सिनेमा में व्यंग्य: भारतीय संदर्भ में अध्ययन
पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से....

सिनेमा में व्यंग्य: भारतीय संदर्भ में अध्ययन

       दृश्य-श्रव्य माध्यमों, विशेषतः सिनेमा और टेलीविज़न, में व्यंग्य की भूमिका पर अपेक्षित गंभीर चर्चा प्रायः नहीं हुई है, जबकि ये माध्यम दर्शकों पर सीधा और व्यापक प्रभाव डालते हैं। इस माध्यम की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि साहित्य के पाठकों की तरह फिल्म-दर्शकों का अत्यधिक शिक्षित होना आवश्यक नहीं होता। आशय यह है कि दृश्य-श्रव्य माध्यम का दायरा लिखित साहित्य की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक है।

भारतीय सिनेमा का इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनेक फिल्मों के संवाद, गीत और कथानक जन-स्मृति का स्थाई हिस्सा बन गए हैं। दशकों पहले देखी गई फिल्मों के संवाद आज भी आम बोलचाल में उद्धृत होते हैं। “बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं”, “मुगैंबो खुश हुआ”, “तेरा क्या होगा कालिया”, “मेरे पास माँ है”, “डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है” या “रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं” जैसे संवादों ने लोकप्रियता के नए पैमाने तो रचे ही थे, अपने समय की सामाजिक मानसिकता, नायक-प्रतिमानों और सांस्कृतिक मूल्यों को भी प्रतिबिंबित किया। इन संवादों में प्रत्यक्षतः कोई गूढ़ संदेश न भी हो, तो भी सशक्त अभिनय, सटीक पटकथा और प्रभावी दृश्य-संयोजन ने इन्हें कालजयी बना दिया है। यही कारण है कि सिनेमा, एक दृश्य-श्रव्य कला के रूप में, भावनाओं, विचारों और अंतर्निहित व्यंग्य को अत्यंत प्रभावी ढंग से संप्रेषित करने की विशिष्ट क्षमता रखता है।

भारतीय सिनेमा की अनेक फिल्मों, जैसे मदर इंडिया, दो बीघा ज़मीन, मुग़ल-ए-आज़म, श्री 420, प्यासा, गाइड, आनंद और शोले ने, न केवल कलात्मक ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं, बल्कि सामाजिक अंतर्विरोधों और मानवीय संवेदनाओं को भी उभारा है। इनमें निहित संदेश और वैचारिकी दर्शक को गंभीर चिंतन के लिए प्रेरित करती है। इनके अतिरिक्त, जाने भी दो यारों, गोलमाल, अंदाज़ अपना अपना, पीपली लाइव और वेलकम टू सज्जनपुर जैसी अनेक फिल्में हैं जिनमें हास्य-वयंग्य अपने पूरे सौंदर्यबोध के साथ उपस्थित है और जो व्यवस्था, राजनीति, मीडिया और सामाजिक विडंबनाओं पर तीखा प्रहार करती हैं। यह विडंबना ही कही जाएगी कि फिल्मों में व्यंग्य के तत्वों का सम्यक्‌ और व्यवस्थित आलोचनात्मक मूल्यांकन नहीं के बराबर हुआ है। प्रस्तुत आलेख में हम दृश्य-श्रव्य माध्यमों में व्यंग्य की मारकता और उसकी प्रासंगिकता को समझने का प्रयास करेंगे।

व्यंग्य के प्रमुख आयाम

भारतीय फिल्मों में व्यंग्य मुख्य रूप से तीन रूपों में उभरता है- राजनीतिक, सामजिक एवं दार्शनिक। यहाँ हम इन तीनों शैलियों में सिनेमा में व्यंग्य की उपस्थिति को क्रमवार देखेंगे।

राजनीतिक व्यंग्य

हिंदी सिनेमा में राजनीतिक व्यंग्य का विकास, स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों की आलोचना के रूप में निरंतर दिखाई देता है। सत्ता की विषमताएँ, नेताओं के अमर्यादित आचरण, चुनावी प्रपंच, व्यवस्था की नाकामियों, खोखली देशभक्ति, मीडिया की शाख और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ इसके केंद्र में रही हैं। भारतीय राजनीति का एक बड़ा अंतर्विरोध ‘लोकतंत्र के उत्सव’ और ‘जमीनी हकीकत’ के बीच की खाई में छिपा है। जहाँ सैद्धांतिक रूप से सत्ता की चाबी आम आदमी के हाथ में बताई जाती है, वहीं व्यावहारिक धरातल पर नीतियाँ अक्सर ‘वोट बैंक’ और ‘पूंजीपति वर्ग’ के हितों के इर्द-गिर्द संचालित होती नजर आती हैं। उदाहरण के तौर पर, चुनाव के समय मुफ्त उपहारों की घोषणाएँ और जातिगत समीकरणों का गणित, राष्ट्रीय विकास के मुद्दों पर भारी पड़ता है।

राजनीतिक विसंगतियों और व्यवस्था के खोखलेपन को उघाड़ने वाली कुछ महत्वपूर्ण फिल्में हैं- श्री 420 (1955), आंधी (1975), किस्सा कुर्सी का (1977), जाने भी दो यारों (1983), शूल (1999), नायक (2001), हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी (2005), वेलकम टू सज्जनपुर (2008), वेल डन अब्बा (2009), गुलाल (2009), जेड प्लस (2014), पीपली लाइव (2010), शंघाई (2012), जॉली एल.एल.बी. (2013), जेड प्लस (2014), देख तमाशा देख (2014), न्यूटन (2017), मोहल्ला अस्सी (2018), धमाका (2021), कठल (2023) आदि। इन फिल्मों में सत्ता के विविध और जटिल रूपों पर अलग-अलग कोणों से प्रहार किया गया है।

1955 में प्रदर्शित राज कपूर की फिल्म ‘श्री 420’ में शहरी भ्रष्टाचार, नैतिक पतन और नवस्वतंत्र भारत में उभरती उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों पर तीखा व्यंग्य मिलता है। यह स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के शुरुआती वर्षों की उन महत्वपूर्ण फिल्मों में है, जिनमें सामाजिक यथार्थ के साथ व्यंग्य की प्रभावी अनुगूँज सुनाई देती है। उस समय देश निर्माण की आदर्शवादी आकांक्षाएँ प्रबल थीं, किंतु फिल्म यह दिखाती है कि किस प्रकार शहरी जीवन में अवसरवाद, छल और नैतिक समझौते भी समानांतर रूप से पनप रहे थे। यह द्वंद्व ही इस फिल्म के व्यंग्य को मार्मिक बनाता है।

1975 में प्रदर्शित गुलज़ार निर्देशित ‘आंधी’ राजनीतिक जीवन और निजी जीवन के अंतर्द्वंद्व को संवेदनशीलता साथ प्रस्तुत करती है, जिसमें सूक्ष्म व्यंग्यात्मक दृष्टि भी अंतर्निहित है। फिल्म की नायिका के व्यक्तित्व और बाह्य रूप में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से साम्य देखा गया, जिसके कारण यह व्यापक चर्चा और विवाद का विषय बनी। यद्यपि यह फिल्म प्रत्यक्ष राजनीतिक व्यंग्य नहीं है, फिर भी सत्ता, सार्वजनिक छवि और व्यक्तिगत संबंधों के बीच के तनाव को जिस तरह उकेरा गया है, उसमें एक व्यंग्यात्मक आलोचना स्पष्ट रूप से विद्यमान है।

‘किस्सा कुर्सी का’ (1977) भारतीय सिनेमा की पहली प्रमुख राजनीतिक व्यंग्य फिल्मों में गिनी जाती है, जो अपने निर्माण और प्रदर्शन, दोनों ही स्तरों पर विवादों से घिरी रही। अमृत नाहटा द्वारा निर्देशित इस फिल्म में तत्कालीन सत्ता-व्यवस्था, विशेषतः आपातकाल (1975–77) की राजनीति, पर सीधा और निर्भीक व्यंग्य किया गया था। इसी कारण फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई और इसके प्रिंट तक नष्ट कर दिए गए जो भारतीय सिनेमा के इतिहास की एक अभूतपूर्व घटना मानी जाती है। 1977 में सत्ता परिवर्तन के बाद फिल्म को पुनः निर्मित कर प्रदर्शित किया गया। यह फिल्म भारतीय राजनीतिक व्यंग्य के साहसिक और सशक्त उदाहरण के रूप में आज भी उल्लेखनीय है।

‘जाने भी दो यारो’ लोकतंत्र की उन विसंगतियों को उजागर करती हैं, जहाँ आदर्शवाद की बातें होती हैं लेकिन हकीकत में सत्ता, पैसे और मीडिया की मिलीभगत से सत्य दबा दिया जाता है। यह एक डार्क कॉमेडी है जिसमें दो फोटोग्राफर एक भ्रष्ट बिल्डर और म्युनिसिपल तंत्र की साजिश का पर्दाफाश करने की कोशिश करते हैं, लेकिन अंततः स्वयं ही फँस जाते हैं। फिल्म स्थापित करती है कि व्यवस्था इतनी सड़ चुकी है कि ईमानदार व्यक्ति ही दंडित होता है, जबकि भ्रष्ट तत्व निर्भय बने रहते हैं। व्यंग्य इतना चुभता है कि आज भी प्रासंगिक लगता है। फिल्म में द्रौपदी चीरहरण का सीन प्रतीक है कि कैसे राजनीति और पूंजीवाद मिलकर आम आदमी की गरिमा का हनन करते हैं। ‘मैं आज़ाद हूँ’ (1989) में मीडिया और राजनीति के गठजोड़ पर गहरा तंज दिखाई देता है। यह फिल्म दिखाती है कि किस प्रकार एक काल्पनिक व्यक्ति को मीडिया ‘नायक’ बना देता है और उसके माध्यम से जनमत को प्रभावित किया जाता है।

‘शूल’ (1999) राजनीति और अपराध के गठजोड़ की भयावहता को उजागर करती है। बिहार की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म सत्ता के बाहुबली चेहरे पर तीखा प्रहार है। 1970 के दशक के आपातकाल और नक्सलवाद की पृष्ठभूमि पर बनी ‘हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी’ (2005) में, राजनीतिक आदर्शवाद और क्रांतियाँ कैसे वक्त के साथ समझौतों की भेंट चढ़ जाती हैं, गहराई से चित्रित हुआ है। यह व्यक्तिगत आकांक्षाओं और राजनीतिक उथल-पुथल के द्वंद्व को बखूबी बयां करती है। अनुराग कश्यप की ‘गुलाल’ (2009) छात्र राजनीति, क्षेत्रीय अस्मिता, सत्ता-लालसा और वैचारिक विखंडन पर व्यंग्य है। यह दिखाती है कि किस प्रकार विचारधाराएँ, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के आगे अपना मार्ग बदल लेती हैं। ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ (2008) ग्रामीण स्तर पर व्याप्त जातिवाद, चुनावी नौटंकी और अंधविश्वास को हल्के-फुल्के व्यंग्य के साथ प्रस्तुत करती है। ‘शंघाई’ (2012) फिल्म विकास के नाम पर होने वाले भ्रष्टाचार और विस्थापन की राजनीति को पेश करती है, जहाँ ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर’ के नाम पर आम आदमी को हाशिए पर धकेल दिया जाता है।

हालिया दौर में ‘पीपली लाइव’ (2010) और ‘न्यूटन’ (2017) जैसी फिल्मों ने व्यंग्य को अधिक यथार्थवादी और सूक्ष्म रूप दिया है, जहाँ किसान संकट, चुनावी प्रक्रिया, मीडिया नेता के खेल और प्रशासनिक तंत्र की विडंबनाएँ, बिना अतिनाटकीयता के सामने आती हैं। फिल्म ‘पीपली लाइव’ में एक गरीब किसान की आत्महत्या को राजनीतिक लाभ और मीडिया टीआरपी का तमाशा बना दिया जाता है, वह व्यवस्था की संवेदनहीनता और विसंगति का सजीव चित्रण है। ‘न्यूटन’ चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से लोकतंत्र की जमीनी सच्चाइयों को सामने लाती है, जहाँ एक ईमानदार अधिकारी आदर्श और व्यावहारिक राजनीति के बीच संघर्ष करता है।

राजनीतिक व्यवस्था की खामियों पर व्यंग्यात्मक दृष्टि से निर्मित कुछ अन्य उल्लेखनीय फिल्में हैं – नायक (2001), वेल डन अब्बा (2009), मटरू की बिजली का मंडोला (2013), सारे जहाँ से महंगा (2013), ज़ेड प्लस (2014), जय हो डेमोक्रेसी (2015) और मोहल्ला अस्सी (2018) आदि।

‘नायक’ में नायक एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनकर शासन-व्यवस्था की जड़ता, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं की परतें खोलता है। यह एक प्रकार की व्यंग्यात्मक फैंटेसी है, जो यह संकेत देती है कि “इच्छाशक्ति हो, तो परिवर्तन संभव है, अन्यथा व्यवस्था स्वयं परिवर्तन की राह में सबसे बड़ी बाधा है।” ‘वेल डन अब्बा’ सरकारी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और फाइलों के अंतहीन मकड़जाल पर केंद्रित है। इसमें आम आदमी की बेबसी को हल्के-फुल्के, किंतु प्रभावी व्यंग्य के माध्यम से उभारा गया है।

‘मटरू की बिजली का मंडोला’ भूमि अधिग्रहण, पूँजीवाद और राजनीति के गठजोड़ पर तीखी टिप्पणी करती है। यह फिल्म ग्रामीण जीवन, कॉरपोरेट लालच और सत्ता-तंत्र के अंतर्संबंधों पर रोशनी डालती है। ‘सारे जहाँ से महंगा’ महँगाई, खोखले राजनीतिक वादों और आम आदमी की रोजमर्रा की परेशानियों पर कटाक्ष करती है। ‘ज़ेड प्लस’ आम आदमी को गलती से मिली उच्च स्तरीय सुरक्षा और उसके इर्द-गिर्द पैदा होने वाली राजनीतिक विडंबनाओं को रोचक ढंग से प्रस्तुत करती है। यह सत्ता-तंत्र की अतिरंजित सुरक्षा संस्कृति और दिखावटी गंभीरता पर कटाक्ष करती है। ‘जय हो डेमोक्रेसी’ एक डार्क पॉलिटिकल कॉमेडी है, जिसमें एक छोटे से गाँव में प्रधानमंत्री के आगमन की तैयारी के बहाने स्थानीय राजनीति, सत्ता-प्रदर्शन और लोकतांत्रिक तामझाम पर व्यंग्य किया गया है। काशीनाथ सिंह के प्रसिद्ध उपन्यास “काशी का अस्सी” पर आधारित ‘मोहल्ला अस्सी’ धर्म, राजनीति और वैश्वीकरण के प्रभाव से बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश पर व्यंग्य प्रस्तुत करती है।

2021 में नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई फिल्म ‘धमाका’ मीडिया की नैतिकता, टीआरपी की होड़ और “ब्रेकिंग न्यूज़” संस्कृति पर प्रहार करती है। फिल्म में करियर के संकट से जूझ रहे एक न्यूज़ एंकर को एक आतंकवादी का लाइव कॉल आता है जो मुंबई के सी लिंक को उड़ाने की धमकी देता है। एंकर इस स्थिति को अपने करियर को पुनः स्थापित करने के अवसर के रूप में देखता है और पूरे घटनाक्रम को लाइव कवरेज में बदल देता है। फिल्म व्यंग्य करती है कि कैसे ब्रेकिंग न्यूज मानवीय संवेदनाओं को खत्म कर रही है और लोग मौतों को एक शो की तरह टीवी पर देख रहे होते हैं।

सामाजिक व्यंग्य

राजनीति के बाद हिंदी फिल्म निर्माताओं का दूसरा प्रिय विषय समाज में पैठी विषमताएँ रही हैं। इन विषमताओं में जातिवाद, दहेज, रूढिवादिता, धार्मिक आडंबर, ऊँच-नीच, सामाजिक असमानता जैसे विषय शामिल हैं, जिन पर समय-समय पर अनेक फिल्मों ने सार्थक और प्रभावी टिप्पणी की है।

जाति-व्यवस्था पर प्रभावी कटाक्ष करने वाली शुरुआती फिल्मों में 1936 में प्रदर्शित ‘अछूत कन्या’ का महत्वपूर्ण स्थान है। यह फिल्म प्रत्यक्ष रूप से एक करुण प्रेमकथा लगती है, किंतु इसके भीतर जाति-व्यवस्था पर गहरा व्यंग्य निहित है। एक तथाकथित अछूत लड़की और सवर्ण युवक का प्रेम उसी समाज द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है, जो मानवता और धर्म की दुहाई देता है, किंतु प्रेम और समानता को सबसे पहले नकार देता है। यही नैतिक विरोधाभास फिल्म के व्यंग्य का मूल आधार है। 1953 में प्रदर्शित ‘दो बीघा ज़मीन’ जमींदारी और उभरती पूँजीवादी व्यवस्था पर करारा व्यंग्य प्रस्तुत करती है। एक किसान अपनी जमीन बचाने के लिए शहर में मजदूरी करने को विवश होता है। विडंबना यह है कि विकास और आधुनिकता के नाम पर वही व्यक्ति सबसे अधिक शोषित होता है।

राज कपूर अभिनीत ‘जागते रहो’ (1956) एक रात की कथा है, जो शहरी समाज के पाखंड को उजागर करती है। एक प्यासा, गरीब ग्रामीण व्यक्ति पानी की तलाश में एक अपार्टमेंट में प्रवेश करता है और चोर समझ लिया जाता है, जबकि वहीं रहने वाले तथाकथित सभ्य लोग स्वयं भ्रष्टाचार, पाखंड, अवैध संबंधों और अपराधों में लिप्त दिखाई देते हैं। जो व्यक्ति निर्दोष है, वह अपराधी ठहराया जाता है और जो वास्तव में अपराधी हैं, वे समाज में सम्मानित नागरिक बने रहते हैं। यह उलटबाँसी ही फिल्म का व्यंग्यात्मक औजार है।

सिनेमा में व्यंग्य: भारतीय संदर्भ में अध्ययन

गुरुदत्त की ‘प्यासा’ (1957) साहित्य, बाज़ारवाद और संवेदनहीन समाज पर गहरा व्यंग्य करती है। एक सच्चे कवि को उसके जीवित रहते कोई महत्व नहीं मिलता, किंतु उसकी मृत्यु की अफवाह फैलते ही वही समाज उसे महान घोषित कर देता है। यह गहरी विडंबना ही फिल्म के व्यंग्य का केन्द्रीय तत्व है। उसी वर्ष आई वी. शांताराम की ‘दो आँखें बारह हाथ’ (1957) भारतीय सिनेमा की एक कालजयी कृति है। प्रथम दृष्टि में यह एक सुधारवादी और आदर्शवादी फिल्म लग सकती है, किंतु इसकी गहराई में व्यवस्था, मानवीय स्वभाव और न्याय की अवधारणा पर सूक्ष्म व्यंग्य निहित है। फिल्म का सबसे बड़ा कटाक्ष तत्कालीन जेल-व्यवस्था पर है, जहाँ कठोर दंड और बंदिशें अपराधियों को नहीं सुधार पातीं, वहीं विश्वास और मानवीय व्यवहार उन्हें बदलने की संभावना जगाते हैं। जेलर आदिनाथ का चरित्र भी एक व्यंग्यात्मक प्रतीक है, जो सत्ता का प्रतिनिधि होते हुए दमन के बजाय नैतिकता और विश्वास पर आधारित व्यवस्था की वकालत करता है।

श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ (1974) सामंतवाद और पितृसत्तात्मक समाज के दोहरे मापदंडों पर प्रहार करती है। एक उच्चवर्गीय, शिक्षित जमींदार-पुत्र स्वयं को आधुनिक समझता है, किंतु उसके कर्म शोषणकारी मानसिकता से संचालित होते हैं। यहाँ व्यंग्य उन नैतिक मुखौटों पर है, जिन्हें सत्ता-संपन्न वर्ग अपनी सुविधा के अनुसार पहनता और उतारता है। फिल्म का अंतिम दृश्य, एक बच्चे द्वारा हवेली पर पत्थर फेंकना, पूरी व्यवस्था के विरुद्ध उभरते प्रतिरोध का प्रतीक है। इसी क्रम में श्याम बेनेगल की ही ‘मंडी’ (1983), राजनीति और समाज की नैतिकता के दोहरे मापदंडों को एक कोठे की पृष्ठभूमि के जरिए बखूबी उजागर करती है।

धर्म के नाम पर पाखंड फैलाने वालों और धर्म के ठेकेदारों पर ‘ओएमजी’ (ओह माय गॉड!) (2012) तथा ‘पीके’ (2014) जैसी फिल्में सीधे प्रश्न उठाती हैं। ओएमजी 2 (2023) यौन-शिक्षा के अभाव और सामाजिक संकोच पर न्यायालयीय कथानक के माध्यम से व्यंग्य करती है तथा अंधविश्वासों को चुनौती देती है। ‘जॉली एलएलबी’ (2013) भारतीय न्याय-व्यवस्था की खामियों, पेशेगत नैतिकता और वकालत के व्यवसाय की विडंबनाओं को उजागर करती है, जबकि ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ (2017) खुले में शौच जैसी सामाजिक समस्या के इर्द-गिर्द बुनी गई व्यंग्यात्मक प्रेमकथा है, जो स्वच्छता अभियान और सामाजिक मानसिकता, दोनों पर एक साथ टिप्पणी करती है।

दार्शनिक व्यंग्य

दार्शनिकता भारतीय जनजीवन का अभिन्न अंग रही है, ऐसे में उस पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करना अक्सर लोगों को असहज कर देता है। यही कारण है कि इस विषय पर बहुत अधिक फिल्में नहीं बनीं, लेकिन यह कहना भी ठीक नहीं है कि यह विषय पूरी तरह अछूता रहा है। हिंदी सिनेमा में कुछ ऐसी कृतियाँ अवश्य मिलती हैं, जहाँ जीवन-दर्शन को व्यंग्य, विडंबना और संवेदनात्मक दृष्टि के साथ प्रस्तुत किया गया है।

‘आनंद’ (1971) इस संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय फिल्म है। यह फिल्म जीवन, मृत्यु और मानवीय संबंधों जैसे गहन दार्शनिक प्रश्नों को सरल, संवेदनशील और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है। “ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं” जैसा संवाद एक प्रेरक वाक्य तो है ही, जीवन-दर्शन पर एक सूक्ष्म व्यंग्य भी है, जो आधुनिक मनुष्य की लंबी उम्र की आकांक्षा के बरक्स सार्थक जीवन के प्रश्न को खड़ा करता है। फिल्म का नायक अपनी आसन्न मृत्यु के बावजूद जीवन के प्रति उत्सवधर्मी दृष्टि अपनाता है, जो परंपरागत भय-आधारित जीवन-दृष्टि पर एक प्रभावी व्यंग्य है। इसी क्रम में ‘गाइड’ (1965) का भी उल्लेख आवश्यक है, जहाँ आध्यात्मिकता, आस्था और संतत्व की अवधारणा को जटिल मानवीय संदर्भों में प्रस्तुत किया गया है। एक साधारण मनुष्य का परिस्थितियोंवश गुरु बन जाना और समाज द्वारा उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेना, अपने आप में धार्मिक आस्था और सामाजिक मनोविज्ञान पर गहरा व्यंग्य करता है।

हाल के समय में ‘पीके’ (2014) जैसी फिल्में धर्म, ईश्वर और आस्था से जुड़े प्रश्नों को प्रत्यक्ष व्यंग्य के माध्यम से उठाती हैं। यह फिल्म दिखाती है कि कैसे आस्था के नाम पर निर्मित संरचनाएँ कभी-कभी तर्क और मानवीय संवेदना से दूर हो जाती हैं।

दार्शनिक विषयों पर आधारित इन फिल्मों में व्यंग्य विडंबना और वैचारिक टकराव के रूप में सामने आता है। यह व्यंग्य दर्शक को असहज भी करता है और आत्ममंथन के लिए प्रेरित भी करता है।

चूंकि यह विषय विस्तार की मांग करता है इसलिए अगली कड़ी में हम सिनेमा के व्यंग्य की जो यात्रा रही है, उसकी कालखंड के अनुसार करेंगे और सिनेमाई व्यंग्य की कुछ प्रवृत्तियों की पड़ताल भी हमारा लक्ष्य रहेगा..

अरुण अर्णव खरे, arun arnaw khare

अरुण अर्णव खरे

अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो ​विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।

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