
- April 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....
कथारस में सराबोर स्मृतियों के पन्ने
सूरज पालीवाल जी हमारे समय के प्रतिष्ठित आलोचकों में हैं। उन्होंने अपने लेखन की शुरूआत कहानीकार के रूप में की थी। उनके दो कहानी-संग्रह प्रकाशित हैं। मुख्यतः कथा-आलोचना के साथ फणीश्वरनाथ रेणु के कथा साहित्य पर उनका विशेष अध्ययन है।
कुछ समय पहले उनके संस्मरणों पर आधारित पुस्तक ‘नक्शे के मुताबिक’ प्रकाशित हुई है।मेरा हमेशा से ये सोच रहा है कि आत्मकथा लिखना कठिन है क्योंकि यह बेहद ईमानदारी की मांग करता है। मैंने इसका ज़िक्र अपनी संस्मरण पुस्तक ‘समय शिला पर’ में भी किया है। कोई भी देवता नहीं है। हम और हमारे निकटतम सभी मानवोचित कमज़ोरियों के साथ जीते हैं। पारिवारिक जीवन हो या बाह्य जगत, अनेक बार टकराव की स्थितियाँ भी होती हैं।इनके बीच से ही लेखक अपनी रचनात्मकता के सफ़र में आगे बढ़ता है। आत्मश्लाघा और ‘मैं’ से बचते हुए लिखी गयी आत्मकथाएँ अपने समय और सामाजिक इतिहास का दस्तावेज़ बन जाती हैं।
प्रतिष्ठित आलोचक प्रोफ़ेसर सूरज पालीवाल जी ने अपनी पुस्तक ‘मेरे नक्शे के मुताबिक’ में बचपन से लेकर अब तक के संस्मरण पाठकों के लिए प्रस्तुत किये हैं। उनकी जीवन यात्रा के साथ उनके बचपन और छात्र जीवन का सजीव वर्णन प्रभावित करता है। बचपन की स्मृतियाँ अगर भावी जीवन के सपनों की आधार शिला हैं, तो युवा मन की जिज्ञासा और शिक्षा-जगत में मिला वातावरण और वैचारिकी व्यक्तित्व का आधार बन सोच को प्रखरता देते हैं।
‘मेरे अध्यापक-1’ में वह अपने गाँव के शिक्षकों और शिक्षा के माहौल के बारे में विस्तार से लिखते हैं। ये केवल स्मृतियाँ नहीं हैं। ये हमारे हिन्दुस्तान के गाँव-समाज की तस्वीर है और शासन-व्यवस्था की स्थितियों का लेखा-जोखा है। जातिगत सामाजिक ढाँचा और शिक्षा के प्रति व्यवस्थागत उदासीनता ही है कि आज भी मात्र साक्षरता का लक्ष्य ही हम पूरा नहीं कर पाये हैं। हिन्दी राज्यों में यह स्थिति अधिक चिंताजनक है, आंकड़े भले ही कुछ कहते हों। अपने बचपन से लेकर आज इक्कीसवीं सदी तक, वे गाँव का चित्र प्रस्तुत करते हैं-
“अब भी गाँव में सरकारी नौकरी में बहुत कम युवा हैं.. प्राथमिक विद्यालयों के अवकाश प्राप्त अध्यापक… पेंशन लेकर या तो मंदिर में कीर्तन करते हैं या राजनीति में इधर-उधर की बातें… केवल पक्के घर, खड़न्जे, हैंडपंप और मोटर साइकिलों से विकास नहीं होता, यह समझाने वाला गाँव में कोई नहीं।”

दरअसल गाँव तो क्या पूरे देश में कोई नहीं है, जो सामाजिक विकास का सही रूप बता सके। गाँव का एक और संकट पानी का है। दरअसल पोखर, तालाबों पर दबंगों का का कब्ज़ा जहाँ मकान और इमारतें बन गयीं और कुएं सूख गये। कहना न होगा कि यह तस्वीर भी पूरे देश की है। गाँव के प्राथमिक विद्यालय का ज़िक्र करते हुए वह लिखते हैं:
“पढ़ाई सामूहिक थी इसलिए अध्यापक पढ़ाते नहीं थे और विद्यार्थियों को अपनी-अपनी पट्टियों पर लिखने को दे देते थे।”
अब मात्र दो कमरे। एक में कक्षा पाँच के और दूसरे में कक्षा एक से लेकर चार तक के बच्चे। यह स्थिति आज भी वैसी ही है। अब दो या अधिकतम तीन अध्यापक। उन्हें अब मिड डे मील का अतिरिक्त कार्यभार भी मिल गया है।
ग्रामीण जीवन के अनेक चित्रों के साथ यह कथन भी दिलचस्प है, जो उन्होंने लिखा है-“दांतों में ब्रश करने तथा शरीर पर साबुन लगाने की परंपरा उस समय रोज़मर्रा के जीवन में शामिल नहीं थी.. गाँव में केवल शादी-ब्याहों में ही साबुन से नहाने की परंपरा थी। बाक़ी दिनों में तो कुएँ में खड़े होकर बाल्टी भरकर अपने शरीर को गीला करने को ही नहाना माना जाता था।”
सूरज पालीवाल जी कहते हैं कि पहले भी लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जाता था और आज भी गाँव से प्राइमरी कर भी लिया तो आगे पढ़ने के लिए बाहर भेजने की परंपरा नहीं है। मुझे लगता है कमोबेश हिन्दी पट्टी के ग्रामीण जीवन में यह आम चलन है।
सूरज पालीवाल जी के विश्वविद्यालय के संस्मरण भी बहुत दिलचस्प हैं। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अपनी उच्च शिक्षा ग्रहण की और वहाँ के सांस्कृतिक वातावरण तथा सामाजिक जीवन से जीवन मूल्य ग्रहण किये जिसने उन्हें वैचारिक दृष्टि प्रदान की। वे लिखते हैं:
“अलीगढ़ ने मुझे पढ़ना-लिखना सिखाया, अलीगढ़ ने मुझे धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाया, अलीगढ़ ने अपना पक्ष निडर होकर रखने का मंत्र दिया… यदि मैं ए.एम.यू. की जगह धर्म समाज काॅलेज (आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध अलीगढ़ शहर का महाविद्यालय) में पढ़ा होता तो संभवतः वह नहीं होता जो आज हूँ… वह अपनी विशाल उपस्थिति में ज्ञान और धर्मनिरपेक्षता का हिमालय है।”
उन्होने जोधपुर विश्वविद्यालय और फिर महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में, जहाँ वे रहे और विभिन्न पदों पर रहते हुए सेवानिवृत्त हुए, उनका भी विस्तार से वर्णन किया है।इसमें अनेक नामी-गिरामी लेखक और व्यक्तित्व शामिल हैं।
अपने पिता के संबंध में लिखा गया संस्मरण बेहद मार्मिक और संवेदना से भरपूर है। वह न केवल उनके बारे में है बल्कि उस समय के सामाजिक-राजनीतिक वातावरण की भी अंतरंग जानकारी देता है। घर का सामंती परिवेश, संयुक्त परिवार, स्त्री की भूमिका, संतानों के साथ परस्पर संबंध और व्यवहार की छवियाँ बेहद संवेदनशील वातावरण निर्मित करती हैं।
पालीवाल जी के पास क़िस्सों का ख़ज़ाना है। बेहद चुटीली और फुदकती भाषा में लिखे गये ये संस्मरण कथारस से भरपूर हैं। इस ख़ज़ाने के वे सभी हिस्सेदार हैं, जिनके नाम बेहद आत्मीयता से लिये गये हैं।

नमिता सिंह
लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।
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