Rome is just Rome blog by Rati saxena
पाक्षिक ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से.....

रोम बस रोम है...

     इतिहास रोमन संस्कृति के बारे में जिस तरह से चीख-चीखकर कहता है, रोम अनजाने में हमारे मन में प्रवेश कर जाता है। मेरे मन में यदि किसी जगह को देखने की इच्छा थी, तो रोम। मोन्ज़ा तक की यात्रा काफ़ी अच्छी रही, इसलिए रोम के प्रति उत्सुकता बढ़ती गयी। मोन्ज़ा से रोम की यात्रा हमने रेल से की। यूरोपीय रेलें बड़ी सुखद होती हैं, मेरे सामने एक महिला अपने किशोर बेटे के साथ बैठी थी, मेरी बगल वाली सीट में उनकी कोई प्रौढ़ा मित्र बैठी थी। किशोर बड़ा नटखट और बातूनी था, माँ बेटे जिस तरह से हँसी-मज़ाक़ कर रहे थे, लग रहा था कोई भारतीय परिवार ही है।

पूरा रास्ता हँसते-हँसते पार हो गया, रोम आया तो पता ही नहीं चला। रोम में उतरकर मैं रोबर्टों का इंतज़ार करने लगी। थोड़ी देर में रोबर्टों आते दिखायी दिये, रोबर्टों क़रीब 74 बरस के हैं, लेकिन बेहद चुस्त-दुरुस्त लगते हैं। मोन्ज़ा से बुलावा आने पर मैंने रोबर्टों को ही मेल लिखा था कि क्या रोम होते हुए वियेना जा सकते हैं। रोबर्टो ने मुझे अपने घर पर रहने के लिए आमंत्रित ही नहीं किया बल्कि रोम में एक कविता पाठ भी रखवाया। उनकी पत्नी पोला समाजसेविका और समाजशास्त्री हैं। उम्र उनकी भी कम नहीं होगी लेकिन जिस तरह से वे तैयार थीं, मुझे कॉम्प्लेक्स होने लगा। वे पूरे मेकअप और बेहद फ़ैशनैबल कपड़ों में थीं।

मेरे घर आते ही उन्होंने मुझे मेरा कमरा दिखाया और खाना परोस दिया। रोम में खाने का तरीक़ा काफ़ी अलग है, यहाँ कई कोर्स में खाना परसा जाता है। एक के ऊपर एक तश्तरी रखी हुई थी। एक कोर्स ख़त्म होते ही उस तश्तरी को हटा दिया जाता और दूसरे कोर्स के लिए नयी तश्तरी में परोस लिया जाता है। पहले सूप, फिर सलाद, फिर पास्ता…

रोबर्टों ने अपनी जीवन यात्रा गाइड के रूप में शुरू की थी, इसलिए वे जैसे ही सड़क पर पहुँचते कुछ न कुछ बताने लगते। रोबर्टों के पास बताने को काफ़ी कुछ था भी, न जाने कितनी पीढ़ियों से वे त्रस्तेवर में रह रहे थे। जन्म के साथ शिशु न जाने कितनी जानी-अनजानी स्मृतियां लेकर आता है, बीज बनने की गाथा स्मृतियों के संगठित होने की गाथा भी तो है। जिस बिल्डिंग में वे रहते हैं, वे सौ बरस से भी पुरानी है, उनके फ्लैट में सामान है वह सदियों से संकलित किया गया है, भव्य पेंटिंग्स, क्रॉकरी, फ़र्नीचर, सभी बेहद पुराने और अपने भीतर कोई न कोई कहानी लिये हुए।

रोबर्टो ने एक ऐसी पेंटिंग दिखायी, जो थोड़ी अधूरी थी, लेकिन उनके पिता ने किसी बड़े कलाकार से बनवायी थी। आज मैं लिखते वक़्त उस कलाकार का नाम तो भूल रही हूँ, लेकिन पेंटिंग का अधूरापन मन में अभी टंगा है। त्रस्तेवर रोम की प्रमुख सड़क है, जिसमें भव्य इमारतें हैं, जो काफ़ी पुरानी हैं। आश्चर्य की बात यह है कि कोई भी इमारत पुरानी-सी नहीं लगती।

तेवरे (Teverre rivers) उस नदी का नाम है, जिसके किनारे रोम बसा है, इसलिए नदी पार बस्ती को त्रस्तेवरे कहा गया है। रोबर्टो यहूदी हैं। वे बताते हैं कि इसी जर्मन यहूदियों की तलाश में उनके घर तक पहुँचे थे। उस वक़्त उनके माता-पिता और अन्य कुछ रिश्तेदार घर छोड़ के अलग-अलग जगहों में पनाह ले रहे थे। घर को बूढ़ी बीमार दादी और उनकी एक बहन, जो कि उनके परिवार की एकमात्र ईसाई धर्म मानने वाली सदस्या थीं, के भरोसे छोड़ गये। लोगों का विचार था जर्मन बूढ़ों को परेशान नहीं करेंगे। लेकिन उनकी क्रूरता की सीमा की कोई रेखा नहीं थी, उनकी इमारत तक पहुँचने वाले थे कि उनके नीचे की मंज़िल पर रहने वाली एक महिला चतुराई से बूढ़ी दादी को लिफ्ट से पलंग सहित अपनी बिल्डिंग में ले गयी। रोबर्टों की आंटी को जेल में डाल दिया गया, बाद में त्रस्तेवरे के चर्च के पोप के द्वारा दख़ल देने पर छोड़ा गया।

इस बीच पाँच वर्षीय रोबर्टो अपनी माँ के साथ किसी चर्च में पनाह लिये हुए थे और पिता कहीं और छिपे थे। चर्च के द्वारा यहूदियों को पनाह देने के पीछे कारण यह था कि तत्कालीन पोप को आरंभ में तो हिटलर पर भरोसा था कि वह कम्युनिस्टों के ख़िलाफ़ चर्च का साथ देगा, लेकिन हिटलर ने पोप को भी ज़्यादा भाव नहीं दिया, तो पोप ने चर्चों को यहूदियों की चोरी-छिपे सहायता करने का गुप्त आदेश दे दिया। रोबर्टो बता रहे थे कि उस उम्र में उनके लिए सबसे मुश्किल काम था, अपने नाम को याद रखना, क्योंकि उन्हें दो नाम बताये गये थे, एक उनके जन्म का नाम जो माता-पिता ने दिया था, दूसरा ईसाई नाम जो चर्च ने दिया।

रोबर्टों अपनी माँ के साथ उसी चर्च में क़रीब एक साल तक रहे। उन्हें ईसाई नाम दे दिया गया था, और ईसाई प्रार्थनाएँ भी सिखायी गयी थीं, लेकिन उनका अधिकतर वक़्त चर्च के तहख़ाने में चुपचाप बैठे हुए बीतता था।

एक दुर्घटना या चूक!

चलने से पहले मैंने अपने पर्स में एक फोल्डर रखा, जिसमें पाँच सौ यूरो का नोट और पासपोर्ट और साथ में वीसा भी था, हालाँकि चलने से पहले मेरे मन में एक विचार आया कि इतने पैसे एक साथ रखने चाहिए कि नहीं, पर मेरे पास खुल्ले यूरो नहीं थे और मैंने सोचा कि नोट खुला लूँगी। रोबर्टो हमें ट्राम से ले गये। वे लगातार कुछ न कुछ दिखाते- बताते जा रहे थे, अतः मेरा ध्यान उनकी बातों में लगा था। रोबर्टो रोम दिखाने के लिए बड़े उत्साहित थे, लेकिन अभी हम सेंटर में खड़े ही थे कि मुझे लगा कि मेरा बैग कुछ हल्का-सा है। मैंने देखा तो बैग की ज़िप खुली थी, और फोल्डर ग़ायब… कुछ पल के लिए सुन्न रह गयी, पैसे गये तो अलग बात है, लेकिन यहाँ तो वीसा, पासपोर्ट ही ग़ायब है।

रोबर्टो ने कहा कि हो सकता है कि घर में भूल आयी हो, मुझे मालूम था कि मैंने फोल्डर साथ रखा था, लेकिन घर आना ही पड़ा। कुछ नहीं मिला, फिर तो रोम की इमारतें देखने की जगह हम पुलिस डिपार्टमेन्ट के चक्कर लगाने लगे। रोबर्टो के साथ होने के कारण भाषा की समस्या नहीं थी, लेकिन मैं मन में बेहद अजीब-सी शर्म महसूस कर रही थी कि इस उम्र में रोबर्टो को परेशान कर रही हूँ। दूसरे दिन शाम तक हमें पासपोर्ट तो नया मिल गया, लेकिन वीसा बनने की समस्या बरक़रार थी। लेकिन इस बीच काफ़ी कवायद हो चुकी थी। पासपोर्ट बनने के बाद हम पासपोर्ट ऑफ़िस की गली से लगी दूसरी सड़क में खाना खाने आये तो रोबर्टो ने थर्राने वाली बात बतायी।

रोम की लहूलुहान यादें

रोबर्टो बताने लगे कि यह VIA RASELLA है, जहाँ यहूदियों के क़त्ले-आम की नींव रखी गयी थी। जर्मन सेना इस गली से मार्च कर रही थी, किसी बच्चे ने शैतानी में किसी बिल्डिंग के पास एक पटाखा रख दिया। जर्मनों के दो-चार सिपाही ज़ख़्मी हो गये, बस फिर क्या था, उन्होंने उस गली में रहने वाले क़रीब 300 यहूदियों को चुन-चुन कर मार डाला।

मैं रोबर्टो की बात सुन रही थी, रोम का इतिहास ख़ून से रंगा है, जितनी लड़ाइयाँ, जितने युद्ध यहाँ हुए हैं, उतने संभवतः ही किसी और देश में हुए होंगे, लेकिन आश्चर्य यह देखकर होता है युद्ध और क्रूरता के मध्य कला किस तरह से महत्वपूर्ण स्थान बना पायी। इस शहर के चप्पे-चप्पे में कलात्मक वैभव देखते ही बनता है। हर नुक्कड़ पर एक फ़व्वारा, हर गली में इतिहास की खिड़की, शहर नहीं मानों एक बड़ा अजूबा म्यूज़ियम हो।

Rati Saxena

और फिर कविता की शाम

शाम को कविता पाठ था, जिसका इंतज़ाम रीटा और एंजिलो ने एक लाइब्रेरी में करवाया था, जहाँ भारतीय कैफ़े था, और संस्कृत पढ़ायी जाती थी। यूरोपवासी आज भी पुरातन इतिहास और संस्कृति में रुचि लेते हैं। शाम को हम लोग लाइब्रेरी पहुँच गये। छह बज चुके थे, लेकिन Professor Filippo Bettini, जो कि Allegorein नामक एसोसिएशन के प्रमुख थे और Mediterranea नामक महत्वपूर्ण पोइट्री फ़ेस्टिवल चलाते हैं, अभी तक नहीं पहुँचे थे। मुझे असमंजस में पड़ा देखकर रोबर्टो बोले- हम लोग इतालवी हैं, अंग्रेज़ नहीं।

हमारे यहाँ छह बजे का मतलब साढ़े छह या फिर सात बजे होता है। मुझे हँसी आ गयी, तो फिर यह समय की पाबन्दी की बीमारी मात्र अंग्रेज़ों की है, बाक़ी सब तो पूरे मनुष्य हैं, मन का कहना मानने वाले।

मेसीमो भी रोम आने वाला था, मेसिमो ने मेरे द्वारा किये गये अथर्ववेद की प्रेम कविताओं के अनुवादों का इतालवी में अनुवाद किया था। रीटा भी इतालवी कवयित्री हैं।

इस तरह के कार्यक्रमों में पहुँचकर मैं अक्सर घड़ी की ओर देखना बन्द कर देती हूँ। समय को अपने ऊपर से गुज़र जाने देती हूँ। समय एक होता है, अक्सर हम धारा के विरुद्ध तैरने की कोशिश करते हैं, यदि हम अपने को उस प्रवाह के साथ छोड़ दें तो समय हम पर हावी नहीं होता।

यहाँ भी कविताएँ अनुवाद के साथ पढ़ी गयीं, सहगल जी को प्रस्तुति का पहला पूरा मौक़ा मिला था। कविताओं के अनुवाद रोबर्टो ने किसे, क़रीब आधे घण्टे तक मेरी कविताओं का पाठ चला, उसके बाद मैंसिमो और मैंने अथर्ववेद की प्रेम कविताओं का पाठ किया। फिर सहगल की कविताओं का पाठ हुआ, सहगल की छह कविताओं का अनुवाद किया गया था।
दो घण्टे के इस कार्यक्रम को अच्छी तरह से निभाया गया। अनुवाद पाठ भी बेहद अच्छा था।

सहगल का यह पहला कार्यक्रम था, और यह मौक़ा उन्हें कृत्या के माध्यम से मिला था, वे रोबर्टो आदि किसी को नहीं जानते थे। लेकिन उन्होंने केवल रोबर्टो को धन्यवाद दिया, कृत्या का नाम तक नहीं लिया। वे कृत्या के सान्निध्य में रीटा और एंजिलो के घर ठहराये गये थे, लेकिन उनके धन्यवाद भाषण में रीटा का नाम तक नहीं था। मुझे बुरा तो लगना ही था, मैंने इतना नाशुक्रा आदमी देखा नहीं था। मैंने ही अन्ततः सहगल को कृत्या के माध्यम से कविता पाठ के लिए धन्यवाद दिया।

रात को हमें भारतीय खाना खिलाया गया, लेकिन जो परोसा गया। खाना बांग्लादेशियों द्वारा बनाया गया था, स्वाद का अजीब-सा घालमेल, बांग्ला समोसे के साथ लस्सी। खाना परोसते समय इतालवी आचार का ध्यान रखा गया था, इसलिए समोसा चावल के बाद आया।

रति सक्सेना, rati saxena

रति सक्सेना

लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्र​काशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।

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