
- April 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. संजीव की कलम से....
‘ध्वनि’ से शब्द तक पहुँचने की कारीगरी
ध्वनि से अर्थ तक: लेखन की आंतरिक यात्रा का छठा अध्याय… जब लेखन अभिव्यक्त होना पहचानने लगता है, तब वह शब्द की अंतःस्रावी ग्रंथियों में प्रवेश कर पाता है।
लेखन को अक्सर भाषा का कौशल माना जाता है— व्याकरण, शब्द-चयन, शैली, संरचना। पर यदि हम गहराई से देखें तो लेखन भाषा से शुरू नहीं होता। वह ध्वनि से शुरू होता है—उस सूक्ष्म कंपन से जो किसी अनुभव के जन्म के साथ उठता है। शब्द बाद में आते हैं। पहले कुछ काँपता है, फिर वह अर्थ खोजता है।
ध्वनि यहाँ केवल श्रव्य ध्वनि नहीं है। यह उस आंतरिक हलचल का नाम है जो अनुभव के समय पैदा होती है। जब कोई बात हमें छूती है— दुख, प्रेम, विस्मय, अपमान, करुणा— तो भीतर एक कंपन उठता है। वह तुरंत शब्द नहीं बनता। वह पहले संवेदना होता है, फिर ध्वनि-जैसी एक आंतरिक तरंग, और बहुत बाद में शब्द।
लेखन की असली कारीगरी इसी यात्रा को पहचानना है— कंपन से ध्वनि, ध्वनि से संकेत, संकेत से शब्द। जो लेखक सीधे शब्द से शुरू करता है, वह अक्सर सतह पर रह जाता है। जो ध्वनि से शुरू करता है, वह भीतर उतरता है।
‘कारीगरी’ शब्द यहाँ बहुत महत्वपूर्ण है। कारीगर वह होता है, जो पदार्थ की प्रकृति समझता है। कुम्हार मिट्टी की नमी पहचानता है, बढ़ई लकड़ी की नसें। लेखक को ध्वनि की प्रकृति पहचाननी होती है— कौन-सी ध्वनि अभी कच्ची है, कौन-सी परिपक्व, कौन-सी उधार की, कौन-सी अपनी।
अक्सर हम जो लिखते हैं वह हमारी नहीं, सुनी-सुनायी ध्वनियों का शब्दीकरण होता है। समाज की आवाज़ें, किताबों की आवाज़ें, परंपरा की आवाज़ें। यह लेखन बुरा नहीं, पर गहरा नहीं। गहराई वहाँ आती है जहाँ लेखक अपनी ध्वनि सुन लेता है— वह जो भीड़ से अलग है, जो कई बार असुविधाजनक है।
ध्वनि की दुनिया में अर्थ अभी तय नहीं होते। वहाँ अनुभव खुला होता है। जैसे संगीत में एक सुर कई भाव जगा सकता है। शब्द आते ही अर्थ सीमित होने लगते हैं। इसलिए शब्द एक उपलब्धि भी हैं और एक सीमा भी। लेखन की कारीगरी इस सीमा को पहचानना है— शब्द देते हुए भी अनुभव की जीवंतता बचाये रखना।
यहीं दूसरा वाक्य गहराई खोलता है— जब लेखन अभिव्यक्त होना पहचानने लगता है। इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि लेखक समझने लगता है कि अभिव्यक्ति करना और अभिव्यक्ति होना अलग बातें हैं।
अभिव्यक्ति करना एक क्रिया है— मैं कुछ कह रहा हूँ। अभिव्यक्ति होना एक अवस्था है— कुछ मेरे माध्यम से प्रकट हो रहा है।
पहले में नियंत्रण है, दूसरे में समर्पण। पहले में लेखक केंद्र है, दूसरे में अनुभव। जब लेखक अभिव्यक्ति होने देता है, तब शब्द माध्यम बनते हैं, मालिक नहीं।
अब “शब्द की अंतःस्रावी ग्रंथियाँ”— यह एक गहरा रूपक है। जैसे शरीर में अंतःस्रावी ग्रंथियाँ हार्मोन छोड़ती हैं जो पूरे शरीर को प्रभावित करते हैं, वैसे ही शब्दों के भीतर भी सूक्ष्म अर्थ-रसायन होते हैं। एक शब्द सिर्फ़ अर्थ नहीं देता; वह भाव-रसायन भी छोड़ता है। उसका प्रभाव सीधा चेतना पर पड़ सकता है।
कुछ शब्द पढ़ते ही मन शांत होता है। कुछ से बेचैनी। कुछ से स्मृति जागती है। कुछ से प्रतिरोध। यह सिर्फ़ अर्थ का असर नहीं, शब्द-रसायन का असर है।
लेखक जो सिर्फ़ शब्दकोश से शब्द चुनता है, वह अर्थ चुनता है। जो अनुभव से शब्द चुनता है, वह रसायन चुनता है। यही अंतर है सूचनात्मक लेखन और जीवित लेखन में।
शब्द की अंतःस्रावी ग्रंथियों में प्रवेश का अर्थ है— शब्द के भीतर छिपे भाव-रसायन को पहचानना। यह तभी संभव है जब लेखक स्वयं अपनी संवेदनाओं से जुड़ा हो। जो अपनी ही भावनाओं से कटा है, वह शब्दों के रसायन को कैसे पहचानेगा?
यहाँ एक और सूक्ष्म बात है— शब्द का रसायन स्थिर नहीं। वही शब्द अलग संदर्भ में अलग प्रभाव छोड़ सकता है। “घर” किसी के लिए आश्रय है, किसी के लिए बंधन। शब्द का हार्मोन पाठक की स्मृति से मिलकर सक्रिय होता है। लेखक इस पर पूरा नियंत्रण नहीं रख सकता, पर वह उसकी दिशा को महसूस कर सकता है।
लेखन की कारीगरी का एक हिस्सा सुनना है— बाहर का नहीं, भीतर का। जब कोई अनुभव घटता है, क्या हम उसकी ध्वनि सुनते हैं या तुरंत उसे नाम दे देते हैं? नाम देना आसान है। सुनना कठिन। नाम अनुभव को जल्दी बंद कर देता है; सुनना उसे खुला रखता है।
अच्छे लेखक अक्सर धीमे होते हैं— वे तुरंत शब्द नहीं देते। वे अनुभव को पकने देते हैं। जैसे फल को समय चाहिए, वैसे ही ध्वनि को शब्द बनने में समय चाहिए। जल्दी लिखे शब्द कई बार कच्चे होते हैं— उनमें रसायन कम, शोर अधिक होता है।
आज का समय, शोर का समय है। हर कोई कह रहा है, कम लोग सुन रहे हैं। इस शोर में ध्वनि खो जाती है। लेखन तब प्रतिक्रिया बन जाता है, सृजन नहीं। गहरा लेखन शोर से पीछे हटता है। वह ध्वनि खोजता है— वह जो भीड़ में नहीं, भीतर है।
जब लेखक ध्वनि के स्तर पर जीना सीखता है, तो उसके शब्द कम हो सकते हैं, पर असर गहरा होता है। क्योंकि वे शब्द अनुभव से भीगे होते हैं। वे सूखे नहीं, रसयुक्त होते हैं। उनमें जीवन का ताप होता है।
ध्वनि से शब्द तक की यात्रा में एक और पड़ाव है— मौन। ध्वनि और शब्द के बीच मौन है। वहीं जे अर्थ पकता है। यदि लेखक उस मौन को जगह नहीं देता, तो शब्दों में घनत्व नहीं आता। जैसे बिना विराम के संगीत थका देता है, वैसे ही बिना मौन के लेखन भी।
लेखन की उच्चतम कारीगरी यह नहीं कि कितने सुंदर शब्द चुने गये, बल्कि यह कि कितनी सच्ची ध्वनि शब्द तक पहुँच पायी। कई बार साधारण शब्द भी गहरे लगते हैं क्योंकि उनके पीछे सच्ची ध्वनि होती है। और कई बार अलंकृत शब्द भी खोखले लगते हैं क्योंकि वे सिर्फ़ सजावट हैं।
अंततः लेखन ध्वनि को संरक्षित करने की कला है। ध्वनि क्षणिक है; शब्द उसे टिकाते हैं। पर यदि शब्द में वह कंपन जीवित नहीं रहा, तो वह सिर्फ़ खोल है। जीवित लेखन वह है जहाँ शब्द के भीतर अभी भी ध्वनि साँस ले रही हो।
और शायद यही लेखन का रहस्य है— शब्द लिखना नहीं, ध्वनि को शब्द तक सुरक्षित पहुँचाना। कारीगरी यही है। साधना भी यही। जब लेखक इस स्तर पर पहुँचता है, तब उसका लेखन पढ़ा नहीं जाता— महसूस किया जाता है। और महसूस किया गया शब्द ही देर तक जीवित रहता है, क्योंकि अंत में मनुष्य अर्थ से कम, कंपन से अधिक जुड़ता है। वह शब्द नहीं, उनके पीछे की ध्वनि पहचानता है। और वही ध्वनि— यदि सच्ची हो— तो शब्द की अंतःस्रावी ग्रंथियों को सक्रिय कर देती है।
तब एक पंक्ति पूरे मन पर असर डाल सकती है। लेखन तब कारीगरी से आगे बढ़कर रसायन बन जाता है— चेतना का रसायन। और शायद वही साहित्य का गहरा उद्देश्य भी है—चेतना को हल्का-सा बदल देना। ध्वनि से शब्द तक की यह यात्रा बाहर की नहीं, भीतर की यात्रा है। जो इस यात्रा पर चलने को तैयार है, वही लेखन को सिर्फ़ लिखना नहीं, जीना सीखता है।
लेखन सच में “ध्वनि से शब्द तक पहुँचने की कारीगरी” है— जैसे कुम्हार मिट्टी को नहीं, उसकी नमी को गढ़ता है… वैसे ही लेखक शब्दों को नहीं, उनकी ध्वन्यात्मक आत्मा को आकार देता है।
आइए, कुछ शब्दों को “अर्थ” से नहीं, ध्वनि → अनुभूति → अर्थ की यात्रा में खोलते हैं—
- “शून्य” ध्वनि- “शू—न्य”, “शू” में एक फैलाव है— जैसे हवा धीरे-धीरे बाहर जा रही हो, “न्य” में अचानक संकुचन— जैसे सब कुछ सिमट गया। कारीगरी: यह शब्द पहले आपको विस्तार देता है, फिर अचानक ख़ाली कर देता है। “शून्य” का अर्थ ख़ाली नहीं, बल्कि “सब कुछ समेटकर शांत हो जाना” है।
- “स्पंदन” ध्वनि- “स्-पं-द-न”, “स्” एक हल्की शुरूआत, “पं” एक उछाल, “दन” में गिरावट। कारीगरी- पूरा शब्द दिल की धड़कन जैसा है—उठना, गिरना, फिर उठना। यह केवल “कंपन” नहीं, बल्कि जीवन का सबसे पहला संकेत है।
- “अंधकार” ध्वनि- “अं-ध-का-र”, “अं” — एक भारीपन, जैसे कुछ दबा हुआ, “ध” — रुकावट, “का-र” — एक लंबा खिंचाव। कारीगरी- यह शब्द ख़ुद चलते-चलते धीमा हो जाता है—जैसे अंधेरे में चलते समय क़दम भारी हो जाते हैं। अंधकार केवल प्रकाश का अभाव नहीं, बल्कि गति का भी अवरोध है।
- “प्रवाह” ध्वनि “प्र-वा-ह”, “प्र” — एक धक्का, “वा” — फैलती हुई धारा, “ह” — अंत में विलय। कारीगरी- यह शब्द खुद बहता है— और अंत में “ह” पर आकर जैसे हवा में घुल जाता है। प्रवाह का अर्थ केवल चलना नहीं, बल्कि चलते-चलते स्वयं को खो देना है।
- “मौन” ध्वनि “मौ—न”, “मौ” — एक गहरी, गोल ध्वनि (जैसे भीतर उतरना), “न” — एक बंद दरवाज़ा। कारीगरी – शब्द खुद को खोलता है, फिर तुरंत बंद कर देता है। मौन ख़ालीपन नहीं— यह एक ऐसा कक्ष है जहाँ प्रवेश तो होता है, पर बाहर कुछ नहीं आता।
- “विस्मृति” ध्वनि “वि—स्मृ—ति”, “वि” — अलगाव, “स्मृ” — एक जटिल, उलझी ध्वनि, “ति” — अचानक समाप्ति। कारीगरी- यह शब्द ख़ुद को याद करने की कोशिश करता है, और उसी में उलझकर ख़त्म हो जाता है। विस्मृति भूलना नहीं, बल्कि याद रखने की असफल कोशिश है।
- “आह” ध्वनि “आ—ह”, “आ” — खुलना, “ह” — धीरे-धीरे समाप्त होना। कारीगरी- यह शब्द पूरा एक श्वास है— जन्म से मृत्यु तक का एक सूक्ष्म चक्र। “आह” दुख नहीं, बल्कि दुख का शुद्धतम निर्वहन है।
- “राग” ध्वनि “रा—ग”, “रा” — फैलती हुई ध्वनि, “ग” — एक स्थिरता। कारीगरी- पहले फैलाव, फिर टिकाव— यही संगीत का मूल है। राग केवल संगीत नहीं, बल्कि भाव का स्थायी घर है।
- “कंपन” ध्वनि “कं—प—न”, “कं” — भीतर का हिलना, “प” — एक हल्का विस्फोट, “न” — समाप्ति। कारीगरी- यह शब्द खुद कांपता हुआ लगता है—जैसे कोई डर या उत्साह भीतर से बाहर आ रहा हो।
- “अनंत”- ध्वनि “अ—नं—त”, “अ” — शुरूआत, “नं” — गहराई, “त” — अंत। कारीगरी-शब्द “अनंत” ख़ुद एक विरोधाभास है— जिसका नाम ही अंत है, वह अंतहीन को दर्शाता है। अनंत वह नहीं जिसका अंत नहीं, बल्कि वह जो हर अंत में छिपा है।
- जब लेखक लिखता है, तो वह शब्द नहीं चुनता— वह ध्वनि की दिशा चुनता है। “म” से शुरू होने वाले शब्द अधिकतर भीतर ले जाते हैं (मौन, मृत्यु, ममता)।
- “प्र” से शुरू होने वाले शब्द गति देते हैं (प्रवाह, प्रस्थान, प्रलय) “क” में कठोरता है (कठिन, कटु, क्रोध) “आ” में विस्तार है (आकाश, आत्मा, आग)।
- लेखन की असली कारीगरी यह नहीं कि आप क्या कहते हैं— बल्कि यह कि आपकी ध्वनि पाठक के भीतर कौन-सी तरंग पैदा करती है। शब्द केवल नाव हैं, असली यात्रा ध्वनि करती है।
शब्दों की कारीगरी
अब हम सच में “कारीगरी” के स्तर पर चलते हैं— यानी एक ही शब्द को अलग-अलग संदर्भों में रखकर उसकी ध्वनि, अर्थ और चेतना कैसे बदलती है। मैं कुछ शब्द लेता हूँ, और आपको दिखाता हूँ कि लेखक उन्हें कैसे “गढ़ता” है—
- “मौन” —इसकी ऊपर कुछ चर्चा की है। एक ही शब्द, कई अस्तित्व (क) सामान्य प्रयोग- ‘कमरे में गहरा मौन था।’ यहाँ “मौन” केवल स्थिति है—एक सूचना। (ख) भावात्मक प्रयोग ‘उसके शब्द ख़त्म हुए, पर मौन बोलता रहा।’ यहाँ “मौन” एक सक्रिय सत्ता बन गया—ध्वनि से भी अधिक शक्तिशाली। (ग) दार्शनिक प्रयोग- मौन वह है, जहाँ प्रश्न भी अपने उत्तर खो देता है। यहाँ “मौन” एक अवस्था नहीं, अस्तित्व का स्तर बन गया। (घ) सूक्ष्म कारीगरी- उसने कुछ नहीं कहा— और वही सबसे अधिक कहा गया।
- “मौन” शब्द गायब है, पर उसकी ध्वनि पूरी पंक्ति में उपस्थित है।
- “प्रवाह” — गति से अस्तित्व तक। (क) सामान्य- नदी का प्रवाह तेज़ है। केवल भौतिक गति। (ख) काव्यात्मक- विचारों का प्रवाह थमता नहीं। अब यह मानसिक हो गया। (ग) सूक्ष्म – वह इतना बहा कि अंत में स्वयं ही प्रवाह बन गया। यहाँ व्यक्ति और प्रवाह एक हो गये— शब्द ने पहचान बदल दी। (घ) गूढ़ प्रयोग- जहाँ ठहराव पूर्ण होता है, वहीं से असली प्रवाह शुरू होता है। विरोधाभास के माध्यम से गहराई— प्रवाह = ठहराव का परिणाम।
- “शून्य” — ख़ालीपन से सृजन तक। (क) सामान्य- उसके पास शून्य बचा- अभाव। (ख) काव्यात्मक- शून्य में भी एक अजीब-सी गूंज थी। अब शून्य “जीवित” हो गया। (ग) दार्शनिक- शून्य वह नहीं जहाँ कुछ नहीं, बल्कि वह जहाँ सब कुछ होने की संभावना है। शून्य = सृजन का आधार। (घ) सूक्ष्म कारीगरी- उसने सब छोड़ दिया—और पहली बार भर गया, यहां “शून्य” शब्द नहीं है, पर उसकी अनुभूति पूरी तरह उपस्थित है।
- “आह” — पीड़ा से मुक्ति तक। (क) सामान्य। उसने दर्द में एक आह भरी- सीधा अर्थ। (ख) भावात्मक- उसकी आह में वर्षों की चुप्पी थी- “आह” = संचित अनुभव। (ग) सूक्ष्म- एक आह निकली— और भीतर का बोझ हल्का हो गया। “आह” = शुद्धिकरण। (घ) गूढ़ प्रयोग वह मुस्कुराया— जैसे किसी आह ने रूप बदल लिया हो। “आह” और “मुस्कान” एक ही ऊर्जा के रूप बन गये।
- “अंधकार” — अभाव से सृजन तक। (क) सामान्य- कमरे में अंधकार था- केवल प्रकाश का अभाव। (ख) काव्यात्मक- अंधकार ने उसे अपने भीतर समेट लिया। अंधकार = एक जीवित सत्ता। (ग) दार्शनिक- अंधकार वह नहीं जो दिखता नहीं, बल्कि वह जो देखने नहीं देता। दृष्टि का अवरोध (घ) सूक्ष्म- उसने आँखें बंद कीं— और पहली बार देख पाया। अंधकार शब्द अनुपस्थित, पर उसका उच्चतम अर्थ उपस्थित।
सबसे महत्वपूर्ण कारीगरी। अब ध्यान दीजिए—
- शब्द को हटाकर भी उसकी उपस्थिति रखना। सबसे उच्च लेखन वह है, जहाँ शब्द लिखा न हो, पर महसूस हो।
- शब्द को “क्रिया” बना देना। जैसे—“मौन बोलता रहा”। मौन = क्रिया।
- विरोधाभास से गहराई बनाना “ठहराव में प्रवाह है” दिमाग़ रुकता है, अनुभव खुलता है।
- शब्द को पहचान से मुक्त करना- “वह प्रवाह बन गया” शब्द = अस्तित्व
लेखन की असली कारीगरी यह है कि— शब्द वही रहें, पर हर बार उनका “अस्तित्व” बदल जाये।

संजीव कुमार जैन
लंबे समय से साहित्य के स्वाध्याय एवं अध्यापन से जुड़े संजीव शासकीय कन्या महाविद्यालय अर्थात नूतन कॉलेज, भोपाल में हिंदी के सह प्राध्यापक हैं। आपकी अभिरुचि पढ़ना लिखना है लेकिन अधिक प्रकाशन से आप गुरेज़ करते हैं।
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