेंट से साफ़ है कि फ़िल्म की लागत का एक बड़ा हिस्सा रणनीतिक ब्रांड साझेदारियों के माध्यम से ऑफ़सेट किया गया था।

कुछ उदाहरणों की बात

प्रोडक्ट प्लेसमेंट की शुरूआती मिसालें हॉलीवुड से मिलती हैं। कहा जाता है पहली बार यह तकनीक विंग्स (Wings-1927) में इस्तेमाल हुई, जहाँ Hershey’s चॉकलेट को प्रमुखता से दिखाया गया।

भारतीय सिनेमा में इसका प्रारंभ 1960 के दशक में माना जाता है, जब शर्मिला टैगोर (Sharmila Tagore) को स्क्रीन पर कोक पीते दिखाया गया।
राजदूत, जो 70 और 80 के दशक की लोकप्रिय बाइकों में से एक थी, को ऋषि कपूर के किर्दार के माध्यम से बॉबी में लॉन्च किया गया था और हाल ही मारुति सुज़ुकी ने ‘बंटी और बबली’ के माध्यम से स्विफ़्ट को लॉन्च किया।

अगर हिंदी सिनेमा में ब्रांड इंटीग्रेशन की बात हो और लव (Love-1991) के गीत “We Are Made For Each Other” का ज़िक्र न आये, तो चर्चा अधूरी ही रहेगी। यह शायद भारतीय फ़िल्म इतिहास का सबसे हास्यास्पद और इसी लिए ही सबसे यादगार उदाहरण है, जहाँ ब्रांड्स केवल फ़्रेम में नहीं दिखाये गये, बल्कि गीत के बोलों में ही पिरो दिये गये। गीत में प्रेम का इज़हार कुछ यूँ होता है कि प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे के लिए “Colgate से दाँत चमकाने,” “Old Spice से महकने,” “Nivea लगाने,” “Vimal की suiting पहनने,” और “Amul श्रीखंड खाने” जैसी कल्पनाएँ करते हैं। यह उत्पादों का प्लेसमेट नहीं, वास्तव में, एक संगीतबद्ध विज्ञापन ही था। आज के समय में यह शायद मीम बन जाये। दिलचस्प बात यह है कि 1991 में, जब ब्रांड इंटीग्रेशन अभी फ़िल्म उद्योग का मानक भी नहीं बना था, लव ने दिखा दिया था कि हिंदी फ़िल्में ब्रांड्स को नैरैटिव के भीतर कितनी दूर तक ले जा सकती हैं।

ब्रांड इंटीग्रेशन की मिसालें

भारतीय फ़िल्म उद्योग विश्व के सबसे बड़े फ़िल्म उद्योगों में से एक है, जहाँ हर वर्ष 1500–2000 फ़िल्में बनती हैं। इतने विशाल कंटेंट इकोसिस्टम में ब्रांड इंटीग्रेशन का उपयोग न करना लगभग व्यावसायिक मूर्खता होगी।

कभी-कभी एक ब्रांड की ताक़त फ़िल्म से भी ज़्यादा होती है। जैसे-एयर इंडिया, लगभग सभी भारतीय फ़िल्मों के लिए एक ही एयरलाइन है। 2003 में आयी फ़िल्म ‘इटैलियन जॉब’ में बीएमडब्ल्यू ने मिनी कारों को फ़िल्म में दिखाने के लिए उन्हें कोई भुगतान नहीं किया, बल्कि उन्होंने उन्हें इस्तेमाल करने के लिए 30 कारें दे दीं।

कहा जाता है टाटा मोटर्स ने ‘ट्रिपलिंग’ के लिए टीवीएफ़ प्रोडक्शन हाउस को एक मिलियन डॉलर का भुगतान किया था। टीवीएफ़ ब्रांड एकीकरण का सबसे समझदारी से यूज़ करने वाला प्रोडक्शन हाउस है। उसने टाटा की टियागो को लगभग चौथे किरदार की तरह बना दिया।

“मेरे डैड की मारुति” के बारे में अलग से क्या ही कहना। चेन्नई एक्सप्रेस में शाहरुख़ ख़ान तो नोकिया लूमिया 920 के सभी फ़ीचर्स के बारे में बताते हुए नज़र आये। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि फ़ोन कितना अच्छा है और इसे फ़िल्म में बख़ूबी शामिल किया।

एक रोचक तथ्य एपल ब्रांड को लेकर है। ब्रांड इंटीग्रेशन में Apple ब्रांड “नो विलेन” क्लॉज़ के अंतर्गत काम करता है। इसके मुताबिक़ Apple अपनी ट्रेडमार्क गाइडलाइंस में कहता है कि प्रोडक्ट्स को पॉज़िटिव तरीक़े से दिखाया जाना चाहिए। डायरेक्टर रियान जॉनसन ने बताया एपल कैमरे पर विलेन को iPhone इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं देता है।

एक फिल्म की दृष्टि और योगदान

लेकिन राकेश रोशन की दृष्टि केवल थर्ड-पार्टी ब्रांड्स तक सीमित नहीं थी।
उनका बड़ा विज़न था— जादू को ब्रांड बनाना। अपना ख़ुद का बौद्धिक संपदा ब्रांड (intellectual property brand) रचना।

वह जानते थे यदि ‘जादू’ बच्चों के बीच लोकप्रिय हो गया, तो फ़िल्म के परे मर्केंडाइज़, खिलौने, ऐसेसरीज़ और लाइसेंसिंग के ज़रिये राजस्व की नयी धारा, नया बाज़ार खुल सकता है। हॉलीवुड में जैसे Frozen या superhero फ्रेंचाइज़ ने बाज़ार का पूरा साम्राज्य बनाया है, उसी मॉडल का भारतीय संस्करण राकेश रोशन ने ‘जादू’ के साथ बनाने की कोशिश की।

दो दशक बाद भी जादू भारतीय पॉप कल्चर के उन काल्पनिक चरित्रों में से एक है, जिन्हें झट से पहचाना जा सकता है। उसकी silhouette, उसकी आवाज़, उसकी शक्ल, सब कुछ आज भी सामूहिक स्मृति में सुरक्षित है। भारत का मुख्यधारा का सिनेमा बहुत कम ऐसे फ़ैंटैसी चरित्र मौलिक रूप से पैदा कर पाया है, जिनकी विज़ुअल रिकॉल इतनी प्रबल हो।

यही ‘कोई मिल गया’ की वास्तविक दूरदर्शिता थी। राकेश रोशन ने इस फ़िल्म को सिर्फ़ एक स्क्रीन उत्पाद की तरह नहीं रचा। उन्होंने इसे कई स्तरों पर मुनाफ़े या वित्तीय प्रवाह वाले मॉडल की तरह समझा यानी:

Box office revenue
Brand integration revenue
Character-based merchandising potential

एक ही फ़िल्म में उन्होंने राजस्व के तीन दरवाज़े खोल दिये। आज यह रणनीति सामान्य लग सकती है। आज फ़िल्में ब्रांड्स के साथ पार्टनरशिप, प्रायोजित कैंपैन, मर्केंडाइज़ ड्रॉप्स और फ़्रेंचाइज़ योजनाओं के साथ रिलीज़ होती हैं। स्टूडियोज़ अब फ़िल्मों को standalone narratives नहीं बल्कि एक असीम विस्तार यानी expandable universes की तरह देखते हैं। लेकिन 2003 में हिंदी सिनेमा उस औद्योगिक शब्दावली तक नहीं पहुँचा था।

‘कोई मिल गया’ ने इस ट्रेंड का आविष्कार नहीं किया, लेकिन उसे भारतीय सिनेमाई मुख्यधारा में अभूतपूर्व ढंग से, स्पष्ट रूप से क्रियान्वित किया। एलियन जादू इतना मशहूर हो गया कि उसके बारे में एक स्पिन-ऑफ़ टीवी सीरीज़ ‘निकलोडियन इंडिया’ पर आयी। इसका नाम था ‘जे बोले तो जादू’।

राकेश रोशन को सिर्फ़ फ़िल्म निर्देशक कहना उनके योगदान को कम करके आंकना होगा। उन्होंने ‘कोई मिल गया’ के माध्यम से यह दिखाया कि एक फ़िल्म सिर्फ़ कहानी नहीं होती, वह एक व्यापारिक इकोसिस्टम भी हो सकती है। इसीलिए ‘कोई मिल गया’ सिर्फ़ एक सफल फ़िल्म नहीं, बल्कि भारतीय फ़िल्म मार्केटिंग और प्रोडक्शन की दुनिया में एक केस स्टडी है।

और ये ट्रिविया भी…

  1. फ़िल्म निर्माताओं ने दो अलग-अलग अंत शूट किये थे। दूसरी एंडिंग में, एलियन सारी पावर्स अपने साथ ले जाता है। रोहित आसमान की तरफ़ देखकर थैंक यू कहता है। लेकिन डायरेक्टर को लगा कि ऑडियंस हैप्पी एंडिंग ज़्यादा पसंद करेगी। इसलिए रोहित को पावर्स वापस मिलने वाली एंडिंग शूट की गयी।
  2. जादू का रोल Indravadan J. Purhohit उर्फ़ ‘छोटे उस्ताद’ ने निभाया है। उन्होंने The Lord of the Rings: The Fellowship of the Ring में भी एक छोटा किरदार किया था। उन्हें बास्केटबॉल मैच के दौरान प्रीति ज़िंटा के पीछे बैठे देखा जा सकता है। हालांकि राकेश रोशन इस बात पर ज़ोर देते रहे कि जादू एक रोबोट है, जिसे सिर्फ़ फ़िल्म के लिए बनाया गया था। जादू के मूवमेंट रिमोट कंट्रोल से होते थे लेकिन यह सब झूठ निकला।
  3. राकेश रोशन ने कसौली शहर के मेयर से ख़ास इजाज़त ली थी, जहाँ फ़िल्म की शूटिंग हुई थी, ताकि जब स्पेसशिप शहर के ऊपर से गुज़रे तो उस सीन को शूट करते समय पूरे शहर की लाइट बंद कर दी जाये।
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मानस

विवेक त्रिपाठी उर्फ़ मानस पूर्व बैंककर्मी हैं लेकिन फ़िल्मों के जुनून ने नौकरी छुड़वायी और फ़िल्में बनाने की दिशा में प्रेरित किया। आधा दर्जन शॉर्ट फ़िल्में बना चुके मानस की कुछ फ़िल्मों को फ़ेस्टिवलों में सराहना व पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म लेखन व निर्देशन के अलावा मानस का एक कहानी संग्रह 'बालकनी' प्रकाशित है। इन दिनों वह पूरी लंबाई की फ़िल्म के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं।

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