
- April 30, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग चारु शर्मा की कलम से....
पहली फिल्म, जिसके खिलाफ सड़क पर उतरी जनता
नमस्कार साथियो, उम्मीद है आपको विश्व सिनेमा के इतिहास की यह सीरीज़ पसंद आ रही होगी। कोई सुझाव या प्रश्न हैं तो हमें ज़रूर लिखें और साथ ही अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर भेजें। हमें इंतज़ार रहेगा।
जहाँ एक ओर विश्व सिनेमा दुनिया भर में दस्तक दे चुका था, तो दूसरी ओर प्रथम विश्व युद्ध भी अपने अंतिम चरण में था और पूरी दुनिया के तमाम देश एक अजीब-सी असंभावना और टूटन के बीच झूल रहे थे। लेकिन इसी टूटन से एक नयी सिनेमाई शैली जन्म ले रही थी, आम लोगों के दिलों में युद्ध के परिणामों को लेकर उलझन थी, तब सिनेमा ने उनको काफ़ी हद तक सुकून पहुंचाने का काम किया। कभी हँसाकर, कभी विचारों की उत्तेजना बनकर और कभी उम्मीद के तौर पर। अब सिनेमा ने अपनी सीमाएं लांघकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में घुसपैठ शुरू कर दी थी और इसकी वजह थी कि दिमाग़ी तौर पर ताक़तवर लोगों ने इसके माध्यम से अपनी विचारधारा को दुनिया तक पहुंचाना शुरू कर दिया।
1918 में दुनिया टूट रही थी और सिनेमा चुपचाप, उसे जोड़ना सिखा रहा था। इस अंधेरे समय में, सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन नहीं रहा, वह लोगों के लिए सांत्वना, प्रचार और वास्तविकता से पलायन, तीनों बन गया। कहा जाता है सिनेमा समाज का आईना होता है और ये आईना हमेशा ही सजगता से अपना कर्तव्य निभाता रहा है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद सिनेमा की जन्मभूमि यूरोप लगभग खंडहर बन चुकी थी, हज़ारों लोग मारे जा चुके थे, समाज अपने अस्तित्व पर सवाल उठा रहा था और इसका असर वहां के फ़िल्म निर्माण उद्योग पर भी पड़ा था। लेकिन एक ओर यूरोप में सिनेमा कमज़ोर हो रहा था, दूसरी ओर अमेरिकन फ़िल्म उद्योग लगातार परवान चढ़ रहा था।
यूरोपियन सिनेमा की शुरूआत के लिए यूँ तो लूमिएर ब्रदर्स और मेलिएस का ही विशेष उल्लेख (जिन्हें आप पिछले ब्लॉग्स में पढ़ चुके हैं) किया जाता है लेकिन आपको जानकर ताज्जुब होगा कि उसी कड़ी में उस दौर में एक महिला फ़िल्मकार ने भी सिनेमा में पैर जमा लिया था। उनका नाम था ऐलिस गुय ब्लाचे (Alice Guy-Blaché)
ऐलिस का ज़िक्र एक भूली हुई शुरूआत जैसा है, अब इसकी वजह उनका महिला होना था या फिर कुछ और, यह आपको आगे पता चल जाएगा। लेकिन ये बात हम यक़ीन और तथ्यों के आधार पर कह सकते हैं कि वो न सिर्फ़ पहली महिला फ़िल्म निर्देशक थीं बल्कि पहली Narrative Fiction Filmmaker भी थीं।
पेरिस की भीड़ भरी सड़कों से दूर, एक साधारण-सा घर, जहाँ एक बच्ची जन्म लेती है, ऐलिस। उसके पिता ऐमिल गुय किताबों के व्यापारी थे, जिनका काम उन्हें फ्रांस से दूर, चिली तक ले गया। माँ मैरी क्लोटाइल्ड एक सख़्त लेकिन संवेदनशील महिला थीं। ऐलिस का बचपन स्थिर नहीं था… कभी वह चिली में होती, कभी फ्रांस में और कभी बोर्डिंग स्कूल में। ख़ैर ये सिलसिला भी जल्दी ही बदल गया जब उनके पिता का निधन हो गया। यह सिर्फ़ एक व्यक्तिगत क्षति नहीं थी, यह उसके जीवन की दिशा बदलने वाला क्षण था।
अब परिवार पर आर्थिक दबाव था। ऐलिस को जल्दी बड़ा होना पड़ा और कमाने के लिए बाहर निकलना पड़ा। इतिहास की मानें तो उनका परिवार काफ़ी बड़ा था और उनके भाई, बहन भी थे लेकिन उनके बारे में कोई विशेष तथ्य मौजूद नहीं हैं। मान सकते हैं एक भरे-पूरे परिवार के होते हुए भी ऐलिस अकेली ही थीं, अपनी ज़िम्मेदारियों के साथ।
पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने शॉर्टहैंड और टाइपिंग सीखी। नौकरी करना ज़रूरत थी और इसी ज़रूरत ने उन्हें Gaumont के ऑफ़िस में पहुंचाया, जहाँ से उनकी सिनेमाई यात्रा शुरू हुई। Gaumont 1895 में खुली एक फ्रेंच फ़िल्म और टेलीविज़न प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी थी, जिसका मुख्यालय Neuilly-sur-Seine, पेरिस में था। Gaumont आज भी एक सक्रिय कंपनी है और इतिहास की सबसे पुरानी फ़िल्म कंपनियों में गिनी जाती है।
ऐलिस की पहली फिल्म का जन्म
पेरिस की एक सुबह थी— शांत, साधारण, और बिल्कुल वैसी, जैसी उस समय की ज़िंदगियाँ हुआ करती थीं। एक युवा लड़की, कागज़ों और फाइलों के बीच बैठी, अपने काम में लगी हुई थी। उसका नाम था ऐलिस। वह कोई कलाकार नहीं थी। कोई निर्देशक नहीं। वह बस एक सचिव थी, सहायक, काम करती थी Gaumont में। लेकिन उसके आसपास कुछ असाधारण हो रहा था।

लोग एक नयी मशीन के बारे में बात कर रहे थे— एक ऐसा यंत्र जो समय को क़ैद कर सकता था। बाहर, दुनिया बदल रही थी। लूमिएर ब्रदर्स ने लोगों को दिखा दिया था कि ज़िंदगी को स्क्रीन पर उतारा जा सकता है और मेलिएस ने साबित कर दिया था कि उसी स्क्रीन पर सपने भी रचे जा सकते हैं।
ऐलिस चुपचाप यह सब देख रही थी। एक दिन, उसने सोचा—
“अगर हम जीवन दिखा सकते हैं… और जादू बना सकते हैं… तो क्या हम एक कहानी नहीं कह सकते?”
यह सवाल साधारण नहीं था। यह सिनेमा के भविष्य का सवाल था।
वह अपने बॉस, लिएन गॉमोंट के पास गयी। थोड़ा संकोच, थोड़ा साहस— और उसने कहा कि वह एक फ़िल्म बनाना चाहती है। शायद उन्हें भी अंदाज़ा नहीं था कि वे किसे अनुमति दे रहे हैं।
ऐलिस पढ़ी-लिखी थी, किताबों से जुड़ी थी, लोककथाएँ जानती थी। उसके पिता किताबों के व्यापारी थे— कहानियाँ उसके जीवन का हिस्सा थीं। उस समय एक महिला का यह कहना कि वह फ़िल्म बनाएगी— यह अपने आप में असाधारण था। फिर भी, ऐलिस ने हिम्मत की। उनके बॉस ने तुरंत “हाँ” नहीं कहा। लेकिन उन्होंने उसे रोका भी नहीं। उन्होंने एक शर्त रखी, “तुम अपना ऑफ़िस का काम प्रभावित नहीं करोगी।” यह अनुमति छोटी थी लेकिन इतिहास के लिए बहुत बड़ी।
अब सवाल था… कैसे? उस समय कोई तैयार फ़िल्म क्रू नहीं होता था। सब कुछ नया था। ऐलिस ने वहां उपलब्ध कैमरा का इस्तेमाल किया, स्टूडियो या खुले बग़ीचे जैसे लोकेशन लिए, कुछ साधारण अभिनेता (मित्र, सहयोगी) लिये, कोई बड़ी टीम नहीं थी, यह एक छोटा-सा, प्रयोग करने भर के लिए सेटअप था। कह सकते हैं— यह पैशन प्रोजेक्ट था, न कि पेशेवर फ़िल्म निर्माण।
इस फ़िल्म की सबसे दिलचस्प बात थी कि कोई बजट नहीं था, बस संसाधन से यह फ़िल्म बनी। यही इसकी ताक़त भी थी बिना बड़े पैसे के, एक नयी सोच जन्म ले रही थी। उस समय महिलाओं से अपेक्षा थी कि वे ‘स्थायी’ काम करें और फ़िल्म बनाना कोई स्थापित पेशा नहीं था इसलिए परिवार को यह जोखम लगा लेकिन ऐलिस ने किसी की मंज़ूरी का इंतज़ार नहीं किया और आगे बढ़ीं।
और फिर, 1896 में उन्होंने ‘La Fée aux Choux’ नाम से एक फ़िक्शन फ़िल्म बनायी, जिसमें एक छोटा-सा बग़ीचा, कुछ गोभी के पौधे और उनमें से निकलते बच्चे। कोई भव्यता नहीं थी बस इरादा था। पहली बार, कैमरा सिर्फ़ देख नहीं रहा था, वह कल्पना को जीवित कर रहा था।
ऐलिस ने सिनेमा को पहली बार एक “पूरी कहानी” के रूप में देखना शुरू किया। उनकी शुरूआती फ़िल्म La Fée aux Choux को अक्सर दुनिया की पहली नैरैटिव फ़िल्मों में गिना जाता है। यह छोटी-सी फ़िल्म थी, लेकिन इसमें एक संरचना थी, एक शुरूआत, एक घटना, और एक अंत।
धीरे-धीरे, उन्होंने कैमरे को सिर्फ़ रिकॉर्ड करने या चमत्कार दिखाने का साधन नहीं रहने दिया— उन्होंने उसे कहानी सुनाने का माध्यम बना दिया। और यह सब उस समय हो रहा था जब सिनेमा अभी ख़ुद को समझ ही रहा था। उस एक क़दम के बाद, ऐलिस रुकी नहीं। धीरे-धीरे, वही लड़की जो एक डेस्क के पीछे बैठती थी, अब स्टूडियो के केंद्र में खड़ी थी। वह फ़िल्में बना रही थी— एक के बाद एक। कॉमेडी, ड्रामा, फ़ैंटेसी— हर शैली में, हर प्रयोग में। वह सिर्फ़ निर्देशक नहीं थी— वह सिनेमा को समझ रही थी, उसे आकार दे रही थी। उस समय, जब दुनिया महिलाओं को इस जगह पर देखने की आदी नहीं थी, ऐलिस कैमरे के पीछे खड़ी थी— निर्देशन कर रही थी, निर्णय ले रही थी, एक पूरी इंडस्ट्री को प्रभावित कर रही थी।
यह फ़िल्म लगभग 30 सेकंड से 1 मिनट के बीच की अवधि की थी। यूँ तो La Fée aux Choux की कोई एक आधिकारिक प्रीमियर तिथि दर्ज नहीं है, लेकिन इसे 1896–1897 के दौरान Gaumont system के तहत दिखाया गया। La Fée aux Choux के बाद जो हुआ, वह सिर्फ़ एक फ़िल्म की सफलता नहीं थी, वह एक करियर का जन्म था।
उस दिन तक ऐलिस एक सेक्रेटरी थी, लेकिन उस फ़िल्म के बाद, Gaumont के भीतर उसकी पहचान बदलने लगी। शुरूआत में यह बदलाव धीमा था। उसे कोई बड़ा पद तुरंत नहीं मिला, लेकिन उसे एक चीज़ मिल गयी— विश्वास। Gaumont ने समझ लिया कि यह लड़की सिर्फ़ काग़ज़ संभालने के लिए नहीं है। वह कैमरे को समझती है और उससे कुछ नया कर सकती है। धीरे-धीरे, Alice को और फ़िल्में बनाने की अनुमति मिलने लगी। वह अब सिर्फ़ “प्रयोग” नहीं कर रही थी। नियमित फ़िल्में बना रही थी। और यहीं से, उसका असली सफ़र शुरू होता है।
ऐलिस की सिनेमाई विरासत
जैसे-जैसे Gaumont की फ़िल्म कंपनी बढ़ने लगी, वैसे-वैसे ऐलिस की भूमिका भी बढ़ती गयी। वह स्क्रिप्ट सोचती थी, अभिनेताओं को समझाती थी, शूट्स का प्रबंधन करती थी और धीरे-धीरे वह कंपनी की निर्माण प्रमुख बन गयी। यह एक असाधारण बात थी, ख़ासकर उस दौर में— जब फ़िल्म इंडस्ट्री में महिलाएँ लगभग न के बराबर थीं। अब वह सिर्फ़ निर्देशक नहीं थी, एक पूरा सिस्टम चला रही थी।
ऐलिस ने बहुत-सी फ़िल्में बनायीं और हर फ़िल्म में कुछ नया करने की कोशिश की। La Esmeralda – Victor Hugo की कहानी पर आधारित एक फ़िल्म। यह उसकी बड़े निर्माणों में से एक था। परिधान, मंचन और ड्रामाई स्टोरी टेलिंग के साथ, यहाँ सिनेमा थिएटर जैसा नहीं, बल्कि सिनेमैटिक बनने लगा था।
1900 के दशक की शुरूआत में, ऐलिस ने Gaumont के Chronophone system के साथ काम किया। यह synchronized sound का शुरूआती प्रयोग था। इन शॉर्ट म्यूज़िकल फ़िल्मों में गायक ही अभिनय करते थे और आवाज़ को रिकॉर्ड कर synchronize किया जाता था। यह साउंड सिनेमा का बहुत शुरूआती रूप था, talkies फ़िल्मों से दशकों पहले।
Madame’s Cravings एक गर्भवती महिला की अजीब ललक की कहानी। यह कॉमेडी थी लेकिन इसमें सामाजिक अवलोकन भी था। यह दिखाता है कि ऐलिस सिर्फ़ फ़ैंटेसी नहीं वास्तविक व्यवहार को भी एक्स्प्लोर कर रही थीं।
A Fool and His Money, यह फ़िल्म ख़ास इसलिए है क्योंकि इसमें सभी अभिनेता अफ़्रीकी-अमेरिकी थे। उस समय के हिसाब से यह बहुत प्रगतिशील क़दम था। ऐलिस की फ़िल्मों में महिलाएँ केंद्र में होती थीं और रोज़मर्रा की ज़िंदगी को कहानी बनाया जाता था। वह सिर्फ़ फ़िल्मकार नहीं थी, जीवन की एक सघन प्रेक्षक थीं।
जिस लड़की ने कभी एक नौकरी के लिए दरवाज़ा खटखटाया था, आज वो सिनेमा की दुनिया में नये-नये दरवाजे खोल रही थी। ऐलिस ने अपने करियर (लगभग 1896–1920) में 1000 से अधिक फ़िल्मों का निर्माण किया, जिनमें मुख्य रूप से उन्होंने, निर्माता, निर्देशक और लेखन का कार्य संभाला लेकिन वर्त्तमान में उनकी कुल फ़िल्मों में से केवल 100-150 ही बची हैं और क़रीब 80 से 90 प्रतिशत फिल्में ़इतिहास के पन्नों में खो चुकी हैं। जो बची हैं, वे अलग-अलग आर्काइव्स में रखी गयी हैं: विशेषकर Gaumont archives और यूरोपीय फ़िल्म आर्काइव्स में।

एक छोटी-सी लव स्टोरी
उन्नीसवीं सदी की शुरूआत का यह वो समय था, जब ऐलिस की ज़िंदगी में उनके प्यार ने दस्तक दी। पेरिस के Gaumont स्टूडियो में, यहीं इसी दुनिया में, उसकी मुलाक़ात हुई एक ऐसे शख़्स से, जो उसके जीवन का हिस्सा बनने वाला था- हर्बर्ट ब्लाचे Herbert Blaché। हर्बर्ट एक कैमरा ऑपरेटर की तरह काम करता था और कैमरा की तकनीक में माहिर, एक शांत स्वभाव का व्यक्ति था। शुरू में, यह कोई प्रेम कहानी नहीं थी। यह एक कामकाजी रिश्ता था- ऐलिस शॉट सेट करती और हर्बर्ट कैमरा संभालते। दोनों एक ही फ्रेम को अलग-अलग नज़र से देखते। धीरे-धीरे, इन नज़रों में एक समझ आने लगी और उसी समझ में, एक रिश्ता जन्म लेने लगा।
हर्बर्ट फ्रांस से था और शुरूआती सिनेमा के उन लोगों में से, जो “कला” से पहले “तकनीक” को समझते थे। हर्बर्ट की कहानी बहुत लाउड नहीं थी। वह उन लोगों में से थे जो स्पॉटलाइट में नहीं होते, लेकिन जिनके बिना स्पॉटलाइन बनता भी नहीं।
इतिहास हमें शब्द नहीं देता, लेकिन परिस्थितियाँ हमें दृश्य देती हैं। कैसा रहा होगा उनका प्रेम प्रस्ताव। वैसे तो इसका कोई प्रमाण और तारीख़ नहीं मिलती लेकिन इतिहास की परिकल्पना के चलते उनके रिश्ते की शुरूआत कुछ यूँ हुई कि एक शूट ख़त्म हुआ, स्टूडियो ख़ाली हो रहा था, लाइट्स धीमी, हर्बर्ट सामने आते हैं- …कोई भव्य भंगिमा नहीं—बस एक सादा-सा प्रस्ताव, शायद काम की बातों के बीच। एक साथ भविष्य की बात करते हुए। उस दौर में प्रस्ताव आज की तरह ड्रामाई नहीं होते थे, वे ज़्यादा व्यावहारिक और सीधी बातचीत होते थे। बस इसके बाद दोनों ने 1907 में शादी कर ली। यह सिर्फ़ प्यार नहीं था, एक रचनात्मक संबद्धता भी था। ऐलिस के विज़न, निर्देशन और हर्बर्ट के कैमरा, क्रियान्वयन का समागम।
एलिस और हर्बर्ट अब सिर्फ़ साथ काम करने वाले नहीं थे, बल्कि जीवन-साथी थे। और यहीं से शुरू होती है एक ऐसी कहानी, जहाँ प्यार, काम, महत्वाकांक्षा… सब एक ही फ्रेम में आ जाते हैं। दोनों ने मिलकर आगे का रास्ता चुना— शादी के तुरंत बाद, दोनों एक बड़ा फ़ैसला लेते हैं— फ्रांस छोड़कर अमेरिका जाना। हर्बर्ट को Gaumont की तरफ़ से अमेरिका में आपरैशन्स संभालने का मौक़ा मिलता है। ऐलिस भी साथ जाती है। यह सिर्फ़ स्थान परिवर्तन नहीं था, एक नयी ज़िंदगी की शुरूआत थी।
1908 से 1910 के बीच उनके जीवन का गोल्डन समय था। साथ काम, साथ सपने। न्यू यॉर्क और न्यू जर्सी के आसपास हर्बर्ट निर्माण और तकनीकी पक्ष संभालते हैं और ऐलिस निर्देशन और क़िस्सागोई। दोनों मिलकर फ़िल्में बना रहे थे। और इसी दौरान, उनका रिश्ता और गहरा होता है क्योंकि अब वे सिर्फ पति-पत्नी नहीं थे, बल्कि रचनात्मक पार्टनर भी थे।
1910 में, Alice एक साहसी क़दम उठाती है— वह फ़ोर्ट ली में Solax Studios बनाती है। यह एक ऐतिहासिक पल था, एक महिला, अपना ख़ुद का फ़िल्म स्टूडियो चला रही थी। हर्बर्ट भी इसमें शामिल थे, यह दोनों का साझा सपना था। इसी बीच उनके दो बच्चे होते हैं, सिमोन (1908) और रेजिनाल्ड (1910)। अब उनके पास सब कुछ था, एक स्वप्नाकार स्टूडियो, सफल करियर और एक परिवार। ऐलिस दिन में फ़िल्में बनाती और घर आकर माँ बन जाती। संतुलन आसान नहीं था— लेकिन वह इसे निभा रही थी।
लेकिन कहते हैं न कि सब कुछ हमेशा एक-सा नहीं रहता। सिनेमा जगत में हॉलीवुड अपने पैर पसार रहा था। बड़े-बड़े स्टुडिओज़ आ रहे थे। ऐसे में फ़ोर्ट ली धीरे-धीरे पीछे छूटने लगा।
ये बदलाव सिर्फ़ कारोबारी नहीं था। हर्बर्ट का फ़ोकस भी बदलने लगा। वह अलग प्रोजेक्टों में जुड़ने लगा और ऐलिस और हर्बर्ट के बीच दूरी बढ़ने लगी। यह दूरी सिर्फ़ काम की नहीं थी— भावनात्मक दूरी भी थी। 1918 से 1920 के बीच उनमें बेहद दूरी आ जाती है और उनका रिश्ता टूट जाता है। कुछ ऐतिहासिक तथ्यों की मानें तो हर्बर्ट किसी और रिश्ते में चला जाता है। इतना ही नहीं, उनकी कंपनी भी डूबने लगती है। यह ऐलिस के लिए बहुत बड़ा झटका था।
और कहानी का आख़िरी मोड़
1920 में ऐलिस अपने बच्चों के साथ फ्रांस लौटती है। यह वापसी जीत की नहीं, बल्कि ख़ामोशी की वापसी थी। अब उनके पास न स्टूडियो है, न पार्टनर, न वही उद्योग शेष है। तो सिर्फ़ उनके बच्चे ही उनकी दुनिया बन जाते हैं। वतन वापसी पर ऐलिस फिर से फ़िल्मों का हिस्सा बनना चाहती हैं लेकिन दौर बदल चुका है और उनके हालात भी। वे अपने में सिमट जाती हैं, जब तक कि उनके मरने के बाद उनको फिर से खोजा नहीं जाता।
तथ्यों के मुताबिक़ ऐलिस के बच्चों ने सिनेमा में कभी क़दम नहीं रखा और बेहद अलग एक ज़िंदगी जी। 1968 में 94 साल की उम्र में ऐलिस ने दुनिया को अलविदा कह दिया। ऐलिस ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में एक किताब लिखी, उसका नाम है: Autobiography of Alice Guy-Blaché।
एक महिला, जिसने सिनेमा को जन्म लेते देखा… फिर उसे अपने हाथों से आकार दिया… और फिर, उसी इतिहास से उसका नाम ग़ायब हो गया। और तब उसने क़लम उठायी और कहा— “अब मैं अपनी कहानी ख़ुद लिखूँगी” और उस किताब में, सिर्फ़ एक जीवन नहीं है… वहाँ सिनेमा का जन्म दर्ज है, उसकी अपनी आँखों से।
ऐलिस के मेमॉइर का सबसे भावनात्मक हिस्सा वह है, जब ऐलिस बताती हैं कैसे उन्हें इतिहास से मिटा दिया गया। वो लिखती हैं “I have been forgotten… yet I was there at the beginning.” अपने जीवन के अंत में, वह पीछे मुड़कर देखती हैं— लिखती हैं, “My youth was spent in a world that was being born.” (मेरा यौवन एक ऐसी दुनिया में बीता जो जन्म ले रही थी)। अंत में उनकी किताब का एक और वाक्यांश है, “I never stopped working… even when I was no longer seen.” (मैंने कभी भी काम करना नहीं छोड़ा, हालाँकि लोगों ने मुझे अनदेखा कर दिया)।
कहते हैं कि एक कलाकार को उसकी कला से जाना जाता है और उसमें उसकी ज़िंदगी की कहानी छुपी होती है, ऐलिस ने सिनेमा को सैकड़ों कहानियाँ दीं लेकिन समय ने उसकी ज़्यादातर कहानियाँ उससे छीन लीं। आज जो कुछ बचा है— वह सिर्फ़ एक झलक है, उस कलाकार की, जिसकी असली दुनिया हम कभी पूरी देख ही नहीं पाएँगे।

चारु शर्मा
फ़िल्मकार, लेखक, प्रोड्यूसर और सांस्कृतिक क्यूरेटर। यथाकथा फ़िल्म एंड लिटरेचर फ़ेस्टिवल की संस्थापक। चारु मुख्यतः सामाजिक मुद्दों और ऐतिहासिक कथाओं संबंधी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और कंटेंट पर केंद्रित हैं। व्यक्तित्वों, विचारों आदि के दस्तावेज़ीकरण से जुड़े प्रोजेक्ट्स से जुड़ी रही हैं। फ़ीचर-लेंथ डॉक्यूमेंट्री “एम्बेसडर ऑफ़ सोशलिज़्म – लाइफ एंड टाइम्स ऑफ डॉ. राममनोहर लोहिया” उनके प्रमुख कार्यों में शामिल है। संपर्क: 9082050680
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