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डॉ. आक़िब जावेद की कलम से....

युद्ध, बच्चे और हमारी चुप्पी

            जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है
            जंग क्या मसअलों का हल देगी
            -साहिर लुधियानवी

            जब युद्ध होता है, तो सिर्फ़ सीमाएँ नहीं टूटतीं बचपन भी बिखर जाता है। मलबे के बीच बचपन सिर्फ़ एक तस्वीर नहीं, बल्कि हमारी दुनिया की सबसे कड़वी सच्चाइयों में से एक है। बच्चे, जो खिलौनों से खेलते, स्कूल जाते, सपने देखते हैं, वे अचानक धुएँ, गोलियों और डर के बीच जीने लगते हैं। उनके हाथों में किताबों की जगह कभी-कभी मलबे के टुकड़े होते हैं, और आँखों में भविष्य की जगह डर का साया। यह सिर्फ़ शारीरिक नुक़सान नहीं है.. यह उनके मन, उनकी पहचान और उनके पूरे जीवन को प्रभावित करता है।

युद्ध में बच्चे सबसे कमज़ोर होते हैं, लेकिन सबसे ज़्यादा बोझ वही उठाते हैं। वे अपने घर खो देते हैं, माता-पिता खो देते हैं, कई बार अपनी मासूमियत भी। जो आवाज़ें उनके आसपास होनी चाहिए हँसी, खेल, कहानियाँ.. उनकी जगह धमाके और चीखें ले लेती हैं।

दूर देशों में बैठे हम चुपचाप तमाशा देखते रहते हैं, हमारी चुप्पी उनके दर्द को और बढ़ाती है। हम दूर बैठकर ख़बरें देखते हैं, कुछ पल के लिए दुखी होते हैं और फिर अपनी ज़िंदगी में लौट जाते हैं। यह चुप्पी सिर्फ़ अनदेखी नहीं, बल्कि एक तरह की स्वीकृति बन जाती है जैसे हम मान चुके हों कि यह सब “होता रहता है।” लेकिन सवाल यह है क्या यह सच में स्वीकार्य है?

हर बच्चे का अधिकार है सुरक्षित बचपन, शिक्षा और प्यार। जब हम इस अधिकार के हनन पर चुप रहते हैं, तो हम भी कहीं न कहीं इस अन्याय का हिस्सा बन जाते हैं। समाधान आसान नहीं है, लेकिन शुरूआत जागरूकता से होती है, आवाज़ उठाने से, सवाल पूछने से, और उन प्रयासों का समर्थन करने से जो बच्चों को युद्ध के असर से बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

मलबे के बीच भी अगर कोई चीज़ बच सकती है, तो वह है उम्मीद। लेकिन उस उम्मीद को ज़िंदा रखने के लिए सिर्फ़ बच्चों का साहस काफ़ी नहीं, हमारी संवेदनशीलता और हमारी सक्रियता भी उतनी ही ज़रूरी है।

दुनिया, जहाँ सवाल बच्चे पूछते हैं

रात के सन्नाटे में जब बम गिरते हैं, तो सिर्फ़ इमारतें नहीं टूटतीं बचपन भी बिखर जाता है।एक बच्चा जो कभी स्कूल जाने के लिए सुबह जल्दी उठता था, अब वही बच्चा गोलियों की आवाज़ पहचानना सीख जाता है। क्या यह वही दुनिया है, जिसने बच्चों को “भविष्य” कहा था? या यह वह दुनिया है, जिसने अपने भविष्य को युद्ध के हवाले कर दिया है?

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खोजिए तो पता चलता है दुनिया का हर छठा बच्चा किसी न किसी संघर्ष क्षेत्र में जी रहा है। लेकिन असली कहानी आँकड़ों में नहीं है, उन आँखों में है जो अब सपने नहीं देखतीं।बच्चों का दर्द एक अजनबी-सी दुनिया में जी रहा है। बच्चे जो दुनिया देखने का अधिकार रखते हैं, सपने देखते हैं.. वो दुनिया, वो सपने कहीं गुम हो गये हैं।

बच्चे जो देख रहे हैं, वही खेल-खेल में भी जी रहे हैं। हाल ही एक दृश्य सोशल मीडिया पर वायरल रहा है, जब बच्चे कंधे में गुड्डे को रखकर उसकी अंतिम यात्रा निकाल रहे थे। जो बच्चों ने देखा, जिया है, उसी को अपने खेल का हिस्सा बना लिया है। ख़ुद से पूछना होगा कि यह खेल मानवता के संवेदन की अंतिम यात्रा तो नहीं!

ऐसी दुनिया, जहाँ सवाल बच्चे पूछते हैं यह एक कल्पना भी है, और एक चुनौती भी।सोचिए, अगर दुनिया ऐसी हो जहाँ फ़ैसले लेने से पहले बच्चों से पूछा जाये। बच्चों के सवाल सरल होते हैं, लेकिन उनमें एक सीधी नैतिकता होती है बिना राजनीति, बिना स्वार्थ। एक बच्चा युद्ध को “रणनीति” नहीं कहेगा, वह पूछेगा “लोग एक-दूसरे को मार क्यों रहे हैं?”

चिड़िया ने उड़कर कहा मेरा है आकाश
बोला शिकरा डाल से यूँ ही होता काश
-निदा फ़ाज़ली

वह सीमाओं को नक़्शे की लकीरों से नहीं, बल्कि “दोस्त” और “अजनबी” के फ़र्क से देखेगा और शायद उस फ़र्क को भी जल्दी मिटा देगा। ऐसी दुनिया में, शायद हथियारों से पहले शब्द चुने जाते.. बहसें जीतने के लिए नहीं, समझने के लिए होतीं और “ताक़त” का मतलब डराना नहीं, संभालना होता। लेकिन सच्चाई यह है कि हमारी दुनिया में अक्सर बच्चों को जवाब दिये जाते हैं, पूछने का हक़ नहीं। हम उन्हें चुप रहना सिखाते हैं, जबकि शायद हमें उनसे बोलना सीखना चाहिए।

क्योंकि बच्चों के सवाल असहज होते हैं, वे हमारी आदतों, हमारी चुप्पियों और हमारे फ़ैसलों को आईना दिखाते हैं। वे पूछते हैं अगर शांति बेहतर है, तो हम युद्ध क्यों चुनते हैं? अगर प्यार ज़रूरी है, तो नफ़रत इतनी आसान क्यों है? शायद एक बेहतर दुनिया की शुरूआत तब होगी, जब हम बच्चों को सिर्फ़ सुनेंगे नहीं, बल्कि उनके सवालों को गंभीरता से लेंगे।जब हम उनके “क्यों” से बचने की बजाय, उसी “क्यों” के साथ बैठेंगे। क्योंकि कभी-कभी, दुनिया को बदलने के लिए बड़े जवाब नहीं छोटे, सच्चे सवाल ही काफ़ी होते हैं।

चुप्पी चुनना कोई पक्ष हुआ?

युद्ध हमेशा सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता कई बार यह हमारी चुप्पी में भी जारी रहता है। जब हम इन कहानियों को “दूर की समस्या” मान लेते हैं, तो हम अनजाने में उस दुनिया को स्वीकार कर लेते हैं, जहाँ बचपन सुरक्षित नहीं है।

कई बार हम सोचते हैं कि हम तटस्थ हैं न किसी के पक्ष में, न विरोध में। लेकिन सच यह है कि जब अन्याय सामने हो और हम चुप रहें, तो हमारी ख़ामोशी भी एक तरह का चयन बन जाती है।

इतिहास बार-बार दिखाता है कि ख़ामोशी ने अक्सर अन्याय को और मज़बूत किया है। मार्टिन लूथर किंग जूनियर Martin Luther King Jr. ने कहा था:

“In the end, we will remember not the words of our enemies, but the silences of our friends.”

सिर्फ़ एक उद्धरण नहीं, बल्कि चेतावनी है कि निष्क्रियता असर डालती है। हमारी ख़ामोशी कई रूप ले सकती है, नज़रें फेर लेना, “यह हमारा मुद्दा नहीं” कह देना, या यह मान लेना कि कुछ बदल नहीं सकता। लेकिन हर बार जब हम ऐसा करते हैं, तो हम अनजाने में उसी स्थिति को जारी रहने देते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति को बड़े-बड़े क़दम उठाने होंगे। कभी-कभी जागरूक होना, सवाल पूछना, सही जानकारी फैलाना, या मानवीय संवेदनाओं को ज़िंदा रखना ही एक शुरूआत होती है। क्योंकि ख़ामोशी भी एक पक्ष है और सवाल यह है कि हम किस पक्ष में खड़े होना चुनते हैं?

सवाल यह नहीं कि युद्ध कब ख़त्म होगा, सवाल यह है कि तब तक हम बच्चों के लिए क्या कर रहे हैं…

(चित्र परिचय : सूडान के गलाल यूसुफ़ गोलाए रचित पेंटिंग, ट्रायकॉण्टिेनेंटल से साभार।)

आकिब जावेद, aaqib javed

डॉ. आकिब जावेद

बांदा, उत्तर प्रदेश में शिक्षक तथा शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार हेतु सतत प्रयासरत आकिब शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में जुड़े रहे हैं। शिक्षा के साथ ही साहित्य में आपकी उपस्थिति निरंतर है। ग़ज़ल, कविता, कथा तथा बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन एवं संग्रह। देश-विदेश की प्रतिष्ठित साहित्यिक वेबसाइटों एवं मंचों के साथ ही पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाओं का प्रकाशन। साहित्यिक संस्था 'आवाज़-ए-सुख़न-ए-अदब' के संस्थापक और ब्लॉगर। शिक्षा एवं साहित्य दोनों क्षेत्रों में अनेक सम्मान भी प्राप्त। अपने साहित्य को समाज के प्रति सजग दृष्टिकोण, मानवीय संवेदनाओं और जनसरोकारों की प्रतिबद्धता प्रमुख मानते हैं। संपर्क: 9506824464।

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