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पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....

आपने सुनी आब-ओ-हवा की गूंज?

            रघु राय साहब का जाना, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु व असम में चुनाव की सरगर्मियां, महिला आरक्षण को लेकर तमाम पहलू, सबरीमाला के मामले के बाद चल रही बहस, जंग में लहूलुहान हो रहीं ज़मीनें, मणिपुर में महिलाओं का सड़कों पर उतरना… ऐसी और न जाने कितनी ही हलचलों के बीच आब-ओ-हवा अपने 50वें अंक के साथ हाज़िर हो रहा है, सोच रहा हूं इस ब्लॉग में क्या-क्या लिखूं, क्या न लिखूं।

अमीर ख़ुसरो या पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी साहब की तरक़ीब अपनाते हुए सारे विषयों को एक धागे में पिरोने की कोशिश करूं तो मुझे पता है मेरी बुनकरी इतनी दुरुस्त न होगी कि सारे जोड़, सारी गिरहें साफ़ न दिखें। यह वैसा ही है कि दाल में स्वाद तो हो, लेकिन बीच-बीच में कंकर आते जाएं… मेरा ख़याल है आब-ओ-हवा के सफ़र और इस अंक का कुछ जाएज़ा लेना बेहतर है।

पिछले कुछ अंकों से जो सिलसिला चल रहा है, आब-ओ-हवा के 50वें अंक में भी हमने जंग के माहौल में अम्न को आवाज़ देने की कोशिश की है। इब्ने इंशा की एक नज़्म है ‘ये बच्चा किसका बच्चा है?’ और जंग के हालात में जो बच्चे मौत से बदतर ज़िंदगी जीने के लिए मजबूर कर दिये जा रहे हैं, वो चेहरे याद कीजिए तो सवाल बहुवचन में गूंजता है, ‘ये बच्चे किसके बच्चे हैं?’ डॉ. जावेद के दो लेख इन्हीं बच्चों के दर्द के इर्द-गिर्द कुछ भीगी हुई कहानियों के पन्ने हैं और ऐसे कि जहां दिल हो, ज़ोर से धड़क उठे।

बिहार के साहित्यिक सफ़र पर एक संग्रहणीय निबंध विवेक रंजन साहब ने क़लमबंद किया है, तो रघु राय की शख़्सियत और कला के कुछ नोट्स अग्रज कवि मिथलेश राय ने। मज़दूरों के खींचे गये रघु राय के चित्र को इस बार कवर इमेज बनाते हुए उनकी याद को दर्ज करना एक मक़सद तो रहा ही। बार-बार ख़याल आता रहा कोई ऐसी तस्वीर मिलती जिसमें क़लम के मज़दूर की शक्ल में आब-ओ-हवा को किसी तरह उकेरा जा सकता… ऐसा चित्र मई दिवस के साथ ही आब-ओ-हवा के 50वें अंक के पड़ाव के संदर्भ में शायद सार्थक होता।

हमारे ब्लॉग्स की अहमियत

50वें अंक के मौक़े पर ब्लॉग्स को लेकर भी कुछ बातें करना चाहता हूं। अब जबकि हमारे नियमित ब्लॉग्स किताबों की शक्ल में आना शुरू हो चुके हैं, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि हम शुरू से अब तक बहुत सारा दस्तावेज़ी काम करने की दिशा में ठीक चल रहे हैं। अरुण अर्णव खरे साहब का ब्लॉग व्यंग्य के अध्ययन के लिहाज़ से एक पूरा दस्तावेज़ तैयार कर चुका है, जो आने वाले वक़्त में शोध के लिए अनिवार्य रूप से उपयोगी होगा। डॉ. संजीव लेखन की कला सिखाते हुए जो ब्लॉग पिछले पांच अंकों से लिख रहे हैं, वह एक संदर्भ बनता जा रहा है।

AI, robot, industrial pollution, climate change

सिनेमा पर जो ब्लॉग जारी हैं, दोनों ही दस्तावेज़ी हैसियत के हैं। मानस 21वीं सदी की 25 फ़िल्मों का चयन कर रहे हैं और चयन के अपने आधार जिस तरह दर्ज कर रहे हैं, कल यक़ीनन उसके हवाले दिये जाएंगे। चारु अपने ब्लॉग में विश्व सिनेमा का इतिहास नये सिरे से रख रही हैं। इस ब्लॉग की ख़ासियत यह है कि इसे पढ़ते हुए आप कहानी का रस ले सकते हैं। ऐसी कहानी, जिसमें शुरूआत है, एक पूरा कथानक है और क्लाइमेक्स भी…

जो ब्लॉग्स अपना सफ़र पूरा कर चुके हैं, उनमें से भी बेशक कुछ ने दस्तावेज़ी महत्व का काम किया। अभी ज्ञानप्रकाश जो ब्लॉग ग़ज़ल की, ख़ास तौर से कथित हिंदी ग़ज़ल की आलोचना को केंद्र में रखकर लिख रहे हैं, वह विधागत समझ और शोध के लिहाज़ से अहम होता जा रहा है। हिंदी ग़ज़ल की प्रवृत्तियों का जायज़ा लेते हुए वह शोधार्थियों के अध्ययन के लिए एक ज़ख़ीरा तैयार कर रहे हैं, अपने ढंग और ढब से ही सही। आगे जल्द किसी मौक़े पर ‘ललित आलोचना’ की संज्ञा से हम इसकी चर्चा करेंगे।

हमारी आवाज़ सुनो…

साहित्य और कला की सेवा के साथ ही हमने समकाल की चुनौतियों को पूरी तरजीह देने की कोशिश शुरू से ही रखी है। पहले शिक्षा के मुद्दों और समझ को लेकर एक नियमित ब्लॉग रहा है। ‘मुआयना’ के अंतर्गत अभी जो चार ब्लॉग हैं, ‘हम बोलेंगे’, ‘बियॉण्ड द ब्रेन’, ‘तत्वान्वेषण’ और ‘ट्रुथ इन हेल्थ’… ये चारों ही नियमित पढ़ रहे हैं तो आप जानते हैं पर्यावरण, स्वास्थ्य, तकनीक और समाज के प्रमुख मुद्दों पर एक आवाज़, एक सोच के साथ आब-ओ-हवा ने हमेशा अपना दख़ल दिया है। इस अंक में ये ब्लॉग्स बेहद संवेदनशील मुद्दों पर चिंतन के लिहाज़ से ज़रूरी हैं।

इस वक़्त सबसे विकराल संकट का नाम है ‘अंधाधुंध विकास’। देश भर में एक विकास माफ़िया पैदा हो चुका है। पूंजी और राजनीति के भ्रष्ट गठबंधन की नीयत के ख़िलाफ़ खड़े होने के लिए हर वक़्त सही होता है, यह कुछ ज़्यादा ही मुफ़ीद है।

यूरोप में ज़हर के जिस धंधे को अपराध माना गया, बंद किया गया, दर्जनों दोषियों को सज़ाएं दी गयीं… उसे भारत में स्थापित कर दिया गया है ‘उद्योग’ और ​’विकास’ के नाम से। विकास के नाम पर इस तरह का गोरखधंधा उस डेथ सर्टिफ़िकेट पर मुहर है कि देश में ‘नागरिक’ नामक संस्था जाने कैसे-कैसे ‘नैरैटिवों’ से मार डाली गयी है।

देश की आब-ओ-हवा दिनो-दिन गर्म होती जा रही है। इसे विशेषज्ञ क्लाइमेट इमरजेंसी कह रहे हैं लेकिन हम हैं कि इस घोषित आपातकाल से भी अनजान बने रहने का नाटक करने में माहिर हो चुके हैं। एक दूसरा पहलू भी आपको चौंका सकता है। ऐसे समझें कि आप जितना एसी चलाते हैं गर्मी उतनी बढ़ती है, यह तो आप जान चुके हैं लेकिन क्या यह सवाल आपके ज़ेह्न में कौंधा कि आप एआई का जितना इस्तेमाल करेंगे, ग्लोबल वॉर्मिंग में उतने भागीदार होंगे?

विकास की अंधी दौड़ में आपकी, आपकी आती पीढ़ियों की और आपके इस इकलौते ग्रह के साथ कितना जानलेवा खिलवाड़ हो रहा है, जयजीत, विवेक रंजन और डॉ. आलोक के इन ब्लॉग्स में इस बार आप जानेंगे। लगातार इन आवाज़ों के साथ जुड़े रहिए और कम से कम जानते रहिए कि आपके सामने ख़तरे क्या हैं? इनसे संघर्ष के रास्ते क्या हैं?

जैसा डॉ. आलोक ने भी लिखा है कि हम विकास के विरुद्ध कैसे हो सकते हैं, यह तो एक अनिवार्य प्रक्रिया है लेकिन इसे संतुलित, नियंत्रित और इस तरह संयत करना ही होगा ताकि मानवता और पृथ्वी ज़िंदा रह सके। कितना अफ़सोसनाक है यह बोलना कि इस वक़्त आप और हम तय नहीं कर सकते कि ऐसा विकास ज़्यादा जानलेवा है या बेशर्मी से चल रहे युद्ध!

इस आह-कराह और चीख-पुकार के बीच आब-ओ-हवा का 50वां अंक बग़ैर किसी नाजायज़ शोर के आपके हाथ है और अब आपको ही इसके भविष्य की चिंता करना है।

हम बहुत विनम्रता से यह बात रखना चाहते हैं कि यहां तक का सफ़र बिल्कुल ही बिल्कुल ज़ाती जुनून और ‘घर फूंक तमाशा देख’ वाली फ़ितरत से किसी तरह हो सका है। कुछ जुनूनी साथी रचनात्मक रूप से साथ रहे हैं, हम उनके आभारी हैं लेकिन आगे सफ़र अब इसलिए आसान नहीं है क्योंकि भूखे पेट भजन न होय गोपाला… लगातार भूखे पेट रहने से ताक़त और हिम्मत जवाब देने लगती है। फिर मौसम ख़राब हो तो इस हालत में सिधारने के अंदेशे बढ़ जाते हैं।

आब-ओ-हवा किसी संस्था, पार्टी या किसी भी तरह से वित्तपोषित उपक्रम नहीं है। निष्पक्ष पत्रकारिता, साहित्य सेवा और पुल बनाने वाले सरोकारों व कलात्मक रुजहानों के प्रति समर्पित ये कोशिशें पूरी तरह से अपने पाठकों को ही आधार और संबल मानती हैं। यदि आप ऐसी ईमानदार और जुनूनी कोशिश को ज़िंदा रखना चाहते हैं, तो हम जल्द ही नये सिरे से क्राउड फ़ंडिंग की अपील के साथ हाज़िर हो रहे हैं, तब तक आप पोर्टल पर दिये गये ‘सहयोग’ खंड का रुख़ कर सकते हैं। हम आपके आभारी हैं।

भवेश दिलशाद, bhavesh dilshaad

भवेश दिलशाद

क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।

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